इश्के-बुतां में जिंदगी गुजर गई ‘मोमिन’
आखिरी वक्त क्या खाक मुसलमां होंगे?

कांग्रेस के असंतुष्ट नेता कह रहे हैं कि कमजोर होती कांग्रेस उनसे देखी नहीं जाती है लेकिन उनके खुद के सिर पर भगवा पगड़ी क्या महज संयोग है? या फिर इसके जरिये कांग्रेस नेतृत्व को कोई संदेश दिया जा रहा है। सियासत में बिना कहे ही बात कहने को, कई मर्तबा सियासतदां प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। दिल्ली से दूर जम्मू में जब कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं के समूह 'G-23' ने आंतरिक लोकतंत्र को लेकर पार्टी नेतृत्व की खुली आलोचना की तो शब्दों से कहीं ज्यादा मायनेखेज उनके प्रतीक थे। गांधी ग्लोबल का मंच और सभी के सिर बंधी भगवा पगड़ी। यह महज संयोग है या बगावत का कोई संदेश?, सवाल उठने लाजिमी है।
सबसे अहम यह कि असन्तुष्ट नेताओ में सभी वरिष्ठ नेता जरूर हैं लेकिन ज्यादातर का अपना कोई जनाधार नहीं है। मसलन, कांग्रेस में हर पद पर चुनाव की मांग वाली चिट्ठी लिखने वाले गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, विवेक तन्खा, मनीष तिवारी आदि ज्यादातर नेता अनुकंपा वाले ही हैं। लेकिन इसमें चौंकाने वाला नाम हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का है। हुड्डा, कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं और बाप-बेटे के चुनाव हारने के बाद, राज्य की इकलौती राज्यसभा की सीट उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा को मिल गई है। कांग्रेस आलाकमान की करीबी और दिवंगत अहमद पटेल के बेहद नजदीक रहीं प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा की सीट खाली हुई थी और कायदे से उनको दूसरी बार यह सीट मिलनी थी पर हुड्डा ने दबाव बनाकर, यह सीट अपने बेटे के लिए ले ली। इसी से उनका असंतुष्ट खेमे में खड़ा होना हर किसी को चौंका रहा है।
जानकारों की मानें तो कहा जा रहा है कि हुड्डा इस फिराक में हैं कि कांग्रेस आलाकमान पर ऐसा दबाव बनाया जाए कि अगले चुनाव में वे और उनके बेटे ही कांग्रेस की कमान संभाले रहें। तभी कहा जा रहा है कि वे अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान उनके बेटे को अध्यक्ष बना सकता है पर उसके लिए खुद हुड्डा को विधायक दल के नेता का पद छोड़ना होगा। कांग्रेस पार्टी दोनों पद जाट को नहीं दे सकती है और पिता-पुत्र को तो बिल्कुल नहीं।
सभी जानते हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने भजनलाल को किनारे करके, हुड्डा को मौका दिया था। दस साल हुड्डा सीएम रहे लेकिन अब हुड्डा नहीं चाहते हैं कि पार्टी प्रदेश में किसी और को मौका दे। दूसरी ओर राहुल गांधी अपने करीबी रणदीप सुरजेवाला को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि सुरजेवाला भी विधानसभा के दो चुनाव लगातार हार चुके हैं। वे पहले जींद सीट पर उपचुनाव हारे और उसके बाद अपनी कैथल सीट पर भी चुनाव हार गए। लेकिन कांग्रेस के मीडिया प्रभारी के तौर पर उनका काम अच्छा रहा है और राहुल गांधी उनको पसंद करते हैं। परदे के पीछे की राजनीति में वे माहिर हैं। तभी अपना महत्व बनवाए हुए हैं। राहुल ने उनको बिहार का चुनाव लड़ाने भेजा था और अब तमिलनाडु में डीएमके से गठबंधन की बात करने के काम में भी उनको शामिल किया गया है। राहुल गांधी ने उनको महासचिव बना कर कर्नाटक जैसे अहम राज्य का प्रभारी भी बनाया है।
निसंदेह 5 राज्यों में चुनाव की घोषणा और बागी नेताओं के नए तेवर कांग्रेस पार्टी के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, पुदुचेरी, तमिलनाडु और केरल के पांच राज्यों में से अगर किसी एक राज्य में भी कांग्रेस जीत जाए तो उसे मां-बेटा नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। केरल और पुदुचेरी में कांग्रेस अपने विरोधियों को तगड़ी टक्कर दे सकती है, इसमें शक नहीं है।
यदि पांच राज्यों में कांग्रेस पिटती है तो मां बेटा नेतृत्व के खिलाफ कांग्रेस में जबरदस्त लहर उठ खड़ी होगी। उसके संकेत अभी से मिलने लग गए हैं। जिन 23 वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस की दुर्दशा पर पुनर्विचार करने की गुहार पहले लगाई थी, वे जम्मू के बाद कुरूक्षेत्र में भी बड़े आयोजन करने वाले हैं। जम्मू का आयोजन गुलाम नबी आजाद के सम्मान में किया जा रहा है, क्योंकि मां-बेटा नेतृत्व ने उन्हें राज्यसभा के पार्टी-नेतृत्व से विदा कर दिया है। गुलाम नबी की तारीफ में भाजपा ने प्रशंसा के पुल बांध रखे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि उसके बावजूद वे भाजपा में जानेवाले नहीं हैं।
बहरहाल, क्या कांग्रेस के ‘चिंतित नेताओं’ को साथ जोड़कर अब वे नई कांग्रेस गढ़ने में लगे हैं? उनके साथ जो वरिष्ठ नेता जुड़े हैं, उनमें कई योग्य अत्यंत गुणी व अनुभवी हैं लेकिन उनमें साहस कितना है, यह समय ही बताएगा। क्या वे बगावत का झंडा उठा पाएंगे, देखना होगा? लेकिन इन सभी की दुविधा यही है कि..
इश्के-बुतां में जिंदगी गुजर गई ‘मोमिन’
आखिरी वक्त क्या खाक मुसलमां होंगे?
आखिरी वक्त क्या खाक मुसलमां होंगे?

कांग्रेस के असंतुष्ट नेता कह रहे हैं कि कमजोर होती कांग्रेस उनसे देखी नहीं जाती है लेकिन उनके खुद के सिर पर भगवा पगड़ी क्या महज संयोग है? या फिर इसके जरिये कांग्रेस नेतृत्व को कोई संदेश दिया जा रहा है। सियासत में बिना कहे ही बात कहने को, कई मर्तबा सियासतदां प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। दिल्ली से दूर जम्मू में जब कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं के समूह 'G-23' ने आंतरिक लोकतंत्र को लेकर पार्टी नेतृत्व की खुली आलोचना की तो शब्दों से कहीं ज्यादा मायनेखेज उनके प्रतीक थे। गांधी ग्लोबल का मंच और सभी के सिर बंधी भगवा पगड़ी। यह महज संयोग है या बगावत का कोई संदेश?, सवाल उठने लाजिमी है।
सबसे अहम यह कि असन्तुष्ट नेताओ में सभी वरिष्ठ नेता जरूर हैं लेकिन ज्यादातर का अपना कोई जनाधार नहीं है। मसलन, कांग्रेस में हर पद पर चुनाव की मांग वाली चिट्ठी लिखने वाले गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, विवेक तन्खा, मनीष तिवारी आदि ज्यादातर नेता अनुकंपा वाले ही हैं। लेकिन इसमें चौंकाने वाला नाम हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का है। हुड्डा, कांग्रेस विधायक दल के नेता हैं और बाप-बेटे के चुनाव हारने के बाद, राज्य की इकलौती राज्यसभा की सीट उनके बेटे दीपेंद्र हुड्डा को मिल गई है। कांग्रेस आलाकमान की करीबी और दिवंगत अहमद पटेल के बेहद नजदीक रहीं प्रदेश अध्यक्ष कुमारी शैलजा की सीट खाली हुई थी और कायदे से उनको दूसरी बार यह सीट मिलनी थी पर हुड्डा ने दबाव बनाकर, यह सीट अपने बेटे के लिए ले ली। इसी से उनका असंतुष्ट खेमे में खड़ा होना हर किसी को चौंका रहा है।
जानकारों की मानें तो कहा जा रहा है कि हुड्डा इस फिराक में हैं कि कांग्रेस आलाकमान पर ऐसा दबाव बनाया जाए कि अगले चुनाव में वे और उनके बेटे ही कांग्रेस की कमान संभाले रहें। तभी कहा जा रहा है कि वे अपने बेटे दीपेंद्र हुड्डा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग कर रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान उनके बेटे को अध्यक्ष बना सकता है पर उसके लिए खुद हुड्डा को विधायक दल के नेता का पद छोड़ना होगा। कांग्रेस पार्टी दोनों पद जाट को नहीं दे सकती है और पिता-पुत्र को तो बिल्कुल नहीं।
सभी जानते हैं कि कांग्रेस आलाकमान ने भजनलाल को किनारे करके, हुड्डा को मौका दिया था। दस साल हुड्डा सीएम रहे लेकिन अब हुड्डा नहीं चाहते हैं कि पार्टी प्रदेश में किसी और को मौका दे। दूसरी ओर राहुल गांधी अपने करीबी रणदीप सुरजेवाला को आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि सुरजेवाला भी विधानसभा के दो चुनाव लगातार हार चुके हैं। वे पहले जींद सीट पर उपचुनाव हारे और उसके बाद अपनी कैथल सीट पर भी चुनाव हार गए। लेकिन कांग्रेस के मीडिया प्रभारी के तौर पर उनका काम अच्छा रहा है और राहुल गांधी उनको पसंद करते हैं। परदे के पीछे की राजनीति में वे माहिर हैं। तभी अपना महत्व बनवाए हुए हैं। राहुल ने उनको बिहार का चुनाव लड़ाने भेजा था और अब तमिलनाडु में डीएमके से गठबंधन की बात करने के काम में भी उनको शामिल किया गया है। राहुल गांधी ने उनको महासचिव बना कर कर्नाटक जैसे अहम राज्य का प्रभारी भी बनाया है।
निसंदेह 5 राज्यों में चुनाव की घोषणा और बागी नेताओं के नए तेवर कांग्रेस पार्टी के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, पुदुचेरी, तमिलनाडु और केरल के पांच राज्यों में से अगर किसी एक राज्य में भी कांग्रेस जीत जाए तो उसे मां-बेटा नेतृत्व की बड़ी उपलब्धि माना जाएगा। केरल और पुदुचेरी में कांग्रेस अपने विरोधियों को तगड़ी टक्कर दे सकती है, इसमें शक नहीं है।
यदि पांच राज्यों में कांग्रेस पिटती है तो मां बेटा नेतृत्व के खिलाफ कांग्रेस में जबरदस्त लहर उठ खड़ी होगी। उसके संकेत अभी से मिलने लग गए हैं। जिन 23 वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस की दुर्दशा पर पुनर्विचार करने की गुहार पहले लगाई थी, वे जम्मू के बाद कुरूक्षेत्र में भी बड़े आयोजन करने वाले हैं। जम्मू का आयोजन गुलाम नबी आजाद के सम्मान में किया जा रहा है, क्योंकि मां-बेटा नेतृत्व ने उन्हें राज्यसभा के पार्टी-नेतृत्व से विदा कर दिया है। गुलाम नबी की तारीफ में भाजपा ने प्रशंसा के पुल बांध रखे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि उसके बावजूद वे भाजपा में जानेवाले नहीं हैं।
बहरहाल, क्या कांग्रेस के ‘चिंतित नेताओं’ को साथ जोड़कर अब वे नई कांग्रेस गढ़ने में लगे हैं? उनके साथ जो वरिष्ठ नेता जुड़े हैं, उनमें कई योग्य अत्यंत गुणी व अनुभवी हैं लेकिन उनमें साहस कितना है, यह समय ही बताएगा। क्या वे बगावत का झंडा उठा पाएंगे, देखना होगा? लेकिन इन सभी की दुविधा यही है कि..
इश्के-बुतां में जिंदगी गुजर गई ‘मोमिन’
आखिरी वक्त क्या खाक मुसलमां होंगे?