एफसीआरए संशोधन ‘खतरनाक’, अल्पसंख्यक संस्थानों में अनुचित हस्तक्षेप : कैथोलिक संस्था

Written by sabrang india | Published on: March 30, 2026
कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) का मानना है कि लोकसभा में प्रस्तुत विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधन संवैधानिक रूप से मिली स्वतंत्रताओं में कार्यपालिका के हस्तक्षेप की संभावना बढ़ा सकते हैं।


प्रतीकात्मक तस्वीर

कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित बदलावों को लेकर गहरी चिंता जताई है और इस विधेयक को इसके संभावित प्रभावों के कारण ‘खतरनाक’ बताया है।

एक बयान में संस्था ने कहा कि लोकसभा में पेश किए गए ये संशोधन लाइसेंस नवीनीकरण के नाम पर संविधान द्वारा दी गई स्वतंत्रताओं में कार्यपालिका के दखल को बढ़ावा दे सकते हैं।

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, संस्था ने यह भी चेतावनी दी कि इन बदलावों से अल्पसंख्यक संस्थानों और नागरिक समाज संगठनों के कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप की आशंका पैदा होती है, जो गंभीर चिंता का विषय है।

ध्यान देने योग्य है कि यह विधेयक बुधवार (26 मार्च) को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया था। इसके बाद सीबीसीआई ने उन प्रावधानों पर आपत्ति दर्ज की, जिनसे केंद्र सरकार को अधिक अधिकार मिलने की संभावना है।

संस्था ने खास तौर पर नई लाइसेंसिंग प्राधिकरण की कार्यप्रणाली को लेकर चिंता व्यक्त की है। इसके तहत यह प्राधिकरण गैर-सरकारी संगठनों और अल्पसंख्यक संस्थाओं के फंड, संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर नियंत्रण रख सकेगा, साथ ही लाइसेंस के नवीनीकरण को खारिज या रद्द करने का अधिकार भी रखेगा।

इसके अलावा, प्रस्तावित प्रावधानों के तहत प्राधिकरण को संपत्तियों को जब्त करने, उनका प्रबंधन करने और उनका निपटान करने का अधिकार भी दिया जाएगा, जिसमें अस्थायी और स्थायी दोनों प्रकार की शक्तियां शामिल हैं।

सीबीसीआई ने कहा कि इस तरह के कदम निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न करते हैं।

संस्था ने अपने बयान में विधेयक को पेश करने की मंशा पर भी प्रश्न उठाए हैं और इसे एकतरफा करार दिया है। उनका कहना है कि विपक्षी सांसदों के विरोध के बावजूद इसे सदन में प्रस्तुत किया गया।

इसके साथ ही, सीबीसीआई ने उन मुद्दों पर व्यापक परामर्श और गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता पर जोर दिया है, जो मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं।

सीबीसीआई का कहना है कि ऐसे प्रावधान, जो एफसीआरए पंजीकरण की अवधि समाप्त होने पर केंद्र सरकार को संगठनों की विदेशी निधियों और परिसंपत्तियों पर नियंत्रण का अधिकार देते हैं, ‘अलोकतांत्रिक, असंवैधानिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ’ हैं।

संस्था ने इन प्रस्तावित संशोधनों को अल्पसंख्यक संस्थानों को ‘बेहद सख्त नियामक ढांचे’ के दायरे में लाने का प्रयास बताया है।

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 में उन गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की संपत्तियों पर अस्थायी या स्थायी नियंत्रण रखने के लिए एक ‘नामित प्राधिकरण’ के गठन का प्रस्ताव है, जिनके एफसीआरए लाइसेंस रद्द, सरेंडर या समाप्त हो गए हैं। इसमें ऐसी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान की शक्तियां भी शामिल हैं।

इन प्रस्तावों में निधियों के उपयोग के लिए समयसीमा तय करना, निलंबन के दौरान संपत्तियों का प्रबंधन करना, दंड व्यवस्था को अधिक तर्कसंगत बनाना और जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति को अनिवार्य करना शामिल है।

सीबीसीआई ने सरकार से इन प्रस्तावित संशोधनों पर पुनर्विचार करने और विधेयक से सभी विवादास्पद प्रावधानों को हटाने की अपील की है। साथ ही यह भी आग्रह किया है कि संवैधानिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं, खासकर अल्पसंख्यकों के अधिकारों, की पूरी तरह से रक्षा सुनिश्चित की जाए।

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