UP में महिलाओं का बढ़ता उत्पीड़न खोल रहा योगी के मिशन शक्ति अभियान की पोल

Written by Navnish Kumar | Published on: January 5, 2021
UP में महिलाओं का बढ़ता उत्पीड़न योगी के मिशन शक्ति अभियान की पोल खोल रहा है। 2020 में देशभर में महिला उत्पीड़न की आधे से ज्यादा शिकायतें अकेले उत्तर प्रदेश से आई हैं। हाथरस कांड में फजीहत के बाद राष्ट्रीय महिला आयोग का ताजा खुलासा चौंकाने के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा और आत्मसम्मान से जीवन जीने को लेकर भयावह स्थिति को भी दर्शाता है। 



राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के हवाले से घरेलू हिंसा को लेकर सनसनीखेज जानकारी मिली है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय महिला आयोग को वर्ष 2020 में पिछले छह सालों में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की सबसे अधिक 23,722 शिकायतें मिलीं हैं। खास बात यह है कि इसमें आधे से ज्यादा 11,872 शिकायतें अकेले उत्तर प्रदेश की हैं। यह आंकड़ा योगी आदित्यनाथ सरकार के द्वारा महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और स्वावलंबन को लेकर चलाए जा रहे मिशन शक्ति अभियान को भी खुला आईना दिखा रहे हैं। 

राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के अनुसार साल 2020 में मिली कुल शिकायतों में से एक चौथाई घरेलू हिंसा से जुड़ी थीं। सर्वाधिक शिकायतें उत्तर प्रदेश से मिलीं हैं और इसके बाद दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र रहे हैं। लेकिन इन राज्यों और यूपी से प्राप्त शिकायतों में 5-10 गुणे के बड़े अंतर हैं। 

मसलन, सबसे ज्यादा 11,872 शिकायतें उत्तर प्रदेश से मिलीं हैं तो इसके बाद क्रमशः दूसरे, तीसरे व चौथे नम्बर पर रहे राज्यों दिल्ली से 2,635, हरियाणा से 1,266 और महाराष्ट्र से 1,188 शिकायतें मिली हैं।

कुल 23,722 शिकायतों में 7,708 शिकायतें सम्मान के साथ जीने के अधिकार से जुड़ी थीं, जिसमें महिलाओं के भावनात्मक उत्पीड़न के मामले देखे जाते हैं। वहीं, आयोग के अनुसार, करीब एक चौथाई 5,294 शिकायतें घरेलू हिंसा से जुड़ी हैं। 

यूपी कांग्रेस ने यह आंकड़े सोशल मीडिया पर साझा करते हुए योगी सरकार के मिशन शक्ति अभियान पर हमला बोला है। कहा कि एक ओर मिशन शक्ति अभियान चल रहा है तो दूसरी ओर, महिलाओं का उत्पीड़न बढ़ता जा रहा है।

राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने कहा कि हो सकता है कि 2020 में कोरोना आदि के चलते आर्थिक असुरक्षा, तनाव बढ़ने, वित्तीय चिंताओं समेत अन्य चिंताओं और ऐसे में माता-पिता/परिवार की तरफ से भावनात्मक सहायता न मिलने का परिणाम घरेलू हिंसा के रूप में निकला हो।

उन्होंने कहा कि कोरोना काल में घर पति-पत्नी दोनों के लिए कार्यस्थल और बच्चों के लिए स्कूल-कॉलेज बन गया है। ऐसी परिस्थितियों में महिलाएं एक ही स्थान से घर भी संभाल रही हैं और पेशेवर भी हैं। लेकिन महिलाओं के सामने इस साल की सबसे बड़ी चुनौती इन परिस्थितियों में तालमेल बिठाने की ही है। इसी सब के चलते लॉकडाउन के दौरान ही मॉर्च से जून जुलाई तक घरेलू हिंसा की सर्वाधिक शिकायतें आईं हैं।

रेखा शर्मा कहती हैं कि लॉकडाउन की वजह से घरेलू हिंसा के मामले दर्ज कराने की संभावनाएं भी महिलाओं के पास कम हो गईं और वे इस बीच सुरक्षित स्थानों पर भी नहीं जा सकती थीं तथा मायके के साथ भी उनका संपर्क कम हो गया, जो ऐसे वक्त में उनके लिए संपर्क और सहायता का बड़ा जरिया हुआ करता था।

उन्होंने कहा, ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत आने वाले तंत्रों की पहचान लॉकडाउन में अनिवार्य सेवा के रूप में नहीं की गई और ऐसे में सुरक्षा अधिकारी तथा गैर सरकारी संगठन पीड़िताओं के घर जाने में असमर्थ हो गए। वहीं, पुलिस अधिकारियों के पास कोविड-19 से निपटने के इतने काम थे कि वे प्रभावी तरीके से पीड़िताओं की मदद नहीं कर पाए।

राष्ट्रीय महिला आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 1,276 शिकायतें महिलाओं के प्रति पुलिस की उदासीनता और 704 शिकायतें साइबर अपराध की हैं। वहीं, 1,234 शिकायतें दुष्कर्म या दुष्कर्म की कोशिश की मिली हैं जबकि यौन उत्पीड़न की 376 शिकायतें मिलीं हैं। वही घरेलू हिंसा के मामलों में सबसे बुरा हाल कर्नाटक, असम, मिजोरम, तेलंगाना और बिहार में है। खास यह भी हैं कि 2020 से पहले 2014 में 33,906 शिकायतें मिली थीं।

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