ट्रांस संशोधन विधेयक लैंगिक पहचान तय करने के अधिकार को कमजोर कर सकता है: राजस्थान हाईकोर्ट

Written by sabrang india | Published on: April 1, 2026
‘जिसे सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की अस्मिता का अटूट हिस्सा माना था, वह अब एक सशर्त, राज्य-निर्भर अधिकार में बदलने का खतरा झेल रहा है।’


फोटो साभार : लाइव लॉ

राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार, 30 मार्च को स्पष्ट किया कि किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान खुद तय करने का पूरा अधिकार है। यह कोई रियायत नहीं, बल्कि उसका मौलिक अधिकार है। अदालत ने यह भी आगाह किया कि मोदी सरकार द्वारा लाया गया ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक इस अधिकार को कमजोर कर सकता है और इसे राज्य के नियंत्रण में आने वाले अधिकार में बदल सकता है।

अदालत ने यह टिप्पणी ट्रांस महिला गंगा कुमारी की याचिका पर दिए गए अपने फैसले के समापन भाग (एपिलॉग) में की। इस याचिका में राज्य सरकार से ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए समान आरक्षण लागू करने की मांग की गई थी।

जस्टिस योगेंद्र पुरोहित और जस्टिस अरुण मोंगा की पीठ ने कहा कि प्रस्तावित संशोधन विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 की उस धारा को हटाने का प्रयास करता है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार देती है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि मूल बात यह है कि किसी व्यक्ति की पहचान कोई रियायत नहीं, बल्कि उसका अधिकार है।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने कहा कि 2014 के नालसा फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर लोगों के इस अधिकार को मान्यता दी थी। लेकिन संशोधन विधेयक में प्रस्ताव है कि ‘लैंगिक पहचान की कानूनी मान्यता प्रमाणपत्र, जांच या अन्य प्रशासनिक स्वीकृति पर निर्भर होगी।’

अदालत ने कहा, ‘जिसे सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्ति की अस्मिता का अटूट हिस्सा माना था, वह अब एक सशर्त, राज्य-निर्भर अधिकार में बदलने का खतरा झेल रहा है।’

पीठ ने यह भी कहा कि राज्य सरकार का दायित्व है कि वह अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए संशोधित कानून के दायरे में भी आत्म-पहचान के सिद्धांत को यथासंभव सुरक्षित बनाए रखे। साथ ही, अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी कानूनी बदलाव का क्रियान्वयन इस तरह न हो, जिससे संवैधानिक अधिकार कमजोर पड़ें।

अदालत ने कहा कि एक संवैधानिक संस्था के रूप में राज्य सरकार से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कानून के अनुपालन और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखे, ताकि प्रक्रियात्मक अड़चनों के कारण ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकार केवल औपचारिकता बनकर न रह जाएं।

अपने मुख्य फैसले में अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति गठित करे, जो विभिन्न पृष्ठभूमियों से आने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के गहरे हाशियाकरण की स्थिति का विस्तृत अध्ययन करे। इस अध्ययन की रिपोर्ट के आधार पर सरकार को उचित नीतियां तैयार करनी होंगी।

इसके साथ ही, अदालत ने निर्देश दिया कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक राजस्थान सरकार ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सरकारी नौकरियों और राज्य संचालित शैक्षणिक संस्थानों में चयन के लिए निर्धारित अधिकतम अंकों में 3% अतिरिक्त वेटेज प्रदान करे।

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा 2023 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने का नोटिफिकेशन ‘सिर्फ दिखावा और भ्रम पैदा करने वाला कदम’ है। अदालत के अनुसार, यह महज एक औपचारिकता प्रतीत होता है, जिसमें वास्तविक लाभ नजर नहीं आता।

कोर्ट ने कहा कि सभी ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करने से उनके पहले से प्राप्त आरक्षण अधिकार समाप्त हो जाते हैं और उन्हें कोई विकल्प भी नहीं मिलता। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि एससी, एसटी और अन्य पिछड़े वर्गों से आने वाले ट्रांसजेंडर व्यक्ति ‘दोहरी और परस्पर जुड़ी हुई वंचनाओं’ का सामना करते हैं।

यह उल्लेखनीय है कि संसद ने इस महीने की शुरुआत में व्यापक विरोध के बीच इस संशोधन विधेयक को पारित कर दिया है, हालांकि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अभी तक इसे अपनी मंजूरी नहीं दी है।

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