मध्य प्रदेश में आदिवासी किसानों की जमीन विवाद: 29 परिवारों ने उद्योग को दी गई भूमि के खिलाफ कोर्ट का रुख किया

Written by sabrang india | Published on: April 29, 2026
वर्ष 1976 में शासन से मिली 44 एकड़ भूमि को ‘नजूल’ घोषित कर AKVN के माध्यम से उद्योग को सौंपने का आरोप लगाया गया है, जिसे किसान SC/ST एक्ट और पेसा (PESA) कानूनों का उल्लंघन बता रहे हैं।



मध्य प्रदेश के इंदौर जिले से एक चिंताजनक मामला सामने आया है। यहां 29 आदिवासी किसानों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया है कि उनकी पुश्तैनी कृषि भूमि को नियमों के खिलाफ एक उद्योग को लीज पर दे दिया गया। पीथमपुर के पास काली बिल्लोद क्षेत्र में स्थित खसरा नंबर 278 की लगभग 44 एकड़ जमीन को लेकर यह विवाद गहराता जा रहा है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था और आदिवासी अधिकारों पर सवाल उठने लगे हैं। किसानों के अनुसार, यह जमीन उन्हें वर्ष 1976 में सरकारी योजना के तहत दी गई थी, लेकिन अब इसे नजूल भूमि घोषित कर गलत तरीके से उद्योग को सौंप दिया गया है, जिससे उनकी आजीविका पर गंभीर संकट आ गया है।

किसानों के हवाले से द मूकनायक ने लिखा कि उन्हें यह जमीन उस समय दी गई थी, जब शासन ने उन्हें वन भूमि पर काबिज मानते हुए वैध पट्टे प्रदान किए थे। इसके साथ ही राजस्व विभाग द्वारा भू-अधिकार प्रमाण पत्र भी जारी किए गए थे, जिससे यह भूमि उनके नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज थी। दशकों तक इन परिवारों ने इसी जमीन पर खेती कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया। लेकिन हाल के घटनाक्रम में इस भूमि की प्रकृति बदलकर इसे नजूल घोषित कर दिया गया, जो किसानों के मुताबिक पूरी तरह अवैध और मनमाना कदम है।

इस मामले में सबसे गंभीर आरोप नामांतरण प्रक्रिया में अनियमितताओं और दस्तावेजों में कथित हेरफेर से जुड़े हैं। किसानों का कहना है कि वारिसों के नाम दर्ज करने में जानबूझकर लापरवाही की गई, जिसका लाभ उठाकर जमीन के रिकॉर्ड में बदलाव किए गए। इसी आधार पर मार्च 2025 में इस भूमि को पहले औद्योगिक केंद्र विकास निगम (AKVN) को सौंपा गया और बाद में ‘शक्ति पंप इंडस्ट्रीज’ को लीज पर दे दिया गया। किसानों का आरोप है कि पूरी प्रक्रिया बिना पारदर्शिता के और कानूनी नियमों का पालन किए बिना पूरी की गई।

प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें जमीन से हटाने की कार्रवाई बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई के की गई। उनके अनुसार, प्रशासनिक अधिकारी, पुलिस और उद्योग से जुड़े लोग मौके पर पहुंचे और उन पर जमीन खाली करने का दबाव बनाया। इस दौरान गाली-गलौज और धमकी देने जैसे गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। किसानों का दावा है कि उन्हें अपनी ही जमीन से जबरन बेदखल करने की कोशिश की गई, जिससे वे मानसिक और आर्थिक रूप से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

न्याय की उम्मीद में 16 किसानों ने 6 अप्रैल 2026 को विशेष SC/ST कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई, जिस पर उसी दिन सुनवाई भी हुई। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इंदौर संभाग के राजस्व आयुक्त को नोटिस जारी कर 26 जून तक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा, 22 अप्रैल को किसानों ने हाई कोर्ट में भी एक रिट याचिका दायर की है, जिसमें कलेक्टर के आदेश को रद्द करने की मांग की गई है। किसानों की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज सोनी का कहना है कि यह मामला केवल राजस्व नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी अधिकारों के हनन का भी एक गंभीर उदाहरण है।

किसानों का आरोप है कि भूमि हस्तांतरण के दौरान अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) और पेसा (PESA) कानून सहित अन्य कानूनी प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया गया है। उनका कहना है कि आदिवासी भूमि को सामान्य परिस्थितियों में हस्तांतरित नहीं किया जा सकता और इसके लिए ग्राम सभा की सहमति के साथ-साथ निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक होता है। लेकिन इस मामले में न तो ग्राम सभा से अनुमति ली गई और न ही अधिग्रहण से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया।

एडवोकेट नीरज सोनी के अनुसार, यदि दस्तावेजों में हेरफेर और धोखाधड़ी के आरोप साबित होते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और अन्य पक्षों के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराओं में कार्रवाई हो सकती है। याचिका में इन्हीं आधारों पर आपराधिक मामला दर्ज करने और पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने की मांग उठाई गई है।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अधिक प्रभाव उन 29 आदिवासी परिवारों पर पड़ा है, जो लंबे समय से अपनी आजीविका के लिए इसी जमीन पर निर्भर थे।

जमीन छिनने के बाद कई परिवार अब मजदूरी करने के लिए मजबूर हो गए हैं। किसानों का कहना है कि यह केवल जमीन का विवाद नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों की लड़ाई है। अब सभी की निगाहें अदालत के फैसले पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि इन परिवारों को न्याय मिल पाता है या नहीं।

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