देश के विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें 118% बढ़ीं: यूजीसी

Written by sabrang india | Published on: January 19, 2026
संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से पता चलता है कि देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों में पिछले पांच वर्षों के दौरान 118.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस अवधि में दर्ज घटनाओं की संख्या 2019–20 में 173 से बढ़कर 2023–24 में 378 हो गई।



विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष जो आंकड़े प्रस्तुत किए हैं, उनसे स्पष्ट होता है कि पिछले पांच वर्षों में देशभर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव से संबंधित शिकायतों में 118.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, यूजीसी के आंकड़े बताते हैं कि इस संदर्भ में दर्ज मामलों की संख्या 2019–20 में 173 थी, जो बढ़कर 2023–24 में 378 हो गई।

इसी अवधि के दौरान, 2019–20 से 2023–24 के बीच यूजीसी को 704 विश्वविद्यालयों और 1,553 कॉलेजों में कार्यरत समान अवसर प्रकोष्ठों (ईओसी) तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) प्रकोष्ठों के माध्यम से कुल 1,160 शिकायतें प्राप्त हुईं।

इनमें से 1,052 शिकायतों का निपटारा किया गया, जो 90.68 प्रतिशत की समाधान दर को दर्शाता है। हालांकि, लंबित मामलों की संख्या 2019–20 में 18 से बढ़कर 2023–24 में 108 हो गई।

उल्लेखनीय है कि शिक्षा, महिला, बाल, युवा और खेल मामलों से संबंधित संसदीय स्थायी समिति के साथ भी यूजीसी द्वारा साझा किए गए वर्षवार आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि दर्ज मामलों में लगातार वृद्धि हुई है।

इस क्रम में 2020–21 में 182, 2021–22 में 186 और 2022–23 में 241 मामले दर्ज किए गए, जिसके बाद 2023–24 में इनमें तेज़ उछाल देखने को मिला।

हिंदुस्तान टाइम्स ने यूजीसी के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया कि शिकायतों में आई वृद्धि का एक कारण अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति तथा समान अवसर प्रकोष्ठों की भूमिका को लेकर छात्रों में बढ़ी जागरूकता हो सकती है। अधिकारी के अनुसार, ये प्रकोष्ठ सक्रिय रूप से मामलों के समाधान की दिशा में काम कर रहे हैं। हालांकि, शिक्षाविदों ने रिपोर्ट की गई समाधान दर पर सवाल उठाए हैं।

समाधान दर पर सवाल

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एन. सुकुमार ने अख़बार को बताया कि अधिकांश अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ प्रशासनिक नियंत्रण के तहत कार्य करते हैं और उनके पास स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति नहीं होती, क्योंकि उनके सदस्य प्रशासन द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। उनके अनुसार, इससे गंभीर मामलों में निष्पक्षता प्रभावित होती है।

वहीं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संकाय सदस्य और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ के पूर्व सदस्य डी.के. लोबोयाल ने भी इसी तरह की चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि समय के साथ इन प्रकोष्ठों की स्वायत्तता लगातार कम होती जा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतों की बढ़ती संख्या यह संकेत देती है कि न केवल रिपोर्टिंग में वृद्धि हुई है, बल्कि जातिगत भेदभाव की समस्या अब भी बनी हुई है।

इस संदर्भ में यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव थोरात ने बताया कि उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने से संबंधित यूजीसी विनियम, 2012 के तहत समान अवसर प्रकोष्ठों का गठन किया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि समान अवसर प्रकोष्ठों से पहले अस्तित्व में आए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ मूल रूप से सेवा और रोजगार से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए बनाए गए थे।

उन्होंने कहा, “समस्या तब उत्पन्न होती है जब संस्थान इस अंतर को स्पष्ट नहीं रख पाते और सभी शिकायतों का निपटारा एक ही आंतरिक तंत्र के माध्यम से करने लगते हैं।”

पृष्ठभूमि

दरअसल, यूजीसी ने ये आंकड़े जनवरी 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में प्रस्तुत किए थे। अदालत ने निकाय को 2012 के विनियमों के तहत जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायतों का डेटा संकलित करने का आदेश दिया था।

यह निर्देश हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधार्थी रोहित वेमुला की मृत्यु के बाद दायर एक याचिका के संदर्भ में दिया गया था, जिसमें विश्वविद्यालय परिसरों में जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए यूजीसी की जवाबदेही तय करने और प्रभावी तंत्र स्थापित करने की मांग की गई थी।

फरवरी 2025 में यूजीसी ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में बताया कि उसे देशभर के 3,522 उच्च शिक्षा संस्थानों से प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई हैं।

इन आंकड़ों के अनुसार, 3,067 समान अवसर प्रकोष्ठों और 3,273 अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठों को कुल 1,503 शिकायतें प्राप्त हुईं, जिनमें से 1,426 का निपटारा किया गया।

गौरतलब है कि पिछले वर्ष सर्वोच्च न्यायालय में पेश किए गए यूजीसी के समता नियमों के मसौदे की विभिन्न पक्षों द्वारा आलोचना की गई थी। इनमें रोहित वेमुला की मां भी शामिल थीं, जो इस मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक हैं। आलोचना का मुख्य कारण मौजूदा प्रावधानों को कमजोर किया जाना बताया गया था।

पिछले सप्ताह यूजीसी ने आलोचकों द्वारा उठाए गए कुछ मुद्दों का समाधान करते हुए मसौदा नियमों को अधिसूचित किया। इसके तहत उच्च शिक्षा संस्थानों को समता समितियों और समान अवसर केंद्रों की स्थापना करने, 24/7 हेल्पलाइन शुरू करने और अन्य ऑनलाइन शिकायत निवारण तंत्र विकसित करने के निर्देश दिए गए हैं।

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