गोगामेड़ी: राजपूत–मुस्लिम परंपरा और उस पर होते सांप्रदायिक दावे

Written by Adityakrishna Singh Deora | Published on: January 29, 2026


1. प्रस्तावना
: गोगामेड़ीविवादों में आयी एक पवित्र विरासत 

उत्तरी राजस्थान के हनुमानगढ़ ज़िले में, थार मरुस्थल के किनारे स्थित गोगामेड़ी केवल एक तीर्थस्थल नहीं है, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत के साझा और समन्वयी अतीत का एक जीवित दस्तावेज़ है। यह धाम गोगाजी चौहान, जिन्हें जाहरवीर गोग्गा भी कहा जाता है, को समर्पित है—जो 11वीं शताब्दी के एक मध्यकालीन राजपूत सामंत एवं संत थे। उनकी पूजा और मान्यता धार्मिक सीमाओं से परे रही है। सदियों से गोगामेड़ी में हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग—किसान, पशुपालक, योद्धा और व्यापारी—आते रहे हैं। राजस्थान में यह उन दुर्लभ पवित्र स्थलों में से एक है, जहाँ ऐतिहासिक रूप से धार्मिक पहचान से अधिक महत्व वंश, स्मृति और साझा श्रद्धा का रहा है। किन्तु इस समावेशी परंपरा पर हाल के समय में संकट मंडराया है।
 
इस वर्ष 26 जनवरी को जयपुर की रहने वाली  सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रिद्धिमा शर्मा गोगामेड़ी पहुँचीं और वहाँ से ऐसे वीडियो व बयान साझा किए, जो व्यापक रूप से सांप्रदायिक और भड़काऊ थे  । सोशल मीडिया पर तेजी से फैलाए गए इन बयानों में गोगामेड़ी में मुस्लिम सहभागिता की वैधता पर सवाल उठाए गए और ऐसी सांप्रदायिक भाषा का प्रयोग किया गया, जो इस स्थल की जीवित परंपराओं से पूरी तरह अलग है। इस घटना के बाद गोगामेड़ी में सार्वजनिक टकराव देखने को मिले और क्षत्रिय परिषद जैसे राजपूत संगठनों ने इसकी निंदा की। उनका आरोप था कि रिद्धिमा शर्मा एक ऐसे तीर्थ को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रही हैं, जिसकी जड़ें हिन्दू-मुस्लिम राजपूतों के मिले-जुले साझा इतिहास पर तिकी है और जिसका ब्राह्मण-परम्परा से कोई संबंध ही नहीं।
 
गोगामेड़ी में जो कुछ हुआ, वह किसी एक इन्फ्लुएंसर की व्यक्तिगत हरकत भर नहीं था। यह एक बड़े राजनीतिक प्रोजेक्ट का लक्षण है—ऐसा प्रोजेक्ट जो साझा लोक-तीर्थों को संकुचित, ब्राह्मणवादी हिंदू स्थलों में बदलना चाहता है, सांप्रदायिक राजनीति में ना फिट होते इतिहास को मिटाते हुए और सदियों पुराने संरक्षक समुदायों को हाशिये पर धकेलते हुए। अपने राजपूत वंशानुक्रम और मुस्लिम पुजारी परंपरा के कारण गोगामेड़ी इस परियोजना के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट है।
 
2. गोगामेड़ी, गोगाजी चौहान और साझा पंथ की राजपूत संरक्षकता
 
गोगाजी चौहान, जिन्हें जाहरवीर गोग्गा भी कहा जाता है, उत्तर-पश्चिम भारत की लोक-ऐतिहासिक स्मृति में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं।
 
गोगामेड़ी को सांप्रदायिक खाँचों में बाँटना इतना कठिन क्यों है, इसे समझने के लिए स्वयं गोगाजी चौहान की ऐतिहासिक भूमिका को देखना आवश्यक है। वे भाट परंपराओं, मौखिक आख्यानों और लोक स्मृति में पशुपालकों और  किसानों के रक्षक के रूप में याद किए जाते हैं। गोगाजी जांगलदेश या ददरेवा (वर्तमान चूरू ज़िला) के एक चौहान राजपूत प्रमुख थे और इतिहासकार दशरथ शर्मा, आर.सी. टेम्पल, क्यामखान रासो तथा जैन ग्रंथ श्रावक-व्यातुड़ी-अतिचार जैसे स्रोतों के अनुसार वे महमूद ग़ज़नवी के समकालीन थे। इन स्रोतों के अनुसार वे राजस्थान के चौहान सम्राटों के अधीन एक सामंती शासक थे। हरियाणा के फ़ाज़िल्का से लेकर चूरू के ददरेवा तक फैला उनका क्षेत्र चायलवाड़ा कहलाता था—जो उनके चौहान उपवंश चायल के नाम पर था।
 
फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ के काल में कई चायल सरदारों ने सूफ़ियों के प्रभाव में इस्लाम स्वीकार किया। ददरेवा के राजा करमचंद चौहान, जिन्होंने बाद में क़ायमख़ान नाम अपनाया, उनमें से एक थे। उनके और उनके भाई के वंशज, जिन्हें सामूहिक रूप से क़ायमख़ानी कहा जाता है, आज तक उत्कृष्ट सैनिक रहे हैं और कई वीर चक्र विजेता दिए हैं। झुंझुनूं और (सीकर के पास) फ़तेहपुर नगरों की स्थापना क़ायमख़ानी शासकों नवाब मोहम्मद ख़ान और नवाब फ़तेह ख़ान ने की थी।
 
इसी कारण गोगाजी उन देवताओं से भिन्न हैं जिन्हें ब्राह्मणवादी कर्मकांडों में समाहित कर लिया गया। वे एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व से लोक-योद्धा-संत बने—ऐसे संत जिनकी सत्ता शास्त्रों से नहीं, बल्कि शौर्य, स्थानीय प्रभुत्व और जनमान्यता से निकली।
 
एक अत्यंत महत्वपूर्ण, किंतु अक्सर जानबूझकर छिपाया गया तथ्य यह है कि गोगामेड़ी के मुख्य पुजारी ऐतिहासिक रूप से चायल (चौहान) वंश के मुस्लिम राजपूत रहे हैं, जिन्हें स्वयं गोगाजी के वंशज माना जाता है। उनकी उपस्थिति किसी बाद की “समायोजन नीति” का परिणाम नहीं, बल्कि इस तीर्थ की मूल परंपरा का हिस्सा है। राजस्थान की लोक धार्मिक संरचना में रूढ़िवादी मत से अधिक वंश का महत्व रहा है, और गोगामेड़ी इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। यहाँ पुजारित्व ब्राह्मणीय योग्यता पर नहीं, बल्कि रक्त और वंश पर आधारित है।
 
गोगामेड़ी राजस्थान के पाँच पंचपीरों से जुड़े तीर्थों की परंपरा का हिस्सा है। इनमें पाबूजी राठौड़, मेहाजी मांगलिया, रामदेवजी तोमर और हरबूजी सांखला जैसे राजपूत योद्धा-संत शामिल हैं। इन सभी स्थलों पर परंपरागत रूप से संतों के अपने वंशज—चाहे वे आज हिंदू हों या मुस्लिम—संरक्षक रहे हैं। आधुनिक सांप्रदायिक ढाँचे को यह परंपरा असहज करती है, लेकिन पूर्व-औपनिवेशिक समाज में यह पूरी तरह स्वाभाविक थी।
 
गोगामेड़ी कोई हाशिये का या उपेक्षित स्थल नहीं रहा है। जून 2025 में यहाँ बामसेफ (एक अम्बेडकरवादी संगठन) और उसकी राजपूत शाखा केएमएम की एक बैठक हुई, जिसमें हिंदू और मुस्लिम, दोनों राजपूतों ने भाग लिया। यह आयोजन दर्शाता है कि गोगामेड़ी आज भी धार्मिक सीमाओं से परे राजपूत एकता का केंद्र है—एक तथ्य जिसे मुख्यधारा की चर्चाओं में अक्सर नज़रअंदाज़ किया जाता है।
 
इस तीर्थ की समावेशी परंपरा को रियासती सत्ता ने भी मान्यता दी। 1911 में बीकानेर के शासक महाराजा गंगा सिंह राठौड़ ने गोगामेड़ी परिसर का जीर्णोद्धार कराया। यह केवल निर्माण कार्य नहीं था, बल्कि ऐतिहासिक संरक्षण का एक महत्वपूर्ण प्रयास था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि चायल चौहान वंश के मुस्लिम पुजारियों को हिंदू श्रद्धालुओं द्वारा उचित सम्मान मिले, उन्हें राज्य संरक्षण प्राप्त हो और गोगाजी के वंशज होने के नाते उनके भरण-पोषण की व्यवस्था हो। बीकानेर शासक का यह कदम गोगामेड़ी के समन्वयी और राजपूत-केंद्रित चरित्र को और सुदृढ़ करता है।
 
इस प्रकार गोगामेड़ी केवल हिंदू–मुस्लिम सौहार्द का प्रतीक नहीं है। यह एक विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक भूमिका निभाता है, जो हिंदू राजपूतों और मुस्लिम राजपूतों—विशेष रूप से क़ायमख़ानियों—को एक साझा पवित्र और ऐतिहासिक संसार में बाँधता है। इस स्थल को सांप्रदायिक बनाने का कोई भी प्रयास इस नाज़ुक लेकिन स्थायी बंधन को तोड़ने की कोशिश है।
 
3. इन्फ्लुएंसर राजनीति, और एक राजपूत तीर्थ पर ब्राह्मणवादी कब्ज़ा
 
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रिद्धिमा शर्मा की कार्रवाइ एक अलग ही राजनीतिक अर्थ ग्रहण करती हैं। वे गोगामेड़ी की परंपराओं से जुड़ी कोई स्थानीय श्रद्धालु नहीं हैं, बल्कि जयपुर की एक ब्राह्मण सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर हैं, जिनकी पहचान सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने की है। गोगामेड़ी में उनका हस्तक्षेप सहज भक्ति नहीं, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र में दखल था, जो संरचनात्मक और ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणवादी सत्ता से अलग रहा है।
 
यहाँ उद्देश्य केवल सामान्य हिंदू–मुस्लिम तनाव नहीं था। प्रयुक्त भाषा और मुस्लिम पुजारियों पर केंद्रित सवाल यह संकेत देते हैं कि उद्देश्य हिंदू राजपूतों और मुस्लिम राजपूतों, विशेष रूप से क़ायमख़ानियों, के बीच दरार पैदा करना था—जो लंबे समय से इस क्षेत्र की सामाजिक और राजनीतिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। मुस्लिम संरक्षकता को चुनौती देकर ऐसे प्रयास राजपूत वंश-आधारित संरक्षकता को अवैध ठहराना चाहते हैं और उसकी जगह ब्राह्मण-केंद्रित धार्मिक नियंत्रण स्थापित करना चाहते हैं।

यह कोई नया पैटर्न नहीं है। उत्तर भारत भर में साझा लोक तीर्थ—चाहे वे योद्धा-संतों से जुड़े हों, पशुपालक देवताओं से या स्थानीय पीरों से—तेजी से “शुद्धिकरण” के निशाने पर हैं। इस प्रक्रिया में तीर्थ को संस्कृतनिष्ठ ढाँचे में ढालना, ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति, वंशानुगत संरक्षकों को हाशिये पर डालना और इतिहास की ऐसी व्याख्या करना शामिल है, जो एकरूप और ब्राह्मणीकरण किए गए हिंदू पहचान से मेल खाए। गोगामेड़ी का प्रतिरोध उसके राजपूत वंशानुक्रम और मुस्लिम पुजारियों की परंपरा में निहित है, जो ब्राह्मणवादी सामाजिक-राजनीतिक प्रभुत्व के विस्तार में बाधा डालती है।
 
इस दृष्टि से गोगामेड़ी की घटना किसी एक इन्फ्लुएंसर के बयान भर का मामला नहीं, बल्कि सत्ता, स्मृति और नियंत्रण के लिए संघर्ष है। तीर्थ पर नियंत्रण का अर्थ है दान, आख्यान और क्षेत्रीय प्रभाव पर नियंत्रण। मुस्लिम राजपूत पुजारियों को हटाना न केवल स्थल को सांप्रदायिक बनाएगा, बल्कि उस राजपूत राजनीतिक संरचना को भी तोड़ेगा, जो ऐतिहासिक रूप से ब्राह्मणीय मध्यस्थता से बाहर रही है।
 
इसलिए स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया को केवल रक्षात्मक प्रतिक्रिया नहीं माना जाना चाहिए। यह एक निर्विवादित तथ्य है कि गोगामेड़ी एक गैर-ब्राह्मणीय, वंश-आधारित पवित्र व्यवस्था का हिस्सा है, और गोगाजी पंथ को पर ब्राह्मणवादी सामाजिक-राजनीतिक ढाँच थोपने की कोशिश इतिहास के साथ छेड़छाड़ और सांस्कृतिक आक्रमण के समान है।
 
निष्कर्ष: गोगामेड़ी की रक्षा, इतिहास की रक्षा है
 
गोगामेड़ी को लेकर उठा विवाद यह याद दिलाता है कि भारत का धार्मिक अतीत आज की राजनीतिक परियोजनाओं की तुलना में कहीं अधिक जटिल, बहुरंगी और समावेशी रहा है। गोगामेड़ी जैसे तीर्थ इसलिए जीवित रहे क्योंकि उन्होंने परस्पर टकराव —हिंदू और मुस्लिम के बीच, पुजारी और योद्धा के बीच, भक्ति और वंश के बीच—का विरोध किया। ऐसे स्थलों को सांप्रदायिक बनाना परंपरा की रक्षा नहीं, बल्कि उसका विकृतिकरण है।
 
आज गोगामेड़ी में जो हो रहा है, वह एक कसौटी है। क्या साझा पवित्र स्थलों को उनके अपने ऐतिहासिक संदर्भ में अस्तित्व में रहने दिया जाएगा, या उन्हें जबरन एक ऐसी एकरूप धार्मिक व्यवस्था में समाहित कर दिया जाएगा, जो एक जाति और एक आख्यान को सर्वोच्च मानती है? गोगामेड़ी की रक्षा केवल सौहार्द बचाने का प्रश्न नहीं है; यह इतिहास के उस अधिकार की रक्षा है, जो जटिल, असहज और समावेशी होने का साहस रखता है। इस अर्थ में गोगामेड़ी की लड़ाई कोई सिमित लड़ाई नहीं है। यह इस बात का निर्णय करता  है कि आने वाले समय में भारत स्वयं को कैसे याद रखना चाहता है।
 

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