'मनु प्रतिष्ठा समारोह' में ही मनु को एक्सपोज करने के लिए सोनवाल जी का आभार...!

Written by Bhanwar Meghwanshi | Published on: December 12, 2017
अंततः रहस्य से पर्दा हटा, मनु को प्रतिष्ठा देने के लिए संघियों द्वारा रखे गए कार्यक्रम में जो विशिष्ट वक्ता के नाते गये, वो लोकेश सोनवाल जी ही थे, जो पुलिस कमिश्नरेट जयपुर में उच्च पदस्थ अधिकारी हैं।



उनके द्वारा रखी गई बात का ऑडियो सुना और मनु प्रतिष्ठा समारोह के पेज पर लाइव भी देखने का अवसर मिला, अन्य वक्ताओं ने क्या बोला, यह तो पता नही, लेकिन सोनवाल जी ने वैचारिक रूप से पूरी दृढ़ता से अपनी बात को रखा और उन्होंने मनु द्वारा स्त्री और शूद्रों के प्रति की गई शैतानी को अच्छे से उजागर किया, उनकी भाषा और आत्मविश्वास दोनो ही निर्भीकता को दर्शाने वाले और सराहनीय थे।

हो सकता है कि आर एस एस के लोग उनको दुबारा नहीं बुलाएं, क्योंकि उनकी बातें मनु को महानतम विधि का जनक साबित नहीं करती और ना ही मनुवाद को पोषित करती हैं, इस साहस के लिए मैं सोनवाल जी को साधुवाद देता हूँ। 

पढ़ें- भंवर मेघवंशी का खुला पत्र- लोकेश सोनवाल जी, शैतानी सोच वाले 'मनु' की प्रतिष्ठा बढ़ाने आप तो मत जाइए!

मेरे द्वारा पूर्व में लिखी गई पोस्ट 'मनु को प्रतिष्ठा देने आप तो मत जाइये सोनवाल जी' से वे जरूर आहत हुए होंगे, इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ, अक्सर मैं अपने लेखन और भाषण से लोगों को पीड़ा दे देता हूँ .उन्होंने अपनी पीड़ा आगरा के निवासी बहुजन समस्या मेला के राष्ट्रीय संयोजक डॉ आर बी एस पुष्कर जी से बातचीत में प्रकट भी की कि वे एक सरकारी व्यक्ति हो कर भी संघी मंच पर गए और उनको खरी खरी सुना कर आ गए, लेकिन मैं ( भँवर मेघवंशी ) सामाजिक कार्यकर्ता हो कर काले झंडे ले कर वहां नही पहुंचा, सोनवाल जी का कहना तो सही ही है, वैसे मैं आज तक काला झंडा ले कर कहीं नहीं पंहुचा, शायद ऐसा मुझमे साहस की कमी के चलते हुआ होगा। 

खैर, यह व्यक्तिगत टीका टिप्पणी का सवाल नही है, किसमें कितना साहस है, इसका पैमाना भी कहाँ हैं ? लोग अपनी अपनी तरह का साहस दिखाते हैं, मैं बचपन से ही कायर रहा, आज तक कोई साहसी काम कर ही नहीं पाया। मैं तो आरएसएस के सहज ही मिले हुए मंच पर भी नही टिक पाया, पांच साल में ही छोड़ आया और फिर कभी लौट कर नही गया। साहस होता तो टिका रहता, कम से कम राजनीतिक पुरुष्कार तो मिल ही जाता, पर क्या करूँ साहस ही नही है!

पर मैं लोकेश सोनवाल जी के साहस का प्रशंसक जरूर हूँ, उनके वहां जाने को लेकर अब भी मेरा मतभेद कायम है, क्योंकि वहां डॉ अम्बेडकर का नही डॉ हेडगेवार का एजेंडा काम कर रहा था, लेकिन लोकसेवक हो कर भी उन्होंने वहाँ जा कर जो बोला, वह काबिले तारीफ है, अन्य दब्बू अधिकारियों को सोनवाल जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। 

हालांकि मनु प्रतिष्ठा समारोह के ये आयोजक हाईकोर्ट जयपुर में लगी मनु की मूर्ति की रक्षा में दिन रात एक किये हुए हैं। उनके पेज पर साफ लिखा हुआ है कि कुछ मंदबुद्धि लोगों के समूह ने गत वर्ष महर्षि मनु की प्रतिमा को तोड़ने का षड्यंत्र किया था, जिसे इन घोर मनुवादियों ने विफल कर दिया। दरअसल उनका इशारा इसी वर्ष 3 जनवरी को हमारी ओर से आयोजित किये गये जयपुर के मनुवाद विरोधी सम्मेलन की तरफ था, आज भी वे मनु के साथ खड़े हैं और हम विरोध में, इसमें कोई दो राय नहीं है। 

अब तो यह स्पष्ट हो चुका है कि मनु की प्रतिष्ठा के लिए एक सुनियोजित विमर्श रचा जा रहा है, जिसमें सचेतन रूप से एक कृत्रिम विपक्ष भी निर्मित किया जा रहा है, दरअसल यह चीन के लोकतंत्र की तरह है, जो है तो तानाशाही लेकिन प्रजातन्त्र का खोल ओढ़ने की कोशिश करती है। संघ भी इस देश में वही कर रहा है। वह है तो दलित विरोधी मनुवादी, लेकिन वह मनु को पुनर्स्थापित करने के अभियान में जानबूझ कर सोची समझी रणनीति के तहत एक अनुकूल प्रतिपक्ष रच रहा है, ताकि कह सके कि हमने तो अपने मंच पर हमको गाली देने वाले लोगों को भी आमंत्रित करके बात कहने का मौका दिया है। आपके आदमी ने हमारी बखिया उधेड़ दी, तब भी हमने चुपचाप सुना, यहां तक कि एक दो जगह तो तालियां भी पीटी, अब बताओ भला हमसे अधिक सहिष्णु और लोकतांत्रिक कोई संगठन हो सकता है?

दरअसल यह 'पक्ष भी हम और विपक्ष भी हम' का खेल है, जिसमें कौन किस पाले में खेलेगा, इसका फैसला भारती भवन करता है और अपने पूर्व स्वयंसेवकों अथवा भावी समर्थकों के ज़रिए वो बातें कहलवाता है जिन्हें वह असहमति के स्वर कह कर प्रचारित कर सके। यही संघी समरसता है कि कुछ लोगों को उनकी बात संघी मंच पर बुलाकर कहने दी जाये, इसे मैं सहमती से रचित असहमति कहता हूं। "मेन्युफेक्चर्ड डिसेंट" के खतरे को समझना होगा।

संघ यह भली भांति जानता है कि उसकी विचारधारा को वैचारिक चुनौती सिर्फ दलित बहुजन विचारधारा दे सकती है, जहां उसे रक्षात्मक रुख लेना पड़ता है। वरना तो बाकी आवाजों को वह देशद्रोह की श्रेणी में डाल कर निपटा देता है। दलित बहुजन विमर्श से लड़ने के बजाय संघ उसे हजम करने की फिराक में है। इसी रणनीति के तहत विगत चार पांच साल से दलित राजनीतिक नेतृत्व, बुद्धिजीवी और सरकारी अधिकारी कर्मचारियों को योजनाबद्ध तरीके से संघ के विविध मंचों पर बिठाया जा रहा है, यह उनका बुना जाल है, जिसमें फंस कर हमारे लोग गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। 

डिक्की के अध्यक्ष मिलिंद काम्बले संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ मंच साझा करते हैं तो यह अकारण नही है। अजा जजा कर्मचारी वर्ग के परिसंघ के राष्ट्रीय रहनुमा उदितराज गले मे भगवा पट्टा बांधते हैं तो यह एक योजना का फलित ही है। राजस्थान में विगत दिनों मोहन भागवत के कार्यक्रम की अध्यक्षता भी आईएएस बी एल नवल कर चुके हैं। बालोतरा में चंपा लाल चितारा भी संघ के मंच को गुलजार कर चुके हैं। 6 दिसम्बर को सैंकड़ों जगहों पर दलित समुदाय के लोगों को संघ ने मंच प्रोवाइड किये हैं। संघ के पास सबके लिए काम है। 

खैर, जो भी हो, मनु के नाम पर सजे मंच पर गए सोनवाल जी ने बात तो सही कही, प्रखरता से कही। मनु को गरियाया भी और बाबा साहब के संविधान को सर्वोपरि कह कर संघ को ललकारा भी। मैं जन्मजात कायर सामाजिक कार्यकर्ता उनके इस अप्रतिम साहस को सलाम भेजता हूँ और मनु को प्रतिष्ठित करने में लगे मनुवादी संघियों को पुनः लानत भेजता हूँ, क्योंकि मनु किसी भी स्वरूप में मुझे स्वीकार नहीं है, न था और न ही होगा। मनुवाद का नाश मानवता के विकास के लिए जरूरी है। 


(लेखक स्वतन्त्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)