ओडिशा में बॉक्साइट खनन का विरोध कर रहे आदिवासी समुदायों के खिलाफ तेज होती कार्रवाई के बीच, डॉ. रैंडल सिकेरा को एक ऐसे मामले में गिरफ्तार किया गया है, जिसमें मूल FIR में उनका नाम शामिल नहीं था। उन पर गंभीर आपराधिक आरोप लगे हैं।

Image: Article 14
लगभग दस वर्षों तक डॉ. रैंडल सिकेरा का कार्यस्थल कोई सुसज्जित अस्पताल या निजी क्लिनिक नहीं था। बल्कि, यह ओडिशा के कालाहांडी और रायगडा जिलों की जंगली पहाड़ियां, दूर-दराज की बस्तियां और बिखरे हुए आदिवासी गांव थे। 39 वर्षीय यह डॉक्टर अपनी मोटरसाइकिल से कठिन रास्तों को पार करते हुए एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। वे मलेरिया, दस्त, त्वचा संबंधी बीमारियों और अन्य रोगों से पीड़ित लोगों का इलाज करते थे और अक्सर उन्हें मुफ्त परामर्श और दवाइयां भी देते थे। जिन इलाकों में सबसे नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 60 किलोमीटर से भी अधिक दूर हो सकता था, वहां वे स्थानीय लोगों के शब्दों में एक 'चलते-फिरते अस्पताल' (मोबाइल अस्पताल) बन गए थे।
आज, वही डॉक्टर रायगडा उप-जेल में बंद हैं। 16 अक्टूबर, 2026 की रात को, ओडिशा पुलिस ने कालाहांडी के भवानीपटना में उनके किराए के घर से सिकेरा को दलित कार्यकर्ता लक्ष्मण नाइक के साथ गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी 7 अप्रैल को कांतामल गांव में ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प के लगभग छह महीने बाद हुई है। यह झड़प सिजीमाली बॉक्साइट खनन परियोजना से जुड़ी एक प्रस्तावित सड़क परियोजना के विरोध के दौरान हुई थी। शुरुआती एफआईआर (FIR) में नामजद 26 लोगों में न तो सिकेरा का नाम था और न ही नाइक का। बाद में, लगभग 100 अज्ञात लोगों की श्रेणी, जिन्हें 'अन्य' के रूप में दर्ज किया गया था, उसमें से उनके नाम जोड़े गए।
'द हिंदू' के अनुसार, सिकेरा को अप्रैल की हिंसा के मामले में गिरफ्तार किया गया, जबकि वे इसी घटना से जुड़ी एक अन्य एफआईआर में ओडिशा उच्च न्यायालय से पहले ही अग्रिम जमानत ले चुके थे। इसके बाद, उन पर भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया, जिनमें हत्या के प्रयास और दंगा करने से जुड़ी धाराएं शामिल हैं।
उनकी गिरफ्तारी के हालात विशेष रूप से चिंताजनक हैं। रायगडा जेल से 'द हिंदू' से बात करते हुए, सिकेरा ने बताया कि उन्हें और नाइक को पूरी रात पुलिस थाने के फर्श पर सोना पड़ा। बाद में उन्हें दूसरे पुलिस थाने ले जाया गया और शुरुआत में उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें किस आधार पर गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें अपने परिवार से बात करने की अनुमति नहीं दी गई। यह पहली बार नहीं है जब सिकेरा को खनन-विरोधी आंदोलन से जुड़े होने के कारण प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। जून 2025 में, रायगढ़ जिला प्रशासन ने एकतरफा आदेश जारी कर उन्हें और 24 अन्य लोगों के जिले में प्रवेश पर दो महीने के लिए रोक लगा दी थी। प्रशासन ने उन पर प्रस्तावित सिजीमाली खनन परियोजना के खिलाफ आदिवासी समुदायों को एकजुट करने का प्रयास करने का आरोप लगाया और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर चिंता जताई।
बाद में, ओडिशा उच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंधात्मक आदेश को रद्द कर दिया। अपने फैसले में, अदालत को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि प्रस्तावित शांतिपूर्ण सभा से हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था का कोई तत्काल और गंभीर खतरा था। न्यायमूर्ति एस.के. पाणिग्रही ने कहा कि संवैधानिक कानून के अनुसार, मौलिक अधिकारों को सीमित करने से पहले वास्तविक जोखिम का एक उच्च स्तर होना आवश्यक है। हालांकि, उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद, प्रशासन की ओर से सिकेरा के खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला खत्म नहीं हुआ।

एक डॉक्टर जिसने शहरी चिकित्सा के बजाय पहाड़ी इलाकों को चुना
मूल रूप से कर्नाटक के मंगलुरु के रहने वाले और मुंबई में पले-बढ़े सिकेरा ने बेंगलुरु के सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने जयपुर के सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज व अस्पताल से इंटरनल मेडिसिन में पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई की। जुलाई 2017 में वे कालाहांडी पहुंचे और 'स्वास्थ्य स्वराज' के साथ काम करना शुरू किया। यह एक गैर-लाभकारी संगठन है जो आदिवासी बहुल थुआमूल रामपुर ब्लॉक में सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है।
वे किसी शहरी अस्पताल में एक पारंपरिक मेडिकल करियर चुन सकते थे, लेकिन इसके बजाय वे इसी क्षेत्र में रुक गए। उन्होंने 'लिविंग फार्म्स' और 'डेवलपमेंट एजेंसी फॉर पुअर एंड ट्राइबल अवेकनिंग' (DAPTA) जैसे संगठनों के साथ अपना काम जारी रखा। ये संगठन स्वास्थ्य सेवा, पोषण, शिक्षा और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों के लिए काम करते हैं।

'आर्टिकल 14' की रिपोर्ट के अनुसार, सिकेरा उन बस्तियों में गए जहां लोगों की चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बहुत कम थी। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों का इलाज किया। उनका काम केवल मरीजों का इलाज करने तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने निवारक स्वास्थ्य सेवा (प्रिवेंटिव हेल्थकेयर), सामुदायिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण और पर्यावरण के नुकसान तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच के संबंध को समझने पर ध्यान केंद्रित किया।
खनन से प्रभावित क्षेत्रों में अपने अनुभवों के कारण, उन्होंने औद्योगिक खनन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि सक्रिय बॉक्साइट खदानों के पास रहने वाले समुदायों में, गैर-खनन क्षेत्रों की तुलना में त्वचा संबंधी बीमारियां अधिक देखने को मिलीं। मार्च 2022 से, वे ओडिशा के जाजपुर जिले के सुकिंदा भी गए हैं, जहां बड़े पैमाने पर क्रोमाइट खनन के कारण प्रभावित हुए इलाके में वे तपेदिक (टीबी) से पीड़ित मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
उनके एक करीबी दोस्त ने 'आर्टिकल 14' को बताया कि सिकेरा यह समझते थे कि जब तक खराब स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार संरचनात्मक स्थितियों को ठीक नहीं किया जाता, तब तक केवल मरीजों का इलाज करना नाकाफी है। उनकी समझ के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा को साफ पानी, जंगलों, पोषण और एक स्वस्थ पर्यावरण तक पहुंच से अलग नहीं किया जा सकता।
इसी समझ के चलते वे उन आदिवासी समुदायों के साथ जुड़ गए, जो अपनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को खतरे में डालने वाली खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे थे। 2023 से, वे 'मां माटी माली सुरक्षा मंच' और 'नियमगिरि सुरक्षा समिति' जैसे जमीनी संगठनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने इस इलाके में प्रस्तावित खनन परियोजनाओं का विरोध किया है। यही जुड़ाव अब उन पर लगे आरोपों का मुख्य आधार बन गया है।
जब एकजुटता को कथित आपराधिक अपराध मान लिया जाए
ओडिशा पुलिस ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है कि सिकेरा की गिरफ्तारी का मकसद खनन-विरोधी संघर्ष को दबाना है। 'प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया' (PTI) से बात करते हुए, पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) अखिलेशवर सिंह ने आरोप लगाया कि सिकेरा केवल चिकित्सा सेवाएं ही नहीं दे रहे थे, बल्कि आदिवासी समुदायों को राज्य सरकार के खिलाफ भड़का भी रहे थे।
पुलिस ने उनके खिलाफ कई आपराधिक मामलों का भी हवाला दिया है। हालांकि, मुख्य सवाल यह है कि इन गंभीर आरोपों के समर्थन में क्या सबूत हैं? और उन्हें एक ऐसी FIR में क्यों फंसाया गया, जिसमें शुरू में उनका नाम नहीं था? खासकर तब, जब उसी घटना से जुड़े एक अन्य मामले में उन्हें पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी थी?
'द क्विंट' ने अपनी रिपोर्ट में कार्यकर्ताओं की उस चिंता को उजागर किया है, जिसमें उन्होंने FIR में पुलिस द्वारा 'अन्य' (others) श्रेणी के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। 'कैंपेन अगेंस्ट फैब्रिकेटेड केसेस' (Campaign Against Fabricated Cases) के संयोजक नरेंद्र मोहंती का आरोप है कि इस तरह की खुली श्रेणी पुलिस को उन कार्यकर्ताओं को बाद में फंसाने की छूट देती है, जिनका नाम शिकायत दर्ज कराते समय नहीं था। उनके अनुसार, यह तरीका आंदोलन के नेताओं को हिरासत में रखने के लिए बहुत कारगर साबित हो रहा है; जैसे ही उन्हें किसी मामले में जमानत मिलती है, उन पर एक और नया मामला दर्ज कर दिया जाता है।
आंकड़े चिंताजनक हैं। 'पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स' (PUDR) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में कालाहांडी और रायगडा में बॉक्साइट खनन के विरोध से जुड़े 43 मामले दर्ज किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 100 से अधिक आदिवासियों और दलितों को जेल जाना पड़ा। 8 मार्च से 8 अप्रैल 2026 के बीच, कुल 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया, 217 लोगों को आरोपी बनाया गया और 1,140 अन्य लोगों को 'अन्य' की श्रेणी में रखा गया। इसलिए, सिकेरा की गिरफ्तारी खनन परियोजनाओं का विरोध करने वालों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है।
जमीन, जंगलों और विरोध करने के अधिकार की लड़ाई
इस इलाके में विरोध कोई नई बात नहीं है। दशकों से, आदिवासी समुदायों ने अपने जंगलों और पहाड़ियों को खनन स्थलों में बदलने की कोशिशों का विरोध किया है। 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) में शामिल डोंगरिया कोंध समुदाय, नियमगिरि पहाड़ियों को पवित्र मानता है और 'नियम राजा' की पूजा करता है, जिनके बारे में उनका मानना है कि वे इन्हीं पहाड़ियों में रहते हैं। 2013 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने नियमगिरि में बॉक्साइट खनन के लिए वन भूमि के इस्तेमाल के प्रस्ताव पर फैसला लेने का अधिकार ग्राम सभाओं को सौंप दिया था। इसके बाद, सभी 12 ग्राम सभाओं ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, और 2014 में ओडिशा सरकार ने इस परियोजना को रद्द कर दिया।
सिजीमाली में बॉक्साइट निकालने की नई कोशिशों ने इस इलाके को एक बार फिर खनन हितों के साथ टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया है। वेदांता को सिजीमाली भंडार के लिए पर्यावरण मंजूरी मिल गई है, जबकि पास के कुत्रुमाली भंडार को अडानी समूह को आवंटित किया गया है।
जिन समुदायों की आजीविका, जल स्रोत, जंगल और सांस्कृतिक पहचान इन पहाड़ियों से गहराई से जुड़ी हुई है, उनके लिए खनन केवल एक औद्योगिक विकास परियोजना नहीं है। यह उनके अस्तित्व, स्वायत्तता और अपनी जमीन व संसाधनों पर उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का सवाल है।
सिकेरा की गिरफ्तारी की चिकित्सा जगत और नागरिक समाज के कुछ वर्गों ने भी निंदा की है। 'लिवरडॉक' (LiverDoc) के नाम से मशहूर डॉ. सिरियाक एबी फिलिप्स ने चिकित्सा समुदाय से अपील की है कि वे सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज में उनके जूनियर रहे सिकेरा के समर्थन में आगे आएं। कुत्रुमाली में सिकेरा के काम को याद करते हुए, फिलिप्स ने बताया कि कैसे एक डॉक्टर के रूप में उन्होंने दूर-दराज के इलाकों में जाकर कुपोषित बच्चों और ऐसी महिलाओं का इलाज किया, जिनकी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बहुत सीमित थी। उन्होंने कहा कि सिकेरा यह समझते थे कि जंगलों के विनाश, जल स्रोतों के नुकसान और आदिवासी समुदायों की गरिमा छीने जाने की भरपाई किसी भी 'प्रिस्क्रिप्शन' (दवा की पर्ची) से नहीं की जा सकती।

'जन स्वास्थ्य अभियान' ने भी इन गिरफ्तारियों की निंदा की है। उनका कहना है कि यह उन लोगों पर हमला है जो खनन (माइनिंग) से होने वाले सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए काम कर रहे हैं। संगठन ने सेक्वेरा और नाइक की तुरंत रिहाई, उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और डराने-धमकाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
इस बीच, मुंबई स्थित 'वॉचडॉग फाउंडेशन' ने 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग' से संपर्क किया है। उन्होंने मांग की है कि सिकेरा की गिरफ्तारी से जुड़ी परिस्थितियों की जांच की जाए और यह देखा जाए कि क्या गिरफ्तारी के दौरान जरूरी कानूनी सुरक्षा नियमों का पालन किया गया था या नहीं। 'फ्री प्रेस जर्नल' की रिपोर्ट के अनुसार, फाउंडेशन ने इस बात पर खास तौर पर ध्यान दिलाया है कि अप्रैल की घटना के कई महीनों बाद सेक्वेरा को गिरफ्तार किया गया, जबकि मूल FIR में उनका नाम कहीं नहीं था।
फाउंडेशन ने स्पष्ट किया है कि मूल FIR में किसी व्यक्ति का नाम न होने का मतलब यह नहीं है कि वह निर्दोष है या बाद में की गई उसकी गिरफ्तारी गैर-कानूनी है। हालांकि, उन्होंने इस बात की जांच की मांग की है कि क्या यह जांच विश्वसनीय सबूतों पर आधारित है और क्या इसमें संवैधानिक व प्रक्रियात्मक सुरक्षा नियमों का पालन किया गया है।
सिकेरा के माता-पिता, एलेक्स और नैन्सी सेक्वेरा ने अपने बेटे की गिरफ्तारी पर दुख जताया है, लेकिन साथ ही उन्हें न्याय प्रक्रिया पर भरोसा भी है। 'आर्टिकल 14' को दिए एक बयान में उन्होंने कहा कि उनके बेटे ने अपना पूरा पेशेवर जीवन गरीब और वंचित समुदायों की सेवा में समर्पित कर दिया है। उन्हें उम्मीद है कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का मौका मिलेगा और वे जल्द ही अपने परिवार के पास लौट सकेंगे।
जो लोग आंखें मूंदने से इनकार करते हैं, उन्हें अपराधी बनाना
सिकेरा की गिरफ्तारी से उठा सवाल सिर्फ एक डॉक्टर के भविष्य तक सीमित नहीं है। जब कोई डॉक्टर ऐसे इलाकों में काम कर रहा हो जहां स्वास्थ्य सुविधाएं न के बराबर हैं, और उसी पर उन समुदायों को भड़काने का आरोप लगे जिनका उसने सालों तक इलाज किया है, तो इसका क्या मतलब है? जब खनन से होने वाले स्वास्थ्य और पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की ओर ध्यान दिलाने वालों को 'सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा' माना जाने लगे, तो यह सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में क्या बताता है?
कालाहांडी और रायगडा के आदिवासी समुदायों के लिए, सेक्वेरा एक ऐसे डॉक्टर थे जो तब मदद के लिए आए जब अस्पताल बहुत दूर थे। उन्होंने उनके बच्चों का इलाज किया और वे समझते थे कि इन लोगों का स्वास्थ्य उस जमीन से जुड़ा है जिस पर वे रहते हैं। उनकी गिरफ्तारी ने अब इस रिश्ते को आपराधिक मुकदमों के साये में ला खड़ा किया है। जो डॉक्टर मरीजों तक पहुंचने के लिए सालों तक जंगलों में भटकता रहा, वह अब जेल की कोठरी में बंद है। और जहां राज्य यह सवाल उठा रहा है कि क्या वह वास्तव में चिकित्सा सेवा कर रहे थे या असंतोष भड़का रहे थे, वहीं जिन समुदायों के बीच उन्होंने काम किया, वे आज भी स्वास्थ्य सेवा, जमीन और अस्तित्व से जुड़े उन्हीं सवालों से जूझ रहे हैं; साथ ही उनके मन में यह डर भी है कि जो लोग उनके साथ खड़े हैं, कहीं अगला नंबर उनका न आ जाए।

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लगभग दस वर्षों तक डॉ. रैंडल सिकेरा का कार्यस्थल कोई सुसज्जित अस्पताल या निजी क्लिनिक नहीं था। बल्कि, यह ओडिशा के कालाहांडी और रायगडा जिलों की जंगली पहाड़ियां, दूर-दराज की बस्तियां और बिखरे हुए आदिवासी गांव थे। 39 वर्षीय यह डॉक्टर अपनी मोटरसाइकिल से कठिन रास्तों को पार करते हुए एक गांव से दूसरे गांव जाते थे। वे मलेरिया, दस्त, त्वचा संबंधी बीमारियों और अन्य रोगों से पीड़ित लोगों का इलाज करते थे और अक्सर उन्हें मुफ्त परामर्श और दवाइयां भी देते थे। जिन इलाकों में सबसे नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 60 किलोमीटर से भी अधिक दूर हो सकता था, वहां वे स्थानीय लोगों के शब्दों में एक 'चलते-फिरते अस्पताल' (मोबाइल अस्पताल) बन गए थे।
आज, वही डॉक्टर रायगडा उप-जेल में बंद हैं। 16 अक्टूबर, 2026 की रात को, ओडिशा पुलिस ने कालाहांडी के भवानीपटना में उनके किराए के घर से सिकेरा को दलित कार्यकर्ता लक्ष्मण नाइक के साथ गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी 7 अप्रैल को कांतामल गांव में ग्रामीणों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़प के लगभग छह महीने बाद हुई है। यह झड़प सिजीमाली बॉक्साइट खनन परियोजना से जुड़ी एक प्रस्तावित सड़क परियोजना के विरोध के दौरान हुई थी। शुरुआती एफआईआर (FIR) में नामजद 26 लोगों में न तो सिकेरा का नाम था और न ही नाइक का। बाद में, लगभग 100 अज्ञात लोगों की श्रेणी, जिन्हें 'अन्य' के रूप में दर्ज किया गया था, उसमें से उनके नाम जोड़े गए।
'द हिंदू' के अनुसार, सिकेरा को अप्रैल की हिंसा के मामले में गिरफ्तार किया गया, जबकि वे इसी घटना से जुड़ी एक अन्य एफआईआर में ओडिशा उच्च न्यायालय से पहले ही अग्रिम जमानत ले चुके थे। इसके बाद, उन पर भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया, जिनमें हत्या के प्रयास और दंगा करने से जुड़ी धाराएं शामिल हैं।
उनकी गिरफ्तारी के हालात विशेष रूप से चिंताजनक हैं। रायगडा जेल से 'द हिंदू' से बात करते हुए, सिकेरा ने बताया कि उन्हें और नाइक को पूरी रात पुलिस थाने के फर्श पर सोना पड़ा। बाद में उन्हें दूसरे पुलिस थाने ले जाया गया और शुरुआत में उन्हें यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें किस आधार पर गिरफ्तार किया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें अपने परिवार से बात करने की अनुमति नहीं दी गई। यह पहली बार नहीं है जब सिकेरा को खनन-विरोधी आंदोलन से जुड़े होने के कारण प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। जून 2025 में, रायगढ़ जिला प्रशासन ने एकतरफा आदेश जारी कर उन्हें और 24 अन्य लोगों के जिले में प्रवेश पर दो महीने के लिए रोक लगा दी थी। प्रशासन ने उन पर प्रस्तावित सिजीमाली खनन परियोजना के खिलाफ आदिवासी समुदायों को एकजुट करने का प्रयास करने का आरोप लगाया और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर चिंता जताई।
बाद में, ओडिशा उच्च न्यायालय ने इस प्रतिबंधात्मक आदेश को रद्द कर दिया। अपने फैसले में, अदालत को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि प्रस्तावित शांतिपूर्ण सभा से हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था का कोई तत्काल और गंभीर खतरा था। न्यायमूर्ति एस.के. पाणिग्रही ने कहा कि संवैधानिक कानून के अनुसार, मौलिक अधिकारों को सीमित करने से पहले वास्तविक जोखिम का एक उच्च स्तर होना आवश्यक है। हालांकि, उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बावजूद, प्रशासन की ओर से सिकेरा के खिलाफ कार्रवाई का सिलसिला खत्म नहीं हुआ।

एक डॉक्टर जिसने शहरी चिकित्सा के बजाय पहाड़ी इलाकों को चुना
मूल रूप से कर्नाटक के मंगलुरु के रहने वाले और मुंबई में पले-बढ़े सिकेरा ने बेंगलुरु के सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उन्होंने जयपुर के सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज व अस्पताल से इंटरनल मेडिसिन में पोस्टग्रेजुएट की पढ़ाई की। जुलाई 2017 में वे कालाहांडी पहुंचे और 'स्वास्थ्य स्वराज' के साथ काम करना शुरू किया। यह एक गैर-लाभकारी संगठन है जो आदिवासी बहुल थुआमूल रामपुर ब्लॉक में सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है।
वे किसी शहरी अस्पताल में एक पारंपरिक मेडिकल करियर चुन सकते थे, लेकिन इसके बजाय वे इसी क्षेत्र में रुक गए। उन्होंने 'लिविंग फार्म्स' और 'डेवलपमेंट एजेंसी फॉर पुअर एंड ट्राइबल अवेकनिंग' (DAPTA) जैसे संगठनों के साथ अपना काम जारी रखा। ये संगठन स्वास्थ्य सेवा, पोषण, शिक्षा और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों के लिए काम करते हैं।

'आर्टिकल 14' की रिपोर्ट के अनुसार, सिकेरा उन बस्तियों में गए जहां लोगों की चिकित्सा सुविधाओं तक पहुंच बहुत कम थी। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों का इलाज किया। उनका काम केवल मरीजों का इलाज करने तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने निवारक स्वास्थ्य सेवा (प्रिवेंटिव हेल्थकेयर), सामुदायिक स्वास्थ्य प्रशिक्षण और पर्यावरण के नुकसान तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच के संबंध को समझने पर ध्यान केंद्रित किया।
खनन से प्रभावित क्षेत्रों में अपने अनुभवों के कारण, उन्होंने औद्योगिक खनन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का भी अध्ययन किया। उन्होंने देखा कि सक्रिय बॉक्साइट खदानों के पास रहने वाले समुदायों में, गैर-खनन क्षेत्रों की तुलना में त्वचा संबंधी बीमारियां अधिक देखने को मिलीं। मार्च 2022 से, वे ओडिशा के जाजपुर जिले के सुकिंदा भी गए हैं, जहां बड़े पैमाने पर क्रोमाइट खनन के कारण प्रभावित हुए इलाके में वे तपेदिक (टीबी) से पीड़ित मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
उनके एक करीबी दोस्त ने 'आर्टिकल 14' को बताया कि सिकेरा यह समझते थे कि जब तक खराब स्वास्थ्य के लिए जिम्मेदार संरचनात्मक स्थितियों को ठीक नहीं किया जाता, तब तक केवल मरीजों का इलाज करना नाकाफी है। उनकी समझ के अनुसार, स्वास्थ्य सेवा को साफ पानी, जंगलों, पोषण और एक स्वस्थ पर्यावरण तक पहुंच से अलग नहीं किया जा सकता।
इसी समझ के चलते वे उन आदिवासी समुदायों के साथ जुड़ गए, जो अपनी जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को खतरे में डालने वाली खनन परियोजनाओं का विरोध कर रहे थे। 2023 से, वे 'मां माटी माली सुरक्षा मंच' और 'नियमगिरि सुरक्षा समिति' जैसे जमीनी संगठनों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिन्होंने इस इलाके में प्रस्तावित खनन परियोजनाओं का विरोध किया है। यही जुड़ाव अब उन पर लगे आरोपों का मुख्य आधार बन गया है।
जब एकजुटता को कथित आपराधिक अपराध मान लिया जाए
ओडिशा पुलिस ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है कि सिकेरा की गिरफ्तारी का मकसद खनन-विरोधी संघर्ष को दबाना है। 'प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया' (PTI) से बात करते हुए, पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) अखिलेशवर सिंह ने आरोप लगाया कि सिकेरा केवल चिकित्सा सेवाएं ही नहीं दे रहे थे, बल्कि आदिवासी समुदायों को राज्य सरकार के खिलाफ भड़का भी रहे थे।
पुलिस ने उनके खिलाफ कई आपराधिक मामलों का भी हवाला दिया है। हालांकि, मुख्य सवाल यह है कि इन गंभीर आरोपों के समर्थन में क्या सबूत हैं? और उन्हें एक ऐसी FIR में क्यों फंसाया गया, जिसमें शुरू में उनका नाम नहीं था? खासकर तब, जब उसी घटना से जुड़े एक अन्य मामले में उन्हें पहले ही अग्रिम जमानत मिल चुकी थी?
'द क्विंट' ने अपनी रिपोर्ट में कार्यकर्ताओं की उस चिंता को उजागर किया है, जिसमें उन्होंने FIR में पुलिस द्वारा 'अन्य' (others) श्रेणी के इस्तेमाल पर सवाल उठाए हैं। 'कैंपेन अगेंस्ट फैब्रिकेटेड केसेस' (Campaign Against Fabricated Cases) के संयोजक नरेंद्र मोहंती का आरोप है कि इस तरह की खुली श्रेणी पुलिस को उन कार्यकर्ताओं को बाद में फंसाने की छूट देती है, जिनका नाम शिकायत दर्ज कराते समय नहीं था। उनके अनुसार, यह तरीका आंदोलन के नेताओं को हिरासत में रखने के लिए बहुत कारगर साबित हो रहा है; जैसे ही उन्हें किसी मामले में जमानत मिलती है, उन पर एक और नया मामला दर्ज कर दिया जाता है।
आंकड़े चिंताजनक हैं। 'पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स' (PUDR) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में कालाहांडी और रायगडा में बॉक्साइट खनन के विरोध से जुड़े 43 मामले दर्ज किए गए, जिसके परिणामस्वरूप 100 से अधिक आदिवासियों और दलितों को जेल जाना पड़ा। 8 मार्च से 8 अप्रैल 2026 के बीच, कुल 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया, 217 लोगों को आरोपी बनाया गया और 1,140 अन्य लोगों को 'अन्य' की श्रेणी में रखा गया। इसलिए, सिकेरा की गिरफ्तारी खनन परियोजनाओं का विरोध करने वालों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है।
जमीन, जंगलों और विरोध करने के अधिकार की लड़ाई
इस इलाके में विरोध कोई नई बात नहीं है। दशकों से, आदिवासी समुदायों ने अपने जंगलों और पहाड़ियों को खनन स्थलों में बदलने की कोशिशों का विरोध किया है। 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) में शामिल डोंगरिया कोंध समुदाय, नियमगिरि पहाड़ियों को पवित्र मानता है और 'नियम राजा' की पूजा करता है, जिनके बारे में उनका मानना है कि वे इन्हीं पहाड़ियों में रहते हैं। 2013 के अपने एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने नियमगिरि में बॉक्साइट खनन के लिए वन भूमि के इस्तेमाल के प्रस्ताव पर फैसला लेने का अधिकार ग्राम सभाओं को सौंप दिया था। इसके बाद, सभी 12 ग्राम सभाओं ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, और 2014 में ओडिशा सरकार ने इस परियोजना को रद्द कर दिया।
सिजीमाली में बॉक्साइट निकालने की नई कोशिशों ने इस इलाके को एक बार फिर खनन हितों के साथ टकराव की स्थिति में ला खड़ा किया है। वेदांता को सिजीमाली भंडार के लिए पर्यावरण मंजूरी मिल गई है, जबकि पास के कुत्रुमाली भंडार को अडानी समूह को आवंटित किया गया है।
जिन समुदायों की आजीविका, जल स्रोत, जंगल और सांस्कृतिक पहचान इन पहाड़ियों से गहराई से जुड़ी हुई है, उनके लिए खनन केवल एक औद्योगिक विकास परियोजना नहीं है। यह उनके अस्तित्व, स्वायत्तता और अपनी जमीन व संसाधनों पर उनके संवैधानिक और कानूनी अधिकारों का सवाल है।
सिकेरा की गिरफ्तारी की चिकित्सा जगत और नागरिक समाज के कुछ वर्गों ने भी निंदा की है। 'लिवरडॉक' (LiverDoc) के नाम से मशहूर डॉ. सिरियाक एबी फिलिप्स ने चिकित्सा समुदाय से अपील की है कि वे सेंट जॉन्स मेडिकल कॉलेज में उनके जूनियर रहे सिकेरा के समर्थन में आगे आएं। कुत्रुमाली में सिकेरा के काम को याद करते हुए, फिलिप्स ने बताया कि कैसे एक डॉक्टर के रूप में उन्होंने दूर-दराज के इलाकों में जाकर कुपोषित बच्चों और ऐसी महिलाओं का इलाज किया, जिनकी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बहुत सीमित थी। उन्होंने कहा कि सिकेरा यह समझते थे कि जंगलों के विनाश, जल स्रोतों के नुकसान और आदिवासी समुदायों की गरिमा छीने जाने की भरपाई किसी भी 'प्रिस्क्रिप्शन' (दवा की पर्ची) से नहीं की जा सकती।

'जन स्वास्थ्य अभियान' ने भी इन गिरफ्तारियों की निंदा की है। उनका कहना है कि यह उन लोगों पर हमला है जो खनन (माइनिंग) से होने वाले सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए काम कर रहे हैं। संगठन ने सेक्वेरा और नाइक की तुरंत रिहाई, उनके खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और डराने-धमकाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
इस बीच, मुंबई स्थित 'वॉचडॉग फाउंडेशन' ने 'राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग' से संपर्क किया है। उन्होंने मांग की है कि सिकेरा की गिरफ्तारी से जुड़ी परिस्थितियों की जांच की जाए और यह देखा जाए कि क्या गिरफ्तारी के दौरान जरूरी कानूनी सुरक्षा नियमों का पालन किया गया था या नहीं। 'फ्री प्रेस जर्नल' की रिपोर्ट के अनुसार, फाउंडेशन ने इस बात पर खास तौर पर ध्यान दिलाया है कि अप्रैल की घटना के कई महीनों बाद सेक्वेरा को गिरफ्तार किया गया, जबकि मूल FIR में उनका नाम कहीं नहीं था।
फाउंडेशन ने स्पष्ट किया है कि मूल FIR में किसी व्यक्ति का नाम न होने का मतलब यह नहीं है कि वह निर्दोष है या बाद में की गई उसकी गिरफ्तारी गैर-कानूनी है। हालांकि, उन्होंने इस बात की जांच की मांग की है कि क्या यह जांच विश्वसनीय सबूतों पर आधारित है और क्या इसमें संवैधानिक व प्रक्रियात्मक सुरक्षा नियमों का पालन किया गया है।
सिकेरा के माता-पिता, एलेक्स और नैन्सी सेक्वेरा ने अपने बेटे की गिरफ्तारी पर दुख जताया है, लेकिन साथ ही उन्हें न्याय प्रक्रिया पर भरोसा भी है। 'आर्टिकल 14' को दिए एक बयान में उन्होंने कहा कि उनके बेटे ने अपना पूरा पेशेवर जीवन गरीब और वंचित समुदायों की सेवा में समर्पित कर दिया है। उन्हें उम्मीद है कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का मौका मिलेगा और वे जल्द ही अपने परिवार के पास लौट सकेंगे।
जो लोग आंखें मूंदने से इनकार करते हैं, उन्हें अपराधी बनाना
सिकेरा की गिरफ्तारी से उठा सवाल सिर्फ एक डॉक्टर के भविष्य तक सीमित नहीं है। जब कोई डॉक्टर ऐसे इलाकों में काम कर रहा हो जहां स्वास्थ्य सुविधाएं न के बराबर हैं, और उसी पर उन समुदायों को भड़काने का आरोप लगे जिनका उसने सालों तक इलाज किया है, तो इसका क्या मतलब है? जब खनन से होने वाले स्वास्थ्य और पर्यावरणीय दुष्प्रभावों की ओर ध्यान दिलाने वालों को 'सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा' माना जाने लगे, तो यह सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में क्या बताता है?
कालाहांडी और रायगडा के आदिवासी समुदायों के लिए, सेक्वेरा एक ऐसे डॉक्टर थे जो तब मदद के लिए आए जब अस्पताल बहुत दूर थे। उन्होंने उनके बच्चों का इलाज किया और वे समझते थे कि इन लोगों का स्वास्थ्य उस जमीन से जुड़ा है जिस पर वे रहते हैं। उनकी गिरफ्तारी ने अब इस रिश्ते को आपराधिक मुकदमों के साये में ला खड़ा किया है। जो डॉक्टर मरीजों तक पहुंचने के लिए सालों तक जंगलों में भटकता रहा, वह अब जेल की कोठरी में बंद है। और जहां राज्य यह सवाल उठा रहा है कि क्या वह वास्तव में चिकित्सा सेवा कर रहे थे या असंतोष भड़का रहे थे, वहीं जिन समुदायों के बीच उन्होंने काम किया, वे आज भी स्वास्थ्य सेवा, जमीन और अस्तित्व से जुड़े उन्हीं सवालों से जूझ रहे हैं; साथ ही उनके मन में यह डर भी है कि जो लोग उनके साथ खड़े हैं, कहीं अगला नंबर उनका न आ जाए।
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