200 से अधिक घटनाओं का अभूतपूर्व विश्लेषण: कैसे जनसांख्यिकीय घबराहट, स्वयंभू निगरानी और अल्पसंख्यक-विरोधी लामबंदी भारत के सार्वजनिक क्षेत्र को नया रूप दे रही है

पिछले छह महीनों में उत्तर प्रदेश से गुजरात और असम से महाराष्ट्र तक, छोटे कस्बों, मंदिरों के प्रांगन, सामुदायिक भवनों, औद्योगिक इलाकों और अस्थायी मंचों पर एक अलग ही तरह की राजनीति पनपती दिखी है। यह ऐसी भाषा और सोच है जो भारत के संविधान की भावना से टकराती ही नहीं, बल्कि उसे बदल देने की कोशिश करती है। प्रवीण तोगड़िया के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद (AHP) और उसकी युवा इकाई राष्ट्रीय बजरंग दल (RBD) के सैकड़ों कार्यक्रमों में एक नई “नैतिक व्यवस्था” गढ़ी जा रही है जहां आबादी को लेकर डर को देशभक्ति माना जाता है, हथियारों को समुदाय की रक्षा के पवित्र साधन की तरह पेश किया जाता है, पितृसत्ता को अच्छे नागरिक होने की पहचान बना दिया जाता है और अल्पसंख्यकों- खासकर मुसलमानों और ईसाइयों- को बराबरी के नागरिक नहीं बल्कि समाज के लिए खतरा बताया जाता है। यह सब अलग-अलग जगहों पर हुई नफरत भरी भाषणबाज़ी भर नहीं है। इससे साफ दिखता है कि बहुसंख्यक ताकत की एक संगठित और फैली हुई व्यवस्था खड़ी की जा रही है। यह व्यवस्था राज्य की नजरों से ओझल रहकर काम करती है, संस्थानों की चुप्पी और लापरवाही से ताकत पाती है और धीरे-धीरे भीड़ के दम पर चलने वाली ऐसी सत्ता को सामान्य बना देती है जो संविधान की हैसियत को ही चुनौती देने लगती है। साथ ही, प्रवीण तोगड़िया का दशकों तक विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े रहने के बाद उनसे अलग होकर नई राह पकड़ना भी एक रहस्यमय और समझ से परे बदलाव है, जो गंभीर सवाल और जांच का विषय है।
हालांकि भारत में लंबे समय से सांप्रदायिक दुश्मनी की छिटपुट घटनाएं या कभी-कभी भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाएं देखने को मिलती रही हैं, लेकिन स्टडी के लिए चुने गए छह महीने का समय अपनी तीव्रता, तालमेल और भौगोलिक फैलाव के कारण अलग है। तोगड़िया के ध्रुवीकरण वाले नेतृत्व में, एएचपी और आरबीडी ने दर्जनों पब्लिक रैलियां, शस्त्र पूजा समारोह, त्रिशूल और हथियार बांटने के कार्यक्रम, वैचारिक ट्रेनिंग कैंप, धर्मांतरण विरोधी विरोध प्रदर्शन, अल्पसंख्यक धार्मिक सभाओं में रुकावट और अंतर-धार्मिक और सामुदायिक जिंदगी में सीधे दखल दिए। इन घटनाओं में सामने आए पैटर्न कट्टरता की आकस्मिक अभिव्यक्तियां नहीं हैं, बल्कि एक सावधानीपूर्वक बनाई गई वैचारिक परियोजना के हिस्से हैं जो धर्मशास्त्र, पुरुषत्व की अवधारणा, रीति-रिवाज और हिंसा को एक सुसंगत संगठनात्मक रणनीति में मिलाते हैं।
इस लामबंदी का सामाजिक-कानूनी महत्व न केवल भाषणों की सामग्री या सभाओं की फ़्रीक्वेंसी में है, बल्कि एक समानांतर नियम व्यवस्था के निर्माण में भी है - एक बहुसंख्यकवादी तंत्र जो तेजी से सार्वजनिक जीवन, सामुदायिक संबंधों और हिंसा के वितरण को आकार दे रहा है। AHP-RBD की गतिविधियां उस चीज के मजबूत होने का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसे सतर्कता संप्रभुता का एक बुनियादी ढांचागत रूप कहा जा सकता है। इस सिस्टम में, सांप्रदायिक पहचान सार्वजनिक व्यवस्था का आयोजन सिद्धांत बन जाती है; हिंसा को नैतिक कर्तव्य के रूप में फिर से परिभाषित किया जाता है; पुरुषत्व की अवधारणा एक नागरिक आदर्श बन जाती है और राज्य के अधिकार को उग्र धार्मिकता द्वारा पूरक या खत्म कर दिया जाता है। यह कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है। यह एक पैटर्न में है, स्क्रिप्टेड है, नियमित है और संगठनात्मक संरचनाओं में एम्बेडेड है जो इसे निरंतरता, पुनरुत्पादन और प्रसार प्रदान करती हैं।
यह लेख छह महीनों तक चली इस गतिविधि को सामाजिक और कानूनी नजरिये से देखता है। इसके लिए कई राज्यों में हुए एएचपी–आरबीडी के कार्यक्रमों से जुटाए गए विस्तृत आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है (पूरी सूची संलग्न दस्तावेज में दी गई है)। भाषणों में बार-बार उभरने वाले विषयों, इस्तेमाल की गई भाषा, रस्मों-रिवाजों और खास तौर पर पुलिस जैसी राज्य संस्थाओं के साथ संगठन के व्यवहार को समझते हुए, लेख यह दिखाता है कि एएचपी–आरबीडी की गतिविधियां भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को खतरनाक दिशा में मोड़ रही हैं। इस लामबंदी से सत्ता की एक दोहरी व्यवस्था उभरती दिखती है। एक तरफ वह संवैधानिक राज्य है, जो बराबरी, आजादी और धार्मिक स्वतंत्रता की बात करता है, लेकिन जिसे धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है। दूसरी तरफ एक समानांतर, गैर-कानूनी बहुसंख्यकवादी ताकत है, जो अलग-अलग धर्मों के बीच रिश्तों पर नजर रखती है, तय करती है कि कौन सा धर्म ‘सही’ है, महिलाओं और लैंगिक व्यवहार पर नियंत्रण करती है और समुदाय की रक्षा के नाम पर हिंसा को जायज ठहराती है।
संवैधानिक लोकतंत्र के लिए इसके नतीजे बहुत गंभीर हैं। एएचपी–आरबीडी की गतिविधियां संविधान की धर्मनिरपेक्षता और समानता की बुनियादी सोच को खुली चुनौती देती हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि ये घटनाएं दिखाती हैं कि संविधान की ये प्रतिबद्धताएं सिर्फ सरकार की कार्रवाइयों से ही नहीं, बल्कि उसकी चुप्पी और निष्क्रियता से भी कमजोर होती हैं- जैसे चुनिंदा पुलिस कार्रवाई, परोक्ष समर्थन, बयानबाजी में तालमेल या फिर चरमपंथी भाषा को धीरे-धीरे सामान्य मान लेना। जब नफरत खुले तौर पर स्वीकार्य बना दी जाती है, तो अल्पसंख्यक समुदायों के लिए नागरिक स्पेस सिमटता जाता है और बहुसंख्यक आक्रामकता समाज को काबू में रखने का मान्य तरीका बन जाती है।
सामाजिक आंदोलनों के नजरिये से देखें तो एएचपी–आरबीडी, बड़े हिंदुत्व तंत्र के भीतर एक उग्र धड़ा बनकर काम करता है। यह कट्टर भाषा और हिंसा की सीमाओं को आगे खिसकाता है, जिससे जो बातें पहले अस्वीकार्य थीं वे धीरे-धीरे सामान्य लगने लगती हैं। इसका असर यह होता है कि मुख्यधारा के राजनीतिक नेता अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई देने लगते हैं, जबकि वे उसी माहौल का फायदा उठाते हैं जो उग्र लामबंदी ने बनाया है। कानूनी नजरिये से, इस समूह की गतिविधियां- नफरत फैलाने वाले भाषणों से लेकर हिंसा के लिए उकसाने, हथियारों के इस्तेमाल और चौकसीवाद तक- भारतीय न्याय संहिता, शस्त्र अधिनियम और संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों का बार-बार उल्लंघन करती हैं।
इस लेख में बताया गया है कि एएचपी–आरबीडी की यह लामबंदी केवल बढ़ती बहुसंख्यक आक्रामकता का उदाहरण भर नहीं है, बल्कि सांप्रदायिक राजनीति के एक नए तरीके का संकेत है। यह ऐसा तरीका है जिसमें रस्मों, पुरुषत्व की अवधारणा, धार्मिक प्रतीकों, इतिहास की नए सिरे से व्याख्या और कानूनी अस्पष्टता को जोड़कर एक शक्तिशाली राजनीतिक ढांचा तैयार किया गया है। यह संरचना वैचारिक भी है और संस्थागत भी जो लंबे समय तक चलने वाली गतिविधियां पैदा कर सकती है, कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर सकती है, भावनात्मक माहौल गढ़ सकती है और चुनावी व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। इसके कानूनी असर को समझने के लिए हमें अलग-अलग उल्लंघनों से आगे बढ़कर उस व्यापक सामाजिक-कानूनी बदलाव को देखना होगा, जिसका यह हिस्सा है- एक ऐसी समानांतर राजनीतिक व्यवस्था का धीरे-धीरे उभरना, जो भीतर से ही संवैधानिक लोकतंत्र को विस्थापित करने की क्षमता रखती है।
वीएचपी के हाशिये से उग्र चरमपंथी संगठन तक
प्रवीण तोगड़िया, जो पेशे से प्रशिक्षित कैंसर सर्जन हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जरिये हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति में आए और आगे चलकर विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने- या उन्हें इस पद पर स्थापित किया गया। यही दौर उनकी राजनीतिक परीक्षा की घड़ी थी। उन्होंने आक्रामक सांस्कृतिक लामबंदी के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई, खास तौर पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के लिए ‘त्रिशूल दीक्षा’ जैसे कार्यक्रमों के आयोजन के माध्यम से। ये आयोजन खुले तौर पर सांप्रदायिक उकसावे और हथियारों के वितरण से जुड़े थे और कई बार राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन भी करते थे।
वीएचपी की मूल युवा शाखा बजरंग दल ने एएचपी–आरबीडी की कामकाजी रणनीतियों का खाका तैयार किया। इसकी बुनियादी विचारधारा- हिंदुत्व, इस्लामोफोबिया और अतिदक्षिणपंथी विचार- राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान और उसके बाद 2002 के गुजरात दंगों में और ज्यादा पुख्ता हुई, जिनमें तोगड़िया की भूमिका काफी अहम रही। तोगड़िया की पृष्ठभूमि और गतिविधियों के विस्तृत विश्लेषण के लिए Communalism Combat के मई 2003 के अंक Against the Law [1]को देखा जा सकता है। बजरंग दल की विरासत- जिसमें ईसाइयों पर हमलों से लेकर तथाकथित ‘मोरल पुलिसिंग’ तक की हिंसा और सांप्रदायिक निशाना बनाना शामिल है-यही वह वैचारिक जमीन है, जिस पर एएचपी–आरबीडी खड़ा है।
एएचपी–आरबीडी, तोगड़िया के लिए वह मंच है जिसके जरिये वे खुद को बिना समझौते वाले, सख्त हिंदुत्व की ‘असली आवाज’ के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। यही पृष्ठभूमि एएचपी–आरबीडी की लामबंदी की कई खासियतों को समझाती है:
● इसकी बेहद उग्र और भड़काऊ भाषा, जो मुख्यधारा के हिंदुत्व के सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण वाले तत्वों से भी आगे निकल जाती है;
● जनसंख्या को लेकर डर फैलाने और महिलाओं व लैंगिक व्यवहार पर पुलिसिंग की इसकी सोच;
● पहचान गढ़ने के साधन के रूप में रस्मों और प्रतीकों के सैन्यीकरण पर इसकी निर्भरता;
● कानून और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति इसका खुला अनादर;
● और बीजेपी के मुकाबले खुद को एक उग्र धड़े के रूप में पेश करने की इसकी रणनीति, जो परोक्ष रूप से बीजेपी के राजनीतिक वर्चस्व को और मजबूत करती है।
एएचपी–आरबीडी वैचारिक कट्टरता के बढ़ने, संगठनों के भीतर बदलाव और उस राजनीतिक माहौल का नतीजा है, जो बहुसंख्यक आक्रामकता को लगातार ज्यादा सहनशील नजर से देखने लगा है। यह संगठन राज्य की सत्ता और राष्ट्रवादी भाषा के बीच बने खाली स्थानों में फलता-फूलता है- कानून लागू करने में अस्पष्टता, राजनीतिक नेतृत्व की दुविधा और एक ऐसे समाज की बेचैनी में, जो ध्रुवीकरण, असुरक्षा और ऐतिहासिक पीड़ासे जूझ रहा है।
नफरत एक संरचना के रूप में: पैटर्न का विश्लेषण
इस लेख में जिन घटनाओं का विश्लेषण किया गया है, वे अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई एएचपी–आरबीडी की गतिविधियों का विस्तृत विवरण पेश करती हैं। इनमें रैलियां, भाषण, धार्मिक अनुष्ठान, त्योहार, हथियारों के प्रशिक्षण शिविर, तथाकथित “जागरूकता” अभियान, अल्पसंख्यक संस्थानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, जुलूस और स्थानीय विवादों में दखल जैसी गतिविधियां शामिल हैं। हर घटना में स्थान, गतिविधि का स्वरूप, भाषणों की सामग्री, इस्तेमाल किए गए प्रतीक, प्रदर्शन के तत्व (जैसे त्रिशूल, तलवारें, आग्नेयास्त्र) और पुलिस की मौजूदगी या अनुपस्थिति जैसी जानकारियां दर्ज हैं।
यह लेख पिछले छह महीनों की इन घटनाओं को अलग-थलग मामलों के रूप में नहीं, बल्कि एक समेकित ढांचे के रूप में देखता है- एक ऐसी राजनीतिक प्रस्तुति के रूप में, जिसके जरिए राष्ट्र, समाज और नागरिकता की एक खास कल्पना गढ़ी जाती है और जमीन पर उतारी जाती है।
उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एएचपी के कार्यक्रमों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और प्रतीकों में एक साफ़ पैटर्न उभरकर सामने आता है। यहाँ नफ़रत फैलाने वाले भाषण को सिर्फ़ गाली-गलौज या शब्दों की आक्रामकता के रूप में नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसे सोच और समझ को गढ़ने-मोड़ने की एक रणनीति, यानी विमर्श को जानबूझकर ढालने की तकनीक, के रूप में देखना होगा। यह सांप्रदायिक सीमाएं बनाने, नैतिक मूल्य तय करने, दुश्मनों की पहचान करने और हिंसा के तरीकों को सही ठहराने का एक संगठित तरीका है। अलग-अलग राज्यों और हालात में भी वही बातें बार-बार लगभग एक ही तरह से सामने आती हैं- जनसंख्या को लेकर डर, “लव जिहाद” का भूत, ऐतिहासिक अन्याय की भावना, भूभाग खोने की आशंका और सभ्यता पर खतरे की बात। ये कोई अचानक कहे गए शब्द नहीं हैं, बल्कि एक सोची-समझी वैचारिक पटकथा के हिस्से हैं, जिनका मकसद लोगों के मन में डर, शर्म, गर्व और रक्षात्मक गुस्सा पैदा करना होता है।
इतनी ही अहम बात इस लामबंदी का रस्मों वाला पहलू है। शस्त्र पूजा, त्रिशूल दीक्षा, सामूहिक तलवार-आशीर्वाद, या हथियारों का भक्तिपूर्ण प्रदर्शन जैसी रस्में सिर्फ़ सांस्कृतिक प्रदर्शन से कहीं ज़्यादा हैं। ये हिंसा को सीधे धार्मिक और नैतिक रीति-रिवाजों में शामिल करके उसे पवित्र बनाने की कोशिशें हैं। जब हथियारों को पवित्र माना जाता है, दिखाया जाता है और सामूहिक सम्मान की चीजों के तौर पर बांटा जाता है, तो भक्ति और आक्रामकता के बीच की सीमा खत्म हो जाती है। रीति-रिवाजों पर एंथ्रोपोलॉजी के काम और राजनीतिक धर्म की थ्योरी से प्रेरणा लेते हुए, यह विश्लेषण ऐसी घटनाओं को ऐसे परफॉर्मेटिव कामों के तौर पर देखता है जो सतर्कता की ओर एक नैतिक जिम्मेदारी पैदा करते हैं। वे प्रतिभागियों को खुद को सिर्फ भक्त नहीं, बल्कि रक्षक के तौर पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे हिंसा सही और जरूरी लगने लगती है।
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि AHP–RBD खुद को गैर-कानूनी अथॉरिटी के सोर्स के तौर पर कैसे पेश करता है। कई मामलों में, कैडर पुलिसिंग से जुड़े काम करते हैं: अलग-अलग धर्मों के लोगों के रिश्तों में दखल देना, चर्चों या प्रार्थना सभाओं पर छापा मारना, "संदिग्ध" व्यवहार के आरोपी लोगों को हिरासत में लेना, या सुरक्षा के बहाने इलाकों की निगरानी करना। सामाजिक-कानूनी सिद्धांत के नजरिए से देखने पर, ये हरकतें अलग-थलग अतिक्रमण नहीं हैं, बल्कि एक समानांतर शासन संरचना के संकेत हैं। AHP प्रभावी ढंग से संप्रभु कार्य करता है - खतरों की पहचान करना, अनुशासन लागू करना और नैतिक उल्लंघनों पर फैसला सुनाना - इस तरह यह कानूनी जबरदस्ती पर राज्य के एकाधिकार के साथ मुकाबला करता है। यहां सतर्कता शासन का एक तरीका बन जाती है, न कि कोई असामान्य बात।
संवैधानिक और कानूनी ढांचों के सामने रखने पर, इस पैटर्न का महत्व और भी साफ हो जाता है। संगठन की बातें हेट-स्पीच कानून के तहत सवाल खड़े करती हैं; इसके हथियारबंद रीति-रिवाज संभावित रूप से आर्म्स एक्ट का उल्लंघन करते हैं; धार्मिक कामों में इसका दखल आर्टिकल 25 और 26 से जुड़ा है और मुस्लिम और ईसाई समुदायों को निशाना बनाना आर्टिकल 14 और 15 की समानता की गारंटी को चुनौती देता है। चिंता अलग-अलग उल्लंघनों की मौजूदगी नहीं है, बल्कि संवैधानिक नियमों का कुल मिलाकर जो नुकसान हो रहा है, वह है। जैसे-जैसे ऐसी प्रथाएं सामान्य होती जाती हैं, मौलिक अधिकारों का सुरक्षा ढांचा कमजोर होता जाता है और राज्य के अधिकार और बहुमत की इच्छा के बीच की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं।
सोशल मूवमेंट थ्योरी के नजरिए से देखने पर, यह लामबंदी उससे मेल खाती है जिसे कई लोग चरमपंथी खेमा (radical flank) कहते हैं: एक बड़े वैचारिक इकोसिस्टम का एक चरमपंथी धड़ा जो स्वीकार्य बातचीत की सीमाओं को बढ़ाकर सार्वजनिक मानदंडों को बदल देता है। AHP की खुली दुश्मनी, सामाजिक अलगाव के लिए साफ-साफ आह्वान और पवित्र माने जाने वाले सतर्कतावाद से ऐसा माहौल बनता है जिसमें मुख्यधारा के राजनीतिक नेता उदारवादी दिखते हैं, भले ही वे बहुसंख्यकवादी विचारों के करीब जा रहे हों। आंकड़े यह दिखाते हैं कि इस तरह की हाशिये की, उग्र भाषा हाशिये तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे राजनीतिक सोच के केंद्र में जगह बना लेती है। इसका नतीजा यह होता है कि समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है और लोकतांत्रिक जीवन में सही–गलत की नैतिक सीमाएं नए सिरे से तय होने लगती हैं।
इसी वजह से यह विश्लेषण नफरत को अलग-अलग, बिखरी हुई घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थायी ढांचे के रूप में देखता है- एक ऐसी बनावट जो भाषा, रस्मों, सार्वजनिक जगहों और सत्ता के रिश्तों में गहराई से रची-बसी है। यहां लामबंदी को अर्थ गढ़ने की एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया के तौर पर समझा गया है, जो कानून, पहचान और राज्य की शक्ति के बंटवारे से अलग नहीं है। सांप्रदायिक दुश्मनी के ऐसे बार-बार दोहराए जाने वाले प्रदर्शन धीरे-धीरे यह तय करने लगते हैं कि सार्वजनिक जीवन में क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं- अक्सर कानून बदलने से बहुत पहले ही सामाजिक मानदंड खिसक जाते हैं। साथ ही यह विश्लेषण इस बात को भी सामने लाता है कि गैर-कानूनी ताकतें कानून की अस्पष्टताओं और उसे लागू करने में मौजूद खामियों का रणनीतिक रूप से फायदा उठाकर सार्वजनिक जगहों, निजी रिश्तों, धार्मिक आचरण और रोजमर्रा के सामाजिक संबंधों पर अपना नियंत्रण स्थापित करती हैं। इस नजरिये से देखें तो नफरत सिर्फ एक भाषा या विचार नहीं रह जाती, बल्कि शासन का एक तरीका बन जाती है, जो नीचे से ऊपर की ओर समाज के नैतिक और संवैधानिक ढांचे को बदलने लगती है।
बहुसंख्यकवाद, विजिलैंटे सॉवरेंटी और डर की राजनीति
आंकड़ों के आधार पर एएचपी–आरबीडी की इस लामबंदी को समझने के लिए संगठन को तीन अहम वैचारिक नजरियों में रखकर देखना जरूरी है- बहुसंख्यक राष्ट्रवाद, विजिलैंटे सॉवरेंटी (चौकसीवादी संप्रभुता) और डर की राजनीति। बहुसंख्यक राष्ट्रवाद उस सोच को दर्शाता है, जिसमें किसी एक धर्म या समुदाय को देश का असली मालिक माना जाता है, जबकि अल्पसंख्यकों को या तो शर्तों के साथ स्वीकार किया जाता है या फिर संभावित खतरे के रूप में देखा जाता है। यह ढांचा एएचपी–आरबीडी के भाषणों से काफी मेल खाता है, जहां बार-बार भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में पेश किया जाता है और मुसलमानों व ईसाइयों को बाहरी तत्वों की तरह दिखाया जाता है जिन पर नजर रखना या जिन्हें नियंत्रित करना जरूरी बताया जाता है।
विजिलैंटे सॉवरेंटी की अवधारणा यह समझने में मदद करती है कि कैसे गैर-राज्य समूह खुद को राज्य के विस्तार की तरह पेश करने लगते हैं। ऐसे समूह नैतिक नियम लागू करते हैं, समुदायों पर निगरानी रखते हैं, लोगों के निजी रिश्तों में दखल देते हैं और कई बार हिंसा करते हैं या उसकी धमकी देते हैं। एएचपी–आरबीडी की छापेमारी, लोगों को रोककर पूछताछ करना और सड़कों पर सीधे हस्तक्षेप करना इसी पैटर्न में आते हैं। ये कार्रवाइयां सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और बल प्रयोग करने के राज्य के विशेष अधिकार को सीधी चुनौती देती हैं।
डर की राजनीति यह बताती है कि ऐसे आंदोलन डर को सिर्फ एक भावना के रूप में नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने और सक्रिय करने के टूल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जनसंख्या को लेकर खतरे की बातें, “लव जिहाद,” धर्मांतरण की साजिशें और अतीत के विश्वासघातों का जिक्र करके एएचपी–आरबीडी एक ऐसा माहौल बनाता है जिसमें हर तरफ खतरा महसूस होने लगता है और आक्रामक कदम उठाना जायज लगने लगता है। डर वह ताकत बन जाता है जो समर्थकों को एकजुट रखता है और असाधारण सोच व व्यवहार को सही ठहराने का आधार बनता है।
एक ऐसे एकतरफा राजनीतिक शून्य में, जहां विपक्ष अब तक नफरत भरे भाषणों में किए जा रहे तमाम बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों- चाहे वे “जनसंख्या के खतरे” की बातें हों, “निजी रिश्तों पर सांप्रदायिक नियंत्रण”, “धार्मिक रस्मों का सैन्यीकरण” या कानून के नाम पर सड़कों पर ताकत दिखाने की कार्रवाइयां-का कोई भरोसेमंद, लगातार और प्रभावी जवाब नहीं दे पाया है, वहां यह विजिलैंटिज्म बिना किसी रोक-टोक के चलता रहता है।
2. जनसंख्या को लेकर डर की राजनीति
जनसंख्या को लेकर डर एएचपी–आरबीडी की लामबंदी की रणनीति का केंद्र बिंदु है। छह महीने के आंकड़ों में यह देखा गया कि नेता बार-बार यह बात फैलाते हैं कि हिंदू अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं और मुसलमान रणनीतिक रूप से तेजी से बढ़ रहे हैं। इस कहानी को ऐसे पेश किया जाता है जैसे यह कोई सवाल ही नहीं है, बल्कि एक निश्चित तथ्य है। इसमें सबूत की तुलना में दोहराव, भावना और चित्रण ज्यादा काम आता है, मुसलमानों को तेजी से बढ़ते, इलाके में फैलना, राजनीतिक रूप से संगठित होते और राष्ट्र के अस्तित्व के लिए खतरा बनते दिखाया जाता है।
हालांकि हिंदू राष्ट्रवादी सोच में जनसंख्या को लेकर चिंता लंबे समय से मौजूद रही है, एएचपी–आरबीडी इसे असामान्य तीव्रता और एकरूपता के साथ इस्तेमाल करता है। चाहे अहमदाबाद में भाषण हो, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके हों, उत्तर प्रदेश के छोटे शहर हों या असम के सीमा जिले, नेता लगभग एक ही पटकथा दोहराते हैं: हिंदू घट रहे हैं; मुसलमान जमीन पर कब्जा कर रहे हैं; जनसांख्यिकीय असंतुलन हिंदू सभ्यता के लिए खतरा है; मुस्लिम “वोट बैंक” राजनीति नियंत्रित कर रहे हैं और हिंदू महिलाएं सीधे खतरे में हैं। विभिन्न क्षेत्रों में इस संदेश की लगातार समानता यह दिखाती है कि यह कोई बिखरी हुई स्थानीय भावना नहीं, बल्कि एक संगठित वैचारिक परियोजना है।
सामाजिक-कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो जनसंख्या को लेकर डर एक राजनीतिक उपकरण की तरह काम करता है। यह एक स्थायी आपातकाल का भाव पैदा करता है, जिसमें भविष्य से अनुमानित खतरों के आधार पर वर्तमान को ढाला जाता है। इस माहौल में संविधानिक मानदंड अपर्याप्त लगने लगते हैं। नफरत फैलाने वाले भाषण को “चेतावनी” के रूप में पेश किया जाता है, हथियारों के प्रशिक्षण को “सुरक्षा” कहा जाता है और विजिलैंटिज्म को “रोकथाम की कार्रवाई” के रूप में दिखाया जाता है। यहां तक कि संविधान की समानता को भी एक ऐसा जोखिम बताया जाता है, जिसे हिंदू अब सहन नहीं कर सकते।
जनसंख्या को लेकर डर एक तरह से जमीन या इलाकों का नक़्शा बनाने का तरीका भी बन जाता है। कई भाषणों में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को “कब्जा किए गए इलाके,” “मिनी-पाकिस्तान” या “बांग्लादेशी क्षेत्र” कहा जाता है। इससे सामान्य रहने या काम करने के तरीकों को ही घुसपैठ के प्रतीक में बदल दिया जाता है। एक मुस्लिम मोहल्ला शत्रुतापूर्ण जमीन बन जाता है और रोजमर्रा की जिंदगी ही अतिक्रमण का सबूत बन जाती है।
सामाजिक स्तर पर जनसंख्या का यह डर व्यक्तियों को एक खतरनाक भीड़ में बदल देता है। एक मुस्लिम युवा “जनसंख्या जिहाद” का संकेत बना दिया जाता है, एक मुस्लिम परिवार को कब्जे की साजिश के रूप में देखा जाता है और एक मुस्लिम इलाका विस्तार का अड्डा मान लिया जाता है। इससे मुसलमानों को नागरिक या पड़ोसी के रूप में देखने की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। उन्हें इंसान नहीं, बल्कि जनसांख्यिकीय खतरे के रूप में पेश किया जाता है। ऐसी अमानवीय सोच भेदभावपूर्ण व्यवहार और हिंसा को भी जायज दिखाने लगती है।
इसी के साथ जनसंख्या को लेकर फैला डर हिंदू पहचान को भी नए सिरे से गढ़ता है। इसमें हिंदुओं को कमजोर और चारों तरफ से घिरे हुए दिखाया जाता है, पुरुषों को “रक्षक” की भूमिका अपनाने के लिए उकसाया जाता है और महिलाओं को समुदाय की इज्जत का प्रतीक बना दिया जाता है। यह कहानी अलग-अलग हिंदू समूहों को खतरे और कर्तव्य की एक साझा भावना के तहत एकजुट करने में मदद करती है। भाषण दर भाषण, एएचपी के नेता हिंदुओं से “जागने”, “सतर्क रहने” और “संघर्ष के लिए तैयार होने” की अपील करते हैं। इस तरह डर सामूहिक पहचान गढ़ने का एक टूल बन जाता है।
कानूनी तौर पर देखें तो जनसंख्या को लेकर फैलाया गया यह डर सिर्फ भ्रामक ही नहीं, बल्कि नुकसानदेह भी है। यह भेदभाव को बढ़ावा देता है, बहिष्कार को सामान्य बनाता है और हिंसा के लिए बहाने गढ़ता है। भारतीय संवैधानिक कानून-खासकर नफरत भरे भाषणों से जुड़े मामलों जैसे प्रवासी भलाई संगठन (2014) और अमीश देवगन (2020)-में साफ कहता है कि किसी पूरे समुदाय को खतरनाक बताने वाली भाषा समानता, गरिमा और सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन है। इसके बावजूद, एएचपी-आरबीडी के कई कार्यक्रमों में पुलिस और स्थानीय प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं, जिससे यह संदेश जाता है कि ऐसी भाषा को बर्दाश्त किया जा रहा है। संविधान द्वारा दी गई सुरक्षा और जमीनी हकीकत के बीच यही फासला जनसंख्या के डर को खुले तौर पर फैलने और सार्वजनिक जीवन में जड़ें जमाने का मौका देता है।
आखिरकार, जनसंख्या को लेकर फैलाया गया डर ही एएचपी-आरबीडी की पूरी लामबंदी की बुनियाद है। यह मुसलमानों को स्थायी दुश्मन के रूप में पेश करता है, संतान पैदा करने को संघर्ष का मैदान बना देता है और हथियारों की रस्मों, जेंडर पुलिसिंग, विजिलैंटिज्म, यहां तक कि अलगाव या हिंसा की मांगों को भी जायज ठहराने का आधार देता है। जनसंख्या के इस डर के बिना एएचपी की ज्यादातर कहानी अपनी धार खो देती है। लेकिन इसके सहारे लगभग हर तरह की कार्रवाई को संभव और स्वीकार्य बनाया जा सकता है।
3. जेंडर, सेक्सुअलिटी और नजदीकी रिश्तों पर सामुदायिक नियंत्रण
एएचपी-आरबीडी की विचारधारा के केंद्र में जेंडर और सेक्सुअलिटी हैं। संगठन भले ही “हिंदू धर्म की रक्षा” और “हिंदू महिलाओं की सुरक्षा” की बात करता हो, लेकिन उसके भाषण एक ऐसी सोच दिखाते हैं जो गहराई से पितृसत्तात्मक, जरूरत से ज्यादा पितृसत्तात्मक और सांप्रदायिक है। इसमें महिलाओं के शरीर और उनके निजी फैसलों पर समुदाय की इज्जत के नाम पर नियंत्रण किया जाता है। इस नियंत्रण का सबसे बड़ा टूल“लव जिहाद” की साजिशी थ्योरी है- जिसके तहत यह दावा किया जाता है कि मुस्लिम पुरुष जानबूझकर हिंदू महिलाओं से रिश्ते बनाते हैं ताकि उनका धर्म परिवर्तन कराया जा सके और हिंदू समाज को कमजोर किया जा सके।
आंकड़ों में दर्ज लगभग आधे कार्यक्रम सीधे तौर पर “लव जिहाद” का जिक्र करते हैं। यह संयोग नहीं है। इससे एक ऐसी सोच झलकती है जिसमें जेंडर को सामुदायिक टकराव का सबसे अहम मैदान बना दिया जाता है। हिंदू महिलाओं को मासूम, भोली और आसानी से बहकाए जाने वाली बताया जाता है, जबकि मुस्लिम पुरुषों को शिकारी, चालाक और जरूरत से ज्यादा हापरसेक्सुअल के रूप में पेश किया जाता है। यह दोतरफा तस्वीर किसी तथ्य पर आधारित नहीं है, बल्कि इसे लगातार विजिलैंस, शक और दुश्मनी को जायज ठहराने के लिए गढ़ा गया है।
एएचपी-आरबीडी के विमर्श में हिंदू महिला को संवैधानिक अधिकारों वाली एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता। इसके बजाय उसे हिंदू वंश की वाहक और समुदाय की शुद्धता का प्रतीक मान लिया जाता है। उसका शरीर मानो समुदाय की संपत्ति बन जाता है, और उसके रिश्तों को जनसंख्या से जुड़े खतरे के नजरिये से परखा जाता है। किसी भी अंतरधार्मिक रिश्ते को शुरू से ही जबरदस्ती का नतीजा मान लिया जाता है। हिंदू महिलाओं की अपनी इच्छा और निर्णय की क्षमता से इनकार करके, संगठन उन्हें अपनी पसंद रखने वाले व्यक्ति की बजाय “सुरक्षा की जरूरत वाली वस्तु” में बदल देता है।
यह संरचना तीन बड़े सामाजिक-कानूनी असर पैदा करता है।
पहला, यह महिलाओं पर निगरानी को सही ठहराता है। एएचपी-बीआरडी के सदस्य बाजारों, कॉलेजों और कार्यस्थलों जैसे सार्वजनिक जगहों पर नजर रखते हैं, ताकि हिंदू महिलाओं और मुस्लिम पुरुषों के बीच होने वाले संपर्क पर निगाह रखी जा सके। उनकी मौजूदगी से हर समय जांच-पड़ताल और शक का माहौल बन जाता है। हिंदू महिलाएं आजाद नागरिकों की तरह नहीं, बल्कि सीमाएं तय करने वाले संकेत बन जाती हैं- उनकी आवाजाही और दोस्तियों पर “सुरक्षा” के नाम पर नियंत्रण किया जाता है।
दूसरा, यह मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है। कई भाषणों में मुस्लिम पुरुषों को अपने आप में खतरा बताकर पेश किया जाता है और लोगों को उन्हें रोकने, सजा देने या यहां तक कि मार डालने तक के लिए उकसाया जाता है। ऐसी भाषा सीधे तौर पर BNS और समानता व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन करती है। फिर भी ये बातें खुलेआम कही जाती हैं, कई बार पुलिस की मौजूदगी में, जिससे यह संदेश जाता है कि जेंडर की “सुरक्षा” के नाम पर सांप्रदायिक हिंसा को बर्दाश्त किया जा रहा है।
तीसरा, यह विमर्श संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है। हदिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि बालिग़ अपने जीवनसाथी को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। शफीन जहां, नवतेज जौहर और पुट्टस्वामी जैसे फैसलों में स्वायत्तता, गरिमा और निजता को संविधान के मूल मूल्य माना गया है। लेकिन एएचपी-आरबीडी की लामबंदी में व्यक्ति की आजादी की जगह सामुदायिक नियंत्रण ले लेता है। अंतरधार्मिक रिश्तों को साजिश के रूप में पेश किया जाता है और संवैधानिक सुरक्षा को हिंदू अस्तित्व के लिए खतरा बताकर दिखाया जाता है।
समाजशास्त्रीय तौर पर देखें तो यह जेंडर आधारित कहानी हिंदू पुरुषों को एक साझा पितृसत्तावादी जिम्मेदारी के एहसास के जरिए आपस में बांधती है। “हिंदू महिलाओं की रक्षा” का आह्वान हिंदू पुरुषों के बीच एकजुटता बनाने का तरीका बन जाता है। पितृसत्तावाद को सैन्य अंदाज में परिभाषित किया जाता है- शक्ति, विजिलैंस और टकराव के लिए तैयार रहना। हथियारों की पूजा या त्रिशूल वितरण जैसे अनुष्ठान इस सोच को और मजबूत करते हैं। कुल मिलाकर, जेंडर यहां ऐसे पुरुषों का एक समुदाय गढ़ने का टूल बन जाता है, जिन्हें टकराव के लिए पहले से तैयार किया जाता है।
इस तरह “लव जिहाद” सिर्फ एक मिथक या राजनीतिक नारा नहीं रह जाता। यह एएचपी-आरबीडी की लामबंदी का एक केंद्रीय आधार बन जाता है। इसके जरिए महिलाओं की स्वायत्तता पर लगाम लगाई जाती है, मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ दुश्मनी को हवा दी जाती है, समूह की पहचान मजबूत की जाती है और निगरानी व हिंसक कार्रवाई को नैतिक तौर पर सही ठहरा दिया जाता है। यह रोजमर्रा के निजी रिश्तों को जंग का मैदान बना देता है और निजी नजदीकियों को समुदाय के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बनाकर पेश करता है।
4. अनुष्ठानिक सैन्यीकरण और हिंसा का पवित्रीकरण
एएचपी-आरबीडी की लामबंदी की सबसे अहम विशेषताओं में से एक है हिंसा को सामान्य बनाने में अनुष्ठानों की केंद्रीय भूमिका। आंकड़ों में शस्त्र पूजा, त्रिशूल दीक्षा (त्रिशूलों का वितरण), हथियार चलाने की ट्रेनिंग, आत्मरक्षा कार्यशालाओं और तलवारों, बंदूकों व त्रिशूलों के सार्वजनिक प्रदर्शन से जुड़े कई कार्यक्रम दर्ज हैं। ये चीजें राजनीतिक सभाओं में सिर्फ सजावट के लिए नहीं होतीं, बल्कि संगठन की विचारधारात्मक रणनीति का मूल हिस्सा होती हैं।
शस्त्र पूजा, जो परंपरागत रूप से एक धार्मिक अनुष्ठान है, एएचपी-आरबीडी के कार्यक्रमों में साफ तौर पर राजनीतिक अर्थ ले लेती है। तोगड़िया के भाषणों में हथियारों की सराहना उनके प्रतीकात्मक महत्व के लिए नहीं, बल्कि उनके इस्तेमाल के लिए की जाती है- यानी बल के जरिए हिंदू समुदाय की “रक्षा” करने की क्षमता के लिए। तलवार को साहस, त्रिशूल को शुद्धता और बंदूक को तैयारी का प्रतीक बताया जाता है। जब हथियारों को आशीर्वाद दिया जाता है, तो दरअसल हिंसा को ही आशीर्वाद दिया जाता है। यह अनुष्ठानिक संरचना आक्रामकता को नैतिक ढाल देता है, जिससे राजनीतिक मंशा धार्मिक प्रथा के पीछे छिप जाती है।
त्रिशूल दीक्षा इस प्रक्रिया को और आगे ले जाती है। युवाओं को त्रिशूल बांटना एक धार्मिक दीक्षा के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन असल में इससे ऐसे लोगों का एक समूह तैयार होता है जिन्हें “धर्म के रक्षक” के तौर पर चिन्हित किया जाता है। ये त्रिशूल पहचान के प्रतीक बन जाते हैं जो टकराव के लिए तैयार होने के खुले संकेत हैं। इस तरह के दीक्षा अनुष्ठान दूसरे संदर्भों में सक्रिय उग्रवादी समूहों की प्रथाओं से मिलते-जुलते हैं, जहां प्रतीकात्मक वस्तुएं लोगों को सामूहिक संघर्ष के विचार से भावनात्मक रूप से बांध देती हैं।
हथियार चलाने की ट्रेनिंग की मौजूदगी गंभीर कानूनी सवाल खड़े करती है। आर्म्स एक्ट के तहत हथियारों को संभालने या उनकी ट्रेनिंग देने के लिए सख्त अनुमति जरूरी होती है। इसके बावजूद AHP-RBD अक्सर ऐसे सत्र सार्वजनिक रूप से आयोजित करता है और कई बार पुलिस की ओर से कोई आपत्ति नहीं दिखती। हथियार प्रशिक्षण के दो मकसद होते हैं- एक तरफ यह व्यावहारिक कौशल सिखाता है और दूसरी तरफ यह संदेश देता है कि संगठन खुद को राज्य के समानांतर एक ताकत के रूप में देखता है। इसका मतलब यह भी निकलता है कि AHP- RBD हिंसा पर राज्य के एकाधिकार को स्वीकार नहीं करता।
समाजशास्त्रीय नजरिये से देखें तो ये अनुष्ठान आक्रामकता के इर्द-गिर्द एक तरह की सामुदायिक भावना पैदा करते हैं। ये ऐसे पुरुष-प्रधान माहौल बनाते हैं जहां हिंसा को पवित्र माना जाता है, उसका महिमामंडन किया जाता है और उसका अभ्यास भी कराया जाता है। धार्मिक भक्ति उग्र राष्ट्रवाद से मिल जाती है, जिससे वह स्थिति बनती है जिसे विद्वान “पवित्रीकृत राजनीति” (sacralised polity) कहते हैं यानी ऐसी राजनीतिक पहचान जो शक्ति के अनुष्ठानिक प्रदर्शन और टकराव के लिए हमेशा तैयार रहने की मानसिकता से गढ़ी जाती है।
इसके सामाजिक और कानूनी असर काफी दूर तक जाते हैं। अनुष्ठानिक सैन्यीकरण धर्म और राजनीति, प्रतीक और बल, कानून और गैर कानूनी कामों के बीच की सीमाओं को धुंधला कर देता है। इससे ऐसा समुदाय बनता है जो यह मानने लगता है कि उसे कानून से बाहर जाकर काम करने का नैतिक अधिकार है- शायद नैतिक जिम्मेदारी भी। हथियार पवित्र वस्तुएं बन जाते हैं, हिंसा सामुदायिक कर्म में बदल जाती है और निगरानी या स्वयं न्याय करने की प्रवृत्ति को कर्तव्य समझा जाने लगता है। इस तरह ये अनुष्ठान उस बुनियादी सिद्धांत को कमजोर करते हैं कि वैध बल प्रयोग का अधिकार सिर्फ राज्य के पास है और इसी के साथ संवैधानिक लोकतंत्र की एक अहम नींव हिल जाती है।
5. क्षेत्रीय मिथक, ऐतिहासिक पुनर्लेखन और नफरत का भौगोलिक विस्तार
AHP- RBD की लामबंदी की एक बड़ी खासियत यह है कि वह भूगोल और इतिहास को सांप्रदायिक नजरिए से दोबारा गढ़ती है। संगठन खुद को सिर्फ मौजूदा राजनीतिक विवादों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि मिथकीय इतिहास, सभ्यतागत दावों और जमीन से जुड़ी शिकायतों के मिले-जुले स्रोतों से तर्क खींचता है। यह पुनर्लेखन केवल सांस्कृतिक नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक कोशिश है-यह तय करने की कि राष्ट्र का “असल” हिस्सा कौन है, जमीन पर हक किसका है और सार्वजनिक व पवित्र स्थलों पर नैतिक अधिकार किसे होना चाहिए। यह दावा कि मक्का, मदीना या वेटिकन जैसे वैश्विक धार्मिक स्थल कभी हिंदू मंदिर थे, ऐतिहासिक रूप से निराधार है, लेकिन इसका एक वैचारिक मकसद है। इससे ऐसी कहानी बनाई जाती है जिसमें हिंदू सभ्यता को पवित्र भूगोल का मूल मालिक बताया जाता है, और इस्लाम व ईसाई धर्म को बाद में आने वाली, दखल देने वाली ताकतों के रूप में दिखाया जाता है जिन्होंने दूसरों की चीजें हड़प लीं।
यही सोच AHP की राजनीतिक थियोलॉजी का केंद्र बनती है। हिंदू धर्म को दुनिया की पहली सभ्यता और वैश्विक पवित्र स्थलों का असली संरक्षक बताया जाता है। मुसलमानों और ईसाइयों को बाहरी आगंतुक, सभ्यता को बिगाड़ने वाले और ऐतिहासिक आक्रमणकारी कहकर पेश किया जाता है। यह नस्ली रंग लिए हुआ ढांचा भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों को राष्ट्रीय पहचान से ही अलग करने की कोशिश करता है। जब मक्का तक को “छिना हुआ” हिंदू क्षेत्र बताया जाता है, तो इशारा साफ होता है कि अगर वैश्विक इस्लामी स्थलों को ही अवैध ठहराया जा सकता है, तो भारत में मुसलमानों का भारत से जुड़ाव और भी ज्यादा कमजोर और संदिग्ध दिखाया जा सकता है।
इन विचारों के ठोस सामाजिक-कानूनी असर दिखाई देते हैं। अजीब-ओ-गरीब क्षेत्रीय दावे सांप्रदायिक लामबंदी का आधार बन जाते हैं। काशी या मथुरा को “वापस लेने” की मांग सिर्फ कुछ खास मंदिरों को लेकर दिया गया तर्क नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक धारणा पर टिकी होती है कि सभी मुस्लिम धार्मिक ढांचे तोड़े गए हिंदू स्थलों पर बनाए गए हैं। मस्जिदों को अतीत की हार के प्रतीक के रूप में दोबारा पेश किया जाता है और मुस्लिम मौजूदगी को अपमान की याद की तरह दिखाया जाता है। इस सोच में हिंसा आक्रामकता नहीं, बल्कि “भरपाई” बन जाती है यानी “इतिहास को ठीक करने” की कोशिश।
यह स्थान-आधारित राजनीति भावनाओं से भरी भाषा के जरिए और मजबूत की जाती है। मुसलमानों को अक्सर “क़ब्जाधारी,” “अतिक्रमणकारी,” “जमीन हड़पने वाले,” “बांग्लादेशी” या “जिहादी बसने वाले” जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। इस तरह के नामाकरण आम रिहायशी इलाकों को कल्पित जंग के मैदान में बदल देते हैं। नागरिकता यहां रहने भर का सवाल बन जाती है, जिसे कभी भी छीना जा सकता है। अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों में नेता यह दावा करते हैं कि मुस्लिम- बहुल इलाके “नो-गो जोन” बन चुके हैं, मानो राज्य अपने ही इलाके पर नियंत्रण खो चुका हो। भले ही ऐसे दावों का कोई तथ्यात्मक आधार न हो लेकिन ये जमीन से जुड़ा डर पैदा करते हैं- यह एहसास कि हिंदू अपने ही वतन में भौतिक तौर पर जगह खो रहे हैं।
इस तरह AHP की क्षेत्रीय कल्पना भारत की सामाजिक भूगोल को दोबारा गढ़ने की परियोजना के रूप में काम करती है। यह जमीन, मंदिरों, सांस्कृतिक स्मृति और यहां तक कि शहरी जगहों पर भी हिंदू स्वामित्व का दावा करती है। यह सक्रिय “पुनः प्राप्ति” का आह्वान करती है, जिसे अक्सर धार्मिक कर्तव्य के रूप में पेश किया जाता है। अयोध्या को बार-बार इस बात के सबूत के तौर पर दिखाया जाता है कि ऐसी वापसी न सिर्फ संभव है, बल्कि जरूरी भी है। यहीं से काशी, मथुरा और कई दूसरे स्थलों को एक अंतहीन सभ्यतागत परियोजना के अगले चरण के रूप में पेश किया जाता है। यह तर्क आगे बढ़कर धार्मिक स्थलों से बाहर पूरे इलाकों तक फैल जाता है। असम के जिलों, पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों और उत्तर प्रदेश या कर्नाटक के कुछ हिस्सों को “कब्जे में पड़ी हिंदू जमीन” बताया जाने लगता है।
इस तरह का मिथकीय पुनः क्षेत्रीकरण ऐसा माहौल बनाता है जिसमें हिंसा को स्थान के आधार पर जायज ठहराया जाता है। जिन इलाकों को “कब्जा किया हुआ” कहा जाता है, वे वैध निशाने बन जाते हैं। स्थानीय मुस्लिम समुदायों को ऐतिहासिक आक्रमणकारियों के वारिस के रूप में पेश किया जाता है। “घर वापसी” (पुनः धर्मांतरण) के आह्वान जमीन और धार्मिक स्थलों की भौतिक “वापसी” की मांगों के साथ चलते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जगह खुद वर्चस्व स्थापित करने का टूल बन जाती है।
संवैधानिक नजरिए से देखें तो यह स्थान-आधारित भाषा भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे की जड़ पर हमला करती है। यह समान नागरिकता, धर्म की स्वतंत्रता और इस सिद्धांत को कमजोर करती है कि हर व्यक्ति - उसकी वंशावली या ऐतिहासिक दावों से अलग- देश का बराबर का हिस्सा है। संविधान नागरिकता या क्षेत्रीय अधिकारों का आधार किसी “सभ्यतागत स्वामित्व” को नहीं मानता। लेकिन AHP की सोच ठीक ऐसी ही एक सीढ़ीनुमा व्यवस्था खड़ी करती है, जिसमें अल्पसंख्यकों को शर्तों पर शामिल सदस्य बना दिया जाता है जिनका देश से जुड़ाव हर समय सवालों के घेरे में रहता है।
भूगोल को विचारधारा और इतिहास को शिकायत में बदलकर, AHP नागरिकता के रोजमर्रा के अनुभव को नए सिरे से गढ़ देता है। जहां मुसलमान रहते हैं, काम करते हैं, पढ़ते हैं या इबादत करते हैं, उन जगहों को विवादित इलाकों की तरह पेश किया जाता है। अयोध्या, काशी और मथुरा की प्रतीकात्मक “वापसी” को स्थानीय स्तर पर दबदबा कायम करने का मॉडल बना दिया जाता है। इस तरह क्षेत्रीय मिथक लामबंदी का टूल बन जाते हैं और सार्वजनिक स्थान सांप्रदायिक दावे और डर का मैदान बन जाते हैं।
6. निगरानी आधारित संप्रभुता और गैर-कानूनी सत्ता का उभार
छह महीनों के डेटा में एक साफ पैटर्न दिखता है कि AHP-RBD सार्वजनिक जीवन में नियमित रूप से पुलिस जैसी भूमिका अपने हाथ में लेता है। संगठन अंतरधार्मिक रिश्तों में दखल देता है, ईसाई प्रार्थना सभाओं पर छापे डालता है, मस्जिदों के निर्माण को रोकता या बाधित करता है, सार्वजनिक जगहों पर मुस्लिम पुरुषों से पूछताछ करता है, धर्मांतरण विरोधी गश्त करता है और उन गतिविधियों को निशाना बनाता है जिन्हें वह “हिंदू हितों” के लिए खतरा बताता है। ये अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। मिलकर ये एक सुसंगत व्यवस्था बनाती हैं, जिसे “निगरानी आधारित संप्रभुता” कहा जा सकता है जहां कोई गैर-राज्य समूह वह जबरदस्ती की सत्ता इस्तेमाल करता है जो सामान्यतः राज्य के पास होती है। उन्हें मिलने वाली असाधारण छूट पुलिस और प्रशासन की जानबूझकर की गई निष्क्रियता में दिखती है, जहां ऐसे आयोजन होते हैं या होने वाले होते हैं।
निगरानी आधारित संप्रभुता उन हालात को दर्शाती है जहां हिंसा पर राज्य का एकाधिकार कमजोर पड़ जाता है और वैचारिक समूह अपने नैतिक और सामुदायिक नियम लागू करने लगते हैं। AHP-RBD सिर्फ कानून नहीं तोड़ता, बल्कि बहुसंख्यक दावों पर टिकी एक वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था गढ़ता है, जो संवैधानिक मूल्यों पर नहीं टिकी होती। इस व्यवस्था में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा जोखिम की तरह देखा जाता है, महिलाओं के फैसलों पर पहरा लगाया जाता है और असहमति खतरनाक बन जाती है।
यह निगरानीवादी व्यवस्था तीन आपस में जुड़ी प्रक्रियाओं के जरिए चलती है- निगरानी, दखलअंदाजी और सजा।
निगरानी में अंतरधार्मिक जोड़ों पर नजर रखना, कथित धर्मांतरणों की जानकारी जुटाना, मस्जिदों के निर्माण या मरम्मत पर निगरानी करना, मुस्लिम स्वामित्व वाले कारोबारों पर ध्यान रखना और “संदिग्ध” जमावड़ों को चिन्हित करना शामिल है। यह राज्य की निगरानी नहीं, बल्कि सामुदायिक निगरानी है। AHP के कार्यकर्ता मोहल्लों में गश्त करते हैं, सोशल मीडिया पर नजर रखते हैं, अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए सूचनाएं इकट्ठा करते हैं और ऐसे लोगों की सूचियां बनाते हैं जिन्हें खतरा बताया जाता है। सार्वजनिक सुरक्षा की परिभाषा बदलकर “हिंदू सुरक्षा” कर दी जाती है, और मुसलमानों की मौजूदगी को ही खतरे के रूप में पेश किया जाता है।
इसके बाद दखलअंदाजी होती है। AHP-RBD के सदस्य अक्सर निजी या अर्ध-निजी जगहों (semi-private spaces)- घरों, दुकानों, चर्चों, प्रार्थना स्थलों, स्कूलों- में घुसकर उन गतिविधियों को रोकते हैं जिन्हें वे नुकसानदेह मानते हैं। कई बार यह सब पुलिस की मौजूदगी में होता है। कई घटनाओं में देखा गया है कि पुलिसकर्मी अंतरधार्मिक जोड़ों का सामना करने या प्रार्थना सभाओं में व्यवधान डालने के दौरान AHP के कार्यकर्ताओं के साथ होते हैं। पुलिस शायद ही कभी संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करती है। इससे राज्य की निष्पक्षता टूटती हुई दिखती है और राज्य व निगरानी समूहों के बीच सत्ता बांटने का संकेत मिलता है।
आखिर में आता है सजा। यह सजा धमकियों, सार्वजनिक अपमान, आर्थिक बहिष्कार की अपीलों, उत्पीड़न या शारीरिक हमले के रूप में हो सकती है। कई भाषणों में AHP के नेता खुलेआम उन मुस्लिम पुरुषों को मारने की बात कहते हैं जिन पर हिंदू महिलाओं से रिश्ते बनाने का आरोप लगाया जाता है। ऐसी बातें सीधे आपराधिक उकसावे के दायरे में आती हैं, फिर भी कानूनी कार्रवाई बहुत कम या न के बराबर होती है। यही बेख़ौफी इस विश्वास को मजबूत करती है कि AHP को अपनी तरह का “न्याय” लागू करने का हक है।
निगरानीवादी संप्रभुता (vigilante sovereignty) का बढ़ना भारत की राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत है यानी दोहरी कानूनी व्यवस्था का उभार। एक व्यवस्था संवैधानिक है, जो समानता, गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्म की आजादी पर टिकी है। दूसरी बहुसंख्यकवादी है, जो पहचान, पदानुक्रम और जनसांख्यिकीय डर पर आधारित है। AHP-RBD की गतिविधियां दिखाती हैं कि कई संदर्भों में यह बहुसंख्यकवादी व्यवस्था संवैधानिक व्यवस्था पर हावी होने लगी है।
इस बदलाव के गंभीर न्यायिक नतीजे हैं। संविधान यह मानकर चलता है कि अधिकारों की रक्षा और वैध बल प्रयोग का अधिकार सिर्फ राज्य के पास है। जब गैर-राज्य समूह बिना किसी नतीजे के छापे मारने, पूछताछ करने और सजा देने जैसे राज्य के काम अपने हाथ में ले लेते हैं, तो संवैधानिक वादा टूटने लगता है। इसके बदले अनौपचारिक इलाकों की एक बिखरी हुई व्यवस्था उभरती है, जहां संवैधानिक अधिकार चुनिंदा तौर पर लागू होते हैं या चुपचाप निलंबित कर दिए जाते हैं। ये घोषित आपातकाल नहीं होते बल्कि पुलिस की मिलीभगत, सार्वजनिक डर और नफरत के सामान्यीकरण से संभव हुई रोजमर्रा की खामोश निलंबन की स्थितियां होती हैं।
यह पैटर्न केवल भारत तक सीमित नहीं है। इसी तरह की स्थितियां अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी देखी गई हैं जब वे दबाव में रहे: कोलंबिया में अर्धसैनिक समूह, म्यांमार में उग्र बौद्ध समूह, श्रीलंका में मुस्लिम विरोधी निगरानी समूह और ब्राजील में सुसमाचारवादी मिलिशिया। हर मामले में, जब सरकारें बहुसंख्यक विचारधाराओं के साथ खड़ी होती हैं, तो निगरानी आधारित संप्रभुता बढ़ती है और राज्य और मिलिशिया के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।
AHP-RBD की गतिविधियां भारत को इसी तरह के रास्ते पर ले जाती हैं। रिश्तों में दखल देकर, संगठन व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर नियंत्रण का दावा करता है। प्रार्थना सभाओं को रोककर, यह धार्मिक अभिव्यक्ति पर नियंत्रण का दावा करता है। सार्वजनिक स्थानों में गश्त करके, यह दृश्यता और आवाजाही पर नियंत्रण का दावा करता है। हथियार प्रशिक्षण और युवाओं की लामबंदी के माध्यम से, यह हिंसा पर ही नियंत्रण का दावा करता है।
इसके परिणाम गहरे हैं। निगरानी आधारित संप्रभुता भेदभाव को सामान्य बनाती है, उग्रवाद को बढ़ावा देती है, औपचारिक पुलिसिंग को कमजोर करती है और सार्वजनिक स्थान को सांप्रदायिक संघर्ष का मैदान बना देती है। यह अल्पसंख्यक समुदायों को “सीमित नागरिकता वाला” बना देती है, जिनके अधिकार बहुसंख्यक की मंजूरी पर निर्भर रहते हैं। और यह संवैधानिक उपायों को कमजोर करती है, क्योंकि नुकसान सीधे राज्य द्वारा नहीं बल्कि राज्य की सहनशीलता के साथ काम करने वाले निजी समूहों द्वारा पहुंचाई जाती है।
इस समानांतर सत्ता के उभार को आज भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक माना जा सकता है। यह कोई अस्थायी व्यवधान नहीं है बल्कि यह एक विकसित होती हुई शासन प्रणाली है यानी ऐसी व्यवस्था जो सांप्रदायिक आधार पर बल प्रयोग का अधिकार बांटती है और बहुसंख्यक प्रभुत्व को रोजमर्रा के जीवन में गढ़ देती है।
7. ईसाइयों के प्रति बढ़ती दुश्मनी
हालांकि मुसलमान AHP-RBD की लामबंदी का मुख्य फोकस बने हुए हैं, डेटा में ईसाइयों के प्रति स्पष्ट और बढ़ती दुश्मनी भी दिखती है। यह भाषणों, चर्चों के विरोध प्रदर्शन, प्रार्थना सभाओं में बाधा डालने, जबरन धर्मांतरण के आरोप और ईसाई संस्थाओं पर लगातार भाषणात्मक हमलों में दिखाई देती है। “दुश्मन” की श्रेणी का फैलाव-सिर्फ मुसलमान से मुसलमान और ईसाइयों तक-एक व्यापक वैचारिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है: एक ऐसा बहु-लक्ष्य नफरत का ढांचा बनाना जो सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों पर निगरानी कर सके और इसे एक सभ्यतागत नैरेटिव के तहत पेश किया जाए।
ईसाइयों के खिलाफ इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अपने कंटेंट में अलग है, लेकिन संरचना में मुस्लिम-विरोधी भाषा की तरह ही काम करती है। मुसलमानों को जनसंख्या के लिए खतरा बताया जाता है और ईसाइयों को धर्मांतरण का खतरा। मुसलमानों को क्षेत्रीय और हिंसक दिखाया जाता है; ईसाइयों को धोखेबाज और चालाक बताया जाता है। मुसलमानों को “घुसपैठिया” कहा जाता है; ईसाइयों को “धर्मांतरण करने वाला” कहा जाता है। दोनों ही तरह की रूढ़ियां पूरी समुदायों को एकल, शत्रुतापूर्ण पहचान में सीमित कर देती हैं, जैसे कि वे किसी कथित हिंदू विरोधी एजेंडा के लिए काम कर रहे हों।
ईसाइयों के प्रति यह दुश्मनी हिंदू राष्ट्रवादी सोच के लंबे समय से चले आ रहे विषय से आती है। औपनिवेशिक काल से ही, ईसाई मिशनरियों को विदेशी एजेंट के रूप में पेश किया जाता रहा है, जो धर्मांतरण के जरिए हिंदू संस्कृति को कमजोर करना चाहते हैं। AHP-RBD इस शक को फिर से जिंदा करता है और इसे वैश्वीकरण से जुड़ी समकालीन चिंताओं के साथ जोड़ देता है। छोटी प्रार्थना सभाओं को “धर्मांतरण का फैक्ट्री” कहा जाता है और ईसाई चैरिटेबल संस्थाओं पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे सामाजिक सेवा के पीछे प्रचार छुपाते हैं। ईसाई संस्थाओं को भारत को अस्थिर करने वाली वैश्विक साजिश का हिस्सा बताया जाता है।
कई दर्ज घटनाओं में, AHP के सदस्य मामूली प्रार्थना सभाओं पर छापा मारते हैं- अक्सर निजी घरों या किराए के हॉल में होने वाली सभा पर। ये सभाएं आम तौर पर छोटे समूहों की थीं, जो शास्त्र पढ़ते या भजन गाते थे। फिर भी, AHP कार्यकर्ताओं ने इन्हें अवैध धर्मांतरण गतिविधियों के रूप में पेश किया, बिना किसी ठोस सबूत के। कुछ मामलों में पुलिस खामोश रही या निगरानी करने वालों के साथ मिलीभगत करती दिखी। इसका प्रभाव डर पैदा करना है कि आम ईसाई केवल प्रार्थना के लिए इकट्ठा होने पर उत्पीड़न का डर महसूस करने लगे।
ये कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 25 के मूल अधिकार को चोट पहुंचाती है, जो धर्म के पालन और प्रचार की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। प्रचार पर नियम लग सकते हैं, लेकिन शांतिपूर्ण प्रार्थना को अपराध नहीं ठहराया जा सकता। AHP के दखल को अनौपचारिक रूप में ईसाई पूजा पर रोक के रूप में देखा जा सकता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिकता दोनों को कमजोर करता है।
रणनीतिक रूप से, ईसाई-विरोधी भाषा AHP को अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद करती है। ईसाइयों को विदेशी एजेंट के रूप में पेश करके, संगठन राष्ट्रीय चिंताओं- वैश्विक प्रभाव और सांस्कृतिक क्षति- को भुनाता है। यह कथा मुस्लिम-विरोधी डर को पूरा करती है: एक दुश्मन आबादी के लिए खतरा है और दूसरा संस्कृति के लिए। दोनों मिलकर लगातार संकट का एहसास पैदा करते हैं और निरंतर लामबंदी को जायज ठहराते हैं। मुस्लिम-विरोधी लामबंदी अक्सर स्थानीय होती है, लेकिन ईसाई-विरोधी लामबंदी वहां भी लागू की जा सकती है जहां ईसाई कम हों, जिससे AHP के लिए विभिन्न क्षेत्रों में संगठन बनाने का साधन मिल जाता है।
इसका राजनीतिक असर भी होता है। केरल, गोवा और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों जैसे राज्यों में ईसाई समुदाय अक्सर विपक्षी पार्टियों का समर्थन करते हैं। इन समुदायों को डराने से उनकी राजनीतिक भागीदारी कमजोर होती है, मतदान कम होता है और नागरिक समाज के नेटवर्क बाधित होते हैं। डर एक शांत, लेकिन प्रभावशाली चुनावी उपकरण बन जाता है।
इसलिए ईसाइयों के प्रति दुश्मनी केवल सांप्रदायिक भाषण का छोटा विस्तार नहीं है। यह भारतीय पहचान को बहिष्कार के जरिए परिभाषित करने का प्रयास है यानी हिंदू बहुसंख्यकता को एकमात्र वैध रूप में पेश करने की कोशिश। इस संरचना में संवैधानिक अधिकार शर्तों पर निर्भर हो जाते हैं, अल्पसंख्यक मौजूदगी संदिग्ध बन जाती है और धार्मिक स्वतंत्रता ज्यादातर कागज पर ही रहती है, रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं।
मुसलमानों और ईसाइयों दोनों को निशाना बनाकर, AHP-RBD एक व्यापक तानाशाही सांस्कृतिक व्यवस्था बना रहा है। यह बहु लक्ष्य नफरत का ढांचा तय करता है कि कौन से धर्म स्वीकार्य हैं, कौन-सी प्रथाएं वैध हैं और कौन सी मौजूदगी खतरा है। यह समकालीन भारत में सांप्रदायिक तानाशाही को गहरा करता है यानी एक ऐसा खतरा जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करता है और संविधान की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक नींव को कमजोर करता है।
लामबंदी का क्षेत्रीय भूगोल: स्थानिक समूह, स्थानीय अभिव्यक्तियां और नफरत का संघीय जीवन
छह महीने के डेटा से पता चलता है कि AHP-RBD की लामबंदी पूरे भारत में समान नहीं है। यह स्थानिक रूप से रणनीतिक है। घटनाएं उन राज्यों में एकत्रित होती हैं जहां जनसांख्यिकीय चिंताएं, राजनीतिक प्रोत्साहन और कमजोर संस्थागत जांच एक साथ मिलती हैं। हर राज्य अपनी इतिहास, राजनीति और सामाजिक संरचना के अनुसार नफरत लामबंदी का एक अलग पैटर्न दिखाता है।
उत्तर प्रदेश इसका केंद्र है। यहां AHP-RBD की घटनाओं की संख्या और आक्रामकता सबसे ज्यादा है। यूपी की बड़ी मुस्लिम आबादी, सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास और बहुसंख्यक राज्य मशीनरी के बढ़ते प्रभाव से एक सहूलियत वाला माहौल बनता है। नेता यहां सबसे सीधे खतरों के संदेश देते हैं -हिंसा की अपील, अंतरधार्मिक जोड़ों पर निगरानी और सामाजिक बहिष्कार लागू करना। पुलिस अक्सर AHP के वक्ताओं के साथ खड़ी रहती है, जिससे नफरत की भाषा को आधिकारिक तस्वीर मिलती है। यूपी में राज्य की शक्ति और निगरानी समूह की कार्रवाई के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।
गुजरात विचारधारात्मक केंद्र के रूप में काम करता है। यहां तोगड़िया के सबसे लंबे और विचारधारात्मक भाषण जनसांख्यिकीय युद्ध, सभ्यता की श्रेष्ठता और वैश्विक साजिशों पर दिए जाते हैं। 2002 के अनुभव और हिंदुत्व के साथ संस्थाओं के साथ गहरी तालमेल गुजरात के राजनीतिक माहौल को एक अधिक जटिल और अनुष्ठानिक लामबंदी की सुविधा देता है। यह ज़्यादातर सीधे झगड़े या भिड़ंत पर नहीं, बल्कि हिंदू सभ्यता के बड़े ऐतिहासिक दावों और बड़े नैरेटिव को सामने रखने वाला है।
महाराष्ट्र में दोहरा पैटर्न दिखाई देता है। मुंबई, ठाणे और पुणे जैसे शहरों में AHP “सुरक्षा” की भाषा पर ध्यान केंद्रित करता है, जो मध्यवर्ग की चिंताओं को भड़काता है। वहीं, अर्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों- जलगांव, नासिक, धुले, विदर्भ-में लामबंदी ज्यादा उग्र हो जाती है, जिसमें त्रिशूल वितरण, शस्त्र पूजा और हथियार प्रदर्शन शामिल हैं। शिवाजी की तस्वीर और मराठा गौरव आसानी से AHP की हिंदू शक्ति और ऐतिहासिक शिकायत की नैरेटिव में घुल-मिल जाते हैं।
असम में स्थिति अलग है। यहां AHP लंबे समय से मौजूद क्षेत्रीय डर-विशेषकर प्रवास और नागरिकता को लेकर-का फायदा उठाता है। “बांग्लादेशी घुसपैठ” की भाषा प्रमुख है। बंगाली मूल के मुसलमानों को धार्मिक अल्पसंख्यक की बजाय अवैध कब्जाधारी के रूप में पेश किया जाता है। AHP केवल NRC, विदेशी न्यायाधिकरण और दशकों की राजनीतिक बहस से पहले से बनी चिंताओं को और बढ़ाता है। परिणामस्वरूप स्थानीय जातीय डर और राष्ट्रीय हिंदुत्व के बयानों का एक शक्तिशाली मिश्रण बन जाता है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को लॉजिस्टिक हब के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ये राज्य प्रशिक्षण शिविरों, हथियारों के अनुष्ठानों और “जागरूकता” कार्यक्रमों की मेजबानी करते हैं। जंगल, छोटे शहर और बिखरे हुए गांव जैसी भौगोलिक संरचना AHP को मीडिया की निगरानी से दूर अर्धसैनिक गतिविधियां करने की सुविधा देती है। ये घटनाएं भले कम नाटकीय हों, लेकिन संगठन के लिए महत्वपूर्ण होती हैं यानी कार्यकर्ता तैयार करना, हथियार बांटना और नेटवर्क बनाना।
दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और जम्मू में लामबंदी शहरी और सीमावर्ती तरीके अपनाती है। दिल्ली और NCR में “राष्ट्रीय सुरक्षा” की भाषा अपनाई जाती है और नफरत को देशभक्ति के रूप में पेश किया जाता है। पंजाब में छोटी लामबंदी ईसाई समुदायों के खिलाफ धर्मांतरण विरोधी भाषा पर केंद्रित है। जम्मू में AHP क्षेत्र की जटिल सामाजिक संरचना को सरल हिंदू-मुस्लिम विभाजन में बदल देता है और राष्ट्रीयतावादी शिकायत को बढ़ावा देता है।
ये क्षेत्रीय पैटर्न मिलकर दिखाते हैं कि AHP-RBD एक ही मॉडल से काम नहीं करता। यह स्थानीय भय, राजनीतिक अवसर और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के हिसाब से ढल जाता है। यह एक राज्य में उग्र संगठन, किसी दूसरे में सांस्कृतिक संस्था, कहीं भक्ति समूह या उस जगह सामुदायिक निगरानी बल के रूप में पेश हो सकता है जहां उसे कम विरोध मिलता है। यह स्थानीय लचीलापन संगठन को ताकत और पहुंच देता है। इससे नफरत की राजनीति स्थानीयकृत, सामान्यीकृत और रोजमर्रा की जिंदगी में गढ़ी जा सकती है।
इस स्थानीय संरचना को समझना जरूरी है। यह दिखाता है कि AHP-RBD सिर्फ एक वैचारिक आंदोलन नहीं है, बल्कि एक बहु-स्तरीय इकोसिस्टम है यानी संदेश में राष्ट्रीय, रूप में क्षेत्रीय और कार्यान्वयन में स्थानीय। यही अनुकूलन क्षमता इसे प्रभावशाली और पारंपरिक कानूनी या प्रशासनिक ढांचों से नियंत्रित करने में मुश्किल बनाती है।
चुनावी प्रभाव और रेडिकल फ्लैंक मैकेनिज़्म
AHP-RBD की छह महीने की लामबंदी को भारत के चुनावी परिदृश्य से अलग समझा नहीं जा सकता। हालांकि संगठन BJP–RSS ढांचे का औपचारिक हिस्सा नहीं माना जाता, इसकी गतिविधियां लगातार BJP की व्यापक राजनीतिक रणनीति को मजबूत करती हैं। वास्तविक और संगठनात्मक संबंध संभवतः मौजूद हैं, हालांकि इन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया नहीं गया। इसे सबसे अच्छे ढंग से “रेडिकल फ्लैंक प्रभाव” (radical flank effect) से समझा जा सकता है-एक सामाजिक आंदोलन सिद्धांत जो बताता है कि उग्र समूह कैसे सार्वजनिक मानदंडों को बदलते हैं, जिससे अधिक “मध्यम” समूहों को समझदार दिखाने का अवसर मिलता है और साझा वैचारिक एजेंडा आगे बढ़ता है।
व्यवहार में, AHP-RBD रेडिकल फ्लैंक की भूमिका निभाता है। इसकी खुली हिंसा की अपील, निगरानी आधारित कार्रवाई और अल्पसंख्यकों का दुष्प्रचार एक ऐसा राजनीतिक माहौल बनाते हैं जो डर से भरा होता है। जब यह डर आम हो जाता है, तो BJP की अपनी भाषा-अक्सर संकेतों में-इसके मुकाबले मध्यम दिखती है। जब AHP-RBD मुसलमानों को कुछ इलाकों से निकालने की मांग करता है, तो BJP की सख्त पुलिसिंग या बहिष्कारकारी कल्याण नीतियां “मध्यम” लगती हैं। जब AHP-RBD कार्यकर्ता प्रार्थना सभाओं पर छापा डालते या अंतरधार्मिक जोड़ों को परेशान करते हैं, तो BJP की “कानून और व्यवस्था” वाली छवि कानूनी और वाजिब दिखाई देती है, जब कि इसे अनिवार्य या दबाव वाला माना जा सकता था। यह त्रिकोणीय प्रभाव (triangulation) BJP को उग्रवाद द्वारा बनाए गए भावनात्मक माहौल का लाभ उठाने की अनुमति देता है, बिना इसे खुलेआम समर्थन दिए।
चुनावी आंकड़े और क्षेत्रीय पैटर्न दिखाते हैं कि जिन इलाकों में AHP-RBD की गतिविधियां तीव्र होती हैं, वहां हिंदू मतदाता एकजुटता बढ़ती है। यह बदलाव स्पष्ट समन्वय की जरूरत नहीं रखता; यह लगातार नफरत लामबंदी से बने भावनात्मक माहौल से स्वाभाविक रूप से पैदा होता है। जब सार्वजनिक चर्चा जनसांख्यिकीय खतरे, “लव जिहाद,” धर्मांतरण या “जिहादी घुसपैठ” जैसे संदेशों से भरी होती है, तो मतदाता उस पार्टी की ओर आकर्षित होते हैं जिसे वे हिंदू सुरक्षा का रक्षक समझते हैं। डर सांप्रदायिक मतदान का भावनात्मक इंजन बन जाता है।
AHP-RBD की गतिविधियां सीधे अल्पसंख्यक राजनीतिक भागीदारी को भी प्रभावित करती हैं। मुसलमान और ईसाई समुदायों को डराने से मतदान कम होता है, सार्वजनिक सभाएं बाधित होती हैं और स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक गतिविधियां रुक जाती हैं। राजनीतिक रूप से सक्रिय ईसाई मतदाता वाले क्षेत्रों- जैसे गोवा, केरल, मिजोरम और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से- में प्रार्थना सभाओं और चर्च संबंधित गतिविधियों को निशाना बनाने का सीधा राजनीतिक प्रभाव दिखाई देता है। डर, उनके मौजूदगी और आवाज दोनों को कम कर देता है।
संगठन स्थानीय संवाद पर हावी होकर चुनावों को भी आकार देता है। इसकी रैलियां स्थानीय मीडिया में असमान कवरेज पाती हैं, जिससे ऐसे क्षेत्रों में भी तनाव का अहसास पैदा होता है जहां वास्तविक संघर्ष नहीं होता। सांप्रदायिक नौरेटिव बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट और कल्याण जैसे मुद्दों को पीछे धकेल देती हैं। जब सार्वजनिक बातचीत का आधार ही बदल जाता है, तो धर्मनिरपेक्ष मुद्दों के लिए फिर से जगह बनाना कठिन हो जाता है। चुनाव शासन पर नहीं, पहचान पर आधारित रूप में आयोजित होने लगते हैं।
आखिरकार, AHP-RBD एक तरह से वैचारिक प्रयोगशाला की तरह काम करता है। जिन मुद्दों को वह आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाता है- जैसे जनसंख्या नियंत्रण कानून, धर्मांतरण के खिलाफ अभियान, मंदिरों की “पुनर्प्राप्ति”, या अंतरधार्मिक रिश्तों की निगरानी- वे धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे और मीडिया की बहसों में जगह बना लेते हैं। यह सफर हाशिये से केंद्र तक धीरे-धीरे होता है, लेकिन साफ दिखाई देता है। समय के साथ ये विचार कट्टर या अतिवादी लगना बंद हो जाते हैं और “सामान्य समझ” जैसे दिखने लगते हैं।
इसका असर यह होता है कि पूरा राजनीतिक माहौल दक्षिण की ओर खिसकने लगता है। विपक्षी दलों को उन मुद्दों पर प्रतिक्रिया देनी पड़ती है, जिन्हें चरमपंथी ताकतें तय करती हैं। मध्यमार्गी नेता “हिंदू-विरोधी” कहलाने के डर से बहुसंख्यकवादी भाषा अपनाने लगते हैं। असहमति की गुंजाइश सिकुड़ती चली जाती है। अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भागीदारी घटती है। नफरत धीरे-धीरे लोकतांत्रिक जीवन का सामान्य हिस्सा बन जाती है।
इस तरह AHP-RBD का असर सिर्फ कुछ खास इलाकों या चुनावों तक सीमित नहीं रहता। यह चुनावी राजनीति की पूरी संरचना को नया रूप देता है। यह तय करता है कि क्या कहना वैध है, कौन-सी मांगें स्वीकार्य हैं और जनता की भावनाएं किस हद तक जायज मानी जाएंगी। यह उस भावनात्मक और वैचारिक जमीन को बदल देता है, जिस पर चुनाव लड़े जाते हैं। यह भारतीय लोकतंत्र की भाषा और व्याकरण तक को बदल देता है।
कानूनी विश्लेषण: नफरत भरी भाषा, भीड़- न्याय, हथियार कानूनों का उल्लंघन और संवैधानिक अधिकारों का हनन
छह महीनों के आंकड़ों से एक लगातार चलता पैटर्न सामने आता है जो भारतीय आपराधिक कानून और संविधान द्वारा दी गई गारंटियों का बार-बार, व्यवस्थित और कई बार खुले तौर पर उल्लंघन दिखाता है। ये कोई अचानक हुई ज्यादतियां या बेकाबू घटनाएं नहीं हैं बल्कि AHP-RBD की लामबंदी की रणनीति का ही हिस्सा हैं। इनके कानूनी मायने समझने के लिए इन्हें चार संरचनाओं में देखना जरूरी है:
(1) भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत नफरत भरी भाषा और आपराधिक उकसावा,
(2) भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेना और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन,
(3) आर्म्स एक्ट के तहत अवैध हथियारों का प्रदर्शन और प्रशिक्षण, और
(4) संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का हनन।
नफरत भरी भाषा और उकसावा:
भारतीय अदालतों ने-जैसे प्रवासी भलाई संगठन, अमीश देवगन, एस. रंगराजन मामलों और भड़काऊ भाषणों पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों में-अपमानजनक भाषा और ऐसी भाषा के बीच साफ फर्क किया है, जो सीधे तौर पर सार्वजनिक शांति को खतरे में डालती है या दुश्मनी भड़काती है। AHP-RBD की भाषा लगातार इसी दूसरी श्रेणी में आती है।
मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाना, मुसलमानों को जमीन पर कब्जा करने वाले आक्रांता की तरह पेश करना या यह कहना कि हिंदू महिलाएं किसी संगठित साजिश का निशाना हैं- ये सब सीधे आपराधिक उकसावे के उदाहरण हैं। यह आरोप लगाना कि मुसलमान “इलाकों पर कब्जा” करना चाहते हैं, “हिंदू सभ्यता को मिटाना” चाहते हैं, या “हिंदू महिलाओं को नियंत्रित करना” चाहते हैं- ये ठीक वही श्रेणियां हैं, जिन्हें BNS में सार्वजनिक शांति भंग करने और समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने वाली निषिद्ध भाषा माना गया है।
ये आंकड़ा एक चौंकाने वाली सच्चाई दिखाता है कि कानून लागू करने में साफ तौर पर एक बड़ा खालीपन है। जिन आयोजनों में यह नफरत भरी भाषा खुलेआम बोली जाती है, वहां पुलिस की मौजूदगी तटस्थता नहीं बल्कि जानबूझकर कार्रवाई न करने का संकेत देती है। संस्थागत स्तर पर यह उदासीनता नफरत को धीरे-धीरे “कानूनी उल्लंघन” से “सार्वजनिक सामान्य समझ” में बदलने में मदद करती है। यह कानून के तहत समान सुरक्षा सुनिश्चित करने की राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी की विफलता को भी दिखाती है।
विजिलैंटिज्म और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन: AHP-RBD बार-बार खुद को पुलिस की भूमिका में रखता हुआ दिखाई देता है जैसे लोगों को पकड़ना, कथित आरोपियों से पूछताछ करना, प्रार्थना सभाओं पर छापे मारना और सामुदायिक सीमाएं लागू करना। ये कार्रवाइयां सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 पर चोट करती हैं जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मनमानी गिरफ्तारी से सुरक्षा की गारंटी देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) के ऐतिहासिक फैसले में साफ कहा था कि भीड़ द्वारा हिंसा रोकना और दोषियों पर कार्रवाई करना राज्य का सकारात्मक दायित्व है। लेकिन यह डेटा ठीक उलटा रुझान दिखाता है जैसे पुलिस की निष्क्रियता, बिना हस्तक्षेप के मौजूदगी और कुछ मामलों में परोक्ष सहयोग। इससे एक तरह की दोहरी पुलिस व्यवस्था बन जाती है:
एक- कानूनी, संवैधानिक और सिद्धांत रूप में समान;
दूसरी- अनौपचारिक, सामुदायिक और व्यवहार में बहुसंख्यकवादी।
ऐसी व्यवस्था धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन के संवैधानिक वादे का उल्लंघन है जिन्हें ‘मूल संरचना सिद्धांत’ का हिस्सा माना गया है। इसलिए विजिलैंटिज्म सिर्फ गैरकानूनी हरकत नहीं रह जाता, बल्कि संविधान की संप्रभुता के लिए सीधी चुनौती बन जाता है।
अवैध हथियारों का प्रदर्शन और प्रशिक्षण: AHP-RBD की गतिविधियों में हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल दिखता है-तलवारें, त्रिशूल और हथियार-चाहे वह शस्त्र पूजा हो, त्रिशूल दीक्षा, सार्वजनिक जुलूस हों या खुले तौर पर चलने वाले हथियार प्रशिक्षण शिविर। आर्म्स एक्ट के तहत, ऐसे कई हथियारों को सार्वजनिक रूप से दिखाने या लड़ाकू प्रशिक्षण देने के लिए सख्त लाइसेंस की जरूरत होती है।
रिकॉर्ड की घटनाएं इन नियमों का कई स्तरों पर उल्लंघन दिखाती हैं। यहां हथियार महज़ सजावटी चीजें नहीं हैं बल्कि वे धार्मिक प्रतीक, पहचान के चिन्ह और राजनीतिक संदेश देने के टूल बन जाते हैं। हथियारों को धार्मिक रूप से पवित्र ठहराने से उन कामों को नैतिक ढाल मिल जाती है, जिन पर सामान्य हालात में तुरंत आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।
राज्य की निष्क्रियता इस चिंता को और गहरा करती है। जब पुलिस हथियारों की पूजा, उनके खुले वितरण या प्रशिक्षण सत्रों के दौरान मूकदर्शक बनी रहती है तो यह संवैधानिक सिद्धांत कमजोर पड़ता है कि वैध बल प्रयोग का एकमात्र अधिकार राज्य के पास है। नागरिक राजनीति से हथियारों को दूर रखने की भारत की पुरानी नीति धीरे-धीरे टूटने लगती है और उसकी जगह निजी मिलिशियाओं के लिए अनुकूल माहौल बनता चला जाता है।
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: AHP-RBD की गतिविधियों का असर यह होता है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों का लगातार और व्यवस्थित हनन होता है।
● अनुच्छेद 14 का उल्लंघन लक्षित भेदभाव और कानून की असमान सुरक्षा के जरिए होता है।
● अनुच्छेद 15 तब टूटता है, जब अलगाव, बहिष्कार या किसी खास समुदाय के खिलाफ दुश्मनी को बढ़ावा दिया जाता है।
● अनुच्छेद 19(1)(b) तब प्रभावित होता है, जब अल्पसंख्यकों को शांतिपूर्ण सभा करने या सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने से डराया जाता है।
● अनुच्छेद 21 को धमकियों, जबरदस्ती और मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाकर कमजोर किया जाता है।
● अनुच्छेद 25 और 26 का सीधा उल्लंघन तब होता है, जब प्रार्थना सभाओं पर छापे मारे जाते हैं, धार्मिक कार्यों में बाधा डाली जाती है, या ईसाई और मुस्लिम संस्थानों को निशाना बनाया जाता है।
ये उल्लंघन अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक समानांतर सत्ता के रूप में काम करते हैं जहाँ एक गैर-राज्य संगठन अनौपचारिक तौर पर धर्म, निजी रिश्तों, सार्वजनिक स्थानों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का अधिकार अपने हाथ में ले लेता है। सबसे गहरी चोट धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर पड़ती है, जो भारत के संविधान की मूल संरचना का एक अहम हिस्सा है। जब राज्य किसी बहुसंख्यकवादी संगठन को जबरदस्ती की ताकत इस्तेमाल करने देता है, तो धर्मनिरपेक्षता सिर्फ काग़ज़ी रह जाती है यानी सिद्धांतों में मौजूद है लेकिन जमीनी हकीकत में कमजोर है।
लोकतांत्रिक खतरे और अल्पसंख्यक-विरोधी शासन का सामान्यीकरण
AHP-RBD की छह महीने की गतिविधियां भारत के लोकतांत्रिक संरचना में एक गहरे संस्थागत और सांस्कृतिक बदलाव की ओर इशारा करती हैं जहां बहुलतावादी संवैधानिक लोकतंत्र धीरे-धीरे एक बहुसंख्यकवादी अर्ध-लोकतंत्र में बदलता दिखता है। इसमें अल्पसंख्यकों के अधिकार औपचारिक तौर पर तो मौजूद रहते हैं, लेकिन व्यवहार में उन्हें लगातार खोखला किया जाता है। यह गिरावट न तो अधिकारों को औपचारिक रूप से निलंबित करके होती है और न ही आपातकाल जैसी किसी घोषणा से। यह धीरे-धीरे होती है यानी सांप्रदायिक दुश्मनी को सामान्य बनाकर, जो लोगों के व्यवहार, संस्थाओं के कामकाज और नागरिकता की भावनात्मक समझ को बदल देती है।
लोकतंत्र के लिए पहला बड़ा ख़तरा संवैधानिक मूल्यों की वैधता को कमजोर किया जाना है। जब सांप्रदायिक उभार सार्वजनिक जीवन पर हावी हो जाता है, तो समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष शासन जैसे सिद्धांत बुनियादी प्रतिबद्धताएं नहीं रह जाते, बल्कि बहुसंख्यक इच्छा के रास्ते की रुकावट लगने लगते हैं। नफरत भरी भाषा, जनसंख्या को लेकर डर फैलाना और धार्मिक प्रतीकों के साथ सैन्यकरण एक ऐसा भावनात्मक माहौल बनाते हैं, जिसमें संवैधानिक सुरक्षा “जरूरत से ज्यादा उदार” या यहां तक कि खतरनाक दिखाई देने लगती है। ऐसे माहौल में अल्पसंख्यक भीतर ही भीतर डर को अपना लेते हैं, सार्वजनिक स्थानों से पीछे हटने लगते हैं, राजनीतिक भागीदारी सीमित कर देते हैं और लोकतांत्रिक जीवन को असमान शर्तों पर जीने को मजबूर होते हैं। चुनावी राजनीति भी विकृत हो जाती है यानी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बहुसंख्यक वोट मजबूत होता है, जबकि अल्पसंख्यकों का मतदान जोखिम भरा और प्रभाव में कम हो जाता है।
लोकतंत्र के लिए दूसरा खतरा संस्थागत निष्पक्षता के धीरे-धीरे खत्म होने से जुड़ा है। आंकड़ों में बार-बार ऐसे मामले दर्ज हैं, जहां भड़काऊ या खुले तौर पर हिंसक भाषण दिए जा रहे थे और वहां पुलिस मौजूद थी। जब राज्य की एजेंसियां भीड़-न्याय करने वालों के साथ एक ही मंच या माहौल में दिखाई देती हैं, तो कानून और बहुसंख्यक भावना के बीच एक प्रतीकात्मक मेल बन जाता है। कानून लागू करने वाली संस्थाएं निष्पक्ष अधिकार-रक्षक होने के बजाय सामुदायिक निगरानी का औजार बनती चली जाती हैं। जब संस्थाएं संवैधानिक मानकों को लागू करने में नाकाम रहती हैं, तो उनकी वैधता कमजोर पड़ जाती है और उस खाली जगह में वैकल्पिक सत्ता केंद्र- यानी बहुसंख्यक समूह जो खुद को असल पुलिस मानने लगते हैं- कदम रख देते हैं।
तीसरा लोकतांत्रिक खतरा नागरिकता की सांस्कृतिक परिभाषा के बदलने से जुड़ा है। AHP-RBD का विमर्श हिंदू पहचान को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ देता है और मुसलमानों व ईसाइयों को ऐसे “शर्तों वाले नागरिक” के रूप में पेश करता है, जिनकी वफादारी बार-बार साबित करनी होगी और जिनके अधिकार सीमित किए जा सकते हैं। नागरिकता धीरे-धीरे नागरिक अधिकारों पर आधारित न रहकर जातीय-धार्मिक पहचान से जुड़ी हुई बन जाती है। यह बदलाव भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की जड़ों पर हमला है, क्योंकि संविधान जानबूझकर मूलनिवास, धार्मिक बहुसंख्यकवाद और नस्ली पहचान को नागरिकता का आधार मानने से इंकार करता है। जब अल्पसंख्यकों को हमेशा शक की निगाह से देखा जाने लगता है, तो लोकतांत्रिक जीवन में उनकी भागीदारी असुरक्षित हो जाती है और गणराज्य धीरे-धीरे श्रेणीबद्ध नागरिकता की ओर बढ़ने लगता है।
अंतिम लोकतांत्रिक खतरा लंबे समय तक चलने वाला ध्रुवीकरण है। नफरत के जरिए की जाने वाली लामबंदी ऐसे जख्म छोड़ती है जो पीढ़ियों तक रहते हैं यानी लगातार बना रहने वाला डर, आपसी अविश्वास और कठोर होती सामुदायिक पहचानें। यह ध्रुवीकरण सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी को भी बदल देता है। बाजार बंटने लगते हैं, स्कूलों में सामुदायिक विभाजन बढ़ता है, कार्यस्थलों का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है और मोहल्ले दुश्मनी से भरे छोटे-छोटे इलाकों में टूटने लगते हैं। समय के साथ ये छोटे-छोटे अलगाव मिलकर एक गहरी संरचनात्मक दूरी बना देते हैं, जिससे वह सामाजिक एकजुटता कमजोर पड़ती है, जिस पर लोकतंत्र टिका होता है। डर से बंटा हुआ समाज सामूहिक शासन, सार्वभौमिक अधिकारों और साझा सार्वजनिक संस्थाओं को टिकाए नहीं रख सकता।
इन सबको साथ रखकर देखें, तो स्पष्ट होता है कि AHP-RBD की गतिविधियां सिर्फ तात्कालिक खतरे पैदा नहीं करतीं, बल्कि लोकतंत्र में एक गहरी और धीरे-धीरे बढ़ती गिरावट लाती हैं जहां संवैधानिक नागरिकता, संस्थागत निष्पक्षता और बहुलतावादी लोकतंत्र अंदर से खोखले होते चले जाते हैं।
निष्कर्ष: नफरत की संरचना एक समानांतर सत्ता के रूप में
AHP-RBD के आयोजनों और इकट्ठा किए गए आंकड़ों से नफरत की एक जटिल और बहु-स्तरीय संरचना सामने आती है जो कभी-कभार होने वाली हिंसा नहीं, बल्कि धीरे उभरती हुई एक राजनीतिक व्यवस्था की तरह काम करती है। यह व्यवस्था संवैधानिक राज्य के समानांतर खड़ी होती है, सोच में बहुसंख्यकवादी और व्यवहार में भीड़-न्याय पर आधारित होती है। जनसंख्या को लेकर डर फैलाने, लैंगिक नियंत्रण, धार्मिक प्रतीकों के जरिए सैन्यकरण, इलाकों को “पुनर्परिभाषित” करने की कोशिशें, अल्पसंख्यकों की निगरानी और गैर - कानूनी सजाओं को सामान्य बनाने के जरिए AHP एक वैकल्पिक नैतिक दुनिया गढ़ता है यानी एक ऐसी दुनिया, जहां सामुदायिक पहचान ही वैधता तय करती है, हिंसा नैतिक कर्तव्य बन जाती है और संवैधानिक सत्ता की जगह उग्र धार्मिकता ले लेती है।
यह घटना सिर्फ भारत के अल्पसंख्यकों के लिए खतरा नहीं है। यह लोकतांत्रिक जीवन की बुनियादों के लिए एक बड़ी चुनौती है। जब कोई संगठन यह तय करने लगे कि कौन “अपना” है और कौन नहीं, पुलिस से नजदीकी बनाए, धार्मिक आस्था को हथियार बना दे, इतिहास को नए सिरे से गढ़े और सार्वजनिक जगहों को नियंत्रित करने लगे - और यह सब अक्सर राज्य की मूक सहमति या खुली मौजूदगी में हो- तो नागरिकता अपने आप में शर्त के दायरे में हो जाती है। कानून का शासन चुनिंदा लागू होने वाली चीज बन जाता है। गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष और नागरिक चरित्र कमजोर पड़ने लगता है और उस पर जातीय-धार्मिक पहचान की छाया छा जाती है।
भारत एक और गहरे सांस्कृतिक बदलाव से गुजर रहा है:
— बहुलता से “शुद्धता” की ओर,
— अधिकारों से आज्ञाकारिता की ओर,
— कानून से तमाशे की ओर,
— सहअस्तित्व से विजय की ओर।
कोई भी लोकतंत्र तब जिंदा नहीं रह सकता, जब नफरत को “सामान्य समझ” के रूप में संस्थागत बना दिया जाए। कोई भी संवैधानिक व्यवस्था तब टिक नहीं सकती, जब गैर-राज्य तत्वों को बिना सजा के जबरदस्ती की ताकत इस्तेमाल करने दिया जाए। और कोई भी समाज तब एकजुट नहीं रह सकता, जब लोगों को रक्षक और ख़तरा, अंदरूनी और बाहरी, शुद्ध और अशुद्ध में बांट दिया जाए।
इसलिए भारत के सामने चुनौती सिर्फ किसी एक चरमपंथी संगठन पर लगाम लगाने की नहीं है। असली चुनौती है यानी संवैधानिक कल्पना को दोबारा हासिल करने की। इसके लिए संस्थागत निष्पक्षता को बहाल करना होगा, आपराधिक कानून को बिना भेदभाव के लागू करना होगा, समानता और गरिमा के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता को फिर से मजबूत करना होगा, और डर की राजनीति को सांस्कृतिक स्तर पर खारिज करना होगा। इसके लिए एक सजग नागरिक समाज और ऐसा राजनीतिक साहस चाहिए जो नफरत को सामान्य मानने से साफ इनकार करे।
AHP-RBD की लामबंदी किसी हाशिये के समूह की कहानी नहीं है। यह एक समानांतर राजनीतिक व्यवस्था की कहानी है जो उभर रही है, फैल रही है और असर जमा रही है। यह समानांतर व्यवस्था भारत के भविष्य में कितनी गहराई से जड़ें जमाएगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संस्थाएं, अदालतें, राजनीतिक दल और नागरिक इस डेटा में दर्ज शुरुआती चेतावनी संकेतों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।
संविधान का टैक्स्ट आज भी मौजूद है। लेकिन उसका जमीनी सच बड़े दबाव में है- कुछ लोग तो कहेंगे कि वह अब खोखला ढांचा बनता जा रहा है।
यह जो दिशा यहां दिखाई देती है, वह अनिवार्य नहीं है लेकिन बेहद स्पष्ट है। इसका सामना करना सिर्फ अकादमिक विश्लेषण का सवाल नहीं है। यह एक लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है, जो भारत की पहचान को एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक गणराज्य के रूप में सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है।
[1] यहां दिए गए नफरत भरे भाषणों के विश्लेषण पर एक नजर डालने से स्पष्ट तस्वीर सामने आती है। (https://sabrang.com/cc/archive/2003/may03/index.html), तोगड़िया, जो उस समय पूरी तरह विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़े हुए थे, खुले तौर पर अपने और अपने संगठन के नफरत और हिंसा से भरे इरादों का ऐलान करते हैं- देश के हर गांव में अराजकता और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा (यानी एक तरह का गृहयुद्ध) फैलाने का इरादा। न तो संसाधनों की कमी और न ही व्यवस्थागत अड़चनें इस “कैंसर सर्जन” को रोक पाईं। अहमदाबाद में उनका धनवंतरी अस्पताल भी फरवरी- मार्च 2002 के दौरान बड़े पैमाने पर पीड़ित मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के मरीजों का इलाज करने से इनकार करने के लिए कुख्यात रहा। (https://sabrang.com/cc/archive/2002/marapril/hospital.htm, https://sabrang.com/tribunal/vol2/pubspace.html)

पिछले छह महीनों में उत्तर प्रदेश से गुजरात और असम से महाराष्ट्र तक, छोटे कस्बों, मंदिरों के प्रांगन, सामुदायिक भवनों, औद्योगिक इलाकों और अस्थायी मंचों पर एक अलग ही तरह की राजनीति पनपती दिखी है। यह ऐसी भाषा और सोच है जो भारत के संविधान की भावना से टकराती ही नहीं, बल्कि उसे बदल देने की कोशिश करती है। प्रवीण तोगड़िया के नेतृत्व वाली अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद (AHP) और उसकी युवा इकाई राष्ट्रीय बजरंग दल (RBD) के सैकड़ों कार्यक्रमों में एक नई “नैतिक व्यवस्था” गढ़ी जा रही है जहां आबादी को लेकर डर को देशभक्ति माना जाता है, हथियारों को समुदाय की रक्षा के पवित्र साधन की तरह पेश किया जाता है, पितृसत्ता को अच्छे नागरिक होने की पहचान बना दिया जाता है और अल्पसंख्यकों- खासकर मुसलमानों और ईसाइयों- को बराबरी के नागरिक नहीं बल्कि समाज के लिए खतरा बताया जाता है। यह सब अलग-अलग जगहों पर हुई नफरत भरी भाषणबाज़ी भर नहीं है। इससे साफ दिखता है कि बहुसंख्यक ताकत की एक संगठित और फैली हुई व्यवस्था खड़ी की जा रही है। यह व्यवस्था राज्य की नजरों से ओझल रहकर काम करती है, संस्थानों की चुप्पी और लापरवाही से ताकत पाती है और धीरे-धीरे भीड़ के दम पर चलने वाली ऐसी सत्ता को सामान्य बना देती है जो संविधान की हैसियत को ही चुनौती देने लगती है। साथ ही, प्रवीण तोगड़िया का दशकों तक विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल से जुड़े रहने के बाद उनसे अलग होकर नई राह पकड़ना भी एक रहस्यमय और समझ से परे बदलाव है, जो गंभीर सवाल और जांच का विषय है।
हालांकि भारत में लंबे समय से सांप्रदायिक दुश्मनी की छिटपुट घटनाएं या कभी-कभी भीड़ द्वारा हिंसा की घटनाएं देखने को मिलती रही हैं, लेकिन स्टडी के लिए चुने गए छह महीने का समय अपनी तीव्रता, तालमेल और भौगोलिक फैलाव के कारण अलग है। तोगड़िया के ध्रुवीकरण वाले नेतृत्व में, एएचपी और आरबीडी ने दर्जनों पब्लिक रैलियां, शस्त्र पूजा समारोह, त्रिशूल और हथियार बांटने के कार्यक्रम, वैचारिक ट्रेनिंग कैंप, धर्मांतरण विरोधी विरोध प्रदर्शन, अल्पसंख्यक धार्मिक सभाओं में रुकावट और अंतर-धार्मिक और सामुदायिक जिंदगी में सीधे दखल दिए। इन घटनाओं में सामने आए पैटर्न कट्टरता की आकस्मिक अभिव्यक्तियां नहीं हैं, बल्कि एक सावधानीपूर्वक बनाई गई वैचारिक परियोजना के हिस्से हैं जो धर्मशास्त्र, पुरुषत्व की अवधारणा, रीति-रिवाज और हिंसा को एक सुसंगत संगठनात्मक रणनीति में मिलाते हैं।
इस लामबंदी का सामाजिक-कानूनी महत्व न केवल भाषणों की सामग्री या सभाओं की फ़्रीक्वेंसी में है, बल्कि एक समानांतर नियम व्यवस्था के निर्माण में भी है - एक बहुसंख्यकवादी तंत्र जो तेजी से सार्वजनिक जीवन, सामुदायिक संबंधों और हिंसा के वितरण को आकार दे रहा है। AHP-RBD की गतिविधियां उस चीज के मजबूत होने का प्रतिनिधित्व करती हैं जिसे सतर्कता संप्रभुता का एक बुनियादी ढांचागत रूप कहा जा सकता है। इस सिस्टम में, सांप्रदायिक पहचान सार्वजनिक व्यवस्था का आयोजन सिद्धांत बन जाती है; हिंसा को नैतिक कर्तव्य के रूप में फिर से परिभाषित किया जाता है; पुरुषत्व की अवधारणा एक नागरिक आदर्श बन जाती है और राज्य के अधिकार को उग्र धार्मिकता द्वारा पूरक या खत्म कर दिया जाता है। यह कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है। यह एक पैटर्न में है, स्क्रिप्टेड है, नियमित है और संगठनात्मक संरचनाओं में एम्बेडेड है जो इसे निरंतरता, पुनरुत्पादन और प्रसार प्रदान करती हैं।
यह लेख छह महीनों तक चली इस गतिविधि को सामाजिक और कानूनी नजरिये से देखता है। इसके लिए कई राज्यों में हुए एएचपी–आरबीडी के कार्यक्रमों से जुटाए गए विस्तृत आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है (पूरी सूची संलग्न दस्तावेज में दी गई है)। भाषणों में बार-बार उभरने वाले विषयों, इस्तेमाल की गई भाषा, रस्मों-रिवाजों और खास तौर पर पुलिस जैसी राज्य संस्थाओं के साथ संगठन के व्यवहार को समझते हुए, लेख यह दिखाता है कि एएचपी–आरबीडी की गतिविधियां भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को खतरनाक दिशा में मोड़ रही हैं। इस लामबंदी से सत्ता की एक दोहरी व्यवस्था उभरती दिखती है। एक तरफ वह संवैधानिक राज्य है, जो बराबरी, आजादी और धार्मिक स्वतंत्रता की बात करता है, लेकिन जिसे धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है। दूसरी तरफ एक समानांतर, गैर-कानूनी बहुसंख्यकवादी ताकत है, जो अलग-अलग धर्मों के बीच रिश्तों पर नजर रखती है, तय करती है कि कौन सा धर्म ‘सही’ है, महिलाओं और लैंगिक व्यवहार पर नियंत्रण करती है और समुदाय की रक्षा के नाम पर हिंसा को जायज ठहराती है।
संवैधानिक लोकतंत्र के लिए इसके नतीजे बहुत गंभीर हैं। एएचपी–आरबीडी की गतिविधियां संविधान की धर्मनिरपेक्षता और समानता की बुनियादी सोच को खुली चुनौती देती हैं। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि ये घटनाएं दिखाती हैं कि संविधान की ये प्रतिबद्धताएं सिर्फ सरकार की कार्रवाइयों से ही नहीं, बल्कि उसकी चुप्पी और निष्क्रियता से भी कमजोर होती हैं- जैसे चुनिंदा पुलिस कार्रवाई, परोक्ष समर्थन, बयानबाजी में तालमेल या फिर चरमपंथी भाषा को धीरे-धीरे सामान्य मान लेना। जब नफरत खुले तौर पर स्वीकार्य बना दी जाती है, तो अल्पसंख्यक समुदायों के लिए नागरिक स्पेस सिमटता जाता है और बहुसंख्यक आक्रामकता समाज को काबू में रखने का मान्य तरीका बन जाती है।
सामाजिक आंदोलनों के नजरिये से देखें तो एएचपी–आरबीडी, बड़े हिंदुत्व तंत्र के भीतर एक उग्र धड़ा बनकर काम करता है। यह कट्टर भाषा और हिंसा की सीमाओं को आगे खिसकाता है, जिससे जो बातें पहले अस्वीकार्य थीं वे धीरे-धीरे सामान्य लगने लगती हैं। इसका असर यह होता है कि मुख्यधारा के राजनीतिक नेता अपेक्षाकृत संतुलित दिखाई देने लगते हैं, जबकि वे उसी माहौल का फायदा उठाते हैं जो उग्र लामबंदी ने बनाया है। कानूनी नजरिये से, इस समूह की गतिविधियां- नफरत फैलाने वाले भाषणों से लेकर हिंसा के लिए उकसाने, हथियारों के इस्तेमाल और चौकसीवाद तक- भारतीय न्याय संहिता, शस्त्र अधिनियम और संविधान द्वारा दिए गए मूल अधिकारों का बार-बार उल्लंघन करती हैं।
इस लेख में बताया गया है कि एएचपी–आरबीडी की यह लामबंदी केवल बढ़ती बहुसंख्यक आक्रामकता का उदाहरण भर नहीं है, बल्कि सांप्रदायिक राजनीति के एक नए तरीके का संकेत है। यह ऐसा तरीका है जिसमें रस्मों, पुरुषत्व की अवधारणा, धार्मिक प्रतीकों, इतिहास की नए सिरे से व्याख्या और कानूनी अस्पष्टता को जोड़कर एक शक्तिशाली राजनीतिक ढांचा तैयार किया गया है। यह संरचना वैचारिक भी है और संस्थागत भी जो लंबे समय तक चलने वाली गतिविधियां पैदा कर सकती है, कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर सकती है, भावनात्मक माहौल गढ़ सकती है और चुनावी व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। इसके कानूनी असर को समझने के लिए हमें अलग-अलग उल्लंघनों से आगे बढ़कर उस व्यापक सामाजिक-कानूनी बदलाव को देखना होगा, जिसका यह हिस्सा है- एक ऐसी समानांतर राजनीतिक व्यवस्था का धीरे-धीरे उभरना, जो भीतर से ही संवैधानिक लोकतंत्र को विस्थापित करने की क्षमता रखती है।
वीएचपी के हाशिये से उग्र चरमपंथी संगठन तक
प्रवीण तोगड़िया, जो पेशे से प्रशिक्षित कैंसर सर्जन हैं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के जरिये हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति में आए और आगे चलकर विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बने- या उन्हें इस पद पर स्थापित किया गया। यही दौर उनकी राजनीतिक परीक्षा की घड़ी थी। उन्होंने आक्रामक सांस्कृतिक लामबंदी के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई, खास तौर पर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के लिए ‘त्रिशूल दीक्षा’ जैसे कार्यक्रमों के आयोजन के माध्यम से। ये आयोजन खुले तौर पर सांप्रदायिक उकसावे और हथियारों के वितरण से जुड़े थे और कई बार राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का उल्लंघन भी करते थे।
वीएचपी की मूल युवा शाखा बजरंग दल ने एएचपी–आरबीडी की कामकाजी रणनीतियों का खाका तैयार किया। इसकी बुनियादी विचारधारा- हिंदुत्व, इस्लामोफोबिया और अतिदक्षिणपंथी विचार- राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान और उसके बाद 2002 के गुजरात दंगों में और ज्यादा पुख्ता हुई, जिनमें तोगड़िया की भूमिका काफी अहम रही। तोगड़िया की पृष्ठभूमि और गतिविधियों के विस्तृत विश्लेषण के लिए Communalism Combat के मई 2003 के अंक Against the Law [1]को देखा जा सकता है। बजरंग दल की विरासत- जिसमें ईसाइयों पर हमलों से लेकर तथाकथित ‘मोरल पुलिसिंग’ तक की हिंसा और सांप्रदायिक निशाना बनाना शामिल है-यही वह वैचारिक जमीन है, जिस पर एएचपी–आरबीडी खड़ा है।
एएचपी–आरबीडी, तोगड़िया के लिए वह मंच है जिसके जरिये वे खुद को बिना समझौते वाले, सख्त हिंदुत्व की ‘असली आवाज’ के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। यही पृष्ठभूमि एएचपी–आरबीडी की लामबंदी की कई खासियतों को समझाती है:
● इसकी बेहद उग्र और भड़काऊ भाषा, जो मुख्यधारा के हिंदुत्व के सबसे ज्यादा ध्रुवीकरण वाले तत्वों से भी आगे निकल जाती है;
● जनसंख्या को लेकर डर फैलाने और महिलाओं व लैंगिक व्यवहार पर पुलिसिंग की इसकी सोच;
● पहचान गढ़ने के साधन के रूप में रस्मों और प्रतीकों के सैन्यीकरण पर इसकी निर्भरता;
● कानून और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति इसका खुला अनादर;
● और बीजेपी के मुकाबले खुद को एक उग्र धड़े के रूप में पेश करने की इसकी रणनीति, जो परोक्ष रूप से बीजेपी के राजनीतिक वर्चस्व को और मजबूत करती है।
एएचपी–आरबीडी वैचारिक कट्टरता के बढ़ने, संगठनों के भीतर बदलाव और उस राजनीतिक माहौल का नतीजा है, जो बहुसंख्यक आक्रामकता को लगातार ज्यादा सहनशील नजर से देखने लगा है। यह संगठन राज्य की सत्ता और राष्ट्रवादी भाषा के बीच बने खाली स्थानों में फलता-फूलता है- कानून लागू करने में अस्पष्टता, राजनीतिक नेतृत्व की दुविधा और एक ऐसे समाज की बेचैनी में, जो ध्रुवीकरण, असुरक्षा और ऐतिहासिक पीड़ासे जूझ रहा है।
नफरत एक संरचना के रूप में: पैटर्न का विश्लेषण
इस लेख में जिन घटनाओं का विश्लेषण किया गया है, वे अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई एएचपी–आरबीडी की गतिविधियों का विस्तृत विवरण पेश करती हैं। इनमें रैलियां, भाषण, धार्मिक अनुष्ठान, त्योहार, हथियारों के प्रशिक्षण शिविर, तथाकथित “जागरूकता” अभियान, अल्पसंख्यक संस्थानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, जुलूस और स्थानीय विवादों में दखल जैसी गतिविधियां शामिल हैं। हर घटना में स्थान, गतिविधि का स्वरूप, भाषणों की सामग्री, इस्तेमाल किए गए प्रतीक, प्रदर्शन के तत्व (जैसे त्रिशूल, तलवारें, आग्नेयास्त्र) और पुलिस की मौजूदगी या अनुपस्थिति जैसी जानकारियां दर्ज हैं।
यह लेख पिछले छह महीनों की इन घटनाओं को अलग-थलग मामलों के रूप में नहीं, बल्कि एक समेकित ढांचे के रूप में देखता है- एक ऐसी राजनीतिक प्रस्तुति के रूप में, जिसके जरिए राष्ट्र, समाज और नागरिकता की एक खास कल्पना गढ़ी जाती है और जमीन पर उतारी जाती है।
उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एएचपी के कार्यक्रमों में इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और प्रतीकों में एक साफ़ पैटर्न उभरकर सामने आता है। यहाँ नफ़रत फैलाने वाले भाषण को सिर्फ़ गाली-गलौज या शब्दों की आक्रामकता के रूप में नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसे सोच और समझ को गढ़ने-मोड़ने की एक रणनीति, यानी विमर्श को जानबूझकर ढालने की तकनीक, के रूप में देखना होगा। यह सांप्रदायिक सीमाएं बनाने, नैतिक मूल्य तय करने, दुश्मनों की पहचान करने और हिंसा के तरीकों को सही ठहराने का एक संगठित तरीका है। अलग-अलग राज्यों और हालात में भी वही बातें बार-बार लगभग एक ही तरह से सामने आती हैं- जनसंख्या को लेकर डर, “लव जिहाद” का भूत, ऐतिहासिक अन्याय की भावना, भूभाग खोने की आशंका और सभ्यता पर खतरे की बात। ये कोई अचानक कहे गए शब्द नहीं हैं, बल्कि एक सोची-समझी वैचारिक पटकथा के हिस्से हैं, जिनका मकसद लोगों के मन में डर, शर्म, गर्व और रक्षात्मक गुस्सा पैदा करना होता है।
इतनी ही अहम बात इस लामबंदी का रस्मों वाला पहलू है। शस्त्र पूजा, त्रिशूल दीक्षा, सामूहिक तलवार-आशीर्वाद, या हथियारों का भक्तिपूर्ण प्रदर्शन जैसी रस्में सिर्फ़ सांस्कृतिक प्रदर्शन से कहीं ज़्यादा हैं। ये हिंसा को सीधे धार्मिक और नैतिक रीति-रिवाजों में शामिल करके उसे पवित्र बनाने की कोशिशें हैं। जब हथियारों को पवित्र माना जाता है, दिखाया जाता है और सामूहिक सम्मान की चीजों के तौर पर बांटा जाता है, तो भक्ति और आक्रामकता के बीच की सीमा खत्म हो जाती है। रीति-रिवाजों पर एंथ्रोपोलॉजी के काम और राजनीतिक धर्म की थ्योरी से प्रेरणा लेते हुए, यह विश्लेषण ऐसी घटनाओं को ऐसे परफॉर्मेटिव कामों के तौर पर देखता है जो सतर्कता की ओर एक नैतिक जिम्मेदारी पैदा करते हैं। वे प्रतिभागियों को खुद को सिर्फ भक्त नहीं, बल्कि रक्षक के तौर पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे हिंसा सही और जरूरी लगने लगती है।
आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि AHP–RBD खुद को गैर-कानूनी अथॉरिटी के सोर्स के तौर पर कैसे पेश करता है। कई मामलों में, कैडर पुलिसिंग से जुड़े काम करते हैं: अलग-अलग धर्मों के लोगों के रिश्तों में दखल देना, चर्चों या प्रार्थना सभाओं पर छापा मारना, "संदिग्ध" व्यवहार के आरोपी लोगों को हिरासत में लेना, या सुरक्षा के बहाने इलाकों की निगरानी करना। सामाजिक-कानूनी सिद्धांत के नजरिए से देखने पर, ये हरकतें अलग-थलग अतिक्रमण नहीं हैं, बल्कि एक समानांतर शासन संरचना के संकेत हैं। AHP प्रभावी ढंग से संप्रभु कार्य करता है - खतरों की पहचान करना, अनुशासन लागू करना और नैतिक उल्लंघनों पर फैसला सुनाना - इस तरह यह कानूनी जबरदस्ती पर राज्य के एकाधिकार के साथ मुकाबला करता है। यहां सतर्कता शासन का एक तरीका बन जाती है, न कि कोई असामान्य बात।
संवैधानिक और कानूनी ढांचों के सामने रखने पर, इस पैटर्न का महत्व और भी साफ हो जाता है। संगठन की बातें हेट-स्पीच कानून के तहत सवाल खड़े करती हैं; इसके हथियारबंद रीति-रिवाज संभावित रूप से आर्म्स एक्ट का उल्लंघन करते हैं; धार्मिक कामों में इसका दखल आर्टिकल 25 और 26 से जुड़ा है और मुस्लिम और ईसाई समुदायों को निशाना बनाना आर्टिकल 14 और 15 की समानता की गारंटी को चुनौती देता है। चिंता अलग-अलग उल्लंघनों की मौजूदगी नहीं है, बल्कि संवैधानिक नियमों का कुल मिलाकर जो नुकसान हो रहा है, वह है। जैसे-जैसे ऐसी प्रथाएं सामान्य होती जाती हैं, मौलिक अधिकारों का सुरक्षा ढांचा कमजोर होता जाता है और राज्य के अधिकार और बहुमत की इच्छा के बीच की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं।
सोशल मूवमेंट थ्योरी के नजरिए से देखने पर, यह लामबंदी उससे मेल खाती है जिसे कई लोग चरमपंथी खेमा (radical flank) कहते हैं: एक बड़े वैचारिक इकोसिस्टम का एक चरमपंथी धड़ा जो स्वीकार्य बातचीत की सीमाओं को बढ़ाकर सार्वजनिक मानदंडों को बदल देता है। AHP की खुली दुश्मनी, सामाजिक अलगाव के लिए साफ-साफ आह्वान और पवित्र माने जाने वाले सतर्कतावाद से ऐसा माहौल बनता है जिसमें मुख्यधारा के राजनीतिक नेता उदारवादी दिखते हैं, भले ही वे बहुसंख्यकवादी विचारों के करीब जा रहे हों। आंकड़े यह दिखाते हैं कि इस तरह की हाशिये की, उग्र भाषा हाशिये तक सीमित नहीं रहती, बल्कि धीरे-धीरे राजनीतिक सोच के केंद्र में जगह बना लेती है। इसका नतीजा यह होता है कि समाज में ध्रुवीकरण बढ़ता है और लोकतांत्रिक जीवन में सही–गलत की नैतिक सीमाएं नए सिरे से तय होने लगती हैं।
इसी वजह से यह विश्लेषण नफरत को अलग-अलग, बिखरी हुई घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि एक स्थायी ढांचे के रूप में देखता है- एक ऐसी बनावट जो भाषा, रस्मों, सार्वजनिक जगहों और सत्ता के रिश्तों में गहराई से रची-बसी है। यहां लामबंदी को अर्थ गढ़ने की एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया के तौर पर समझा गया है, जो कानून, पहचान और राज्य की शक्ति के बंटवारे से अलग नहीं है। सांप्रदायिक दुश्मनी के ऐसे बार-बार दोहराए जाने वाले प्रदर्शन धीरे-धीरे यह तय करने लगते हैं कि सार्वजनिक जीवन में क्या स्वीकार्य है और क्या नहीं- अक्सर कानून बदलने से बहुत पहले ही सामाजिक मानदंड खिसक जाते हैं। साथ ही यह विश्लेषण इस बात को भी सामने लाता है कि गैर-कानूनी ताकतें कानून की अस्पष्टताओं और उसे लागू करने में मौजूद खामियों का रणनीतिक रूप से फायदा उठाकर सार्वजनिक जगहों, निजी रिश्तों, धार्मिक आचरण और रोजमर्रा के सामाजिक संबंधों पर अपना नियंत्रण स्थापित करती हैं। इस नजरिये से देखें तो नफरत सिर्फ एक भाषा या विचार नहीं रह जाती, बल्कि शासन का एक तरीका बन जाती है, जो नीचे से ऊपर की ओर समाज के नैतिक और संवैधानिक ढांचे को बदलने लगती है।
बहुसंख्यकवाद, विजिलैंटे सॉवरेंटी और डर की राजनीति
आंकड़ों के आधार पर एएचपी–आरबीडी की इस लामबंदी को समझने के लिए संगठन को तीन अहम वैचारिक नजरियों में रखकर देखना जरूरी है- बहुसंख्यक राष्ट्रवाद, विजिलैंटे सॉवरेंटी (चौकसीवादी संप्रभुता) और डर की राजनीति। बहुसंख्यक राष्ट्रवाद उस सोच को दर्शाता है, जिसमें किसी एक धर्म या समुदाय को देश का असली मालिक माना जाता है, जबकि अल्पसंख्यकों को या तो शर्तों के साथ स्वीकार किया जाता है या फिर संभावित खतरे के रूप में देखा जाता है। यह ढांचा एएचपी–आरबीडी के भाषणों से काफी मेल खाता है, जहां बार-बार भारत को एक हिंदू राष्ट्र के रूप में पेश किया जाता है और मुसलमानों व ईसाइयों को बाहरी तत्वों की तरह दिखाया जाता है जिन पर नजर रखना या जिन्हें नियंत्रित करना जरूरी बताया जाता है।
विजिलैंटे सॉवरेंटी की अवधारणा यह समझने में मदद करती है कि कैसे गैर-राज्य समूह खुद को राज्य के विस्तार की तरह पेश करने लगते हैं। ऐसे समूह नैतिक नियम लागू करते हैं, समुदायों पर निगरानी रखते हैं, लोगों के निजी रिश्तों में दखल देते हैं और कई बार हिंसा करते हैं या उसकी धमकी देते हैं। एएचपी–आरबीडी की छापेमारी, लोगों को रोककर पूछताछ करना और सड़कों पर सीधे हस्तक्षेप करना इसी पैटर्न में आते हैं। ये कार्रवाइयां सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और बल प्रयोग करने के राज्य के विशेष अधिकार को सीधी चुनौती देती हैं।
डर की राजनीति यह बताती है कि ऐसे आंदोलन डर को सिर्फ एक भावना के रूप में नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने और सक्रिय करने के टूल के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। जनसंख्या को लेकर खतरे की बातें, “लव जिहाद,” धर्मांतरण की साजिशें और अतीत के विश्वासघातों का जिक्र करके एएचपी–आरबीडी एक ऐसा माहौल बनाता है जिसमें हर तरफ खतरा महसूस होने लगता है और आक्रामक कदम उठाना जायज लगने लगता है। डर वह ताकत बन जाता है जो समर्थकों को एकजुट रखता है और असाधारण सोच व व्यवहार को सही ठहराने का आधार बनता है।
एक ऐसे एकतरफा राजनीतिक शून्य में, जहां विपक्ष अब तक नफरत भरे भाषणों में किए जा रहे तमाम बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों- चाहे वे “जनसंख्या के खतरे” की बातें हों, “निजी रिश्तों पर सांप्रदायिक नियंत्रण”, “धार्मिक रस्मों का सैन्यीकरण” या कानून के नाम पर सड़कों पर ताकत दिखाने की कार्रवाइयां-का कोई भरोसेमंद, लगातार और प्रभावी जवाब नहीं दे पाया है, वहां यह विजिलैंटिज्म बिना किसी रोक-टोक के चलता रहता है।
2. जनसंख्या को लेकर डर की राजनीति
जनसंख्या को लेकर डर एएचपी–आरबीडी की लामबंदी की रणनीति का केंद्र बिंदु है। छह महीने के आंकड़ों में यह देखा गया कि नेता बार-बार यह बात फैलाते हैं कि हिंदू अल्पसंख्यक बनते जा रहे हैं और मुसलमान रणनीतिक रूप से तेजी से बढ़ रहे हैं। इस कहानी को ऐसे पेश किया जाता है जैसे यह कोई सवाल ही नहीं है, बल्कि एक निश्चित तथ्य है। इसमें सबूत की तुलना में दोहराव, भावना और चित्रण ज्यादा काम आता है, मुसलमानों को तेजी से बढ़ते, इलाके में फैलना, राजनीतिक रूप से संगठित होते और राष्ट्र के अस्तित्व के लिए खतरा बनते दिखाया जाता है।
हालांकि हिंदू राष्ट्रवादी सोच में जनसंख्या को लेकर चिंता लंबे समय से मौजूद रही है, एएचपी–आरबीडी इसे असामान्य तीव्रता और एकरूपता के साथ इस्तेमाल करता है। चाहे अहमदाबाद में भाषण हो, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाके हों, उत्तर प्रदेश के छोटे शहर हों या असम के सीमा जिले, नेता लगभग एक ही पटकथा दोहराते हैं: हिंदू घट रहे हैं; मुसलमान जमीन पर कब्जा कर रहे हैं; जनसांख्यिकीय असंतुलन हिंदू सभ्यता के लिए खतरा है; मुस्लिम “वोट बैंक” राजनीति नियंत्रित कर रहे हैं और हिंदू महिलाएं सीधे खतरे में हैं। विभिन्न क्षेत्रों में इस संदेश की लगातार समानता यह दिखाती है कि यह कोई बिखरी हुई स्थानीय भावना नहीं, बल्कि एक संगठित वैचारिक परियोजना है।
सामाजिक-कानूनी दृष्टिकोण से देखें तो जनसंख्या को लेकर डर एक राजनीतिक उपकरण की तरह काम करता है। यह एक स्थायी आपातकाल का भाव पैदा करता है, जिसमें भविष्य से अनुमानित खतरों के आधार पर वर्तमान को ढाला जाता है। इस माहौल में संविधानिक मानदंड अपर्याप्त लगने लगते हैं। नफरत फैलाने वाले भाषण को “चेतावनी” के रूप में पेश किया जाता है, हथियारों के प्रशिक्षण को “सुरक्षा” कहा जाता है और विजिलैंटिज्म को “रोकथाम की कार्रवाई” के रूप में दिखाया जाता है। यहां तक कि संविधान की समानता को भी एक ऐसा जोखिम बताया जाता है, जिसे हिंदू अब सहन नहीं कर सकते।
जनसंख्या को लेकर डर एक तरह से जमीन या इलाकों का नक़्शा बनाने का तरीका भी बन जाता है। कई भाषणों में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को “कब्जा किए गए इलाके,” “मिनी-पाकिस्तान” या “बांग्लादेशी क्षेत्र” कहा जाता है। इससे सामान्य रहने या काम करने के तरीकों को ही घुसपैठ के प्रतीक में बदल दिया जाता है। एक मुस्लिम मोहल्ला शत्रुतापूर्ण जमीन बन जाता है और रोजमर्रा की जिंदगी ही अतिक्रमण का सबूत बन जाती है।
सामाजिक स्तर पर जनसंख्या का यह डर व्यक्तियों को एक खतरनाक भीड़ में बदल देता है। एक मुस्लिम युवा “जनसंख्या जिहाद” का संकेत बना दिया जाता है, एक मुस्लिम परिवार को कब्जे की साजिश के रूप में देखा जाता है और एक मुस्लिम इलाका विस्तार का अड्डा मान लिया जाता है। इससे मुसलमानों को नागरिक या पड़ोसी के रूप में देखने की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती। उन्हें इंसान नहीं, बल्कि जनसांख्यिकीय खतरे के रूप में पेश किया जाता है। ऐसी अमानवीय सोच भेदभावपूर्ण व्यवहार और हिंसा को भी जायज दिखाने लगती है।
इसी के साथ जनसंख्या को लेकर फैला डर हिंदू पहचान को भी नए सिरे से गढ़ता है। इसमें हिंदुओं को कमजोर और चारों तरफ से घिरे हुए दिखाया जाता है, पुरुषों को “रक्षक” की भूमिका अपनाने के लिए उकसाया जाता है और महिलाओं को समुदाय की इज्जत का प्रतीक बना दिया जाता है। यह कहानी अलग-अलग हिंदू समूहों को खतरे और कर्तव्य की एक साझा भावना के तहत एकजुट करने में मदद करती है। भाषण दर भाषण, एएचपी के नेता हिंदुओं से “जागने”, “सतर्क रहने” और “संघर्ष के लिए तैयार होने” की अपील करते हैं। इस तरह डर सामूहिक पहचान गढ़ने का एक टूल बन जाता है।
कानूनी तौर पर देखें तो जनसंख्या को लेकर फैलाया गया यह डर सिर्फ भ्रामक ही नहीं, बल्कि नुकसानदेह भी है। यह भेदभाव को बढ़ावा देता है, बहिष्कार को सामान्य बनाता है और हिंसा के लिए बहाने गढ़ता है। भारतीय संवैधानिक कानून-खासकर नफरत भरे भाषणों से जुड़े मामलों जैसे प्रवासी भलाई संगठन (2014) और अमीश देवगन (2020)-में साफ कहता है कि किसी पूरे समुदाय को खतरनाक बताने वाली भाषा समानता, गरिमा और सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन है। इसके बावजूद, एएचपी-आरबीडी के कई कार्यक्रमों में पुलिस और स्थानीय प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं, जिससे यह संदेश जाता है कि ऐसी भाषा को बर्दाश्त किया जा रहा है। संविधान द्वारा दी गई सुरक्षा और जमीनी हकीकत के बीच यही फासला जनसंख्या के डर को खुले तौर पर फैलने और सार्वजनिक जीवन में जड़ें जमाने का मौका देता है।
आखिरकार, जनसंख्या को लेकर फैलाया गया डर ही एएचपी-आरबीडी की पूरी लामबंदी की बुनियाद है। यह मुसलमानों को स्थायी दुश्मन के रूप में पेश करता है, संतान पैदा करने को संघर्ष का मैदान बना देता है और हथियारों की रस्मों, जेंडर पुलिसिंग, विजिलैंटिज्म, यहां तक कि अलगाव या हिंसा की मांगों को भी जायज ठहराने का आधार देता है। जनसंख्या के इस डर के बिना एएचपी की ज्यादातर कहानी अपनी धार खो देती है। लेकिन इसके सहारे लगभग हर तरह की कार्रवाई को संभव और स्वीकार्य बनाया जा सकता है।
3. जेंडर, सेक्सुअलिटी और नजदीकी रिश्तों पर सामुदायिक नियंत्रण
एएचपी-आरबीडी की विचारधारा के केंद्र में जेंडर और सेक्सुअलिटी हैं। संगठन भले ही “हिंदू धर्म की रक्षा” और “हिंदू महिलाओं की सुरक्षा” की बात करता हो, लेकिन उसके भाषण एक ऐसी सोच दिखाते हैं जो गहराई से पितृसत्तात्मक, जरूरत से ज्यादा पितृसत्तात्मक और सांप्रदायिक है। इसमें महिलाओं के शरीर और उनके निजी फैसलों पर समुदाय की इज्जत के नाम पर नियंत्रण किया जाता है। इस नियंत्रण का सबसे बड़ा टूल“लव जिहाद” की साजिशी थ्योरी है- जिसके तहत यह दावा किया जाता है कि मुस्लिम पुरुष जानबूझकर हिंदू महिलाओं से रिश्ते बनाते हैं ताकि उनका धर्म परिवर्तन कराया जा सके और हिंदू समाज को कमजोर किया जा सके।
आंकड़ों में दर्ज लगभग आधे कार्यक्रम सीधे तौर पर “लव जिहाद” का जिक्र करते हैं। यह संयोग नहीं है। इससे एक ऐसी सोच झलकती है जिसमें जेंडर को सामुदायिक टकराव का सबसे अहम मैदान बना दिया जाता है। हिंदू महिलाओं को मासूम, भोली और आसानी से बहकाए जाने वाली बताया जाता है, जबकि मुस्लिम पुरुषों को शिकारी, चालाक और जरूरत से ज्यादा हापरसेक्सुअल के रूप में पेश किया जाता है। यह दोतरफा तस्वीर किसी तथ्य पर आधारित नहीं है, बल्कि इसे लगातार विजिलैंस, शक और दुश्मनी को जायज ठहराने के लिए गढ़ा गया है।
एएचपी-आरबीडी के विमर्श में हिंदू महिला को संवैधानिक अधिकारों वाली एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में नहीं देखा जाता। इसके बजाय उसे हिंदू वंश की वाहक और समुदाय की शुद्धता का प्रतीक मान लिया जाता है। उसका शरीर मानो समुदाय की संपत्ति बन जाता है, और उसके रिश्तों को जनसंख्या से जुड़े खतरे के नजरिये से परखा जाता है। किसी भी अंतरधार्मिक रिश्ते को शुरू से ही जबरदस्ती का नतीजा मान लिया जाता है। हिंदू महिलाओं की अपनी इच्छा और निर्णय की क्षमता से इनकार करके, संगठन उन्हें अपनी पसंद रखने वाले व्यक्ति की बजाय “सुरक्षा की जरूरत वाली वस्तु” में बदल देता है।
यह संरचना तीन बड़े सामाजिक-कानूनी असर पैदा करता है।
पहला, यह महिलाओं पर निगरानी को सही ठहराता है। एएचपी-बीआरडी के सदस्य बाजारों, कॉलेजों और कार्यस्थलों जैसे सार्वजनिक जगहों पर नजर रखते हैं, ताकि हिंदू महिलाओं और मुस्लिम पुरुषों के बीच होने वाले संपर्क पर निगाह रखी जा सके। उनकी मौजूदगी से हर समय जांच-पड़ताल और शक का माहौल बन जाता है। हिंदू महिलाएं आजाद नागरिकों की तरह नहीं, बल्कि सीमाएं तय करने वाले संकेत बन जाती हैं- उनकी आवाजाही और दोस्तियों पर “सुरक्षा” के नाम पर नियंत्रण किया जाता है।
दूसरा, यह मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ हिंसा को बढ़ावा देता है। कई भाषणों में मुस्लिम पुरुषों को अपने आप में खतरा बताकर पेश किया जाता है और लोगों को उन्हें रोकने, सजा देने या यहां तक कि मार डालने तक के लिए उकसाया जाता है। ऐसी भाषा सीधे तौर पर BNS और समानता व व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन करती है। फिर भी ये बातें खुलेआम कही जाती हैं, कई बार पुलिस की मौजूदगी में, जिससे यह संदेश जाता है कि जेंडर की “सुरक्षा” के नाम पर सांप्रदायिक हिंसा को बर्दाश्त किया जा रहा है।
तीसरा, यह विमर्श संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करता है। हदिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि बालिग़ अपने जीवनसाथी को चुनने के लिए स्वतंत्र हैं। शफीन जहां, नवतेज जौहर और पुट्टस्वामी जैसे फैसलों में स्वायत्तता, गरिमा और निजता को संविधान के मूल मूल्य माना गया है। लेकिन एएचपी-आरबीडी की लामबंदी में व्यक्ति की आजादी की जगह सामुदायिक नियंत्रण ले लेता है। अंतरधार्मिक रिश्तों को साजिश के रूप में पेश किया जाता है और संवैधानिक सुरक्षा को हिंदू अस्तित्व के लिए खतरा बताकर दिखाया जाता है।
समाजशास्त्रीय तौर पर देखें तो यह जेंडर आधारित कहानी हिंदू पुरुषों को एक साझा पितृसत्तावादी जिम्मेदारी के एहसास के जरिए आपस में बांधती है। “हिंदू महिलाओं की रक्षा” का आह्वान हिंदू पुरुषों के बीच एकजुटता बनाने का तरीका बन जाता है। पितृसत्तावाद को सैन्य अंदाज में परिभाषित किया जाता है- शक्ति, विजिलैंस और टकराव के लिए तैयार रहना। हथियारों की पूजा या त्रिशूल वितरण जैसे अनुष्ठान इस सोच को और मजबूत करते हैं। कुल मिलाकर, जेंडर यहां ऐसे पुरुषों का एक समुदाय गढ़ने का टूल बन जाता है, जिन्हें टकराव के लिए पहले से तैयार किया जाता है।
इस तरह “लव जिहाद” सिर्फ एक मिथक या राजनीतिक नारा नहीं रह जाता। यह एएचपी-आरबीडी की लामबंदी का एक केंद्रीय आधार बन जाता है। इसके जरिए महिलाओं की स्वायत्तता पर लगाम लगाई जाती है, मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ दुश्मनी को हवा दी जाती है, समूह की पहचान मजबूत की जाती है और निगरानी व हिंसक कार्रवाई को नैतिक तौर पर सही ठहरा दिया जाता है। यह रोजमर्रा के निजी रिश्तों को जंग का मैदान बना देता है और निजी नजदीकियों को समुदाय के अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बनाकर पेश करता है।
4. अनुष्ठानिक सैन्यीकरण और हिंसा का पवित्रीकरण
एएचपी-आरबीडी की लामबंदी की सबसे अहम विशेषताओं में से एक है हिंसा को सामान्य बनाने में अनुष्ठानों की केंद्रीय भूमिका। आंकड़ों में शस्त्र पूजा, त्रिशूल दीक्षा (त्रिशूलों का वितरण), हथियार चलाने की ट्रेनिंग, आत्मरक्षा कार्यशालाओं और तलवारों, बंदूकों व त्रिशूलों के सार्वजनिक प्रदर्शन से जुड़े कई कार्यक्रम दर्ज हैं। ये चीजें राजनीतिक सभाओं में सिर्फ सजावट के लिए नहीं होतीं, बल्कि संगठन की विचारधारात्मक रणनीति का मूल हिस्सा होती हैं।
शस्त्र पूजा, जो परंपरागत रूप से एक धार्मिक अनुष्ठान है, एएचपी-आरबीडी के कार्यक्रमों में साफ तौर पर राजनीतिक अर्थ ले लेती है। तोगड़िया के भाषणों में हथियारों की सराहना उनके प्रतीकात्मक महत्व के लिए नहीं, बल्कि उनके इस्तेमाल के लिए की जाती है- यानी बल के जरिए हिंदू समुदाय की “रक्षा” करने की क्षमता के लिए। तलवार को साहस, त्रिशूल को शुद्धता और बंदूक को तैयारी का प्रतीक बताया जाता है। जब हथियारों को आशीर्वाद दिया जाता है, तो दरअसल हिंसा को ही आशीर्वाद दिया जाता है। यह अनुष्ठानिक संरचना आक्रामकता को नैतिक ढाल देता है, जिससे राजनीतिक मंशा धार्मिक प्रथा के पीछे छिप जाती है।
त्रिशूल दीक्षा इस प्रक्रिया को और आगे ले जाती है। युवाओं को त्रिशूल बांटना एक धार्मिक दीक्षा के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन असल में इससे ऐसे लोगों का एक समूह तैयार होता है जिन्हें “धर्म के रक्षक” के तौर पर चिन्हित किया जाता है। ये त्रिशूल पहचान के प्रतीक बन जाते हैं जो टकराव के लिए तैयार होने के खुले संकेत हैं। इस तरह के दीक्षा अनुष्ठान दूसरे संदर्भों में सक्रिय उग्रवादी समूहों की प्रथाओं से मिलते-जुलते हैं, जहां प्रतीकात्मक वस्तुएं लोगों को सामूहिक संघर्ष के विचार से भावनात्मक रूप से बांध देती हैं।
हथियार चलाने की ट्रेनिंग की मौजूदगी गंभीर कानूनी सवाल खड़े करती है। आर्म्स एक्ट के तहत हथियारों को संभालने या उनकी ट्रेनिंग देने के लिए सख्त अनुमति जरूरी होती है। इसके बावजूद AHP-RBD अक्सर ऐसे सत्र सार्वजनिक रूप से आयोजित करता है और कई बार पुलिस की ओर से कोई आपत्ति नहीं दिखती। हथियार प्रशिक्षण के दो मकसद होते हैं- एक तरफ यह व्यावहारिक कौशल सिखाता है और दूसरी तरफ यह संदेश देता है कि संगठन खुद को राज्य के समानांतर एक ताकत के रूप में देखता है। इसका मतलब यह भी निकलता है कि AHP- RBD हिंसा पर राज्य के एकाधिकार को स्वीकार नहीं करता।
समाजशास्त्रीय नजरिये से देखें तो ये अनुष्ठान आक्रामकता के इर्द-गिर्द एक तरह की सामुदायिक भावना पैदा करते हैं। ये ऐसे पुरुष-प्रधान माहौल बनाते हैं जहां हिंसा को पवित्र माना जाता है, उसका महिमामंडन किया जाता है और उसका अभ्यास भी कराया जाता है। धार्मिक भक्ति उग्र राष्ट्रवाद से मिल जाती है, जिससे वह स्थिति बनती है जिसे विद्वान “पवित्रीकृत राजनीति” (sacralised polity) कहते हैं यानी ऐसी राजनीतिक पहचान जो शक्ति के अनुष्ठानिक प्रदर्शन और टकराव के लिए हमेशा तैयार रहने की मानसिकता से गढ़ी जाती है।
इसके सामाजिक और कानूनी असर काफी दूर तक जाते हैं। अनुष्ठानिक सैन्यीकरण धर्म और राजनीति, प्रतीक और बल, कानून और गैर कानूनी कामों के बीच की सीमाओं को धुंधला कर देता है। इससे ऐसा समुदाय बनता है जो यह मानने लगता है कि उसे कानून से बाहर जाकर काम करने का नैतिक अधिकार है- शायद नैतिक जिम्मेदारी भी। हथियार पवित्र वस्तुएं बन जाते हैं, हिंसा सामुदायिक कर्म में बदल जाती है और निगरानी या स्वयं न्याय करने की प्रवृत्ति को कर्तव्य समझा जाने लगता है। इस तरह ये अनुष्ठान उस बुनियादी सिद्धांत को कमजोर करते हैं कि वैध बल प्रयोग का अधिकार सिर्फ राज्य के पास है और इसी के साथ संवैधानिक लोकतंत्र की एक अहम नींव हिल जाती है।
5. क्षेत्रीय मिथक, ऐतिहासिक पुनर्लेखन और नफरत का भौगोलिक विस्तार
AHP- RBD की लामबंदी की एक बड़ी खासियत यह है कि वह भूगोल और इतिहास को सांप्रदायिक नजरिए से दोबारा गढ़ती है। संगठन खुद को सिर्फ मौजूदा राजनीतिक विवादों तक सीमित नहीं रखता, बल्कि मिथकीय इतिहास, सभ्यतागत दावों और जमीन से जुड़ी शिकायतों के मिले-जुले स्रोतों से तर्क खींचता है। यह पुनर्लेखन केवल सांस्कृतिक नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक कोशिश है-यह तय करने की कि राष्ट्र का “असल” हिस्सा कौन है, जमीन पर हक किसका है और सार्वजनिक व पवित्र स्थलों पर नैतिक अधिकार किसे होना चाहिए। यह दावा कि मक्का, मदीना या वेटिकन जैसे वैश्विक धार्मिक स्थल कभी हिंदू मंदिर थे, ऐतिहासिक रूप से निराधार है, लेकिन इसका एक वैचारिक मकसद है। इससे ऐसी कहानी बनाई जाती है जिसमें हिंदू सभ्यता को पवित्र भूगोल का मूल मालिक बताया जाता है, और इस्लाम व ईसाई धर्म को बाद में आने वाली, दखल देने वाली ताकतों के रूप में दिखाया जाता है जिन्होंने दूसरों की चीजें हड़प लीं।
यही सोच AHP की राजनीतिक थियोलॉजी का केंद्र बनती है। हिंदू धर्म को दुनिया की पहली सभ्यता और वैश्विक पवित्र स्थलों का असली संरक्षक बताया जाता है। मुसलमानों और ईसाइयों को बाहरी आगंतुक, सभ्यता को बिगाड़ने वाले और ऐतिहासिक आक्रमणकारी कहकर पेश किया जाता है। यह नस्ली रंग लिए हुआ ढांचा भारतीय मुसलमानों और ईसाइयों को राष्ट्रीय पहचान से ही अलग करने की कोशिश करता है। जब मक्का तक को “छिना हुआ” हिंदू क्षेत्र बताया जाता है, तो इशारा साफ होता है कि अगर वैश्विक इस्लामी स्थलों को ही अवैध ठहराया जा सकता है, तो भारत में मुसलमानों का भारत से जुड़ाव और भी ज्यादा कमजोर और संदिग्ध दिखाया जा सकता है।
इन विचारों के ठोस सामाजिक-कानूनी असर दिखाई देते हैं। अजीब-ओ-गरीब क्षेत्रीय दावे सांप्रदायिक लामबंदी का आधार बन जाते हैं। काशी या मथुरा को “वापस लेने” की मांग सिर्फ कुछ खास मंदिरों को लेकर दिया गया तर्क नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक धारणा पर टिकी होती है कि सभी मुस्लिम धार्मिक ढांचे तोड़े गए हिंदू स्थलों पर बनाए गए हैं। मस्जिदों को अतीत की हार के प्रतीक के रूप में दोबारा पेश किया जाता है और मुस्लिम मौजूदगी को अपमान की याद की तरह दिखाया जाता है। इस सोच में हिंसा आक्रामकता नहीं, बल्कि “भरपाई” बन जाती है यानी “इतिहास को ठीक करने” की कोशिश।
यह स्थान-आधारित राजनीति भावनाओं से भरी भाषा के जरिए और मजबूत की जाती है। मुसलमानों को अक्सर “क़ब्जाधारी,” “अतिक्रमणकारी,” “जमीन हड़पने वाले,” “बांग्लादेशी” या “जिहादी बसने वाले” जैसे शब्दों से पुकारा जाता है। इस तरह के नामाकरण आम रिहायशी इलाकों को कल्पित जंग के मैदान में बदल देते हैं। नागरिकता यहां रहने भर का सवाल बन जाती है, जिसे कभी भी छीना जा सकता है। अहमदाबाद और वडोदरा जैसे शहरों में नेता यह दावा करते हैं कि मुस्लिम- बहुल इलाके “नो-गो जोन” बन चुके हैं, मानो राज्य अपने ही इलाके पर नियंत्रण खो चुका हो। भले ही ऐसे दावों का कोई तथ्यात्मक आधार न हो लेकिन ये जमीन से जुड़ा डर पैदा करते हैं- यह एहसास कि हिंदू अपने ही वतन में भौतिक तौर पर जगह खो रहे हैं।
इस तरह AHP की क्षेत्रीय कल्पना भारत की सामाजिक भूगोल को दोबारा गढ़ने की परियोजना के रूप में काम करती है। यह जमीन, मंदिरों, सांस्कृतिक स्मृति और यहां तक कि शहरी जगहों पर भी हिंदू स्वामित्व का दावा करती है। यह सक्रिय “पुनः प्राप्ति” का आह्वान करती है, जिसे अक्सर धार्मिक कर्तव्य के रूप में पेश किया जाता है। अयोध्या को बार-बार इस बात के सबूत के तौर पर दिखाया जाता है कि ऐसी वापसी न सिर्फ संभव है, बल्कि जरूरी भी है। यहीं से काशी, मथुरा और कई दूसरे स्थलों को एक अंतहीन सभ्यतागत परियोजना के अगले चरण के रूप में पेश किया जाता है। यह तर्क आगे बढ़कर धार्मिक स्थलों से बाहर पूरे इलाकों तक फैल जाता है। असम के जिलों, पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों और उत्तर प्रदेश या कर्नाटक के कुछ हिस्सों को “कब्जे में पड़ी हिंदू जमीन” बताया जाने लगता है।
इस तरह का मिथकीय पुनः क्षेत्रीकरण ऐसा माहौल बनाता है जिसमें हिंसा को स्थान के आधार पर जायज ठहराया जाता है। जिन इलाकों को “कब्जा किया हुआ” कहा जाता है, वे वैध निशाने बन जाते हैं। स्थानीय मुस्लिम समुदायों को ऐतिहासिक आक्रमणकारियों के वारिस के रूप में पेश किया जाता है। “घर वापसी” (पुनः धर्मांतरण) के आह्वान जमीन और धार्मिक स्थलों की भौतिक “वापसी” की मांगों के साथ चलते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में जगह खुद वर्चस्व स्थापित करने का टूल बन जाती है।
संवैधानिक नजरिए से देखें तो यह स्थान-आधारित भाषा भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे की जड़ पर हमला करती है। यह समान नागरिकता, धर्म की स्वतंत्रता और इस सिद्धांत को कमजोर करती है कि हर व्यक्ति - उसकी वंशावली या ऐतिहासिक दावों से अलग- देश का बराबर का हिस्सा है। संविधान नागरिकता या क्षेत्रीय अधिकारों का आधार किसी “सभ्यतागत स्वामित्व” को नहीं मानता। लेकिन AHP की सोच ठीक ऐसी ही एक सीढ़ीनुमा व्यवस्था खड़ी करती है, जिसमें अल्पसंख्यकों को शर्तों पर शामिल सदस्य बना दिया जाता है जिनका देश से जुड़ाव हर समय सवालों के घेरे में रहता है।
भूगोल को विचारधारा और इतिहास को शिकायत में बदलकर, AHP नागरिकता के रोजमर्रा के अनुभव को नए सिरे से गढ़ देता है। जहां मुसलमान रहते हैं, काम करते हैं, पढ़ते हैं या इबादत करते हैं, उन जगहों को विवादित इलाकों की तरह पेश किया जाता है। अयोध्या, काशी और मथुरा की प्रतीकात्मक “वापसी” को स्थानीय स्तर पर दबदबा कायम करने का मॉडल बना दिया जाता है। इस तरह क्षेत्रीय मिथक लामबंदी का टूल बन जाते हैं और सार्वजनिक स्थान सांप्रदायिक दावे और डर का मैदान बन जाते हैं।
6. निगरानी आधारित संप्रभुता और गैर-कानूनी सत्ता का उभार
छह महीनों के डेटा में एक साफ पैटर्न दिखता है कि AHP-RBD सार्वजनिक जीवन में नियमित रूप से पुलिस जैसी भूमिका अपने हाथ में लेता है। संगठन अंतरधार्मिक रिश्तों में दखल देता है, ईसाई प्रार्थना सभाओं पर छापे डालता है, मस्जिदों के निर्माण को रोकता या बाधित करता है, सार्वजनिक जगहों पर मुस्लिम पुरुषों से पूछताछ करता है, धर्मांतरण विरोधी गश्त करता है और उन गतिविधियों को निशाना बनाता है जिन्हें वह “हिंदू हितों” के लिए खतरा बताता है। ये अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। मिलकर ये एक सुसंगत व्यवस्था बनाती हैं, जिसे “निगरानी आधारित संप्रभुता” कहा जा सकता है जहां कोई गैर-राज्य समूह वह जबरदस्ती की सत्ता इस्तेमाल करता है जो सामान्यतः राज्य के पास होती है। उन्हें मिलने वाली असाधारण छूट पुलिस और प्रशासन की जानबूझकर की गई निष्क्रियता में दिखती है, जहां ऐसे आयोजन होते हैं या होने वाले होते हैं।
निगरानी आधारित संप्रभुता उन हालात को दर्शाती है जहां हिंसा पर राज्य का एकाधिकार कमजोर पड़ जाता है और वैचारिक समूह अपने नैतिक और सामुदायिक नियम लागू करने लगते हैं। AHP-RBD सिर्फ कानून नहीं तोड़ता, बल्कि बहुसंख्यक दावों पर टिकी एक वैकल्पिक कानूनी व्यवस्था गढ़ता है, जो संवैधानिक मूल्यों पर नहीं टिकी होती। इस व्यवस्था में अल्पसंख्यकों को सुरक्षा जोखिम की तरह देखा जाता है, महिलाओं के फैसलों पर पहरा लगाया जाता है और असहमति खतरनाक बन जाती है।
यह निगरानीवादी व्यवस्था तीन आपस में जुड़ी प्रक्रियाओं के जरिए चलती है- निगरानी, दखलअंदाजी और सजा।
निगरानी में अंतरधार्मिक जोड़ों पर नजर रखना, कथित धर्मांतरणों की जानकारी जुटाना, मस्जिदों के निर्माण या मरम्मत पर निगरानी करना, मुस्लिम स्वामित्व वाले कारोबारों पर ध्यान रखना और “संदिग्ध” जमावड़ों को चिन्हित करना शामिल है। यह राज्य की निगरानी नहीं, बल्कि सामुदायिक निगरानी है। AHP के कार्यकर्ता मोहल्लों में गश्त करते हैं, सोशल मीडिया पर नजर रखते हैं, अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए सूचनाएं इकट्ठा करते हैं और ऐसे लोगों की सूचियां बनाते हैं जिन्हें खतरा बताया जाता है। सार्वजनिक सुरक्षा की परिभाषा बदलकर “हिंदू सुरक्षा” कर दी जाती है, और मुसलमानों की मौजूदगी को ही खतरे के रूप में पेश किया जाता है।
इसके बाद दखलअंदाजी होती है। AHP-RBD के सदस्य अक्सर निजी या अर्ध-निजी जगहों (semi-private spaces)- घरों, दुकानों, चर्चों, प्रार्थना स्थलों, स्कूलों- में घुसकर उन गतिविधियों को रोकते हैं जिन्हें वे नुकसानदेह मानते हैं। कई बार यह सब पुलिस की मौजूदगी में होता है। कई घटनाओं में देखा गया है कि पुलिसकर्मी अंतरधार्मिक जोड़ों का सामना करने या प्रार्थना सभाओं में व्यवधान डालने के दौरान AHP के कार्यकर्ताओं के साथ होते हैं। पुलिस शायद ही कभी संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करती है। इससे राज्य की निष्पक्षता टूटती हुई दिखती है और राज्य व निगरानी समूहों के बीच सत्ता बांटने का संकेत मिलता है।
आखिर में आता है सजा। यह सजा धमकियों, सार्वजनिक अपमान, आर्थिक बहिष्कार की अपीलों, उत्पीड़न या शारीरिक हमले के रूप में हो सकती है। कई भाषणों में AHP के नेता खुलेआम उन मुस्लिम पुरुषों को मारने की बात कहते हैं जिन पर हिंदू महिलाओं से रिश्ते बनाने का आरोप लगाया जाता है। ऐसी बातें सीधे आपराधिक उकसावे के दायरे में आती हैं, फिर भी कानूनी कार्रवाई बहुत कम या न के बराबर होती है। यही बेख़ौफी इस विश्वास को मजबूत करती है कि AHP को अपनी तरह का “न्याय” लागू करने का हक है।
निगरानीवादी संप्रभुता (vigilante sovereignty) का बढ़ना भारत की राजनीतिक संस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत है यानी दोहरी कानूनी व्यवस्था का उभार। एक व्यवस्था संवैधानिक है, जो समानता, गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धर्म की आजादी पर टिकी है। दूसरी बहुसंख्यकवादी है, जो पहचान, पदानुक्रम और जनसांख्यिकीय डर पर आधारित है। AHP-RBD की गतिविधियां दिखाती हैं कि कई संदर्भों में यह बहुसंख्यकवादी व्यवस्था संवैधानिक व्यवस्था पर हावी होने लगी है।
इस बदलाव के गंभीर न्यायिक नतीजे हैं। संविधान यह मानकर चलता है कि अधिकारों की रक्षा और वैध बल प्रयोग का अधिकार सिर्फ राज्य के पास है। जब गैर-राज्य समूह बिना किसी नतीजे के छापे मारने, पूछताछ करने और सजा देने जैसे राज्य के काम अपने हाथ में ले लेते हैं, तो संवैधानिक वादा टूटने लगता है। इसके बदले अनौपचारिक इलाकों की एक बिखरी हुई व्यवस्था उभरती है, जहां संवैधानिक अधिकार चुनिंदा तौर पर लागू होते हैं या चुपचाप निलंबित कर दिए जाते हैं। ये घोषित आपातकाल नहीं होते बल्कि पुलिस की मिलीभगत, सार्वजनिक डर और नफरत के सामान्यीकरण से संभव हुई रोजमर्रा की खामोश निलंबन की स्थितियां होती हैं।
यह पैटर्न केवल भारत तक सीमित नहीं है। इसी तरह की स्थितियां अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी देखी गई हैं जब वे दबाव में रहे: कोलंबिया में अर्धसैनिक समूह, म्यांमार में उग्र बौद्ध समूह, श्रीलंका में मुस्लिम विरोधी निगरानी समूह और ब्राजील में सुसमाचारवादी मिलिशिया। हर मामले में, जब सरकारें बहुसंख्यक विचारधाराओं के साथ खड़ी होती हैं, तो निगरानी आधारित संप्रभुता बढ़ती है और राज्य और मिलिशिया के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।
AHP-RBD की गतिविधियां भारत को इसी तरह के रास्ते पर ले जाती हैं। रिश्तों में दखल देकर, संगठन व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर नियंत्रण का दावा करता है। प्रार्थना सभाओं को रोककर, यह धार्मिक अभिव्यक्ति पर नियंत्रण का दावा करता है। सार्वजनिक स्थानों में गश्त करके, यह दृश्यता और आवाजाही पर नियंत्रण का दावा करता है। हथियार प्रशिक्षण और युवाओं की लामबंदी के माध्यम से, यह हिंसा पर ही नियंत्रण का दावा करता है।
इसके परिणाम गहरे हैं। निगरानी आधारित संप्रभुता भेदभाव को सामान्य बनाती है, उग्रवाद को बढ़ावा देती है, औपचारिक पुलिसिंग को कमजोर करती है और सार्वजनिक स्थान को सांप्रदायिक संघर्ष का मैदान बना देती है। यह अल्पसंख्यक समुदायों को “सीमित नागरिकता वाला” बना देती है, जिनके अधिकार बहुसंख्यक की मंजूरी पर निर्भर रहते हैं। और यह संवैधानिक उपायों को कमजोर करती है, क्योंकि नुकसान सीधे राज्य द्वारा नहीं बल्कि राज्य की सहनशीलता के साथ काम करने वाले निजी समूहों द्वारा पहुंचाई जाती है।
इस समानांतर सत्ता के उभार को आज भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक माना जा सकता है। यह कोई अस्थायी व्यवधान नहीं है बल्कि यह एक विकसित होती हुई शासन प्रणाली है यानी ऐसी व्यवस्था जो सांप्रदायिक आधार पर बल प्रयोग का अधिकार बांटती है और बहुसंख्यक प्रभुत्व को रोजमर्रा के जीवन में गढ़ देती है।
7. ईसाइयों के प्रति बढ़ती दुश्मनी
हालांकि मुसलमान AHP-RBD की लामबंदी का मुख्य फोकस बने हुए हैं, डेटा में ईसाइयों के प्रति स्पष्ट और बढ़ती दुश्मनी भी दिखती है। यह भाषणों, चर्चों के विरोध प्रदर्शन, प्रार्थना सभाओं में बाधा डालने, जबरन धर्मांतरण के आरोप और ईसाई संस्थाओं पर लगातार भाषणात्मक हमलों में दिखाई देती है। “दुश्मन” की श्रेणी का फैलाव-सिर्फ मुसलमान से मुसलमान और ईसाइयों तक-एक व्यापक वैचारिक महत्वाकांक्षा को दर्शाता है: एक ऐसा बहु-लक्ष्य नफरत का ढांचा बनाना जो सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों पर निगरानी कर सके और इसे एक सभ्यतागत नैरेटिव के तहत पेश किया जाए।
ईसाइयों के खिलाफ इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अपने कंटेंट में अलग है, लेकिन संरचना में मुस्लिम-विरोधी भाषा की तरह ही काम करती है। मुसलमानों को जनसंख्या के लिए खतरा बताया जाता है और ईसाइयों को धर्मांतरण का खतरा। मुसलमानों को क्षेत्रीय और हिंसक दिखाया जाता है; ईसाइयों को धोखेबाज और चालाक बताया जाता है। मुसलमानों को “घुसपैठिया” कहा जाता है; ईसाइयों को “धर्मांतरण करने वाला” कहा जाता है। दोनों ही तरह की रूढ़ियां पूरी समुदायों को एकल, शत्रुतापूर्ण पहचान में सीमित कर देती हैं, जैसे कि वे किसी कथित हिंदू विरोधी एजेंडा के लिए काम कर रहे हों।
ईसाइयों के प्रति यह दुश्मनी हिंदू राष्ट्रवादी सोच के लंबे समय से चले आ रहे विषय से आती है। औपनिवेशिक काल से ही, ईसाई मिशनरियों को विदेशी एजेंट के रूप में पेश किया जाता रहा है, जो धर्मांतरण के जरिए हिंदू संस्कृति को कमजोर करना चाहते हैं। AHP-RBD इस शक को फिर से जिंदा करता है और इसे वैश्वीकरण से जुड़ी समकालीन चिंताओं के साथ जोड़ देता है। छोटी प्रार्थना सभाओं को “धर्मांतरण का फैक्ट्री” कहा जाता है और ईसाई चैरिटेबल संस्थाओं पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे सामाजिक सेवा के पीछे प्रचार छुपाते हैं। ईसाई संस्थाओं को भारत को अस्थिर करने वाली वैश्विक साजिश का हिस्सा बताया जाता है।
कई दर्ज घटनाओं में, AHP के सदस्य मामूली प्रार्थना सभाओं पर छापा मारते हैं- अक्सर निजी घरों या किराए के हॉल में होने वाली सभा पर। ये सभाएं आम तौर पर छोटे समूहों की थीं, जो शास्त्र पढ़ते या भजन गाते थे। फिर भी, AHP कार्यकर्ताओं ने इन्हें अवैध धर्मांतरण गतिविधियों के रूप में पेश किया, बिना किसी ठोस सबूत के। कुछ मामलों में पुलिस खामोश रही या निगरानी करने वालों के साथ मिलीभगत करती दिखी। इसका प्रभाव डर पैदा करना है कि आम ईसाई केवल प्रार्थना के लिए इकट्ठा होने पर उत्पीड़न का डर महसूस करने लगे।
ये कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 25 के मूल अधिकार को चोट पहुंचाती है, जो धर्म के पालन और प्रचार की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। प्रचार पर नियम लग सकते हैं, लेकिन शांतिपूर्ण प्रार्थना को अपराध नहीं ठहराया जा सकता। AHP के दखल को अनौपचारिक रूप में ईसाई पूजा पर रोक के रूप में देखा जा सकता है, जो धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिकता दोनों को कमजोर करता है।
रणनीतिक रूप से, ईसाई-विरोधी भाषा AHP को अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद करती है। ईसाइयों को विदेशी एजेंट के रूप में पेश करके, संगठन राष्ट्रीय चिंताओं- वैश्विक प्रभाव और सांस्कृतिक क्षति- को भुनाता है। यह कथा मुस्लिम-विरोधी डर को पूरा करती है: एक दुश्मन आबादी के लिए खतरा है और दूसरा संस्कृति के लिए। दोनों मिलकर लगातार संकट का एहसास पैदा करते हैं और निरंतर लामबंदी को जायज ठहराते हैं। मुस्लिम-विरोधी लामबंदी अक्सर स्थानीय होती है, लेकिन ईसाई-विरोधी लामबंदी वहां भी लागू की जा सकती है जहां ईसाई कम हों, जिससे AHP के लिए विभिन्न क्षेत्रों में संगठन बनाने का साधन मिल जाता है।
इसका राजनीतिक असर भी होता है। केरल, गोवा और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों जैसे राज्यों में ईसाई समुदाय अक्सर विपक्षी पार्टियों का समर्थन करते हैं। इन समुदायों को डराने से उनकी राजनीतिक भागीदारी कमजोर होती है, मतदान कम होता है और नागरिक समाज के नेटवर्क बाधित होते हैं। डर एक शांत, लेकिन प्रभावशाली चुनावी उपकरण बन जाता है।
इसलिए ईसाइयों के प्रति दुश्मनी केवल सांप्रदायिक भाषण का छोटा विस्तार नहीं है। यह भारतीय पहचान को बहिष्कार के जरिए परिभाषित करने का प्रयास है यानी हिंदू बहुसंख्यकता को एकमात्र वैध रूप में पेश करने की कोशिश। इस संरचना में संवैधानिक अधिकार शर्तों पर निर्भर हो जाते हैं, अल्पसंख्यक मौजूदगी संदिग्ध बन जाती है और धार्मिक स्वतंत्रता ज्यादातर कागज पर ही रहती है, रोजमर्रा की जिंदगी में नहीं।
मुसलमानों और ईसाइयों दोनों को निशाना बनाकर, AHP-RBD एक व्यापक तानाशाही सांस्कृतिक व्यवस्था बना रहा है। यह बहु लक्ष्य नफरत का ढांचा तय करता है कि कौन से धर्म स्वीकार्य हैं, कौन-सी प्रथाएं वैध हैं और कौन सी मौजूदगी खतरा है। यह समकालीन भारत में सांप्रदायिक तानाशाही को गहरा करता है यानी एक ऐसा खतरा जो अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रभावित करता है और संविधान की धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक नींव को कमजोर करता है।
लामबंदी का क्षेत्रीय भूगोल: स्थानिक समूह, स्थानीय अभिव्यक्तियां और नफरत का संघीय जीवन
छह महीने के डेटा से पता चलता है कि AHP-RBD की लामबंदी पूरे भारत में समान नहीं है। यह स्थानिक रूप से रणनीतिक है। घटनाएं उन राज्यों में एकत्रित होती हैं जहां जनसांख्यिकीय चिंताएं, राजनीतिक प्रोत्साहन और कमजोर संस्थागत जांच एक साथ मिलती हैं। हर राज्य अपनी इतिहास, राजनीति और सामाजिक संरचना के अनुसार नफरत लामबंदी का एक अलग पैटर्न दिखाता है।
उत्तर प्रदेश इसका केंद्र है। यहां AHP-RBD की घटनाओं की संख्या और आक्रामकता सबसे ज्यादा है। यूपी की बड़ी मुस्लिम आबादी, सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास और बहुसंख्यक राज्य मशीनरी के बढ़ते प्रभाव से एक सहूलियत वाला माहौल बनता है। नेता यहां सबसे सीधे खतरों के संदेश देते हैं -हिंसा की अपील, अंतरधार्मिक जोड़ों पर निगरानी और सामाजिक बहिष्कार लागू करना। पुलिस अक्सर AHP के वक्ताओं के साथ खड़ी रहती है, जिससे नफरत की भाषा को आधिकारिक तस्वीर मिलती है। यूपी में राज्य की शक्ति और निगरानी समूह की कार्रवाई के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।
गुजरात विचारधारात्मक केंद्र के रूप में काम करता है। यहां तोगड़िया के सबसे लंबे और विचारधारात्मक भाषण जनसांख्यिकीय युद्ध, सभ्यता की श्रेष्ठता और वैश्विक साजिशों पर दिए जाते हैं। 2002 के अनुभव और हिंदुत्व के साथ संस्थाओं के साथ गहरी तालमेल गुजरात के राजनीतिक माहौल को एक अधिक जटिल और अनुष्ठानिक लामबंदी की सुविधा देता है। यह ज़्यादातर सीधे झगड़े या भिड़ंत पर नहीं, बल्कि हिंदू सभ्यता के बड़े ऐतिहासिक दावों और बड़े नैरेटिव को सामने रखने वाला है।
महाराष्ट्र में दोहरा पैटर्न दिखाई देता है। मुंबई, ठाणे और पुणे जैसे शहरों में AHP “सुरक्षा” की भाषा पर ध्यान केंद्रित करता है, जो मध्यवर्ग की चिंताओं को भड़काता है। वहीं, अर्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों- जलगांव, नासिक, धुले, विदर्भ-में लामबंदी ज्यादा उग्र हो जाती है, जिसमें त्रिशूल वितरण, शस्त्र पूजा और हथियार प्रदर्शन शामिल हैं। शिवाजी की तस्वीर और मराठा गौरव आसानी से AHP की हिंदू शक्ति और ऐतिहासिक शिकायत की नैरेटिव में घुल-मिल जाते हैं।
असम में स्थिति अलग है। यहां AHP लंबे समय से मौजूद क्षेत्रीय डर-विशेषकर प्रवास और नागरिकता को लेकर-का फायदा उठाता है। “बांग्लादेशी घुसपैठ” की भाषा प्रमुख है। बंगाली मूल के मुसलमानों को धार्मिक अल्पसंख्यक की बजाय अवैध कब्जाधारी के रूप में पेश किया जाता है। AHP केवल NRC, विदेशी न्यायाधिकरण और दशकों की राजनीतिक बहस से पहले से बनी चिंताओं को और बढ़ाता है। परिणामस्वरूप स्थानीय जातीय डर और राष्ट्रीय हिंदुत्व के बयानों का एक शक्तिशाली मिश्रण बन जाता है।
मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान को लॉजिस्टिक हब के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। ये राज्य प्रशिक्षण शिविरों, हथियारों के अनुष्ठानों और “जागरूकता” कार्यक्रमों की मेजबानी करते हैं। जंगल, छोटे शहर और बिखरे हुए गांव जैसी भौगोलिक संरचना AHP को मीडिया की निगरानी से दूर अर्धसैनिक गतिविधियां करने की सुविधा देती है। ये घटनाएं भले कम नाटकीय हों, लेकिन संगठन के लिए महत्वपूर्ण होती हैं यानी कार्यकर्ता तैयार करना, हथियार बांटना और नेटवर्क बनाना।
दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और जम्मू में लामबंदी शहरी और सीमावर्ती तरीके अपनाती है। दिल्ली और NCR में “राष्ट्रीय सुरक्षा” की भाषा अपनाई जाती है और नफरत को देशभक्ति के रूप में पेश किया जाता है। पंजाब में छोटी लामबंदी ईसाई समुदायों के खिलाफ धर्मांतरण विरोधी भाषा पर केंद्रित है। जम्मू में AHP क्षेत्र की जटिल सामाजिक संरचना को सरल हिंदू-मुस्लिम विभाजन में बदल देता है और राष्ट्रीयतावादी शिकायत को बढ़ावा देता है।
ये क्षेत्रीय पैटर्न मिलकर दिखाते हैं कि AHP-RBD एक ही मॉडल से काम नहीं करता। यह स्थानीय भय, राजनीतिक अवसर और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के हिसाब से ढल जाता है। यह एक राज्य में उग्र संगठन, किसी दूसरे में सांस्कृतिक संस्था, कहीं भक्ति समूह या उस जगह सामुदायिक निगरानी बल के रूप में पेश हो सकता है जहां उसे कम विरोध मिलता है। यह स्थानीय लचीलापन संगठन को ताकत और पहुंच देता है। इससे नफरत की राजनीति स्थानीयकृत, सामान्यीकृत और रोजमर्रा की जिंदगी में गढ़ी जा सकती है।
इस स्थानीय संरचना को समझना जरूरी है। यह दिखाता है कि AHP-RBD सिर्फ एक वैचारिक आंदोलन नहीं है, बल्कि एक बहु-स्तरीय इकोसिस्टम है यानी संदेश में राष्ट्रीय, रूप में क्षेत्रीय और कार्यान्वयन में स्थानीय। यही अनुकूलन क्षमता इसे प्रभावशाली और पारंपरिक कानूनी या प्रशासनिक ढांचों से नियंत्रित करने में मुश्किल बनाती है।
चुनावी प्रभाव और रेडिकल फ्लैंक मैकेनिज़्म
AHP-RBD की छह महीने की लामबंदी को भारत के चुनावी परिदृश्य से अलग समझा नहीं जा सकता। हालांकि संगठन BJP–RSS ढांचे का औपचारिक हिस्सा नहीं माना जाता, इसकी गतिविधियां लगातार BJP की व्यापक राजनीतिक रणनीति को मजबूत करती हैं। वास्तविक और संगठनात्मक संबंध संभवतः मौजूद हैं, हालांकि इन्हें सार्वजनिक रूप से दिखाया नहीं गया। इसे सबसे अच्छे ढंग से “रेडिकल फ्लैंक प्रभाव” (radical flank effect) से समझा जा सकता है-एक सामाजिक आंदोलन सिद्धांत जो बताता है कि उग्र समूह कैसे सार्वजनिक मानदंडों को बदलते हैं, जिससे अधिक “मध्यम” समूहों को समझदार दिखाने का अवसर मिलता है और साझा वैचारिक एजेंडा आगे बढ़ता है।
व्यवहार में, AHP-RBD रेडिकल फ्लैंक की भूमिका निभाता है। इसकी खुली हिंसा की अपील, निगरानी आधारित कार्रवाई और अल्पसंख्यकों का दुष्प्रचार एक ऐसा राजनीतिक माहौल बनाते हैं जो डर से भरा होता है। जब यह डर आम हो जाता है, तो BJP की अपनी भाषा-अक्सर संकेतों में-इसके मुकाबले मध्यम दिखती है। जब AHP-RBD मुसलमानों को कुछ इलाकों से निकालने की मांग करता है, तो BJP की सख्त पुलिसिंग या बहिष्कारकारी कल्याण नीतियां “मध्यम” लगती हैं। जब AHP-RBD कार्यकर्ता प्रार्थना सभाओं पर छापा डालते या अंतरधार्मिक जोड़ों को परेशान करते हैं, तो BJP की “कानून और व्यवस्था” वाली छवि कानूनी और वाजिब दिखाई देती है, जब कि इसे अनिवार्य या दबाव वाला माना जा सकता था। यह त्रिकोणीय प्रभाव (triangulation) BJP को उग्रवाद द्वारा बनाए गए भावनात्मक माहौल का लाभ उठाने की अनुमति देता है, बिना इसे खुलेआम समर्थन दिए।
चुनावी आंकड़े और क्षेत्रीय पैटर्न दिखाते हैं कि जिन इलाकों में AHP-RBD की गतिविधियां तीव्र होती हैं, वहां हिंदू मतदाता एकजुटता बढ़ती है। यह बदलाव स्पष्ट समन्वय की जरूरत नहीं रखता; यह लगातार नफरत लामबंदी से बने भावनात्मक माहौल से स्वाभाविक रूप से पैदा होता है। जब सार्वजनिक चर्चा जनसांख्यिकीय खतरे, “लव जिहाद,” धर्मांतरण या “जिहादी घुसपैठ” जैसे संदेशों से भरी होती है, तो मतदाता उस पार्टी की ओर आकर्षित होते हैं जिसे वे हिंदू सुरक्षा का रक्षक समझते हैं। डर सांप्रदायिक मतदान का भावनात्मक इंजन बन जाता है।
AHP-RBD की गतिविधियां सीधे अल्पसंख्यक राजनीतिक भागीदारी को भी प्रभावित करती हैं। मुसलमान और ईसाई समुदायों को डराने से मतदान कम होता है, सार्वजनिक सभाएं बाधित होती हैं और स्थानीय स्तर पर संगठनात्मक गतिविधियां रुक जाती हैं। राजनीतिक रूप से सक्रिय ईसाई मतदाता वाले क्षेत्रों- जैसे गोवा, केरल, मिजोरम और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से- में प्रार्थना सभाओं और चर्च संबंधित गतिविधियों को निशाना बनाने का सीधा राजनीतिक प्रभाव दिखाई देता है। डर, उनके मौजूदगी और आवाज दोनों को कम कर देता है।
संगठन स्थानीय संवाद पर हावी होकर चुनावों को भी आकार देता है। इसकी रैलियां स्थानीय मीडिया में असमान कवरेज पाती हैं, जिससे ऐसे क्षेत्रों में भी तनाव का अहसास पैदा होता है जहां वास्तविक संघर्ष नहीं होता। सांप्रदायिक नौरेटिव बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट और कल्याण जैसे मुद्दों को पीछे धकेल देती हैं। जब सार्वजनिक बातचीत का आधार ही बदल जाता है, तो धर्मनिरपेक्ष मुद्दों के लिए फिर से जगह बनाना कठिन हो जाता है। चुनाव शासन पर नहीं, पहचान पर आधारित रूप में आयोजित होने लगते हैं।
आखिरकार, AHP-RBD एक तरह से वैचारिक प्रयोगशाला की तरह काम करता है। जिन मुद्दों को वह आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाता है- जैसे जनसंख्या नियंत्रण कानून, धर्मांतरण के खिलाफ अभियान, मंदिरों की “पुनर्प्राप्ति”, या अंतरधार्मिक रिश्तों की निगरानी- वे धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे और मीडिया की बहसों में जगह बना लेते हैं। यह सफर हाशिये से केंद्र तक धीरे-धीरे होता है, लेकिन साफ दिखाई देता है। समय के साथ ये विचार कट्टर या अतिवादी लगना बंद हो जाते हैं और “सामान्य समझ” जैसे दिखने लगते हैं।
इसका असर यह होता है कि पूरा राजनीतिक माहौल दक्षिण की ओर खिसकने लगता है। विपक्षी दलों को उन मुद्दों पर प्रतिक्रिया देनी पड़ती है, जिन्हें चरमपंथी ताकतें तय करती हैं। मध्यमार्गी नेता “हिंदू-विरोधी” कहलाने के डर से बहुसंख्यकवादी भाषा अपनाने लगते हैं। असहमति की गुंजाइश सिकुड़ती चली जाती है। अल्पसंख्यकों की राजनीतिक भागीदारी घटती है। नफरत धीरे-धीरे लोकतांत्रिक जीवन का सामान्य हिस्सा बन जाती है।
इस तरह AHP-RBD का असर सिर्फ कुछ खास इलाकों या चुनावों तक सीमित नहीं रहता। यह चुनावी राजनीति की पूरी संरचना को नया रूप देता है। यह तय करता है कि क्या कहना वैध है, कौन-सी मांगें स्वीकार्य हैं और जनता की भावनाएं किस हद तक जायज मानी जाएंगी। यह उस भावनात्मक और वैचारिक जमीन को बदल देता है, जिस पर चुनाव लड़े जाते हैं। यह भारतीय लोकतंत्र की भाषा और व्याकरण तक को बदल देता है।
कानूनी विश्लेषण: नफरत भरी भाषा, भीड़- न्याय, हथियार कानूनों का उल्लंघन और संवैधानिक अधिकारों का हनन
छह महीनों के आंकड़ों से एक लगातार चलता पैटर्न सामने आता है जो भारतीय आपराधिक कानून और संविधान द्वारा दी गई गारंटियों का बार-बार, व्यवस्थित और कई बार खुले तौर पर उल्लंघन दिखाता है। ये कोई अचानक हुई ज्यादतियां या बेकाबू घटनाएं नहीं हैं बल्कि AHP-RBD की लामबंदी की रणनीति का ही हिस्सा हैं। इनके कानूनी मायने समझने के लिए इन्हें चार संरचनाओं में देखना जरूरी है:
(1) भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत नफरत भरी भाषा और आपराधिक उकसावा,
(2) भीड़ द्वारा कानून हाथ में लेना और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन,
(3) आर्म्स एक्ट के तहत अवैध हथियारों का प्रदर्शन और प्रशिक्षण, और
(4) संविधान के तहत मौलिक अधिकारों का हनन।
नफरत भरी भाषा और उकसावा:
भारतीय अदालतों ने-जैसे प्रवासी भलाई संगठन, अमीश देवगन, एस. रंगराजन मामलों और भड़काऊ भाषणों पर दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों में-अपमानजनक भाषा और ऐसी भाषा के बीच साफ फर्क किया है, जो सीधे तौर पर सार्वजनिक शांति को खतरे में डालती है या दुश्मनी भड़काती है। AHP-RBD की भाषा लगातार इसी दूसरी श्रेणी में आती है।
मुस्लिम पुरुषों के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाना, मुसलमानों को जमीन पर कब्जा करने वाले आक्रांता की तरह पेश करना या यह कहना कि हिंदू महिलाएं किसी संगठित साजिश का निशाना हैं- ये सब सीधे आपराधिक उकसावे के उदाहरण हैं। यह आरोप लगाना कि मुसलमान “इलाकों पर कब्जा” करना चाहते हैं, “हिंदू सभ्यता को मिटाना” चाहते हैं, या “हिंदू महिलाओं को नियंत्रित करना” चाहते हैं- ये ठीक वही श्रेणियां हैं, जिन्हें BNS में सार्वजनिक शांति भंग करने और समूहों के बीच दुश्मनी फैलाने वाली निषिद्ध भाषा माना गया है।
ये आंकड़ा एक चौंकाने वाली सच्चाई दिखाता है कि कानून लागू करने में साफ तौर पर एक बड़ा खालीपन है। जिन आयोजनों में यह नफरत भरी भाषा खुलेआम बोली जाती है, वहां पुलिस की मौजूदगी तटस्थता नहीं बल्कि जानबूझकर कार्रवाई न करने का संकेत देती है। संस्थागत स्तर पर यह उदासीनता नफरत को धीरे-धीरे “कानूनी उल्लंघन” से “सार्वजनिक सामान्य समझ” में बदलने में मदद करती है। यह कानून के तहत समान सुरक्षा सुनिश्चित करने की राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी की विफलता को भी दिखाती है।
विजिलैंटिज्म और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन: AHP-RBD बार-बार खुद को पुलिस की भूमिका में रखता हुआ दिखाई देता है जैसे लोगों को पकड़ना, कथित आरोपियों से पूछताछ करना, प्रार्थना सभाओं पर छापे मारना और सामुदायिक सीमाएं लागू करना। ये कार्रवाइयां सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 पर चोट करती हैं जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मनमानी गिरफ्तारी से सुरक्षा की गारंटी देते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने तहसीन पूनावाला बनाम भारत संघ (2018) के ऐतिहासिक फैसले में साफ कहा था कि भीड़ द्वारा हिंसा रोकना और दोषियों पर कार्रवाई करना राज्य का सकारात्मक दायित्व है। लेकिन यह डेटा ठीक उलटा रुझान दिखाता है जैसे पुलिस की निष्क्रियता, बिना हस्तक्षेप के मौजूदगी और कुछ मामलों में परोक्ष सहयोग। इससे एक तरह की दोहरी पुलिस व्यवस्था बन जाती है:
एक- कानूनी, संवैधानिक और सिद्धांत रूप में समान;
दूसरी- अनौपचारिक, सामुदायिक और व्यवहार में बहुसंख्यकवादी।
ऐसी व्यवस्था धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन के संवैधानिक वादे का उल्लंघन है जिन्हें ‘मूल संरचना सिद्धांत’ का हिस्सा माना गया है। इसलिए विजिलैंटिज्म सिर्फ गैरकानूनी हरकत नहीं रह जाता, बल्कि संविधान की संप्रभुता के लिए सीधी चुनौती बन जाता है।
अवैध हथियारों का प्रदर्शन और प्रशिक्षण: AHP-RBD की गतिविधियों में हथियारों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल दिखता है-तलवारें, त्रिशूल और हथियार-चाहे वह शस्त्र पूजा हो, त्रिशूल दीक्षा, सार्वजनिक जुलूस हों या खुले तौर पर चलने वाले हथियार प्रशिक्षण शिविर। आर्म्स एक्ट के तहत, ऐसे कई हथियारों को सार्वजनिक रूप से दिखाने या लड़ाकू प्रशिक्षण देने के लिए सख्त लाइसेंस की जरूरत होती है।
रिकॉर्ड की घटनाएं इन नियमों का कई स्तरों पर उल्लंघन दिखाती हैं। यहां हथियार महज़ सजावटी चीजें नहीं हैं बल्कि वे धार्मिक प्रतीक, पहचान के चिन्ह और राजनीतिक संदेश देने के टूल बन जाते हैं। हथियारों को धार्मिक रूप से पवित्र ठहराने से उन कामों को नैतिक ढाल मिल जाती है, जिन पर सामान्य हालात में तुरंत आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए।
राज्य की निष्क्रियता इस चिंता को और गहरा करती है। जब पुलिस हथियारों की पूजा, उनके खुले वितरण या प्रशिक्षण सत्रों के दौरान मूकदर्शक बनी रहती है तो यह संवैधानिक सिद्धांत कमजोर पड़ता है कि वैध बल प्रयोग का एकमात्र अधिकार राज्य के पास है। नागरिक राजनीति से हथियारों को दूर रखने की भारत की पुरानी नीति धीरे-धीरे टूटने लगती है और उसकी जगह निजी मिलिशियाओं के लिए अनुकूल माहौल बनता चला जाता है।
मौलिक अधिकारों का उल्लंघन: AHP-RBD की गतिविधियों का असर यह होता है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के संवैधानिक अधिकारों का लगातार और व्यवस्थित हनन होता है।
● अनुच्छेद 14 का उल्लंघन लक्षित भेदभाव और कानून की असमान सुरक्षा के जरिए होता है।
● अनुच्छेद 15 तब टूटता है, जब अलगाव, बहिष्कार या किसी खास समुदाय के खिलाफ दुश्मनी को बढ़ावा दिया जाता है।
● अनुच्छेद 19(1)(b) तब प्रभावित होता है, जब अल्पसंख्यकों को शांतिपूर्ण सभा करने या सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखने से डराया जाता है।
● अनुच्छेद 21 को धमकियों, जबरदस्ती और मानवीय गरिमा को ठेस पहुंचाकर कमजोर किया जाता है।
● अनुच्छेद 25 और 26 का सीधा उल्लंघन तब होता है, जब प्रार्थना सभाओं पर छापे मारे जाते हैं, धार्मिक कार्यों में बाधा डाली जाती है, या ईसाई और मुस्लिम संस्थानों को निशाना बनाया जाता है।
ये उल्लंघन अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक समानांतर सत्ता के रूप में काम करते हैं जहाँ एक गैर-राज्य संगठन अनौपचारिक तौर पर धर्म, निजी रिश्तों, सार्वजनिक स्थानों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का अधिकार अपने हाथ में ले लेता है। सबसे गहरी चोट धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत पर पड़ती है, जो भारत के संविधान की मूल संरचना का एक अहम हिस्सा है। जब राज्य किसी बहुसंख्यकवादी संगठन को जबरदस्ती की ताकत इस्तेमाल करने देता है, तो धर्मनिरपेक्षता सिर्फ काग़ज़ी रह जाती है यानी सिद्धांतों में मौजूद है लेकिन जमीनी हकीकत में कमजोर है।
लोकतांत्रिक खतरे और अल्पसंख्यक-विरोधी शासन का सामान्यीकरण
AHP-RBD की छह महीने की गतिविधियां भारत के लोकतांत्रिक संरचना में एक गहरे संस्थागत और सांस्कृतिक बदलाव की ओर इशारा करती हैं जहां बहुलतावादी संवैधानिक लोकतंत्र धीरे-धीरे एक बहुसंख्यकवादी अर्ध-लोकतंत्र में बदलता दिखता है। इसमें अल्पसंख्यकों के अधिकार औपचारिक तौर पर तो मौजूद रहते हैं, लेकिन व्यवहार में उन्हें लगातार खोखला किया जाता है। यह गिरावट न तो अधिकारों को औपचारिक रूप से निलंबित करके होती है और न ही आपातकाल जैसी किसी घोषणा से। यह धीरे-धीरे होती है यानी सांप्रदायिक दुश्मनी को सामान्य बनाकर, जो लोगों के व्यवहार, संस्थाओं के कामकाज और नागरिकता की भावनात्मक समझ को बदल देती है।
लोकतंत्र के लिए पहला बड़ा ख़तरा संवैधानिक मूल्यों की वैधता को कमजोर किया जाना है। जब सांप्रदायिक उभार सार्वजनिक जीवन पर हावी हो जाता है, तो समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष शासन जैसे सिद्धांत बुनियादी प्रतिबद्धताएं नहीं रह जाते, बल्कि बहुसंख्यक इच्छा के रास्ते की रुकावट लगने लगते हैं। नफरत भरी भाषा, जनसंख्या को लेकर डर फैलाना और धार्मिक प्रतीकों के साथ सैन्यकरण एक ऐसा भावनात्मक माहौल बनाते हैं, जिसमें संवैधानिक सुरक्षा “जरूरत से ज्यादा उदार” या यहां तक कि खतरनाक दिखाई देने लगती है। ऐसे माहौल में अल्पसंख्यक भीतर ही भीतर डर को अपना लेते हैं, सार्वजनिक स्थानों से पीछे हटने लगते हैं, राजनीतिक भागीदारी सीमित कर देते हैं और लोकतांत्रिक जीवन को असमान शर्तों पर जीने को मजबूर होते हैं। चुनावी राजनीति भी विकृत हो जाती है यानी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बहुसंख्यक वोट मजबूत होता है, जबकि अल्पसंख्यकों का मतदान जोखिम भरा और प्रभाव में कम हो जाता है।
लोकतंत्र के लिए दूसरा खतरा संस्थागत निष्पक्षता के धीरे-धीरे खत्म होने से जुड़ा है। आंकड़ों में बार-बार ऐसे मामले दर्ज हैं, जहां भड़काऊ या खुले तौर पर हिंसक भाषण दिए जा रहे थे और वहां पुलिस मौजूद थी। जब राज्य की एजेंसियां भीड़-न्याय करने वालों के साथ एक ही मंच या माहौल में दिखाई देती हैं, तो कानून और बहुसंख्यक भावना के बीच एक प्रतीकात्मक मेल बन जाता है। कानून लागू करने वाली संस्थाएं निष्पक्ष अधिकार-रक्षक होने के बजाय सामुदायिक निगरानी का औजार बनती चली जाती हैं। जब संस्थाएं संवैधानिक मानकों को लागू करने में नाकाम रहती हैं, तो उनकी वैधता कमजोर पड़ जाती है और उस खाली जगह में वैकल्पिक सत्ता केंद्र- यानी बहुसंख्यक समूह जो खुद को असल पुलिस मानने लगते हैं- कदम रख देते हैं।
तीसरा लोकतांत्रिक खतरा नागरिकता की सांस्कृतिक परिभाषा के बदलने से जुड़ा है। AHP-RBD का विमर्श हिंदू पहचान को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ देता है और मुसलमानों व ईसाइयों को ऐसे “शर्तों वाले नागरिक” के रूप में पेश करता है, जिनकी वफादारी बार-बार साबित करनी होगी और जिनके अधिकार सीमित किए जा सकते हैं। नागरिकता धीरे-धीरे नागरिक अधिकारों पर आधारित न रहकर जातीय-धार्मिक पहचान से जुड़ी हुई बन जाती है। यह बदलाव भारतीय संवैधानिक व्यवस्था की जड़ों पर हमला है, क्योंकि संविधान जानबूझकर मूलनिवास, धार्मिक बहुसंख्यकवाद और नस्ली पहचान को नागरिकता का आधार मानने से इंकार करता है। जब अल्पसंख्यकों को हमेशा शक की निगाह से देखा जाने लगता है, तो लोकतांत्रिक जीवन में उनकी भागीदारी असुरक्षित हो जाती है और गणराज्य धीरे-धीरे श्रेणीबद्ध नागरिकता की ओर बढ़ने लगता है।
अंतिम लोकतांत्रिक खतरा लंबे समय तक चलने वाला ध्रुवीकरण है। नफरत के जरिए की जाने वाली लामबंदी ऐसे जख्म छोड़ती है जो पीढ़ियों तक रहते हैं यानी लगातार बना रहने वाला डर, आपसी अविश्वास और कठोर होती सामुदायिक पहचानें। यह ध्रुवीकरण सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी को भी बदल देता है। बाजार बंटने लगते हैं, स्कूलों में सामुदायिक विभाजन बढ़ता है, कार्यस्थलों का माहौल तनावपूर्ण हो जाता है और मोहल्ले दुश्मनी से भरे छोटे-छोटे इलाकों में टूटने लगते हैं। समय के साथ ये छोटे-छोटे अलगाव मिलकर एक गहरी संरचनात्मक दूरी बना देते हैं, जिससे वह सामाजिक एकजुटता कमजोर पड़ती है, जिस पर लोकतंत्र टिका होता है। डर से बंटा हुआ समाज सामूहिक शासन, सार्वभौमिक अधिकारों और साझा सार्वजनिक संस्थाओं को टिकाए नहीं रख सकता।
इन सबको साथ रखकर देखें, तो स्पष्ट होता है कि AHP-RBD की गतिविधियां सिर्फ तात्कालिक खतरे पैदा नहीं करतीं, बल्कि लोकतंत्र में एक गहरी और धीरे-धीरे बढ़ती गिरावट लाती हैं जहां संवैधानिक नागरिकता, संस्थागत निष्पक्षता और बहुलतावादी लोकतंत्र अंदर से खोखले होते चले जाते हैं।
निष्कर्ष: नफरत की संरचना एक समानांतर सत्ता के रूप में
AHP-RBD के आयोजनों और इकट्ठा किए गए आंकड़ों से नफरत की एक जटिल और बहु-स्तरीय संरचना सामने आती है जो कभी-कभार होने वाली हिंसा नहीं, बल्कि धीरे उभरती हुई एक राजनीतिक व्यवस्था की तरह काम करती है। यह व्यवस्था संवैधानिक राज्य के समानांतर खड़ी होती है, सोच में बहुसंख्यकवादी और व्यवहार में भीड़-न्याय पर आधारित होती है। जनसंख्या को लेकर डर फैलाने, लैंगिक नियंत्रण, धार्मिक प्रतीकों के जरिए सैन्यकरण, इलाकों को “पुनर्परिभाषित” करने की कोशिशें, अल्पसंख्यकों की निगरानी और गैर - कानूनी सजाओं को सामान्य बनाने के जरिए AHP एक वैकल्पिक नैतिक दुनिया गढ़ता है यानी एक ऐसी दुनिया, जहां सामुदायिक पहचान ही वैधता तय करती है, हिंसा नैतिक कर्तव्य बन जाती है और संवैधानिक सत्ता की जगह उग्र धार्मिकता ले लेती है।
यह घटना सिर्फ भारत के अल्पसंख्यकों के लिए खतरा नहीं है। यह लोकतांत्रिक जीवन की बुनियादों के लिए एक बड़ी चुनौती है। जब कोई संगठन यह तय करने लगे कि कौन “अपना” है और कौन नहीं, पुलिस से नजदीकी बनाए, धार्मिक आस्था को हथियार बना दे, इतिहास को नए सिरे से गढ़े और सार्वजनिक जगहों को नियंत्रित करने लगे - और यह सब अक्सर राज्य की मूक सहमति या खुली मौजूदगी में हो- तो नागरिकता अपने आप में शर्त के दायरे में हो जाती है। कानून का शासन चुनिंदा लागू होने वाली चीज बन जाता है। गणराज्य का धर्मनिरपेक्ष और नागरिक चरित्र कमजोर पड़ने लगता है और उस पर जातीय-धार्मिक पहचान की छाया छा जाती है।
भारत एक और गहरे सांस्कृतिक बदलाव से गुजर रहा है:
— बहुलता से “शुद्धता” की ओर,
— अधिकारों से आज्ञाकारिता की ओर,
— कानून से तमाशे की ओर,
— सहअस्तित्व से विजय की ओर।
कोई भी लोकतंत्र तब जिंदा नहीं रह सकता, जब नफरत को “सामान्य समझ” के रूप में संस्थागत बना दिया जाए। कोई भी संवैधानिक व्यवस्था तब टिक नहीं सकती, जब गैर-राज्य तत्वों को बिना सजा के जबरदस्ती की ताकत इस्तेमाल करने दिया जाए। और कोई भी समाज तब एकजुट नहीं रह सकता, जब लोगों को रक्षक और ख़तरा, अंदरूनी और बाहरी, शुद्ध और अशुद्ध में बांट दिया जाए।
इसलिए भारत के सामने चुनौती सिर्फ किसी एक चरमपंथी संगठन पर लगाम लगाने की नहीं है। असली चुनौती है यानी संवैधानिक कल्पना को दोबारा हासिल करने की। इसके लिए संस्थागत निष्पक्षता को बहाल करना होगा, आपराधिक कानून को बिना भेदभाव के लागू करना होगा, समानता और गरिमा के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता को फिर से मजबूत करना होगा, और डर की राजनीति को सांस्कृतिक स्तर पर खारिज करना होगा। इसके लिए एक सजग नागरिक समाज और ऐसा राजनीतिक साहस चाहिए जो नफरत को सामान्य मानने से साफ इनकार करे।
AHP-RBD की लामबंदी किसी हाशिये के समूह की कहानी नहीं है। यह एक समानांतर राजनीतिक व्यवस्था की कहानी है जो उभर रही है, फैल रही है और असर जमा रही है। यह समानांतर व्यवस्था भारत के भविष्य में कितनी गहराई से जड़ें जमाएगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि संस्थाएं, अदालतें, राजनीतिक दल और नागरिक इस डेटा में दर्ज शुरुआती चेतावनी संकेतों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।
संविधान का टैक्स्ट आज भी मौजूद है। लेकिन उसका जमीनी सच बड़े दबाव में है- कुछ लोग तो कहेंगे कि वह अब खोखला ढांचा बनता जा रहा है।
यह जो दिशा यहां दिखाई देती है, वह अनिवार्य नहीं है लेकिन बेहद स्पष्ट है। इसका सामना करना सिर्फ अकादमिक विश्लेषण का सवाल नहीं है। यह एक लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है, जो भारत की पहचान को एक बहुलतावादी, धर्मनिरपेक्ष और संवैधानिक गणराज्य के रूप में सुरक्षित रखने के लिए बेहद जरूरी है।
[1] यहां दिए गए नफरत भरे भाषणों के विश्लेषण पर एक नजर डालने से स्पष्ट तस्वीर सामने आती है। (https://sabrang.com/cc/archive/2003/may03/index.html), तोगड़िया, जो उस समय पूरी तरह विश्व हिंदू परिषद (VHP) से जुड़े हुए थे, खुले तौर पर अपने और अपने संगठन के नफरत और हिंसा से भरे इरादों का ऐलान करते हैं- देश के हर गांव में अराजकता और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा (यानी एक तरह का गृहयुद्ध) फैलाने का इरादा। न तो संसाधनों की कमी और न ही व्यवस्थागत अड़चनें इस “कैंसर सर्जन” को रोक पाईं। अहमदाबाद में उनका धनवंतरी अस्पताल भी फरवरी- मार्च 2002 के दौरान बड़े पैमाने पर पीड़ित मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के मरीजों का इलाज करने से इनकार करने के लिए कुख्यात रहा। (https://sabrang.com/cc/archive/2002/marapril/hospital.htm, https://sabrang.com/tribunal/vol2/pubspace.html)