जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने मवेशी परिवहन मामले में निवारक हिरासत रद्द की, कहा- PSA सामान्य आपराधिक कानून की जगह नहीं ले सकता

Written by sabrang india | Published on: May 27, 2026
अदालत ने माना कि मवेशियों के परिवहन और ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ के तहत दर्ज आरोप, अधिकतम “कानून-व्यवस्था” से जुड़े मामले हो सकते हैं और इन्हें ‘जम्मू-कश्मीर लोक सुरक्षा अधिनियम’ (PSA) के तहत निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता।



निवारक हिरासत (preventive detention) की संवैधानिक सीमाओं की पुष्टि करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसले में, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने हाल ही में पशु परिवहन से जुड़े कई मामलों में आरोपी एक व्यक्ति की हिरासत को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत की असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल केवल इसलिए नहीं किया जा सकता कि अधिकारियों को लगता है कि सामान्य आपराधिक कानून कथित अपराधों को रोकने में विफल रहा है।

13 मई, 2026 को दिए गए फैसले ‘रेहम अली बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश’ में जस्टिस राहुल भारती ने कहा कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ आरोप—भले ही उन्हें पूरी तरह सही मान लिया जाए—“कानून-व्यवस्था” से जुड़े मुद्दे हैं, न कि “सार्वजनिक व्यवस्था” से। यह एक संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण अंतर है, जो यह तय करता है कि निवारक हिरासत कानूनों का इस्तेमाल वैध रूप से किया जा सकता है या नहीं।

कोर्ट रेहम अली द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने जम्मू-कश्मीर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम, 1978 की धारा 8(1)(a) के तहत अपनी हिरासत को चुनौती दी थी। 28 अक्टूबर, 2025 को जम्मू के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी हिरासत आदेश में आरोप लगाया गया था कि अली की गतिविधियां “सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए हानिकारक” थीं।

जम्मू के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रस्तुत पुलिस डोजियर के अनुसार, अली को 2022 से 2025 के बीच सात FIR में आरोपी बनाया गया था। अधिकारियों ने इन FIR का हवाला देते हुए उसे “पशु तस्करी” में शामिल अपराधी बताया और तर्क दिया कि उसे रोकने के लिए सामान्य आपराधिक कानून अपर्याप्त साबित हुआ है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि ये सभी सात FIR आरोपों के एक ही समूह से जुड़ी थीं—यानी पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत पशुओं या मवेशियों के परिवहन से संबंधित कथित अपराध।

फैसले में प्रशासन के उस प्रयास को खारिज कर दिया गया, जिसमें इन आरोपों को “सार्वजनिक व्यवस्था” का मुद्दा बनाकर निवारक हिरासत को उचित ठहराने की कोशिश की गई थी। जस्टिस भारती ने टिप्पणी की कि, अधिकतम, ये आरोप कानून-व्यवस्था की सामान्य समस्या को दर्शाते हैं, जिसका समाधान सामान्य आपराधिक न्याय प्रणाली के माध्यम से किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा:

“इस कोर्ट को यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि याचिकाकर्ता की निवारक हिरासत (preventive detention) का आधार ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ बनाए रखना गलत है, क्योंकि याचिकाकर्ता, अधिकतम, ‘कानून और व्यवस्था’ के मामले में एक समस्या हो सकता है। इस तरह की समस्याओं से निपटने के लिए ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (BNSS), 2023 के प्रावधान पूरी तरह सक्षम हैं—बशर्ते कानून लागू करने वाली एजेंसियां उनका सही तरीके से इस्तेमाल करें। लेकिन, चूंकि जम्मू के जिला मजिस्ट्रेट ने यह बेहद कमजोर तर्क दिया है कि देश का सामान्य कानून (ordinary law) ‘नाकाम’ हो गया है, इसलिए यह तर्क किसी व्यक्ति को उसकी ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ (personal liberty) के मौलिक अधिकार से वंचित करने के लिए निवारक हिरासत का आदेश देने का आधार नहीं बन सकता।” (पैरा 13)

एक सख्त टिप्पणी में कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट के इस तर्क की आलोचना की कि सामान्य आपराधिक कानून याचिकाकर्ता की गतिविधियों को रोकने में “नाकाम” रहा है। फैसले में कहा गया कि ऐसा आकलन निवारक हिरासत के जरिए किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को निलंबित करने का औचित्य नहीं ठहरा सकता।

कोर्ट का यह तर्क इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निवारक हिरासत से जुड़े कानूनी सिद्धांतों में हमेशा “कानून और व्यवस्था” के उल्लंघन और “सार्वजनिक व्यवस्था” को प्रभावित करने वाली अशांति के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है। जहां सामान्य आपराधिक अपराध “कानून और व्यवस्था” को प्रभावित कर सकते हैं, वहीं निवारक हिरासत संवैधानिक रूप से तभी स्वीकार्य है, जब किसी व्यक्ति की गतिविधियां सार्वजनिक जीवन की सामान्य गति को खतरे में डालती हों या व्यापक सामाजिक अव्यवस्था पैदा करती हों। यह फैसला दोहराता है कि निवारक हिरासत सामान्य आपराधिक कानून के तहत जांच, अभियोजन या कानून लागू करने की प्रक्रिया में कथित कमियों को दूर करने का कोई “शॉर्टकट” नहीं बन सकती।

कोर्ट ने हिरासत से जुड़ी प्रक्रियागत पृष्ठभूमि (procedural history) का भी संज्ञान लिया। अली को 1 नवंबर, 2025 को हिरासत में लिया गया था और उसे उसकी हिरासत से संबंधित 174 पृष्ठों का दस्तावेज सौंपा गया था। जब तक इस याचिका पर फैसला आया, तब तक वह निवारक हिरासत की अधिकतम अनुमत अवधि (एक वर्ष) में से छह महीने पहले ही हिरासत में बिता चुका था।

सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने इसी बेंच के एक पिछले फैसले (HCP No. 4/2024 - हामिद मोहम्मद मामला) का हवाला दिया, जिसमें इसी तरह के एक निवारक हिरासत आदेश की समीक्षा की गई थी।

अंततः, कोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका स्वीकार कर ली और 28 अक्टूबर, 2025 के हिरासत आदेश के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन द्वारा जारी बाद के अनुमोदन/पुष्टिकरण आदेशों को भी रद्द कर दिया। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता को जिला जेल पुंछ या किसी अन्य हिरासत केंद्र से तत्काल रिहा करें। 



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