जंतर-मंतर में इंटरनेट ठप: एक हफ्ते में छह बार इंटरनेट बंद

Written by sabrang india | Published on: July 25, 2026
छात्र आंदोलनों के दौरान बार-बार लगाए जाने वाले इंटरनेट प्रतिबंधों का असर केवल प्रदर्शन स्थल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि फेरीवालों, छोटे व्यापारियों, यात्रियों और हजारों अन्य लोगों के दैनिक जीवन पर भी पड़ा है।



नीट परीक्षा प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर जंतर-मंतर पर छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी रहने के कारण एक हफ्ते में छठी बार मध्य दिल्ली के कुछ हिस्सों में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं। सार्वजनिक सुरक्षा और अपराध रोकने का हवाला देते हुए अधिकारियों द्वारा बार-बार इंटरनेट बंद करने के आदेशों ने सार्वजनिक प्रदर्शनों को संभालने के लिए इंटरनेट पर रोक लगाने के बढ़ते चलन को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं।

जारी नोटिफिकेशन के अनुसार, गृह मंत्रालय (एमएचए) ने टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर्स को 23 जुलाई को जंतर-मंतर के 1.5 किलोमीटर के दायरे में मोबाइल इंटरनेट एक्सेस बंद करने का निर्देश दिया। इस आदेश में कनेक्टिविटी पर रोक लगाने के कारणों के तौर पर “सार्वजनिक आपातकाल”, “सार्वजनिक सुरक्षा” और “किसी भी अपराध को करने के लिए उकसावे” को रोकने की जरूरत का हवाला दिया गया। यह रोक शुरू में शाम 4 बजे तक लागू रहनी थी, लेकिन बाद में इसे आधी रात तक बढ़ा दिया गया।

हालांकि, यह रुकावट सिर्फ विरोध प्रदर्शन वाली जगह तक ही सीमित नहीं थी। जंतर-मंतर से लगभग दो किलोमीटर दूर मंडी हाउस जैसे इलाकों में भी कनेक्टिविटी की समस्याएं देखी गईं, जबकि वे प्रदर्शन का केंद्र नहीं थे। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के अनुसार, इंटरनेट बंद होने से उस इलाके में मौजूद ऑफिस जाने वाले लोगों, स्थानीय निवासियों, कारोबारियों और यात्रियों पर असर पड़ा।

इसके नतीजे तुरंत सामने आए। कई छोटे कारोबारियों के लिए यूपीआई के जरिए डिजिटल पेमेंट काम करना बंद हो गया, जिससे दुकानदारों और सड़क किनारे सामान बेचने वालों को नकद लेन-देन पर निर्भर होना पड़ा। ऐप-आधारित परिवहन सेवाएं, ऑनलाइन संचार प्लेटफॉर्म और नेविगेशन सेवाएं भी प्रभावित हुईं। सड़क किनारे चाय बेचने वाले एक व्यक्ति ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि उसके कारोबार को नुकसान हुआ क्योंकि ग्राहक डिजिटल भुगतान नहीं कर पा रहे थे।



यह हालिया शटडाउन 20 जुलाई को लगाई गई ऐसी ही पाबंदियों के कुछ दिनों बाद हुआ, जब संसद के मानसून सत्र की शुरुआत के दौरान जंतर-मंतर के पास छात्रों के नेतृत्व में “चलो संसद” मार्च आयोजित किया गया था। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) द्वारा बुलाए गए इस मार्च का मकसद नीट में कथित गड़बड़ियों, परीक्षा की जवाबदेही और छात्रों की परेशानियों को उजागर करना था। गौरतलब है कि 20 जुलाई को इंटरनेट बंद करने का नोटिफिकेशन उसी दिन सार्वजनिक नहीं किया गया था।

अधिकारियों ने मार्च की अनुमति देने से इनकार कर दिया, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत पाबंदियां लागू कीं और मध्य दिल्ली में भारी सुरक्षा बल तैनात किया। संसद की ओर जाने वाले रास्ते सील कर दिए गए, जबकि पटेल चौक, राजीव चौक और जनपथ सहित मेट्रो स्टेशन कुछ समय के लिए बंद कर दिए गए।

दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती

अब दिल्ली हाई कोर्ट में शटडाउन (इंटरनेट बंद करने) की कानूनी वैधता को चुनौती दी गई है। ‘सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर, इंडिया’ (एसएफएलसी.इन) द्वारा दायर एक जनहित याचिका में गृह मंत्रालय द्वारा 17, 20, 22 और 23 जुलाई को जंतर-मंतर के आसपास मोबाइल इंटरनेट बंद करने के आदेशों पर सवाल उठाए गए हैं।

‘लाइव लॉ’ की रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में तर्क दिया गया है कि ये आदेश असंवैधानिक और जरूरत से ज्यादा सख्त हैं। साथ ही, ये ‘टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट, 2023’ और ‘टेलीकम्युनिकेशंस (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024’ के तहत बताए गए सुरक्षा उपायों को पूरा नहीं करते।

याचिका में कहा गया है कि अधिकारियों ने इंटरनेट बंद करने को सही ठहराने वाले किसी भी ठोस खतरे का सबूत दिए बिना “सार्वजनिक आपातकाल” और “जन सुरक्षा” जैसे अस्पष्ट आधारों का सहारा लिया। इसमें तर्क दिया गया है कि सरकार यह साबित करने में विफल रही कि मोबाइल इंटरनेट को पूरी तरह बंद करना क्यों जरूरी था, या क्या कम पाबंदी वाले विकल्पों पर विचार किया गया था।

‘अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020)’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि इंटरनेट एक्सेस पर पाबंदियों को वैधता, जरूरत और आनुपातिकता (proportionality) के सिद्धांतों को पूरा करना चाहिए। फैसले में कहा गया था कि अनिश्चित काल के लिए इंटरनेट बंद करना मंजूर नहीं है और किसी भी पाबंदी की न्यायिक जांच तथा समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए।

याचिका में निलंबन आदेशों को सार्वजनिक न करने को भी चुनौती दी गई है। इसमें तर्क दिया गया है कि अगर ऐसे आदेशों का आधार ही पता न हो, तो प्रभावित नागरिक पाबंदियों को प्रभावी ढंग से चुनौती नहीं दे सकते। याचिका में अधिकारियों को आदेश देने की मांग की गई है कि वे शटडाउन आदेशों को लागू करने से पहले या लागू करते समय सार्वजनिक करें। साथ ही, इसमें फाइल नोटिंग, खुफिया जानकारी और समीक्षा समिति की कार्यवाही सहित आधिकारिक रिकॉर्ड पेश करने की मांग की गई है।

‘टेलीकम्युनिकेशंस (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024’ के तहत इंटरनेट निलंबन आदेश आम तौर पर केवल केंद्रीय गृह सचिव या राज्य गृह सचिव द्वारा ही जारी किए जा सकते हैं। कुछ विशेष मामलों में, अपरिहार्य परिस्थितियों में संयुक्त सचिव स्तर के अधिकारी को ऐसा करने की अनुमति है। ऐसे आदेश समीक्षा प्रक्रियाओं के दायरे में भी आते हैं।

दिल्ली में इंटरनेट बंद करने की घटनाओं ने एक बार फिर सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और संवैधानिक आजादी की रक्षा करने के बीच के मुश्किल संतुलन पर ध्यान खींचा है। जहां अधिकारी यह तर्क देते हैं कि इंटरनेट पर अस्थायी रोक से गलत जानकारी फैलने, हिंसा भड़कने और सुरक्षा संबंधी खतरों को रोका जा सकता है, वहीं आलोचकों का मानना है कि बड़े पैमाने पर इंटरनेट बंद करना शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने वाले लोगों के प्रति जरूरत से ज्यादा सख्त प्रतिक्रिया हो सकती है।

यह मुद्दा अब सिर्फ किसी एक विरोध-प्रदर्शन वाली जगह तक सीमित नहीं है। यह डिजिटल लोकतंत्र के लिए एक बुनियादी सवाल खड़ा करता है कि जब नागरिक शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने और अपनी बात कहने के अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं, तो क्या सरकार संचार, संगठन और जानकारी पाने के उस बुनियादी माध्यम को ही बंद करके प्रतिक्रिया दे सकती है?

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