दिव्यांग का दिव्य दर्शन

Published on: 12-31-2015

Image Courtesy: M.Moorthy, The Hindu
 
दिव्य चिंतन में डूबे साहब के मन में अचानक एक बहुत पवित्र बात आई। साहब ने अपने मन की बात पूरे भारत को सुनाई और एक झटके में ही देश के दो करोड़ लोग विकलांग से दिव्यांग हो गये। इस चमत्कार के आगे पूरी दुनिया को नतमस्तक होना चाहिए। भारत वह देश है, जहां अंधे, गूंगे, बहरे और लंगड़े लोगो के साथ हकलाने वालों तक पर चुटकुले बनाने का रिवाज है। कॉमेडी शोज़ में जब ये चुटकुले सुनाये जाते हैं तो महान जनता पेट पकड़-पकड़कर हंसती है। एक तो तकदीर की बेरहम मार और उपर से मिला समाज का तिरस्कार। इन लोगो की बदनसीबी का आलम यह है कि इनके नाम पर खरीदी गई बैसाखी तक घोटाले की चादर में लिपटकर कहीं गुम हो जाती है। समाज से सम्मानजनक व्यवहार और बराबरी के मौके हासिल करने की इन लोगो की लड़ाई आजादी के बाद से चली आ रही है, मगर बहुत कुछ नहीं बदला। .. धन्य हो नमो ये लोग बराबरी के मौके मांग रहे थे, आपने तो एक झटके में सबको सातवें आसमान पर बिठा दिया। मन की बात सुनाते हुए प्रधानमंत्री जी ने कहा--- विकलांग के पास भौतिक अंग भले ना हो, लेकिन उसके पास दिव्य अंग होते हैं। इसलिए बहुत अच्छा होगा अगर हम विकलांगों को दिव्यांग पुकारे। हिंदी का समाज फिजिकली चैलेंज्ड के लिए अब कोई कायदे का शब्द नहीं ढूंढ पाया है। विकलांग बहुत उपयुक्त शब्द नहीं है, फिर भी उसमें एक तरह की करुणा है, लेकिन दिव्यांग!! एक कटे हुए टांग वाले आदमी को दिव्यांग पुकारा जाना कैसा लगेगा? मुझे आशंका है, कहीं ये नया नाम क्रूर समाज के लिए मनोविनोद का ज़रिया ना बन जाये। मुमकिन है, फिजिकली चैलेंज्ड लोगो का समाज इस नाम पर उसी तरह रियेक्ट करे, जिस तरह कभी दलित लोगो ने हरिजन नाम पर किया था। ये लोग कह सकते हैं कि हमे चने के झाड़ पर मत चढ़ाओ, पहले हमें व्हील चेयर दिलाओ, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और शौचालयो को हमारे लायक बनाओ, हमें नौकरियां दो। फोकट में एक और नया नाम लेकर हम क्या करेंगे। बेहतर होता नामकरण से पहले फिजिकली चैलेंज्ड लोगो से पूछ लिया जाता। वैसे ख्याल उन हज़ारो बच्चो का भी किया जाना चाहिए था, जिनके मां-बाप ने बहुत दिमाग़ खर्च करके अपने बेटे का नाम दिव्यांग रखा होगा। दो करोड़ विकलांग नमो कृपा से दिव्यांग बनेंगे तो दूसरी तरफ कुछ हज़ार दिव्यांग अब हाथ-पांव सलामत होने के बावजूद विकलांग भी तो बन जाएंगे। आखिर दोनो नामो के मतलब जो एक हो गयी है।

साफ कर देना ज़रूरी है कि अब तक जो कुछ भी कहा गया उसका मकसद नमो की नेक मंशा पर सवाल उठाना नहीं था। हमारे प्रधानमंत्री युगद्रष्ट्रा होने के साथ एक बहुत बड़े दार्शनिक भी हैं। `विकलागों के पास एक दिव्य अंग होता है’—कितनी गहरी बात कही है, नमो ने! इंसान के पास जो चीज़ ना हो, उसकी चिंता कभी नहीं करनी चाहिए क्योंकि जो नहीं है, वह असल में उसके पास दिव्य रूप में मौजूद होती है। ये फिलॉसफी थोड़ी चकराने वाली है लेकिन अगर काले धन के उदाहरण से समझे तो बात पूरी तरह समझ में आ जाएगी। कई लोग स्विस बैंक से काला धन ना लाये जाने को लेकर स्यापा कर रहे हैं। अगर वे लोग गौर करेंगे तो एहसास होगा होगा कि काला धन दिव्य रूप से देश की तिजोरियों में मौजूद है, वह भी भरपूर मात्रा में। ठीक से चेक करने पर कुछ लोगो को दस-बीस गड्डियां अपनी अलमारी में भी मिल जाएंगी। इसलिए प्रधानमंत्री जी की हर बात को हमें गौर से सुनना चाहिए और उसमें छिपे गहरे अर्थ को समझना चाहिए। शेक्सपियर ने कहा था—व्हाट्स इन ए नेम। नमो मानते हैं— एवरी थिंग इज़ इन ए नेम! इसलिए उनका ज़ोर हमेशा नाम बदलने पर रहता है। उन्हे यकीन है कि नाम बदलने से सबकुछ बदल जाता है। वायलेंट गुजरात को वाइब्रेंट गुजरात में बदलते ही गुजरात फिर से सचमुच वाइब्रेंट हो गया! योजना आयोग के नीति आयोग बनने से ये बात साबित हो गई, देश में नीति आ चुकी है। अब से पहले तो सिर्फ अनीति ही अनीति थी। औरंगजेब मार्ग बदलकर कलाम मार्ग हुआ तो औरंगजेब के नाम का कलंक इतिहास के पन्नो से हमेशा के लिए धुल गया। नया नाम कई समस्याओं के लिए रामबाण है। आरएसएस के कोटे में कोई ऐसा नाम ढूंढे नहीं मिलता जो आज़ादी की लड़ाई में जेल गया हो। लेकिन शहीद-ए-आजम भगत सिंह के बदले अगर संघ के प्रचारक मंगल सेन के नाम पर चंडीगढ़ एयरपोर्ट का नाम रख दिया जाये तो ये कलंक भी मिट सकता है। हो सकता है, पचास साल बाद की पीढ़ी मंगल सेन को भगत सिंह से भी बड़ा क्रांतिकारी मानने लगे। इसलिए नाम मे ही सबकुछ रखा है। नमो की नामकरण क्रांति अभी बहुत आगे जाएगी। कुतात्माओं का हुतात्मा बनाने का रिवाज इस देश में पुराना है। लेकिन ताज्जुब नहीं हुत्तामा अब महात्मा बन जाये और गांधी अहिंसा की जगह सिर्फ स्वच्छता के प्रतीक बने नज़र आये। नामकरण क्रांति के नगाड़ों के बीच कटी टांग वाला दिव्यांग लगातार चकरा रहा है और अपने आप से पूछ रहा है.. क्या मेरा नाम बदलने से समाज और सरकार का रवैया भी बदल जाएगा?
Hindi writer and columnist

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