मोदी जी का नया सपना

Written by विमलभाई | Published on: October 11, 2017
इस बार उत्तराखंड में नई भाजपानीत त्रिवेंद्र रावत सरकार ने 9 सितंबर को हिमालय दिवस का बहुत राग अलापा। 15 अगस्त को भी पर्यावरण पर बहुत चिंता की दिखाई। हर व्यक्ति से एक पेड़ लगाने का संकल्प लिया गया। उस दिन लेखक प्रस्तावित 311 मीटर उंचे पंचेश्वर बांध के प्रभावित कुनगड़ा गांव में था। गांव प्रधान ने लेखक से पूछा की हम मुख्यमंत्री जी को पत्र लिखकर बताना चाहता हूं कि यहंा तो बांध में वे सागौन, बांज जैसे लाखों पेड़ डूबा रहे है। सरकार की कथनी करनी का अंतर उन्होने सरलता से सामने रख दिया।

Narendra Modi
 
उत्तराखंड के कुमाउं क्षेत्र में प्रस्तावित पंचेश्वर बहूउद्देश्यी परियोजना के लिये की 9 अगस्त 2017 को चम्पवात, 11 अगस्त 2017 को पिथौरागढ़ और 17 अगस्त 2017 को अल्मोड़ा जिले में की गयी जन-सुनवाईयों का आयोजन था।
 
1956 में भारत के केन्द्रिय जल व उर्जा कमीशन ने पंचेश्वर बांध स्थल का चुनाव किया था। 1962 में पहली बार उत्तर प्रदेश सरकार ने जमीनी सर्वे में एक कंक्रीट के बांध से 1,000 मेगावाट की परियोजना की परिकल्पना की थी। 1996 में भारत व नेपाल के प्रधानमंत्रियों ने महाकाली समझौता किया जिसमें इस बांध को मूर्त रुप देने की बात हुई। भारत व नेपाल के संयुक्त प्रयास वाली इस परियोजना में चम्पावत जिले में महाकाली और सरयू के संगम पर व नीचे दो बांध प्रस्तावित है। 311 मीटर ऊंचा व 814 मीटर लंबा मिट्टी-पत्थर का 4800 मेगावाट का पंचेश्वर बांध फिर उसके 27 किलोमीटर नीचे 95 मीटर ऊंचा कंक्रीट का 240 मेगावाट का बांध रुपालीगाड में प्रस्तावित है। पंचेश्वर बांध में चम्पवात के 15 गांव, पिथौरागढ़ जिले के 87 और अल्मोड़ा जिले के 21 गांव प्रभावित होने वाले है। रुपालीगाड बांध में चम्पावत जिले के 11 गांव प्रभावित हो रहे है। अभी नेपाल के प्रभावित गांवो की संख्या नही मालूम।

भारत की 9,100 हेक्टेयर व नेपाल की 5,000 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहित होनी होगी। पंचेश्वर बांध का जलाशय 11,600 हेक्टेयर व रुपालीगाड बांध का जलाशय 369 हेक्टेयर भूमि में फेला होगा। डूब में आ रहे 89 मंिदरांे में भारत व नेपाल के आस्था के प्रतीक शिव के पंचेश्वर, रामेश्वर और तालेश्वर मंदिर भी डूब रहे है। 9,100 हेक्टेयर घना जंगल डूब में आने वाला है। 29,400 परिवार पंचेश्वर बांध में और रुपालीगाड बंाध में 1,587 परिवार प्रभावित हो रहे है। भूमि का सिर्फ मुआवजा देने की बात है जमीन के बदले जमीन का कोई प्रावधान नही है। ये संख्या भी बहुत धोखे वाली है। चूंकि जिसके नाम पर जमीन है उसे परिवार माना है। यानि 75 साल के वृद्ध के 4 बेटे और 8 व्यस्क पौत्र है तो भी उनको एक ही परिवार माना गया है।
 
अब इस परियोजना को मोदी जी का एक सपना बताया जा रहा है। सरदार सरोवर भी उनका एक सपना था जिसे हाल ही में 40,000 परिवारों को बिना पुनर्वास दिये उजाड़कर, 65 साल की, 32 साल के अहिंसक आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर पर अपहरण का झूठा केस बनाकर जेल में डालकर पूरा करने की तैसारी की है। अपनी पहली नेपाल यात्रा में मोदी ने 7 अगस्त 2014 को पंचेश्वर डेवलपमैंट अथौरिटी बनाई गई मोदी जी के सपने को आगे बढ़ाने के लिये। 25 अप्रैल 2015 में बांध के अध्ययन कागजात बनाने के लिये पर्यावरण आकलन समिति ने अनुमति दी। 31 मई  2017 को केन्द्रिय पर्यावरण आकलन समिति को बताया गया की परियोजना की भारत संबधी पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट, सामाजिक आंकलन रिपोर्ट व प्रबंध योजना रिपोर्ट उत्तराखंड सरकार को देखने व आकलन करने के लिये दे दी गई है स्वीकृति मिलने पर जनसुनवाई की जायेगी।
 
साल के सर्वाधिक 277.7 मीलीमीटर बारिश वाले अगस्त महिने 2017 में जनसुनवाईयों का आयोजन किया गया। जबकि संबधित जिलों में बारिश के कारण विद्यालयों को बंद करने का जिलाधीश का कठोर आदेश था।

किसी भी बड़ी बांध परियोजना के लिये पर्यावरण स्वीकृति और वन स्वीकृति लेनी आवश्यक होती है। वन स्वीकृति के लिये लोगो से नही पूछा जाता है। पर्यावरण स्वीकृति के लिये ही जनसुनवाई का आयोजन होता है। जिसमें प्रभावितों के सामने परियोजना से जुड़े सभी पक्ष इन कागजातो में परियोजना संबन्धी सम्पूर्ण जानकारी होती है जिसमें जन-जीवन, जंगल, धूल, वायु-प्रदूषण, जीव-जंतुओं, नदी घाटी आदि पर प्रभावों का अध्ययन शामिल होता है। पुनर्वास आदि सहित इन प्रभावों के प्रबंधन पर प्रस्तावित खर्च का ब्यौरा भी होता है। सुनवाई एकमात्र वो खुला मंच होता है जहंा बांध प्रभावित अपनी बात कह सकते है।
 
जन सुनवाई की अधिकारिक सूचना कही भी 30 दिन पहले नही दी गई। जिन कागजातों पर जनसुनवाई होती है वे पर्यावरण प्रभाव आंकलन, सामाजिक प्रभाव आंकलन और पर्यावरण प्रबंध योजना का सार सरल हिन्दी भाषा में नहीं दिया गया था। कुल मिलाकर यह जन सुनवाई में लोगों ने बंाध से जुड़े तथ्यों व कागजातों  कि जानकारी के बिना बातें रखीे।
 
बंद सभागारों में जन सुनवाईयों का आयोजन किया गया। जो प्रभावित गांवों से 30 से 45  किलोमीटर से दूर तक थी जिस कारण अधिकांश लोग नहीं आ पाये थे महिलाओं की संख्या नगण्य ही रही। प्रभावित क्षेत्र से दूर व लोगो के लिये मुश्किल था। चम्पवात व पिथौरागढ़ में तो जन सुनवाई का पैनल ही स्पष्ट नही हो पा रहा था क्योंकि पैनल में भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ प्रतिनिधि व ब्लाक प्रमुख  आदि भी बैठे थे। अल्मोड़ा में मंच पर जिलाधीश, प्र0नि0बोर्ड के सदस्य के साथ पुलिस अधिकारी भी बैठी थी। सभागारों में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता पूरी जनसुनवाई तक अन्दर ही मौजूद थे। जो प्रभावित लोगों व अन्य संगठन के लोगों को जन सुनवाई की प्रक्रिया की खामियों को बोलने से रोकने की कोशिश कर रहे थे। सभी जनसुनवाईयंा तनावपूर्ण व असुरक्षित माहौल में हुई। ऐसा लग रहा था कि बस किसी भी तरह से कागजी कार्यवाही पूरी की जाये। और इसके लिये लोगो पर सब तरह से दवाब रखा गया है।
 
मंचासीन लोगों ने बार-बार पुनर्वास से जुड़ी बातों को किसी चुनावी सभा की तरह दोहराया व आश्वासन दिया। पुर्नवास के संदर्भ में भरोसे का भ्रम पैदा करने की कोशिश की गयी। तीनों ही जिलो में जनसुनवाई परिसर में पुलिस की संख्या बहुत ज्यादा थी। सभागार के अन्दर भी पुलिस की संख्या बहुत थी।

एक प्रभावित ओंकार सिंह धौनी ने जन सुनवाई की प्रक्रिया के बारे में कई सवाल उठाये जिनका उत्तर नही मिल पाया। प्रश्न पूछा कि आप ने गॉव के स्तर पर परियोजना संबधी कागजातों का सार-संक्षेप कब दिया? उनके गांव पंचेश्वर में मात्र 4 दिन पहले ही ये दिया गया था। दूरस्थ गांवों में अखबार भी नही जाता तो वेब साईट पर कैसे लोग पढ़ेंगे?
 
जनसुनवाईयों में लोगो को बार-बार ये बताया गया कि ये अभी शुरुआत है। हम आपकी बात सुनेंगे। जनसुनवाई के जो भी मुददे होंगे उनको अंतिम पर्यावरण प्रभाव आकलन में लिया जायेगा। इस तरह लोगो में यह भ्रम पैदा किया गया की जनसुनवाई एक लम्बी प्रक्रिया है और आगे चलती रहेगी। जो कि पूरी तरह से गलत है।
 
जनसुनवाई के लिए आवश्यक है, कि गाँवों के स्तर पर जनसुनवाई की जानकारी उपलब्ध करायी जाए और पर्यावरण प्रभाव आंकलन रिपोर्ट व् प्रबंध योजना तथा सामाजिक आंकलन सम्बन्धी रिपोर्टों का सार एक महीने पूर्व दिया जाए। किन्तु ऐसा यहाँ नहीं हुआ। 14-09-2006 की अधिसूचना व राष्ट्रीय पर्यावरण अपीलीय प्राधिकरण (ंराष्ट्रीय हरित प्राधिकरण से पहले ये ही होता था ) के विमलभाई बनाम भारत सरकार 2-7-2007 के आदेश का उलंघन था। जबकि जनसुनवाईयों से पहले माटू जनसंगठन, उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी, हिमधारा पर्यावरण समूह ने तीनों जिलाधीशों को मिल कर कानूनी व व्यवहारिक सभी बातें रखी थीं। सैंड्रप संस्था, उत्तराखंड क्रंाति दल, कंाग्रेस पार्टी के क्षेत्रीय विधायक व अन्य संगठनों ने भी विरोध दर्ज किया था।
 
पंचेश्वर और रुपालीगाड बंाध चम्पावत जिले में बन रहे है इसलिये इस जिले में इन बांधों से जुड़ी सभी तरह की कानूनी औपचारिकतायें औपचारिक रुप से ही पूरी की जा रही है। जिसका प्रभावितों या पर्यावरण से कोई मतलब नही। सामाजिक आकलन रिर्पोट के आकड़े पुराने और गलत है। गांव वालो को पता तक नही की कब कौन सर्वे करने आया? नये जमाने में गूगल बाबा से जमीनी सर्वे हो गये। इसलिये चम्पावत जिले के सिमलखेत, बौतड़ी, निडिल आदि गांवों में जो सामाजिक आकलन रिर्पोट और तथाकथित पुनर्वास नीति पर बैठके हो रही है उसमें लोग विरोध कर रहे है।
 
प्रशासन के पास तो मोदी जी के सपने को पूरा करने का दवाब है इसलिये वो अब ‘‘बांध विरोधी संगठनों पर खास नजर रखी जायेगीं‘‘, इस तरह के सरकारी ब्यानों से प्रभावितों को और जनपक्षीय संगठनों को डराने की कोशिश कर रहा है।
 
अभी नेपाल व भारत में पूरी तरह समझौता तक नही हुआ है। 1996 की महाकाली समझौते को 21 साल हो गये। कागजातो में  और जरा उत्तराखंड के टिहरी बवांध को ही देखो? टिहरी बाँध में अभी तक पुनर्वास पूरा नहीं हो पाया, पर्यावरण शर्तें तो पूरी हुई ही नहीं, बाँध के नीतिगत लाभ प्रभावितों को नहीं मिले हैं।
 
जून 2013 की आपदा में बड़े बांधों के कारण तबाही में वृद्धि हुई। यह भी सिद्ध हुया है कि टिहरी बाँध बनने के बाद बादल फटने की घटनाये बड़ी हैं, जलवायु परिवर्तन के दौर में, पडौसी देश चीन से ख़राब होते संबंधों के दौर में, 2015 में तत्कालीन केंद्रीय ऊर्जा मंत्री श्री पीयूष गोयल जी के कथना अनुसार देश में बिजली अधिक है, भारत से बिजली निर्यात की जाती है, संसार में विशेषकर अमेरिका में बडे बाँध तोड़े जा रहे हैं, बांधों के लिए पूँजी निवेश के लिए समस्याये आ रही हैं। ऐसी तमाम ज्वलंत बातों को दरकिनार करके ऐसी कौन सी त्वरित जरूरत आगयी की सरयू व महाकाली घाटी के लाखों लोगों का भविष्य अँधेरे में फैंका जा रहा है। दूरस्थ महाकाली व सरयू घाटी के अतुलनीय सौंदर्य, आक्सीजन के भंडार, स्वावलंबी गांव के लोगों को सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा व् विकास अन्य लाभों से आजादी के बाद से ही महरूम रखा गया है उनकी कड़ी कोशिशों के बाद जब सड़क की उम्मीद हुई तो बांध थोपा जा रहा है।
 
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