जाति/धर्म का बंधन तोड़ने के लिए प्रो. गणेश देवी ने शुरू किया अभियान, युवाओं से की ये अपील

Written by sabrang india | Published on: October 3, 2019
महाराष्ट्र के बहुचर्चित सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर गणेश देवी ने जाति धर्म का बंधन तोड़ने के लिए एक प्रयास शुरू किया है। उन्होंने जाति/धर्म के बंधन तोड़ने के लिए एक अभियान शुरू किया है। अपने इस अभियान को लेकर गणेश देवी गांधी जयंती के अवसर से उन्होंने 10 अक्टूबर तक खाना छोड़ने का ऐलान किया है। साथ ही खाना खाने के लिए एक शर्त रखी है जिसे सिर्फ युवा ही पूरा कर सकते हैं। 



प्रो. गणेश देवी ने कहा कि "आप नया आधुनिक समाज बनाना चाहते हो तो जाति और धर्म से परे रहकर शादी करने की सोच बनाओ। जो जाति-धर्म के पिंजड़े से बाहर निकलकर खुद की जिंदगी के बारे में सोचने के लिए तैयार हैं, वे मुझे अपना नाम, मोबाइल नंबर, ईमेल भेजें। मैं खुद आकर उनसे मिलूंगा, गले लगाऊंगा, उनके साथ बैठकर बातें करूँगा।"

उन्होंने युवाओं से कहा कि, "2 अक्टूबर से 10 अक्टूबर के दरम्यान प्रतिदिन मुझे कम से कम 100 युवाओं की स्वीकृति मिलेगी तभी मैं खाना खाउंगा। अगर 100 से कम युवाओं की स्वीकृति मिली तो केवल पानी पीकर ही दिन गुजारुंगा। मैं मानता हूँ कि इंसान को इंसान के रूप मे पहचानना सच्चा धर्म है। उसे  धर्म-जाति- भाषा-रंग के आधार से नीचा या ऊँचा देखना इन्सानियत पर धब्बा है। वो धब्बा हम जितनी जल्दी दूर करें उतने जल्दी ही हम समाज को एक साफ-सुथरा, समानता वाला बनाने में कामयाब बनेंगे। मैं मानता हुं कि दिमागी स्वच्छता से बहुत कुछ सुधर सकता है।" 



गणेश देवी के समर्थन में बहुत सारे युवा उतर आए हैं। अनेकों युवा उनके फास्ट का समर्थन करने के लिए जुटे और खुले आसमान तले गांधी के बारे में चर्चा की। 



                                                      गणेश देवी के फास्ट का समर्थन करने पहुंचे लोग, गांधी के बारे में चर्चा करते युवा

अपने बारे में बताते हुए गणेश देवी ने कहा कि आज से लगभग पचास साल पहले, मैंने और सुरेखा ने एक-दूसरे से प्यार कबूल किया। शादी की। हम एक-दूसरे की जाति या धर्म क्या है, इसके बारे में जानते नहीं थे। न उसके बारे में सोचना हम जायज़ समझते थे। जरुरी नहीं था। हम खुद को इंसान, केवल इंसान, समझते थे। सुरेखा के सभी भाई -बहनों ने और मेरे भाई ने इसी तरह शादियां कीं। हमारे सबके बच्चे भी बिलकुल इसी तरह जाति-धर्म के पिंजड़े से मुक्त रहकर अपनी जिंदगी गुज़र रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हम सब इस देश से बेहद प्यार करते हैं। मेरे भाई इंडियन एयरफोर्स के अफ़सर रहे, दो-दो युद्दों में जान की बाजी लगाकर देश की रक्षा करते रहे। 

हम सब मानते हैं कि अगर आधुनिक समाज की रचना करना हो तो हम सबको अपने-अपने जाति और धर्म के पिंजड़े से बाहर आना चाहिए, हर इन्सान को केवल इंसान के रूप में पहचानना चाहिए।

आज मैं देख रहा हूं कि पिंजड़े मजबूत बनते जा रहे हैं। जाति और धर्म की झूठी सीमाएं हमारी जिंदगी घेर रही हैं। घृणा से पैदा होने वाली उद्दमता हमारे ऊपर हावी हो रही है। मैं मानता हूं कि आज के हालात में भी शायद हम ऐसे नहीं हैं, शायद हम बहुत ही अलग हैं। शायद आज भी अनुकम्पा, प्यार और प्रार्थना के काबिल रहे हैं। मैं समझता हुं कि मेरा ये मानना शायद आज भी सही है। मेरा मानना सही या गलत, इसे जानने के लिए ही मैंने महाराष्ट्र के युवाओं को दो दिन पहले यह अपील भेजी है।   

गणेश देवी कहते हैं कि अपील के साथ मैंने एक ईमेल एड्रेस और एक गूगल फॉर्म का लिंक दिया है। जैसे ही यह अपील जारी की, मेल और फॉर्म्स आने लगे। उन्होंने कहा कि आज सुबह से मेरे पास 500 से ज्यादा युवक-युवतियों ने मैसेज भेजे हैं। बहुत सारे दोस्तों ने कहा की यह अपील महाराष्ट्र के बाहर भी पहुंचाई जाए इसलिए आप तक पहुंचा रहा हुं।

गणेश देवी स्पष्ट करते हैं कि मेरा यह प्रयास न तो कोई राजकीय स्टंट है और न ही कोई मीडिया इवेंट। मैंने अपनी निजी जिन्दगी में जो किया, जिसपर विश्वास रखा, बस वही सोच आपके पास लिए आया हूं। जीवन भर जिस सोच के प्रति मैंने निष्ठा रखी वह सोच आज के युवाओं तक पहुंचाने के लिए, और 'प्रेम ही सच्चा धर्म हैं' इस मानवतावादी मन्त्र का पुनश्च जागरण करने हेतु, मैं युवा पीढ़ी को प्यार भरा एवं अगत्यशील आह्वान करता हूँ कि हर कोई निर्धारित करे कि "मैं जाति-भेद और धर्म-भेद को बिल्कुल भी ध्यान में लिए बगैर फैसला करुंगा। जाति और धर्म के परे जाकर सोचने वाला समाज निर्माण करने का सपना हम सब मिलके देखें।

उन्होंने अपील की है कि जो युवा मेरी बात से सहमत हैं तो बस इतना करें कि निम्नांकित जानकारी भरकर मेरे पास भेजें।  

ईमेल एड्रेस है [email protected] --- इस पते पर मेल से इस कृति के लिए समर्थन भेज सकते हैं।

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