तेलंगाना में 89,000 बाल मजदूर, इनमें से ज्यादातर मादिगा और लंबाडी बच्चे: सर्वे

Written by sabrang india | Published on: April 20, 2026
2024 के जाति सर्वेक्षण में पाया गया कि तेलंगाना में रोजाना मजदूरी वाले काम में लगे 89,000 बच्चों में से 14% मादिगा (SC) और 11% लंबाडी (ST) थे। यह सर्वेक्षण अलग-अलग जाति समूहों के बीच शिक्षा के क्षेत्र में मौजूद भारी असमानताओं को उजागर करता है।


प्रतीकात्मक तस्वीर; iStock

सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक, रोजगार, राजनीतिक एवं जाति (SEEEPC) सर्वे के अनुसार, 2024 में तेलंगाना में लगभग 89,000 बच्चे बाल मजदूरी में लगे हुए थे। इनमें से 14% या लगभग 12,460 बच्चे मादिगा अनुसूचित जाति (SC) समुदाय से थे, जबकि 11% या लगभग 9,790 बच्चे लंबाडी अनुसूचित जनजाति (ST) समूह से थे। तेलंगाना में दिहाड़ी मजदूरों में भी इन समुदायों का एक बड़ा हिस्सा था।

इस सर्वे को अनौपचारिक रूप से तेलंगाना जाति जनगणना कहा जाता है। इसमें पाया गया कि राज्य की 18 साल से कम उम्र की आबादी का लगभग 1% हिस्सा दिहाड़ी मजदूरी में लगा हुआ था। हालांकि यह प्रतिशत छोटा लग सकता है, लेकिन असल में यह बच्चों की एक बहुत बड़ी संख्या है।

आबादी में हिस्सेदारी के हिसाब से देखें तो बाल मजदूरी की सबसे ज्यादा घटनाएं कोलम (ST) समुदाय में 7.2% थीं। इसके बाद कोया (ST), गोंड (ST) और बेडा (SC), साथ ही पिछड़ा वर्ग (BC) के वाल्मीकि समुदायों का नंबर आता है।

सर्वे में जाति समूहों के बीच शिक्षा में लगातार असमानताओं की ओर भी इशारा किया गया है। इसमें SC, ST और BC समूहों में शिक्षा के मामले में ज्यादा पिछड़ापन देखा गया।

एक स्वतंत्र विशेषज्ञ कार्य समूह ने शिक्षा में पिछड़ेपन के एक इंडेक्स का इस्तेमाल करके डेटा का विश्लेषण किया। इस इंडेक्स में स्कूल छोड़ने की दर, हासिल की गई शिक्षा का उच्चतम स्तर, और अंग्रेजी माध्यम व निजी स्कूलों तक पहुंच जैसे कारकों को शामिल किया गया था। ये नतीजे बुधवार, 15 अप्रैल को सार्वजनिक किए गए।

तेलंगाना की 90% आबादी बनाने वाली 56 जातियों में से, जैन समुदाय के लोगों में शिक्षा का स्तर सबसे ऊंचा पाया गया, जबकि ओड्डे (BC) समुदाय सबसे ज्यादा वंचित पाया गया।

रेड्डी, जो एक सामान्य जाति (General Caste) है, कई BC समुदायों के बराबर पाए गए। इनमें BC-C SC ईसाई (पिछड़ा वर्ग–श्रेणी C, जिसमें दलित ईसाई शामिल हैं) और सुनार (BC) शामिल हैं। OC (खुली श्रेणी, या सामान्य श्रेणी) के मुसलमानों का शिक्षा का स्तर भी कई BC समूहों से नीचे पाया गया।

कई BC समूह - जैसे वाल्मीकि, पिचिगुंटला, कुरैशी मुसलमान, अग्निकुलक्षत्रिय, अरे मराठा, माली और मुदिराज - शिक्षा के मामले में ज्यादातर SC समुदायों की तुलना में ज्यादा वंचित पाए गए। अनुसूचित जनजातियों में, कोया और गोंड समुदायों में स्कूल छोड़ने की दर सबसे ज्यादा पाई गई। इसके उलट, ब्राह्मण, अय्यर/अयंगर, BC-C, SC ईसाई, जैन और कापू समुदायों में स्कूल छोड़ने की दर सबसे कम रही।

अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा तक पहुंच में भी काफी अंतर देखने को मिला। जहां 56 प्रमुख जातियों में 30 साल से कम उम्र के लगभग 47% लोगों ने अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई करने की बात कही, वहीं ब्राह्मणों और कोमाटी समुदाय में यह आंकड़ा 72% तक पहुंच गया, जबकि कोलाम (ST) समुदाय में यह महज़ 11% था।

माला (SC) समुदाय में यह अनुपात राज्य के औसत 47% के लगभग बराबर था, लेकिन अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा तक पहुंच के मामले में ज्यादातर SC और ST समुदाय इस औसत से नीचे ही रहे।

इस कार्य समूह की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी ने की, और इसमें राजनीतिक विचारक कांचा इलैया, शिक्षाविद व कांग्रेस नेता प्रवीण चक्रवर्ती, अर्थशास्त्री सुखदेव थोराट, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की पूर्व अध्यक्ष शांता सिन्हा, इतिहास के प्रोफेसर भांग्या भुक्या, पर्यावरणविद् पुरुषोत्तम रेड्डी, अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हिमांशु और सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे शामिल थे। जाने-माने अर्थशास्त्री जीन ड्रेज़, थॉमस पिकेटी और जूलिया कैगे इस समूह के विशेष आमंत्रित सदस्य थे।

सरकार के अनुसार, इस सर्वेक्षण में राज्य की 97% आबादी को शामिल किया गया था।

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