‘शवों को कब्र से निकालना क्रूर और अमानवीय’: छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के शवों को निकालने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Written by sabrang india | Published on: February 19, 2026
सुप्रीम कोर्ट ने शवों को कब्र से निकालने को क्रूर और अमानवीय बताते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार हफ्तों में जवाब तलब किया है और जबरन खुदाई पर तत्काल रोक लगा दी है।


साभार : डेक्कन हेराल्ड

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के गांवों में आदिवासी ईसाइयों के शवों को कब्र से जबरन निकालकर दूसरी जगह दफनाने के गंभीर आरोपों पर सख्त रुख अपनाया है। बुधवार को शीर्ष अदालत ने इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। इसके साथ ही अदालत ने शवों को कब्र से बाहर निकालने (एक्सह्यूमेशन) की किसी भी आगे की कार्रवाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

‘शव अब नहीं निकाले जाएंगे’

द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट आदेश दिया। पीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करने के बाद कहा, “इस बीच यह सुनिश्चित किया जाए कि दफनाए गए शवों को बाहर निकालने की किसी भी आगे की कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जाएगी।” मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद निर्धारित की गई है।

यह आदेश उस याचिका पर आया है, जिसमें दावा किया गया था कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को उनके अपने ही गांवों में, जहां उनके पूर्वज रहते आए हैं, अपने मृत परिजनों को दफनाने से रोका जा रहा है।

क्या है मामला?

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्विस ने अदालत के समक्ष कुछ चिंताजनक घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि एक याचिकाकर्ता की मां के शव को उनकी जानकारी और सहमति के बिना कब्र से निकालकर किसी अन्य स्थान पर पुनः दफना दिया गया।

उन्होंने यह भी बताया कि एक अन्य मामले में एक याचिकाकर्ता के पति के शव को बहुसंख्यक समुदाय के कुछ ग्रामीणों ने कथित तौर पर जबरन कब्र से निकालकर दूर किसी अन्य स्थान पर दोबारा दफना दिया। कॉलिन गोंसाल्विस ने अदालत से आग्रह किया कि कब्रों से शवों को जबरन हटाने की इस अमानवीय प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाई जाए।

संविधान का उल्लंघन

यह याचिका छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वालिटी और अन्य की ओर से अधिवक्ता सत्य मित्रा द्वारा दाखिल की गई है। याचिका में इस घटनाक्रम को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि आदिवासी ईसाइयों को अपने गांवों की सीमा के भीतर अपने मृतकों को दफनाने से रोका जा रहा है, जबकि अन्य समुदायों पर ऐसी कोई पाबंदी लागू नहीं है। याचिका में कहा गया है कि कब्रों से शवों को निकालकर उन्हें 50 किलोमीटर से अधिक दूर ले जाकर पुनः दफनाना न केवल क्रूर और अपमानजनक व्यवहार है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्रदत्त समानता और जीवन के अधिकार का भी गंभीर उल्लंघन है।

याचिकाकर्ताओं की मांगें

याचिका में अनुरोध किया गया है कि राज्य सरकार तथा किसी भी निजी व्यक्ति को अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में हस्तक्षेप या बाधा डालने से रोका जाए। इसके अतिरिक्त, यह भी घोषित करने की मांग की गई है कि जाति, धर्म या एससी/एसटी/ओबीसी स्थिति की परवाह किए बिना प्रत्येक व्यक्ति को उस गांव में अपने मृतकों का अंतिम संस्कार या दफन करने का अधिकार हो, जहां वह निवास करता है।

इसके अलावा, शीर्ष अदालत से यह भी प्रार्थना की गई है कि वह राज्य की सभी ग्राम पंचायतों को निर्देश दे कि प्रत्येक गांव में सभी समुदायों के लिए दफनाने हेतु उपयुक्त क्षेत्र चिन्हित किया जाए। याचिका में धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक ही गांव के भीतर सभी समुदायों के लिए ‘साझा कब्रिस्तान’ (कॉमन ग्रेवयार्ड) विकसित करने की भी पैरवी की गई है। इसमें कहा गया है कि गांव के सार्वजनिक कब्रिस्तान में स्थान न देना संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य तंत्र मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के बजाय उन सांप्रदायिक तत्वों के अवैध कृत्यों को संरक्षण दे रहा है, जो कब्रों से शव निकालते हैं और शोकाकुल परिवारों को भयभीत करते हैं।

याचिका में जनवरी 2025 के एक निर्णय का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में एक पादरी के अंतिम संस्कार से जुड़े मामले में विभाजित फैसला सुनाते हुए दफन क्रिया पड़ोसी गांव में करने का निर्देश दिया था। याचिका में आरोप लगाया गया है कि छत्तीसगढ़ पुलिस अब इस निर्णय को एक ‘मिसाल’ के रूप में पेश कर रही है, ताकि आदिवासी ईसाइयों को उनके अपने गांवों में दफनाने से रोका जा सके, भले ही वहां किसी प्रकार का स्थानीय विवाद मौजूद न हो।

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