दिल्ली हिंसा के बीच से निकलीं सांप्रदायिक सौहार्द की कहानियां

Written by Sabrangindia Staff | Published on: February 27, 2020
राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में हिंसा और असहिष्णुता की घटनाओं के बीच सांप्रदायिक सद्भाव की कुछ ऐसी भी कहानियां सामने आ रही हैं जो इलाके में फिर से शांति बहाली की उम्मीद जगाती हैं। हिंसा के केंद्र में अच्छे लोग अपने चिंतित और भयभीत साथी नागरिकों को सभी धर्मों के लिए अत्यंत सम्मान दिखाने के लिए सामने आए हैं। लोग अल्पसंख्यक विरोधी तत्वों के खिलाफ खड़े होने के लिए आगे आए हैं।



हिंदुत्ववादी तत्वों ने दिल्ली के अशोक नगर में एक मस्जिद की मीनार के ऊपर भगवान हनुमान को समर्पित ध्वज फहराया था। कुरान को भी जला दिया था लेकिन वहीं दूसरी ओर हिंदुओं और मुसलमानों के एक संयुक्त समूह को मस्जिद के बाहर कुरान के जले हुए पन्नों को इकट्ठा करते हुए देखा गया।

हिंदुओं के एक ग्रुप ने भी मुस्लिम महिलाओं और अन्य बुजुर्गों को हिंसा केंद्रित इलाके से सुरक्षित रूप से दूर जाने में मदद की। एक वृद्ध मुस्लिम व्यक्ति जो अपने दो पोतों के साथ गोंडा में एक शादी के लिए जा रहा था, हिंसा के कारण उन्होंने अपनी यात्रा रद्द कर दी थी। हिंदू युवाओं के समूह द्वारा उन्हें इस क्षेत्र से सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया था। युवाओं का कहना था कि वे हिंदू मुसलमान में विश्वास नहीं करते और वे सभी पहले भारतीय और इंसान हैं इसलिए एक दूसरे को नुकसान से बचाने के लिए आगे आए हैं।

दोनों समुदायों के लोगों ने एक एकता मार्च भी निकाला, जिसमें कहा गया कि वे अपने क्षेत्र के माहौल को नफरत से प्रभावित नहीं होने देंगे।

दिल्ली के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा के बीच विभिन्न समुदायों के लोगों ने एकजुटता दिखाने के लिए ‘बिरयानी तुम खिलाओ, हलवा हम खिलाएंगे’ कार्यक्रम में शामिल हुए। लोगों ने हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, सभी हैं आपस में भाई-भाई के नारे भी लगाए।

हिंसा के बाद जिन लोगों ने कथित तौर पर अपनी जाने बचाने के डर से घरों को छोड़ना शुरु कर दिया था सिख समुदाय ने उन मुस्लिम परिवारों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। मजनू टीला गुरुद्वारा ने उन मुसलमानों को शरण दी है जो अब इस इलाके को छोड़ने पर मजबूर हो गए थे। अन्य गुरुद्वारे भी उन हिंसाग्रस्त इलाकों में उन लोगों को आश्रय देने के लिए आगे जिन्हें शरण, आश्रय और भोजन की आवश्यकता थी।

सीलमपुर में दलित समुदाय के लोगों ने सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल पेश की। वहां दलित समुदाय ने मुस्लिम इलाकों में जाने वाले मार्गों को अवरुद्ध किया और क्षेत्र में दंगाइयों के प्रवेश को रोकने के लिए पहरा दिया। वहीं यमुना विहार में जब दिल्ली पुलिस हिंसा के दौरान लोगों के बचाव के लिए आगे नहीं आई तो स्थानीय नागरिकों ने स्कूली लड़कियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए एक मानव श्रृंखला बनाई।

सामाजिक कार्यकर्ता भी आगे आए हैं। वे स्वयं सहायता समूह बना रहे हैं और उन सभी के लिए हेल्पलाइन शुरू कर रहे हैं जिन्हें राशन की जरूरत है और जो अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित हैं।

सबसे ज्यादा दिल को छूने वाली कहानी प्रेमकांत बघेल की है, दंगाइयों ने उनके घर को आग लगाई फिर भी वह अपने मुस्लिम भाइयों और बहनों को बचाने के लिए आग में कूद गए। प्रेमकांत ने एक ही परिवार के छह लोगों को बचा लिया। लेकिन उनके दोस्त की मां अभी घर में ही थी उन्हें बचाने की कोशिश में प्रेमकांत को चोटें आईं। शिव विहार इलाका हिंसा के घेरे में था इसलिए प्रेमकांत एंबुलेंस की मदद नहीं ले पाए और घर पर ही रहे। उनके परिवार के सदस्यों को उम्मीद नहीं थी कि वह रात में बच पाएंगे। फिर भी अगली सुबह उन्हें जीटीबी अस्पताल ले जाया गया जहां उनकी हालत गंभीर बनी हुई है।

चांदबाग में मुसलमानों और हिंदुओं ने एक साथ आकर उपद्रवियों को समुदाय के सदस्यों को नुकसान पहुंचाने से रोका। मुसलमानों का कहना है कि उन्होंने एक शांति समिति बनाई है और वे भारत नहीं छोड़ेंगे क्योंकि वे देश के नागरिक हैं। वे कहते हैं कि यह न केवल चांदबाग बल्कि चंद्रपुरी भी है जहां भगवान और अल्लाह एक साथ रहते हैं।

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