जमानत मंजूर, आजादी नामंजूर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने “अंतरराष्ट्रीय हालात” का हवाला देते हुए बांग्लादेशी महिला की हिरासत को सही ठहराया

Written by sabrang india | Published on: March 2, 2026
छह साल हिरासत में रहने और पहले के बेल ऑर्डर के बावजूद, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने रिहाई से इनकार कर दिया और राज्य को लंबे समय से लंबित ट्रायल को छह महीने के भीतर समाप्त करने का निर्देश दिया। साथ ही सुरक्षा और ट्रायल के उद्देश्य से उसे डिटेंशन सेंटर में रखना उचित ठहराया।



मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने एक अहम आदेश में, जिसमें लंबे समय तक हिरासत और अनुच्छेद 21 के तहत विदेशी नागरिकों के अधिकारों पर सवाल उठाए गए थे, इंदौर के एक डिटेंशन सेंटर में बंद एक बांग्लादेशी महिला को रिहा करने से इनकार कर दिया, जबकि उसके खिलाफ आपराधिक मामले में उसे पहले ही जमानत मिल चुकी थी।

लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने 23 फरवरी, 2026 को एक हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि लंबित ट्रायल और “मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात” को देखते हुए, नियमित जेल के बजाय डिटेंशन सेंटर में उसका निरंतर रहना उचित है। हालांकि, कोर्ट ने राज्य अभियोजन को लंबे समय से लंबित ट्रायल को छह महीने के भीतर समाप्त करने का निर्देश दिया।

याचिका: जमानत मिली, फिर भी हिरासत

याचिकाकर्ता, जिसकी पहचान आदेश में बांग्लादेशी नागरिक लीमा @ रिया शेख के रूप में हुई है, ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कई राहतें मांगीं, जिनमें शामिल हैं:

● जिसे उसने “गैर-कानूनी और गैर-संवैधानिक हिरासत” बताया, उससे तत्काल रिहाई।

● ट्रायल का शीघ्र निपटारा।

● यह घोषणा कि जमानत के बावजूद उसे लगातार हिरासत में रखना अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है।

● प्रत्यर्पण/वापसी के लिए संबंधित दूतावास और अधिकारियों के साथ समन्वय के निर्देश।

● मुआवजा और कथित गैर-कानूनी हिरासत की जांच।

उसके खिलाफ मामला इंदौर में दर्ज अपराध संख्या 70/2020 से संबंधित है। उस पर भारतीय दंड संहिता की धाराएं 346, 347, 323, 364-A, 506 और 34 के तहत आरोप लगाए गए हैं, साथ ही फॉरेनर्स एक्ट की धारा 14(a), 14(b) और 14(c) तथा पासपोर्ट एक्ट, 1967 के प्रावधानों के तहत भी आरोप हैं। आरोपों में फिरौती के लिए अपहरण, अवैध बंधक बनाना, मारपीट, आपराधिक धमकी और जाली या अमान्य यात्रा दस्तावेजों के साथ भारत में अवैध रूप से निवास करना शामिल है।

गौरतलब है कि उसे आपराधिक मामले में पहले ही जमानत मिल चुकी थी। इसके बावजूद, वह इंदौर की जिला जेल परिसर में बने डिटेंशन सेंटर में निरुद्ध रही।

राज्य का पक्ष: फॉरेनर्स कानून के तहत निरुद्ध

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने दलील दी कि भले ही जमानत मिल चुकी हो, लेकिन याचिकाकर्ता को सार्वजनिक क्षेत्र में नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि वह एक विदेशी नागरिक है और उसका ट्रायल अभी लंबित है।

राज्य ने फॉरेनर्स एक्ट, 1946 और फॉरेनर्स ऑर्डर, 1948 के प्रावधानों का हवाला दिया। उसका कहना था कि सक्षम प्राधिकारी — जिला मजिस्ट्रेट, इंदौर — ने ट्रायल समाप्त होने तक उसे डिटेंशन सेंटर में अस्थायी रूप से रखने की अनुमति देने वाला आदेश पारित किया है। हीरा नगर ज़ोन, इंदौर के सहायक पुलिस आयुक्त का एक पत्र भी अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

कोर्ट का तर्क: उपस्थिति आवश्यक, सुरक्षा का ध्यान

बेंच ने रिहाई का आदेश देने से इनकार करते हुए कहा: “इसमें कोई संदेह नहीं है कि ट्रायल अभी लंबित है और ट्रायल के दौरान किसी भी समय याचिकाकर्ता की उपस्थिति की आवश्यकता पड़ सकती है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात को देखते हुए, उसे डिटेंशन सेंटर में रखना उसकी सुरक्षा के लिए भी उचित है।” (पैरा 4)

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि वह डिटेंशन सेंटर में थी, न कि दंडात्मक जेल में, और विदेशी नागरिकों से संबंधित कानूनों के तहत दंडात्मक कारावास और प्रशासनिक निरुद्धि के बीच स्पष्ट अंतर बताया।

साथ ही, बेंच ने माना कि ट्रायल छह वर्षों से अधिक समय से लंबित है। देरी को देखते हुए, कोर्ट ने राज्य के वकील को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह महीने के भीतर गवाहों को पेश कर ट्रायल में तेजी लाई जाए।

“हालांकि, जहां तक राहत संख्या 7(b) का प्रश्न है, यह देखते हुए कि ट्रायल छह वर्षों से अधिक समय से लंबित है, राज्य के वकील यह सुनिश्चित करेंगे कि आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह महीने के भीतर गवाहों को प्रस्तुत कर ट्रायल में तेजी लाई जाए। यदि उक्त अवधि में कोई प्रगति नहीं होती है, तो याचिकाकर्ता को ट्रायल में तेजी लाने हेतु नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता होगी।” (पैरा 4)

यदि निर्धारित अवधि में उल्लेखनीय प्रगति नहीं होती है, तो याचिकाकर्ता को पुनः अदालत का रुख करने की स्वतंत्रता दी गई है।

छह साल का ट्रायल और संवैधानिक प्रश्न

यह आदेश एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न को सामने लाता है: क्या कोई व्यक्ति — विशेषकर विदेशी नागरिक — सक्षम अदालत से जमानत मिलने के बावजूद कार्यपालिका के प्रशासनिक तंत्र के तहत निरुद्ध रखा जा सकता है?

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि जमानत के बाद लंबी हिरासत मनमानी है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करती है। हालांकि कोर्ट ने विस्तृत संवैधानिक विश्लेषण नहीं किया, लेकिन उसने फॉरेनर्स एक्ट के ढांचे के तहत निरुद्धि की वैधता को बरकरार रखा और ट्रायल में उपस्थिति तथा अंतरराष्ट्रीय संदर्भ से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता दी।

“मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात” शब्द का आदेश में विस्तार से उल्लेख नहीं है, लेकिन प्रतीत होता है कि अदालत के जोखिम और विवेक के आकलन में इसका प्रभाव रहा।

अंतिम निर्देश

हेबियस कॉर्पस याचिका का निपटारा करते हुए, हाई कोर्ट ने:

● डिटेंशन सेंटर से तत्काल रिहाई से इनकार किया।

● अभियोजन को छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा करने का निर्देश दिया।

● ट्रायल में प्रगति न होने की स्थिति में याचिकाकर्ता को पुनः अदालत जाने की स्वतंत्रता दी।

● आदेश की प्रति संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

इस प्रकार मामला एक संवैधानिक दुविधा को उजागर करता है: एक विदेशी नागरिक को जमानत मिलने के बावजूद, दोषसिद्धि के बिना प्रशासनिक आदेश के तहत निरुद्ध रखा गया है, और वह ऐसे ट्रायल की प्रतीक्षा कर रही है जो पहले ही छह वर्षों से लंबित है — और अब अदालत ने औपचारिक रूप से छह महीने की समय-सीमा निर्धारित कर दी है।

पूरा आदेश यहां पढ़ा जा सकता है।



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