2020 दिल्ली दंगे: दिल्ली हाई कोर्ट ने 22 वर्षीय मुस्लिम प्रवासी मजदूर की मौत के मामले में पांच लोगों को सुनाई गई सात साल की सजा को बरकरार रखा

Written by sabrang india | Published on: November 2, 2026
कोर्ट का मानना है कि जानलेवा चोटें किसने पहुंचाईं, यह पता न लगा पाना भी IPC की धारा 149 के तहत आरोपियों को बरी नहीं करता। कोर्ट ने पीड़ित मोनिश पर हमला करने वाली हथियारबंद भीड़ में उनके शामिल होने के सबूतों को आधार बनाया।


Image: udayavani.com

दिल्ली हाई कोर्ट ने फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान 22 वर्षीय मोनीश की हत्या के मामले में, पांच लोगों को 'हत्या की श्रेणी में न आने वाले गैर-इरादतन हत्या' (culpable homicide not amounting to murder) के लिए दोषी ठहराए जाने के फैसले को बरकरार रखा है। साथ ही, उन्हें सुनाई गई सात साल की कठोर कारावास की सजा को भी कायम रखा है।

न्यायमूर्ति मधु जैन ने अमन कश्यप, देवेंद्र कुमार, प्रदीप राय, आशीष उर्फ गोली और अरुण कुमार द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 148 और धारा 304 (भाग-I) के साथ धारा 149 के तहत उनकी दोषसिद्धि को सही ठहराया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के सबूतों से यह साबित होता है कि आरोपी केवल भीड़ में मौजूद नहीं थे, बल्कि वे हथियारों से लैस उस भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे, जिसने मृतक का पीछा किया और उस पर हमला किया।

अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या आरोपियों को मौत के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जबकि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि किस व्यक्ति ने मृतक के सिर पर जानलेवा चोट पहुंचाई थी। निचली अदालत के निष्कर्षों पर मुहर लगाते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि किसी एक हमलावर की पहचान न हो पाना, आरोपियों को IPC की धारा 149 के तहत जिम्मेदारी से मुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने माना कि भीड़ के पास मौजूद हथियार, आरोपियों द्वारा की गई उकसावे की बातें और लगातार किया गया हमला, इस बात का ठोस आधार हैं कि उस भीड़ का एक गैर-कानूनी साझा उद्देश्य था- मृतक पर हमला करना और उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाना।

"इस मामले में, सबूतों से यह साबित होता है कि आरोपी केवल भीड़ में मौजूद नहीं थे। गवाह PW-10 ने पांचों आरोपियों को हथियारों से लैस भीड़ के सबसे आगे देखा था, जहां वे दूसरों को मृतक पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे। पुलिस बैरिकेड्स के पास गिर जाने के बाद भी, मृतक का पीछा किया गया, उसे घेरा गया और उस पर हमला किया गया। आरोपियों का आचरण, भीड़ के सदस्यों के पास मौजूद हथियार और मृतक पर लगातार किया गया हमला, इस निष्कर्ष का आधार बनते हैं कि उस भीड़ का एक गैर-कानूनी साझा उद्देश्य था—मृतक पर हमला करना और उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाना।" (पैरा 67)

अभियोजन पक्ष के सबूत और अपीलकर्ताओं की चुनौती

यह मामला 25 फरवरी, 2020 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप है कि चांद बाग में पीर बाबा मजार के पास, बृजपुरी की गली नंबर 3 के निकट, एक भीड़ ने मोनिश का पीछा किया और उस पर हमला कर दिया। इसके बाद उसे गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाया गया, जहां चोटों के कारण उसकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, उसकी मौत का कारण 'शॉक' (सदमा) था, जो किसी भारी वस्तु की चोट से मस्तिष्क में आई गंभीर चोटों (एंटी-मॉर्टम ब्रेन इंजरी) के परिणामस्वरूप हुआ था।

ट्रायल कोर्ट ने 30 नवंबर, 2024 के अपने फैसले में पांचों अपीलकर्ताओं को IPC की धारा 148 और धारा 304 (भाग I) के तहत, धारा 149 के साथ मिलाकर दोषी ठहराया। 13 जनवरी, 2025 के अपने आदेश में, कोर्ट ने उन्हें घातक हथियारों के साथ दंगा करने के लिए एक साल की साधारण कैद, और 'हत्या की श्रेणी में न आने वाले गैर-इरादतन हत्या' (culpable homicide not amounting to murder) के लिए सात साल की कठोर कैद की सजा सुनाई। साथ ही, उन पर 30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि ये सभी सजाएं एक साथ (concurrently) चलेंगी।

दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए, अपीलकर्ताओं ने चश्मदीदों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उन्होंने पुलिस गवाहों के बयान दर्ज करने में हुई देरी, 'टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड' (TIP) न कराए जाने और जांच में रही कमियों की ओर इशारा किया। उन्होंने पहचान से जुड़े सबूतों पर भी आपत्ति जताई और तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा है कि वे इस हमले में शामिल थे, या उनका कोई ऐसा 'समान उद्देश्य' (common object) था जो उन्हें IPC की धारा 149 के तहत संयुक्त रूप से जिम्मेदार (constructive liability) ठहराने के लिए जरूरी हो।

बचाव पक्ष ने विशेष रूप से शशि कांत के बदलते बयानों पर जोर दिया। शशि कांत ने शुरुआत में हमले के लिए आरोपियों को जिम्मेदार ठहराया था, लेकिन बाद में स्पष्ट किया कि उसने इन पांचों अपीलकर्ताओं को भीड़ में तो देखा था, लेकिन उन्हें मृतक पर हमला करते हुए खुद नहीं देखा था। अभियोजन पक्ष के एक अन्य गवाह, मनोज कनियाल ने ट्रायल कोर्ट के सामने अपीलकर्ताओं की पहचान नहीं की और पहचान से जुड़े अभियोजन पक्ष के सुझावों को भी खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट द्वारा पहचान के सबूतों और पुलिस गवाहों के बयानों का मूल्यांकन

पहचान के सबूतों को चुनौती देने वाली दलीलों को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने मुख्य रूप से कांस्टेबल पीयूष के बयान पर भरोसा किया। वह उस इलाके के 'बीट कांस्टेबल' थे और उन्होंने बताया कि वे अपनी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान घटना से पहले से ही इन अपीलकर्ताओं को जानते थे।

पीयूष ने उन पांच लोगों की पहचान की जो भीड़ में सबसे आगे थे, हथियार लिए हुए थे और "मारो-मारो" चिल्ला रहे थे। उसकी गवाही के अनुसार, मृतक का पीछा किया गया, पुलिस बैरिकेड के पास उस पर हमला किया गया और नीचे गिर जाने के बाद भी उसे लगातार पीटा गया। इसके बाद पुलिसकर्मियों ने बीच-बचाव किया, भीड़ को तितर-बितर किया और घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने का इंतजाम किया।

हेड कॉन्स्टेबल दीपक और कॉन्स्टेबल विनीत ने भी काफी हद तक इस बात की पुष्टि की कि मृतक का पीछा किया गया, उस पर हमला हुआ और पुलिस ने बीच-बचाव किया। हालांकि, अदालत ने माना कि इन गवाहों को आरोपियों के नाम पीयूष से पता चले थे, और जहां तक नामों की बात है, तो उनकी पहचान पीयूष की पहचान से स्वतंत्र नहीं थी। फिर भी, उनके बयानों से घटना के होने और उस समय कथित तौर पर शामिल लोगों की पहचान किए जाने की पुष्टि होती है।

अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि पुलिस गवाहों की गवाही को सिर्फ इसलिए नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि वे सरकारी कर्मचारी हैं। 'गिरजा प्रसाद बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए, अदालत ने दोहराया कि पुलिस की गवाही को गवाह के सरकारी पद के आधार पर खारिज करने के बजाय, उसके अपने गुणों (merits) के आधार पर परखा जाना चाहिए। अदालत ने गौर किया कि ड्यूटी रिकॉर्ड से पुलिस पिकेट पर गवाहों की मौजूदगी की पुष्टि होती है, और मृतक का पीछा करने, उस पर हमला करने और उसे बचाने के बारे में उनके बयान काफी हद तक मेल खाते हैं।

"इस मामले में, पुलिस पिकेट पर उक्त गवाहों की मौजूदगी ड्यूटी रिकॉर्ड से साबित होती है, और मृतक का पीछा करने, उस पर हमला करने और बाद में उसे बचाने के तरीके के बारे में उनके बयान काफी हद तक एक जैसे हैं। इसलिए, उनके सरकारी पद को उनकी गवाही को खारिज करने का कोई स्वतंत्र आधार नहीं माना जा सकता।" (पैरा 53)

TIP (शिनाख्त परेड) न होने के मुद्दे पर, अदालत ने 'मलखान सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि अदालत में की गई पहचान एक ठोस सबूत (substantive evidence) होती है, जबकि TIP का मुख्य उद्देश्य जांच के दौरान किसी संदिग्ध को पहचानने की गवाह की क्षमता को परखना होता है। TIP न होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत में की गई पहचान को सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता, हालांकि इसके साक्ष्य मूल्य (evidentiary value) का आकलन बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। इस सवाल के संदर्भ में, अदालत ने इस बात को विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना कि पीयूष पहले से ही आरोपियों को जानता था।

बयान दर्ज करने में देरी और जांच में कमियां

हाई कोर्ट ने माना कि तीन पुलिस चश्मदीदों के बयान घटना के एक महीने से भी अधिक समय बाद, 1 अप्रैल 2020 को दर्ज किए गए थे। कोर्ट ने जांच अधिकारी के इस कबूलनामे पर भी ध्यान दिया कि गवाह खुद उनके पास नहीं आए थे, बल्कि जांच के दौरान उनसे पूछताछ के लिए उन्हें बुलाया गया था।

कोर्ट ने चेतावनी दी कि केवल इसलिए कि घटना दंगों के दौरान हुई थी, बयान दर्ज करने में हुई देरी को यूं ही स्वीकार नहीं किया जा सकता। फिर भी, इस स्पष्टीकरण पर विचार करने के बाद कि दंगों से जुड़े कई मामलों की एक साथ जांच चल रही थी, और पुलिस गवाहों की गवाही को देखते हुए, कोर्ट ने माना कि केवल देरी होने से ही घटना के होने पर संदेह नहीं पैदा होता और न ही इससे यह साबित होता है कि किसी को झूठा फंसाया गया है।

फैसले में हमले की सटीक जगह, पीसीआर कॉल और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के इस्तेमाल से जुड़ी विसंगतियों पर भी बात की गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज का इस्तेमाल घायल व्यक्ति की पहचान करने के लिए किया गया था, न कि यह साबित करने के लिए कि अपीलकर्ताओं ने हमले में हिस्सा लिया था। इसी तरह, कॉल-डिटेल रिकॉर्ड से मोबाइल डिवाइस की अनुमानित लोकेशन का पता तो चल सकता है, लेकिन इससे किसी खास समय पर यूजर की सटीक लोकेशन का पक्का पता नहीं लगाया जा सकता।

बचाव पक्ष द्वारा जांच में बताई गई कमियों को स्वीकार करते हुए, कोर्ट ने कहा कि ऐसी कमियों की वजह से चश्मदीदों की भरोसेमंद गवाही अपने आप खारिज नहीं हो जाती। कोर्ट ने कहा कि मुख्य सवाल यह है कि क्या किसी कमी की वजह से सबूतों की विश्वसनीयता पर असर पड़ा है या दोषी ठहराने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।

IPC की धारा 149: किसी व्यक्ति द्वारा किए गए घातक वार को साबित किए बिना जिम्मेदारी

मुख्य कानूनी मुद्दा IPC की धारा 149 के लागू होने से जुड़ा था। यह धारा एक 'गैर-कानूनी समूह' (unlawful assembly) के सदस्यों को उन अपराधों के लिए जिम्मेदार ठहराती है, जो समूह के 'साझा उद्देश्य' (common object) को पूरा करने के लिए किए जाते हैं, या ऐसे अपराध जिनके बारे में सदस्यों को पता था कि वे इस उद्देश्य को पूरा करने के दौरान हो सकते हैं।

कोर्ट ने 'मसाल्टी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' और 'लालजी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामलों का हवाला देते हुए दोहराया कि अभियोजन पक्ष (prosecution) के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि गैर-कानूनी समूह के हर सदस्य ने अलग-अलग कोई विशेष काम (overt act) किया हो। हालांकि, कोर्ट ने 'कुलदीप यादव बनाम बिहार राज्य' मामले का भी जिक्र किया और जोर देकर कहा कि किसी समूह में केवल मौजूद होना या हथियार पास रखना ही काफी नहीं है; इसके लिए गैर-कानूनी 'साझा उद्देश्य' या उस उद्देश्य की जानकारी होना साबित करना जरूरी है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए, अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के सबूत केवल यह साबित करने तक सीमित नहीं थे कि अपीलकर्ता भीड़ में मौजूद थे। पीयूष ने पहचान की थी कि वे हथियारों से लैस भीड़ में सबसे आगे थे और दूसरों को मोनिश पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे। मृतक का पीछा किया गया, उसे घेर लिया गया और पुलिस बैरिकेड्स के पास गिर जाने के बाद भी उस पर हमला किया गया।

अपीलकर्ताओं के आचरण, भीड़ के सदस्यों के पास मौजूद हथियारों और लगातार किए गए हमलों को एक साथ देखने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि उस भीड़ का एक गैर-कानूनी साझा उद्देश्य था - मृतक पर हमला करना और उसे शारीरिक नुकसान पहुंचाना।

इसलिए, अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष भले ही उस व्यक्ति की पहचान न कर सका जिसने सिर पर जानलेवा चोट पहुंचाई थी, लेकिन इससे अपीलकर्ता अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। मुख्य बात यह थी कि क्या यह अपराध भीड़ के साझा उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया गया था, या क्या भीड़ के सदस्यों को पता था कि इस उद्देश्य को पूरा करने के दौरान ऐसा अपराध होने की संभावना है।

IPC की धारा 304 भाग I के तहत दोषसिद्धि को क्यों बरकरार रखा गया

उच्च न्यायालय ने अपराध की प्रकृति की अलग से जांच की। अदालत ने जोर देकर कहा कि केवल मौत हो जाने से यह तय नहीं होता कि मामला IPC की धारा 304 के भाग I में आएगा या भाग II में। भाग I तब लागू होता है जब मौत का कारण बनने वाले कृत्य के पीछे जान से मारने का इरादा हो, या ऐसा शारीरिक नुकसान पहुंचाने का इरादा हो जिससे मौत होने की संभावना हो। भाग II तब लागू होता है जब आरोपी को यह पता हो कि मौत होने की संभावना है, लेकिन उसमें भाग I में बताई गई 'जान से मारने की मंशा' (इरादा) न हो।

भीड़ के पास मौजूद हथियारों, अपीलकर्ताओं द्वारा दूसरों को उकसाने और मोनिश पर किए गए हमले के तरीके से जुड़े सबूतों के आधार पर, अदालत ने माना कि मानसिक स्थिति (mental element) तय करने के लिए इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखा जाना चाहिए। अदालत ने गौर किया कि हथियारों से लैस भीड़ ने मृतक का पीछा किया, उसके गिर जाने के बाद भी उस पर लगातार हमले किए, और उसके सिर पर ऐसी चोटें आईं जो जानलेवा साबित हुईं।

इस प्रकार, अदालत ने इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि इस अपराध में IPC की धारा 304 भाग I के तहत जरूरी 'इरादा' शामिल था। यह अपराध या तो उस गैर-कानूनी भीड़ के साझा उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया गया था, या फिर भीड़ के सदस्यों को पता था कि इस उद्देश्य को पूरा करने के दौरान ऐसा अपराध होने की संभावना है। इस तरह, उच्च न्यायालय ने सभी पांचों अपीलों को खारिज कर दिया और 30 नवंबर, 2024 के दोषसिद्धि संबंधी निचली अदालत के फैसले तथा 13 जनवरी, 2025 के सजा संबंधी आदेश को बरकरार रखा।

पूरा फैसला नीचे पढ़ा जा सकता है:

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