कोर्ट ने नोएडा में मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के मामले में गिरफ्तारी के क्रम, वीडियो सबूत न होने और कथित तौर पर प्रक्रिया के उल्लंघन पर सवाल उठाए हैं।

Image: Live Law
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में ग्रेजुएट और एक्टिविस्ट, 25 साल की आकृति चौधरी की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने नोएडा में वर्कर्स के प्रोटेस्ट के दौरान हिंसा में उनकी कथित भूमिका और गिरफ्तारी के बारे में राज्य सरकार के बयानों में गंभीर विसंगतियां पाईं।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने चौधरी की 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को मंजूरी दी और कहा कि उनकी हिरासत राज्य सरकार की एक "गढ़ी हुई कहानी" पर आधारित थी। कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर किसी दूसरे मामले में उनकी कस्टडी की जरूरत नहीं है, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। कोर्ट ने नोएडा अधिकारियों को उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। विस्तृत आदेश का इंतजार है।
हालांकि, 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट है कि चौधरी फिलहाल कस्टडी में ही रहेंगी क्योंकि उन्हें नोएडा वर्कर्स के आंदोलन के सिलसिले में दर्ज अन्य आपराधिक मामलों में अभी तक जमानत नहीं मिली है। यह फैसला तब आया है जब बेंच ने चौधरी की गिरफ्तारी और हिंसा में उनकी कथित भागीदारी के बारे में राज्य सरकार के पक्ष की बारीकी से जांच की, खासकर उनकी गिरफ्तारी का क्रम और 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) के तहत जारी नोटिसों की जांच की।
कोर्ट ने गिरफ्तारी और BNSS नोटिस के क्रम पर सवाल उठाए
सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि चौधरी को 12 अप्रैल, 2026 को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया था और उन्हें BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था। राज्य सरकार का पक्ष था कि चौधरी ने प्रदर्शनकारियों को पत्थरबाज़ी और आगज़नी के लिए उकसाया था। हालांकि, बेंच ने सवाल उठाया कि क्या BNSS के तहत तय प्रक्रिया का वास्तव में पालन किया गया था।
जस्टिस श्रीधरन ने खास तौर पर पूछा कि क्या चौधरी को पहले धारा 126 के तहत नोटिस दिया गया था। राज्य सरकार ने माना कि ऐसा कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था और इसके बजाय धारा 130 के तहत नोटिस दिया गया था। इसके बाद कोर्ट ने दस्तावेजों और जनरल डायरी (GD) एंट्री के क्रम की जांच की। जस्टिस श्रीधरन ने सवाल किया कि चौधरी की गिरफ्तारी के बाद नोटिस कैसे तैयार किया जा सकता है।
'लाइव लॉ' की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने टिप्पणी की: "अब इसमें GD एंट्री देखिए, उसे गिरफ्तार कर लिया फिर नोटिस बनाया।" बेंच ने गिरफ्तारी के रिकॉर्ड और नोटिस के बीच साफ तौर पर दिख रही विसंगति की ओर भी इशारा किया। उन्होंने देखा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि नोटिस तैयार होने से पहले ही चौधरी को गिरफ्तार कर लिया गया था। कोर्ट के सवाल हिरासत की कानूनी वैधता के मुख्य मुद्दे पर केंद्रित थे: क्या राज्य ने गिरफ्तारी जैसा कड़ा कदम उठाने और उसके बाद चौधरी को प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) में रखने से पहले जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया था?
‘जो भी हिंसा हुई, वह उनकी गिरफ्तारी के बाद हुई’
कोर्ट ने राज्य के उस दावे की भी बारीकी से जांच की जिसमें कहा गया था कि मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने में चौधरी की भूमिका थी। राज्य ने मजदूरों के जमावड़े से जुड़ी घटनाओं का हवाला दिया और आरोप लगाया कि चौधरी ने प्रदर्शनकारियों को हिंसा करने के लिए उकसाया था, जिसमें पत्थरबाजी और आगजनी शामिल थी। लेकिन बेंच ने घटनाओं के क्रम (क्रोनोलॉजी) की ओर ध्यान दिलाया।
राज्य के अपने ही बयान के अनुसार, 11 अप्रैल को लोग विरोध-प्रदर्शन के लिए जमा हुए थे। जस्टिस श्रीधरन ने बताया कि अभियोजन पक्ष ने जिस बड़ी हिंसा का जिक्र किया था, वह घटना बाद में हुई थी।
लाइव-लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा, "यानी 11 तारीख को कोई हिंसा नहीं हुई थी। जो भी हिंसा हुई, वह उनकी गिरफ्तारी के बाद हुई।"
यह बात इसलिए अहम थी क्योंकि राज्य का मामला इस बात पर टिका था कि चौधरी का हिंसा से क्या संबंध है। अगर आरोपों का आधार बनी हिंसा से पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, तो कोर्ट जाहिर तौर पर यह सवाल उठा रहा था कि राज्य उन पर बाद में हुई हिंसा के लिए कैसे आरोप लगा सकता है।
वीडियो सबूत कहां है?
पिछली सुनवाई के दौरान बेंच ने राज्य के आरोपों के सबूतों के आधार पर चिंता जताई थी। 1 सितंबर को कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से खास तौर पर वीडियो फुटेज दिखाने को कहा था जिसमें चौधरी कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों को पत्थर फेंकने या गाड़ियों में आग लगाने के लिए उकसा रही हों। राज्य ने फुटेज हासिल करने और पेश करने के लिए और समय मांगा। कोर्ट ने मना कर दिया।
जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि चौधरी पहले ही लगभग पांच महीने हिरासत में बिता चुकी हैं और कहा, "मैं समय नहीं दूंगा। वह 5 महीने से जेल में हैं।"
बेंच ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर रिकॉर्ड से पता चलता है कि सत्ता का मनमाना इस्तेमाल किया गया है, तो संबंधित अधिकारियों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। आखिरी सुनवाई के दौरान यह मुद्दा फिर उठा, जब राज्य ने गवाहों के बयानों का सहारा लिया जिनमें कथित तौर पर चौधरी का नाम लिया गया था। हालांकि, बेंच कुछ और ठोस सबूत चाहती थी: ऐसा कौन सा सबूत है जिससे पता चले कि उन्होंने असल में हिंसा के लिए उकसाया था?
कोर्ट ने चार्जशीट पर राज्य के भरोसे पर भी सवाल उठाए और पूछा कि गवाहों ने खास तौर पर उन्हें कहां फंसाया है और वीडियो सबूत में उकसाने की कथित हरकतें कहां दिख रही हैं।
मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन से NSA के तहत हिरासत तक
चौधरी की हिरासत नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी है, जो ज्यादा वेतन और काम की बेहतर स्थितियों की मांग को लेकर शुरू हुआ था और बाद में हिंसा, आगजनी और पुलिस के साथ झड़प में बदल गया। विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ था लेकिन 13 अप्रैल को हिंसक हो गया। इसके बाद पुलिस ने बड़ी संख्या में मजदूरों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और कई आपराधिक मामले दर्ज किए।
दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में ग्रेजुएट और कार्यकर्ता चौधरी भी गिरफ्तार लोगों में शामिल थीं। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 मई को उन पर और पत्रकार व कार्यकर्ता सत्यम वर्मा पर NSA लगाया। पुलिस का आरोप था कि मजदूरों के आंदोलन से जुड़ी हिंसा और गड़बड़ी में इन दोनों ने अहम भूमिका निभाई थी। उस समय, गौतम बुद्ध नगर की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने दावा किया था कि पुलिस के पास चौधरी, वर्मा और विरोध प्रदर्शनों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों के खिलाफ "मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफिक सबूत" थे। पुलिस का कहना था कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी, बल्कि यह एक बड़ी संगठित कोशिश का हिस्सा थी।
विस्तृत रिपोर्ट यहां और यहां पढ़ी जा सकती है।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में ग्रेजुएट और एक्टिविस्ट, 25 साल की आकृति चौधरी की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने नोएडा में वर्कर्स के प्रोटेस्ट के दौरान हिंसा में उनकी कथित भूमिका और गिरफ्तारी के बारे में राज्य सरकार के बयानों में गंभीर विसंगतियां पाईं।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने चौधरी की 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को मंजूरी दी और कहा कि उनकी हिरासत राज्य सरकार की एक "गढ़ी हुई कहानी" पर आधारित थी। कोर्ट ने आदेश दिया कि अगर किसी दूसरे मामले में उनकी कस्टडी की जरूरत नहीं है, तो उन्हें तुरंत रिहा किया जाए। कोर्ट ने नोएडा अधिकारियों को उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी निर्देश दिया। विस्तृत आदेश का इंतजार है।
हालांकि, 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट है कि चौधरी फिलहाल कस्टडी में ही रहेंगी क्योंकि उन्हें नोएडा वर्कर्स के आंदोलन के सिलसिले में दर्ज अन्य आपराधिक मामलों में अभी तक जमानत नहीं मिली है। यह फैसला तब आया है जब बेंच ने चौधरी की गिरफ्तारी और हिंसा में उनकी कथित भागीदारी के बारे में राज्य सरकार के पक्ष की बारीकी से जांच की, खासकर उनकी गिरफ्तारी का क्रम और 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता' (BNSS) के तहत जारी नोटिसों की जांच की।
कोर्ट ने गिरफ्तारी और BNSS नोटिस के क्रम पर सवाल उठाए
सुनवाई के दौरान, राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि चौधरी को 12 अप्रैल, 2026 को सुबह 10:56 बजे गिरफ्तार किया गया था और उन्हें BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया गया था। राज्य सरकार का पक्ष था कि चौधरी ने प्रदर्शनकारियों को पत्थरबाज़ी और आगज़नी के लिए उकसाया था। हालांकि, बेंच ने सवाल उठाया कि क्या BNSS के तहत तय प्रक्रिया का वास्तव में पालन किया गया था।
जस्टिस श्रीधरन ने खास तौर पर पूछा कि क्या चौधरी को पहले धारा 126 के तहत नोटिस दिया गया था। राज्य सरकार ने माना कि ऐसा कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था और इसके बजाय धारा 130 के तहत नोटिस दिया गया था। इसके बाद कोर्ट ने दस्तावेजों और जनरल डायरी (GD) एंट्री के क्रम की जांच की। जस्टिस श्रीधरन ने सवाल किया कि चौधरी की गिरफ्तारी के बाद नोटिस कैसे तैयार किया जा सकता है।
'लाइव लॉ' की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने टिप्पणी की: "अब इसमें GD एंट्री देखिए, उसे गिरफ्तार कर लिया फिर नोटिस बनाया।" बेंच ने गिरफ्तारी के रिकॉर्ड और नोटिस के बीच साफ तौर पर दिख रही विसंगति की ओर भी इशारा किया। उन्होंने देखा कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि नोटिस तैयार होने से पहले ही चौधरी को गिरफ्तार कर लिया गया था। कोर्ट के सवाल हिरासत की कानूनी वैधता के मुख्य मुद्दे पर केंद्रित थे: क्या राज्य ने गिरफ्तारी जैसा कड़ा कदम उठाने और उसके बाद चौधरी को प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) में रखने से पहले जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन किया था?
‘जो भी हिंसा हुई, वह उनकी गिरफ्तारी के बाद हुई’
कोर्ट ने राज्य के उस दावे की भी बारीकी से जांच की जिसमें कहा गया था कि मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने में चौधरी की भूमिका थी। राज्य ने मजदूरों के जमावड़े से जुड़ी घटनाओं का हवाला दिया और आरोप लगाया कि चौधरी ने प्रदर्शनकारियों को हिंसा करने के लिए उकसाया था, जिसमें पत्थरबाजी और आगजनी शामिल थी। लेकिन बेंच ने घटनाओं के क्रम (क्रोनोलॉजी) की ओर ध्यान दिलाया।
राज्य के अपने ही बयान के अनुसार, 11 अप्रैल को लोग विरोध-प्रदर्शन के लिए जमा हुए थे। जस्टिस श्रीधरन ने बताया कि अभियोजन पक्ष ने जिस बड़ी हिंसा का जिक्र किया था, वह घटना बाद में हुई थी।
लाइव-लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने कहा, "यानी 11 तारीख को कोई हिंसा नहीं हुई थी। जो भी हिंसा हुई, वह उनकी गिरफ्तारी के बाद हुई।"
यह बात इसलिए अहम थी क्योंकि राज्य का मामला इस बात पर टिका था कि चौधरी का हिंसा से क्या संबंध है। अगर आरोपों का आधार बनी हिंसा से पहले ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, तो कोर्ट जाहिर तौर पर यह सवाल उठा रहा था कि राज्य उन पर बाद में हुई हिंसा के लिए कैसे आरोप लगा सकता है।
वीडियो सबूत कहां है?
पिछली सुनवाई के दौरान बेंच ने राज्य के आरोपों के सबूतों के आधार पर चिंता जताई थी। 1 सितंबर को कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से खास तौर पर वीडियो फुटेज दिखाने को कहा था जिसमें चौधरी कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों को पत्थर फेंकने या गाड़ियों में आग लगाने के लिए उकसा रही हों। राज्य ने फुटेज हासिल करने और पेश करने के लिए और समय मांगा। कोर्ट ने मना कर दिया।
जस्टिस श्रीधरन ने कहा कि चौधरी पहले ही लगभग पांच महीने हिरासत में बिता चुकी हैं और कहा, "मैं समय नहीं दूंगा। वह 5 महीने से जेल में हैं।"
बेंच ने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर रिकॉर्ड से पता चलता है कि सत्ता का मनमाना इस्तेमाल किया गया है, तो संबंधित अधिकारियों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। आखिरी सुनवाई के दौरान यह मुद्दा फिर उठा, जब राज्य ने गवाहों के बयानों का सहारा लिया जिनमें कथित तौर पर चौधरी का नाम लिया गया था। हालांकि, बेंच कुछ और ठोस सबूत चाहती थी: ऐसा कौन सा सबूत है जिससे पता चले कि उन्होंने असल में हिंसा के लिए उकसाया था?
कोर्ट ने चार्जशीट पर राज्य के भरोसे पर भी सवाल उठाए और पूछा कि गवाहों ने खास तौर पर उन्हें कहां फंसाया है और वीडियो सबूत में उकसाने की कथित हरकतें कहां दिख रही हैं।
मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन से NSA के तहत हिरासत तक
चौधरी की हिरासत नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए मजदूरों के विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी है, जो ज्यादा वेतन और काम की बेहतर स्थितियों की मांग को लेकर शुरू हुआ था और बाद में हिंसा, आगजनी और पुलिस के साथ झड़प में बदल गया। विरोध-प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से शुरू हुआ था लेकिन 13 अप्रैल को हिंसक हो गया। इसके बाद पुलिस ने बड़ी संख्या में मजदूरों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और कई आपराधिक मामले दर्ज किए।
दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में ग्रेजुएट और कार्यकर्ता चौधरी भी गिरफ्तार लोगों में शामिल थीं। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने 13 मई को उन पर और पत्रकार व कार्यकर्ता सत्यम वर्मा पर NSA लगाया। पुलिस का आरोप था कि मजदूरों के आंदोलन से जुड़ी हिंसा और गड़बड़ी में इन दोनों ने अहम भूमिका निभाई थी। उस समय, गौतम बुद्ध नगर की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने दावा किया था कि पुलिस के पास चौधरी, वर्मा और विरोध प्रदर्शनों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए अन्य लोगों के खिलाफ "मजबूत इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफिक सबूत" थे। पुलिस का कहना था कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी, बल्कि यह एक बड़ी संगठित कोशिश का हिस्सा थी।
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