अर्नब गोस्वामी बनाम संजीव भट्ट के मामले को ऐसे समझिए

Written by Sanjay Kumar Singh | Published on: November 10, 2020
तथाकथित पत्रकार, अर्नब गोस्वामी की गिरफ्तारी का कारण और उसके बचाव में दिए जा रहे तर्क और कुतर्क आप जानते हैं। आरोप है कि अर्नब ने महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ रिपोर्टिंग की और इससे नाराज होकर सरकार ने अर्नब के खिलाफ कार्रवाई शुरू की, कई एफआईआर दर्ज हुए और आखिरकार गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के समय पुलिस वालों के काम में बाधा डालने के लिए उनकी पत्नी और बेटे के खिलाफ भी मामला है। कार्रवाई होगी तो निश्चित रूप से कहा जाएगा कि महाराष्ट्र पुलिस ज्यादती कर रही है।



कहने की जरूरत नहीं है महाराष्ट्र में शिवसेना की सरकार है और हिन्दुत्व के मामले में वह भाजपा से बहुत आगे है। कार्यशैली आदि में भी भाजपा से आगे या बेहतर आराम से कहा जा सकता है। पर अभी उस विस्तार में नहीं भी जाऊं तो साफ है कि अर्नब जैसे मामले देश में एक दो नहीं सैकड़ों हैं। अर्नब की गिरफ्तारी को मीडिया की आजादी से जोड़कर भी आरोप लगाए गए हैं और एक राज्य सरकार पर इमरजेंसी जैसे हालात बना देने के आरोप लगाए गए हैं जबकि इमरजेंसी केंद्र सरकार लगाती है। एक तरफ हिन्दुत्व के नाम पर भाजपा को सौ खून माफ और शिवसेना उसे भी छोड़ दे जो खुलेआम मुख्यमंत्री और पुलिस प्रमुख को चुनौती देता है। पत्रकारिता के नाम पर चीखना चिल्लाना ऊपर से।

देश में कानून के शासन का आलाम यह है कि भीमाकोरेगांव मामले में कई बुद्धिजीवी आम अपराधियों से खराब स्थिति में जेलों में पड़े हैं। इनमें शारीरिक रूप से विकलांग प्रोफेसर जी साईंबाबा और 83 साल के स्टेन स्वामी (जो हाल में गिरफ्तार किए गए) प्रमुख हैं। कल सोशल मीडिया पर चर्चा थी कि स्टेन स्वामी अपनी बीमारी के कारण ग्लास, कप आदि जैसे खुले बर्तन से तरल पदार्थ नहीं पी सकते हैं। इसके लिए उन्हें स्ट्रॉ या सिपर की जरूरत होती है और अपने साथ ले गए बैग में उनका यह जरूरी सामान भी था। एक तरफ तो उन्हें उनका बैग नहीं दिया गया और इतने दिनों बाद उन्हें इसके लिए अदालत की शरण लेनी पड़ी और एनआईए ने इसके लिए कई दिन का समय मांग लिया।

आम लोगों और कमजोर-बीमार लोगों के लिए ऐसी हाल में अर्नब जैसे आरोपी से सबको सहानुभूति है। यह देश-समाज की हालत है और यह मीडिया का बनाया हुआ है। इसीलिए, एनआईए को सिपर देने का निर्णय करने के लिए हफ्तों चाहिए और अर्नब के लिए लगातार सुनवाई चल रही है। दलील दी जा रही है उसे छोड़ देने से आसामन नहीं गिर जाएगा। एख तफ लोगों की जान जा रही है, जा चुकी है और दूसरी तरफ आसमान नहीं गिरेगा इसलिए अभियुक्त को छोड़ देना चाहिए। लेकिन ऐसे ही एक मामले में एक पूर्व पुलिस अधिकारी को दो वर्ष से जेल में रखा गया गया है। पूर्व इसलिए कि नरेन्द्र मोदी के खिलाफ गवाही देने के बाद उनकी नौकरी ली जा चुकी है।

आप समझ चुके होंगे कि मैं आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट की बात कर रहा हूं। संजीव भट्ट के खिलाफ एक मामला 30 अक्तूबर 1990 का है। हिरासत में मौत का एक मामला था। इसमें उन्हें उम्र कैद की सजा हुई है। इस समय वे नशा रखने के एक अलग मामले में जेल में हैं। यह 1996 का मामला है और उनपर एक वकील को गलत फंसाने का आरोप है। दूसरे मामले में सरकार ने उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी थी। दोनों मामले तब खुले जब भट्ट ने 2011 में गुजरात के उस समय के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र दाखिल किया। इसके बाद अगस्त 2015 में उन्हें आईपीएस से निकाल दिया गया था। कार्रवाई 2011 में ही शुरू हुई थी। उनके घर का कुछ हिस्सा गिराने का भी मामला है।

ऐसी हालत में भी लोग कहते हैं कि पत्रकार को निष्पक्ष होना चाहिए। मेरा मानना है कि निष्पक्ष तो विज्ञापन प्रबंधक को होना चाहिए। ताकि पैसे देकर भी कोई अपने पक्ष में गलत और झूठी सूचना नहीं छपवा सके। पत्रकार को तो हमेशा कमजोर के साथ और सरकार के खिलाफ होना चाहिए। पत्रकार न सरकारी पार्टी में होता है और ना उसका काम प्रचारक का है। उसे सरकार की कमियां ही बतानी होती है और उसकी मनमानी पर अंकुश लगाने का प्रयास करना चाहिए। अभी आम लोगों को तो छोड़िए, पत्रकार खुद सरकारी मनमानी से सुरक्षित नहीं हैं और अर्नब की वकालत कर रहे हैं। हो सकता है, सरकार यही चाहती हो और फूट डालो राज करो के तहत पत्रकारों को ऐसी लालच दे। पर यह पत्रकारिता नहीं है। 

पत्रकार का काम तराजू लेकर बैठना या कालम सेंटमीटर नापकर खबर लिखना नहीं है। ना ही प्रसारण समय का हिसाब लगाना है। आज के समय में सरकार के खिलाफ होने के लिए रीढ़ की हड्डी जरूरी है। इसीलिए जिनकी है उनकी तारीफ की जाती है। बाकी ताली थाली तो कोई भी बजा लेता है। मिडल लेवल पर या मध्यम श्रेणी के अखबारों में पत्रकारों का जो हाल है वह किसी से छिपा नहीं है। उनमें ज्यादातर ईमानदारी से निष्पक्षता के साथ अपना काम करते हैं। पर सबसे बुरी हालत उन्हीं की है। ऐसे पत्रकारों के बारे में भी लिखा जाना चाहिए। उनका साथ दिया जाना चाहिए। 

केरल के पत्रकार सिद्दीक कप्पन को तीन अन्य के साथ दिल्ली से हाथरस वाला मामला कवर करने जाते हुए गिरफ्तार किया गया था। उसे अभी तक जमानत नहीं मिली है। बाद में उनपर यूएपीए लगा दिया गया। फिर उन्हें हाथरस साजिश मामले में भी जोड़ दिया गया। वकीलों को उनसे मिलने नहीं दिया गया। इन पत्रकारों के परिवार को इनकी गिरफ्तारी की सूचना नहीं थी। केरल के पत्रकारों की यूनियन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर मांग की है कि उनकी जमानत याचिका पर जल्दी सुनवाई की जाए। इसपर शुक्रवार छह नवंबर को सुनवाई होनी थी। अब 16 नवंबर की तारीख पड़ी है।

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