अयोध्या में दीपोत्सव के विश्व कीर्तिमान से, दीये बनाने वाले कुम्हारों का कितना लाभ हुआ?

Written by मिथुन प्रजापति | Published on: November 1, 2019
साधो, आज एक पंडित जी का लेख पढ़ने को मिल गया। उस लेख में हिंदू धर्म और त्योहारों के महत्व पर पर  प्रकाश डाला गया था। लेख मुख्यतः  छठ पूजा को लेकर था। 



साधो, उस लेख का मुख्य सार यह था कि किस तरह हिन्दू धर्म के त्योहार सभी जातियों का उद्धार करते हैं। पढ़ते हुए यह भी आभास हो रहा था कि पंडित जी बताना चाह रहे हैं कि वर्ण व्यवस्था कितना जरूरी है। जाति का होना कितना जरूरी है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए समझाया था कि छट पूजा में कैसे अलग-अलग जातियों का मुनाफा होता है। उन्होंने किसी साल पढ़े हुए समाचार पत्र का हवाला देते हुए बताया था कि फला वर्ष छठ के दिन डोम जाति के लोगों ने 52 करोड़ के सूप और बांस से जुड़े सामान बेचे। साधो, उन्होंने यह भी बताया कि यह बहुत बड़ी धनराशि है इतनी धनराशि से वे जातियां साल भर खर्च चला लेती हैं और उनका गुजर बसर अच्छी तरह हो जाता है और वे तरक्की कर रही हैं। "यह वर्ण व्यवस्था की महानता है" ऐसा उनका मानना था।

साधो, अब पंडित जी के लेख को छोड़ जरा अपने अनुभवों की चर्चा करना चाहता हूं। मैंने अक्सर गांव में सड़कों किनारे या किसी बाग में कुछ परिवारों को डेरा डाले बांस के सूप, दउरी, डलिया बनाते देखा है। यह अक्सर आम बोलचाल की भाषा में धहिकार (धनकार) कहलाते हैं। यह ऐसे लोग होते हैं जो अक्सर पलायन करते रहते हैं। जहां बेहतर जगह मिली टिक गए। जाड़ा, गर्मी ,बरसात किसी भी मौसम में ये ऐसे ही दिखते हैं। अक्सर इनके साथ भैंसा होता है जिनपर सारी गृहस्थी लादकर चलते हैं। साधो, मेरा प्रश्न यह है, यदि त्योहारों में बिकने वाले इनके बनाये प्रोडक्ट में इतना ही मुनाफा है तो ये लोग आज़ादी के इतने सालों बाद भी सड़क किनारे डेरा डाल रहने को क्यों मजबूर हैं?  इनके साथ छोटे छोटे बच्चे भी काम में अक्सर लगे दिख जाते हैं। उनका भविष्य क्या है?  क्या इन जातियों का देश के संसाधन में जरा भी हक़ नहीं? 

साधो, मैं अन्य जातियों की बात करता हूँ। मेरा जन्म कुम्हार जाति में हुआ है। मैंने बचपन से चाय का कुल्हड़ बनाया है। यह मेरी मजबूरी रही है। मेरे बहुत से प्रिविलेज रहे हैं। मसलन, संम्पन क्षेत्र से था, रहने के लिए घर, दस किलोमीटर के अंदर सरकारी विद्यालय आदि आदि। पर जीवन चलाने के लिए इतना ही काफ़ी नहीं होता। मिट्टी के बर्तन बनाकर परिवार की स्थिति ऐसी न थी कि पढ़ने के लिए आगे की देख सकूं या परिवार मुझे उच्च शिक्षा दिला सके। 

साधो, एक बात याद आ रही है। अभी हाल ही में दिवाली के दिन उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ़ से अयोध्या में साढ़े पांच लाख से भी अधिक दीये जलाकर विश्व कीर्तिमान बनाया गया। यह व्यय सरकारी पैसे से किया गया। साधो, मैं कुम्हार हूँ। मेरे घर जो दीये बनाकर इस दिवाली बेचे गए उन दीयों के पचास पैसे/दीये भी नहीं मिले। अक्सर लोग कुछ अनाज, मसलन गेहूं चावल या धान के बदले ये दिये ले जाते हैं। कुछ लोग पैसे भी दे जाते हैं। दुनिया डॉलर में खेल रही पर गांवों में धोबी, कुम्हार, धहिकार सब वस्तु विनिमय से आगे न बढ़ पा रहे हैं। 

साधो, उस अयोध्या में दीप जलाने के विश्व रिकार्ड बनने के बाद बचे तेल को बोतल में भर रही बच्ची की जाति भी पता चलनी चाहिए । 

साधो, यह मेरा अनुभव है। आज भी मिट्टी के बर्तन बनाकर या बांस के डोंगे बनाकर कोई पेट तो पाल सकता है पर बच्चों को उच्च शिक्षा या परिवार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा नहीं दे सकता। यदि कोई उच्च जाति का यह कहता है कि डलिया, कुल्हड़ बनाने वाली जातियां, कपड़ा धोने वाली जातियां, अपने पुरखों का कार्य करते हुए तरक्की कर रही हैं तो वह महज अपना हित साधते हुए बड़ी धूर्तरा से यह कहना चाहता है कि जाति व्यवस्था बड़े काम की है और इसे बने रहना चाहिए। 

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