मुंबई में हर जरूरी चीज हो रही महंगी, बढ़ती कीमतों से रोजमर्रा का खर्च बढ़ा

Written by sabrang india | Published on: September 4, 2026
रसोई से लेकर रोजाना आने-जाने तक, कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी की वजह से परिवारों को वही जीवन-स्तर बनाए रखने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।



मुंबई के परिवारों के लिए सितंबर की शुरुआत एक बार फिर कीमतों में बढ़ोतरी के साथ हुई है, और इसका बोझ किसी एक चीज या आबादी के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं है। दूध, कुकिंग गैस, CNG और लोकल ट्रांसपोर्ट, सभी महंगे हो गए हैं, जिससे पूरे महाराष्ट्र में खाने-पीने की चीजों और जरूरी सेवाओं की लागत और बढ़ गई है।

कीमतों में बढ़ोतरी का यह नया दौर 1 सितंबर से लागू हुआ। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, महानगर गैस लिमिटेड (MGL) ने मुंबई और आसपास के इलाकों में CNG की कीमतें 2 रुपये प्रति किलो बढ़ाकर 88 रुपये कर दी हैं, जबकि घरेलू PNG 1 रुपये प्रति स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर महंगी हो गई है। चालू वित्त वर्ष में CNG की कीमतों में यह चौथी बढ़ोतरी है; इससे पहले मई में दो बार 2-2 रुपये की और अप्रैल में 1 रुपये की बढ़ोतरी हुई थी। इससे लगभग 13 लाख CNG वाहन मालिकों और करीब 30 लाख घरेलू PNG उपभोक्ताओं पर असर पड़ने की उम्मीद है।

MGL ने इस बढ़ोतरी की वजह वेस्ट एशिया में जारी संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गैस की कीमतों में उछाल और उसके कारण स्पॉट RLNG की लागत में हुई वृद्धि को बताया है। हालांकि, परिवारों के लिए वजह से ज्यादा अहम इसका कुल असर है: ईंधन की ज्यादा लागत का असर ट्रांसपोर्ट, डिलीवरी और रोजमर्रा के दूसरे खर्चों पर भी पड़ता है।

पब्लिक और प्राइवेट, दोनों तरह के ट्रांसपोर्ट महंगे हो गए हैं। मुंबई में ऑटो-रिक्शा का न्यूनतम किराया 26 रुपये से बढ़कर 27 रुपये हो गया है, जबकि काली-पीली टैक्सी का न्यूनतम किराया 31 रुपये से बढ़कर 33 रुपये हो गया है। ऑटो का प्रति किलोमीटर किराया 17.14 रुपये से बढ़कर 18.22 रुपये और टैक्सी का किराया 20.66 रुपये से बढ़कर 21.90 रुपये हो गया है। इंडिया टुडे ने बताया कि मुंबई में 4.5 लाख से ज्यादा ऑटो और 50,000 से ज्यादा टैक्सियां हैं, जिसका मतलब है कि इस बढ़ोतरी का असर शहर में रोजाना आने-जाने वाले लोगों के एक बड़े हिस्से पर पड़ेगा।

दूध की कीमतों में भी बड़ी बढ़ोतरी हुई है। बॉम्बे मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने तबेले के दूध की थोक कीमत 93 रुपये से बढ़ाकर 102 रुपये प्रति लीटर कर दी है। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, सप्लायर और इलाके के हिसाब से खुदरा कीमतें 110 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती हैं। एसोसिएशन ने उत्पादन और संचालन की लागत में बढ़ोतरी का हवाला दिया है; खबरों के मुताबिक, पिछले एक साल में हरे चारे, चुनी और खली (oil cakes) जैसे पशु आहार की मुख्य चीजें 25% तक महंगी हो गई हैं। यह सब महाराष्ट्र में दूध की कीमतें बढ़ने के ठीक बाद हुआ है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 11 अगस्त से गाय और भैंस के दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। मिल्क प्रोड्यूसर्स एंड प्रोसेसर्स वेलफेयर एसोसिएशन ने इस बढ़ोतरी की वजह डीजल, खरीद और पैकेजिंग की बढ़ती लागत को बताया, केवल पैकेजिंग का खर्च ही लगभग 30% बढ़ गया है।

यह दबाव सिर्फ उन घरों तक सीमित नहीं है जो दूध खरीदते हैं या ऑटो का इस्तेमाल करते हैं। कमर्शियल प्रतिष्ठानों को भी लागत बढ़ने की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। NDTV प्रॉफिट की रिपोर्ट के अनुसार, 1 सितंबर से 19-किलो वाले कमर्शियल LPG सिलेंडर की कीमत में 9.50 रुपये की बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट में इस बढ़ोतरी का कारण वेस्ट एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच इम्पोर्टेड कुकिंग गैस की सप्लाई में रुकावट और उससे पैदा हुए दबाव को बताया गया है।

रोजमर्रा के खर्चों में यह बढ़ोतरी कई महीनों से हो रही है। जुलाई में, महाराष्ट्र स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (MSRTC) ने बस के किराए में औसतन 13.5% की बढ़ोतरी की, जिससे छह किलोमीटर की यात्रा का न्यूनतम किराया 13 रुपये से बढ़कर 15 रुपये हो गया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि एक साल के भीतर राज्य परिवहन निगम द्वारा किराए में की गई यह दूसरी बड़ी बढ़ोतरी थी, जबकि पहले सालाना 4-5% की बढ़ोतरी ही आम बात थी। MSRTC रोजाना लगभग 55-60 लाख यात्रियों को ले जाती है, इसलिए किराए में मामूली बढ़ोतरी भी कामगारों, छात्रों और ग्रामीण यात्रियों के लिए मायने रखती है।

खाने-पीने की चीजों की कीमतें भी बढ़ रही हैं। 2 सितंबर को मुंबई से क्लैरियन इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया कि लोग पहले से ही चीनी, पैक्ड दूध, दाल, चावल, अंडे और अन्य जरूरी चीजों की बढ़ी हुई कीमतों से जूझ रहे हैं। रिपोर्ट में एक निवासी ने बताया कि कुछ ही हफ्तों में चीनी की कीमतें 20-25 रुपये प्रति किलोग्राम बढ़ गई हैं, जबकि घर की अन्य रोजमर्रा की चीजें भी महंगी हो गई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थिर आय और रोजगार के दबाव के बीच परिवार किराया, शिक्षा और खाने-पीने के खर्चों का तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रहे हैं।

इसलिए, यह दबाव सिर्फ ऑटो के किराए में 1 रुपये या CNG के लिए 2 रुपये की बढ़ोतरी का मामला नहीं है। समस्या कई चीजों के एक साथ जुड़ने से बनी है। एक परिवार को काम पर जाने, दूध खरीदने, खाना पकाने और रोजमर्रा का राशन खरीदने के लिए ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। ईंधन, ट्रांसपोर्ट और इनपुट की ज्यादा लागत का सामना कर रहे बिजनेस, इन खर्चों का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर डाल देते हैं।

राज्य के किसान भी महंगाई के इसी दबाव का सामना कर रहे हैं। 'द प्रिंट' की एक रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र में एक क्विंटल कपास उगाने की लागत 2018 में लगभग 3,500 रुपये थी, जो आज बढ़कर लगभग 5,000 रुपये हो गई है। खाद, कीटनाशक, ट्रैक्टर और मजदूरी की लागत बढ़ गई है, जबकि 2024-25 और उसके अगले साल के बीच कपास की खेती का रकबा 2.5 लाख हेक्टेयर कम हो गया है।

इन सभी बातों को मिलाकर देखें तो पता चलता है कि समस्या सिर्फ अलग-अलग चीजों की कीमत बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी समस्या है। एक आम परिवार को चलाने का खर्च कई मोर्चों पर बढ़ रहा है, जबकि परिवारों की इन बढ़ी हुई कीमतों को झेलने की क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि उनकी आमदनी भी उसी रफ्तार से बढ़ रही है या नहीं। कई लोगों के मामले में ऐसा नहीं हो रहा है। यही बात कीमतों में हालिया बढ़ोतरी को अहम बनाती है। हर बढ़ोतरी अलग-अलग देखने पर शायद संभालने लायक लगे। लेकिन जब दूध, ईंधन, ट्रांसपोर्ट, खाना और दूसरी जरूरी चीजों की कीमतें एक साथ बढ़ती हैं, तो सवाल यह नहीं रह जाता कि एक या पांच रुपये और लगने का क्या मतलब है। सवाल यह है कि किसी परिवार को अपने पुराने जीवन स्तर को बनाए रखने के लिए अब कितना ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।

ऐसे शहर में जहां घर का किराया और बच्चों की पढ़ाई पहले से ही परिवार की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा ले लेते हैं, वहां जरूरी चीजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी रोजमर्रा की जिंदगी गुजारने को भी एक महंगा काम बनाती जा रही है।

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