शिलांग के प्रशिक्षण केंद्र में संदिग्ध मेनिंगोकोकल बैक्टीरियल संक्रमण से दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत के बाद शुक्रवार, 27 फरवरी को स्वास्थ्य परामर्श जारी किया गया है।

साभार :पीटीआई, प्रतीकात्मक तस्वीर
मेघालय सरकार ने शिलांग के प्रशिक्षण केंद्र में संदिग्ध मेनिंगोकोकल बैक्टीरियल संक्रमण से दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत के बाद शुक्रवार, 27 फरवरी को स्वास्थ्य परामर्श जारी किया। सरकार ने लोगों से भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर रहने और निर्धारित स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने की अपील की है।
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, असम रेजिमेंटल सेंटर (एआरसी) के 30 से अधिक प्रशिक्षुओं में से एक की करीब एक सप्ताह पहले मिलिट्री हॉस्पिटल, शिलांग में मृत्यु हो गई थी। एक अन्य प्रशिक्षु का 23 फरवरी को निधन हुआ। बाकी प्रशिक्षुओं को क्वारंटीन कर मेडिकल निगरानी में रखा गया है।
मेनिंगोकोकल संक्रमण (Meningococcal infection) तेजी से फैलने वाली गंभीर बीमारी है, जो निस्सेरिया मेनिंगिटिडिस (Neisseria meningitidis) नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। यह संक्रमण जानलेवा रूप ले सकता है और मेनिनजाइटिस (मस्तिष्क की झिल्लियों में सूजन) या मेनिंगोकोसेमिया (रक्त में गंभीर संक्रमण) का कारण बन सकता है। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, गर्दन में जकड़न और त्वचा पर चकत्ते शामिल हैं।
द वायर ने लिखा कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के आयुक्त-सचिव जोराम बेदा ने 26 फरवरी को ‘मेनिंगोकोकल रोग’ को लेकर जारी परामर्श में बताया कि ईस्ट खासी हिल्स जिला निगरानी इकाई ने मामले की सक्रिय महामारी विज्ञान संबंधी जांच शुरू कर दी है।
परामर्श में कहा गया, “मामले की जांच, संपर्कों की पहचान, लैबोरेटरी रिव्यू और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की प्रक्रिया जारी है।”
सरकार ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है। राज्य के किसी अन्य हिस्से से अब तक कोई नया संदिग्ध मामला सामने नहीं आया है। सरकार ने यह भी बताया कि मानक प्रकोप प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल के तहत सभी जरूरी सार्वजनिक स्वास्थ्य कदम उठाए जा रहे हैं, जिनमें संक्रमित व्यक्तियों के निकट संपर्कों की पहचान और उनकी निगरानी शामिल है।
सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे भीड़भाड़ वाली जगहों से दूरी बनाए रखें, भीड़ में मास्क का इस्तेमाल करें, श्वसन स्वच्छता का पालन करें और साबुन या सैनिटाइज़र से नियमित रूप से हाथ साफ करते रहें। इसके साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि अचानक तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, तेजी से फैलने वाले बैंगनी धब्बों जैसे चकत्ते, बाद की अवस्था में हाथ-पैरों का पीला पड़ना, रक्त संचार में गड़बड़ी, शॉक या मल्टी-ऑर्गन फेलियर जैसे लक्षण नजर आएं, तो तुरंत निकटतम स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें।
इस बीच, सेना के एक प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि असम रेजिमेंटल सेंटर में संदिग्ध मेनिंगोकोकल संक्रमण का कोई नया मामला दर्ज नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “सावधानी के तौर पर शुरुआती मामलों के संपर्क में आए लोगों को मिलिट्री अस्पताल में आइसोलेशन में रखा गया है। साथ ही मास्क पहनने और आवाजाही पर नियंत्रण से जुड़े प्रोटोकॉल जारी रखे गए हैं।”
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरुवार (26 फरवरी) को मणिपुर में हुई जातीय हिंसा की जांच के लिए 4 जून 2023 को गठित तीन सदस्यीय जांच आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बलबीर सिंह चौहान को सौंपी है।
सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, वे 1 मार्च से अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करेंगे। अधिसूचना में यह भी उल्लेख किया गया है कि मौजूदा अध्यक्ष, सेवानिवृत्त जस्टिस अजय लांबा का इस्तीफा सरकार ने स्वीकार कर लिया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष नवंबर में आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 20 मई 2026 तक की समयसीमा दी गई थी। यह आयोग को दिया गया पांचवां विस्तार है। इससे पहले रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तारीख 20 नवंबर 2025 निर्धारित की गई थी। जांच आयोग के दो कार्यालय हैं—एक मणिपुर के इंफाल में और दूसरा नई दिल्ली में।
मामले से जुड़े एक व्यक्ति के अनुसार, सेवानिवृत्त जस्टिस लांबा ने निजी कारणों से इस्तीफा दिया। उनके मुताबिक, जांच अब ऐसे अहम चरण में पहुंच गई है, जहां भौतिक साक्ष्य और गवाहों के बयान नई दिल्ली में दर्ज किए जाने हैं। इसके लिए समिति के सभी सदस्यों की प्रतिदिन नई दिल्ली स्थित कार्यालय में मौजूदगी जरूरी होगी। यात्रा और अन्य व्यवस्थाओं से जुड़ी व्यक्तिगत दिक्कतों के चलते उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया। बताया गया कि उनके इस्तीफे का जांच प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना में उल्लेख किया गया है कि 4 जून 2023 को जारी मूल अधिसूचना तथा 13 सितंबर 2024, 3 दिसंबर 2024, 20 मई 2025 और 16 दिसंबर 2025 को किए गए संशोधनों के क्रम में, मणिपुर हिंसा जैसे सार्वजनिक महत्व के विषय की जांच के लिए गठित आयोग के अध्यक्ष पद से 28 फरवरी 2026 से प्रभावी जस्टिस अजय लांबा के इस्तीफे को स्वीकार कर लिया गया है। इसके बाद केंद्र सरकार ने जांच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 3(3) के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए 1 मार्च 2026 से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बलबीर सिंह चौहान को आयोग का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है।
यह आयोग, जिसकी अगुवाई पहले गौहाटी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा कर रहे थे, 3 जून 2023 को गठित किया गया था। समिति में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हिमांशु शेखर दास और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अलोका प्रभाकर भी सदस्य के रूप में शामिल हैं। आयोग को 3 मई 2023 से शुरू हुई और विभिन्न समुदायों को निशाना बनाकर की गई हिंसा व दंगों के कारणों तथा उनके विस्तार की जांच का दायित्व सौंपा गया है।
आयोग को प्रारंभिक रूप से निर्देश दिया गया था कि वह अपनी पहली बैठक (4 जून 2023) से छह महीने के भीतर, यथाशीघ्र अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपे।
सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, आयोग हिंसा से पहले हुई घटनाओं के क्रम और उससे जुड़े सभी तथ्यों की पड़ताल करेगा। साथ ही, यह भी जांचेगा कि संबंधित अधिकारियों या व्यक्तियों की ओर से किसी प्रकार की लापरवाही या कर्तव्य में चूक तो नहीं हुई। इसके अलावा, आयोग हिंसा और दंगों की रोकथाम तथा उनसे निपटने के लिए उठाए गए प्रशासनिक कदमों की पर्याप्तता का भी आकलन करेगा।
गौरतलब है कि मई 2023 में मणिपुर में मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़क उठी थी। तब से अब तक करीब 260 लोगों की मौत हो चुकी है और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं।
कार्यकर्ता ने पूर्वी सीमांत क्षेत्र में अवैध कोयला खनन पर जताई चिंता
असम के पूर्वी सीमांत क्षेत्र में अवैध कोयला खनन के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने राज्य सरकार से मांग की है कि डिगबोई वन प्रभाग के तहत आने वाले चार संवेदनशील आरक्षित वनों को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील तिराप-टिपोंग वन गलियारे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है।
असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा को गोलाघाट के जिला आयुक्त के माध्यम से हाल ही में सौंपे गए एक ज्ञापन में पर्यावरण कार्यकर्ता अपूर्व बल्लभ गोस्वामी ने जगुन, लेखापानी और मार्गेरिटा वन रेंजों में कथित ‘रैट-होल’ खनन गतिविधियों का मुद्दा उठाया।
उन्होंने बताया कि तिनसुकिया जिले के डूमडूमा वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाली जगुन रेंज में जारी खनन गतिविधियां 231.65 वर्ग किलोमीटर में फैले देहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान से लगे वन क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं।
गोस्वामी ने सुझाव दिया कि तिराप, टिपोंग, सालेकी और मकुमपानी आरक्षित वनों को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया जाए। उनका मानना है कि अभयारण्य का दर्जा मिलने से अतिक्रमण और अवैध खनन के खिलाफ सख्त कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित होगी। उन्होंने तर्क दिया कि इससे कोयला पट्टी क्षेत्र की जैव विविधता, हाथियों के आवागमन गलियारों तथा महत्वपूर्ण नदी तंत्रों के दीर्घकालिक संरक्षण में मदद मिलेगी।
डिगबोई वन प्रभाग से जुड़े एक पूर्व वन अधिकारी ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। उनका कहना है कि उच्च कानूनी दर्जा मिलने से संवेदनशील वन क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था मजबूत होगी और नियमों के प्रभावी अनुपालन को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
एक स्थानीय वन्यजीव कार्यकर्ता ने यह भी कहा कि अभयारण्य की स्पष्ट और विधिवत निर्धारित सीमाएं तय होने से असम–अरुणाचल प्रदेश सीमा के कुछ हिस्सों में, खासकर धारा बदलने वाली लेका हाका नदी के आसपास, बार-बार उत्पन्न होने वाले अधिकार-क्षेत्र संबंधी भ्रम को दूर किया जा सकेगा। उनका मानना है कि इससे प्रशासनिक समन्वय बेहतर होगा और निगरानी व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सकेगी।
मिजोरम विधानसभा ने मंगलवार, 24 फरवरी को महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभावों वाले एक बड़े विधायी कदम के तहत सर्वसम्मति से मिजो विवाह एवं संपत्ति उत्तराधिकार (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जिससे विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में राज्य के पारंपरिक कानूनों के दायरे में बदलाव किया गया है।
संशोधन के तहत अब वे मिजो महिलाएं, जिन्होंने गैर-मिजो व्यक्तियों से विवाह किया है, साथ ही उनके बच्चे और पोते-पोतियां, मिजो पारंपरिक कानून के दायरे में नहीं माने जाएंगे। यह प्रावधान संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े मामलों पर भी लागू होगा।
इस विधेयक को मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने सदन में प्रस्तुत किया, जो विधि एवं न्याय विभाग का दायित्व भी संभाल रहे हैं। संशोधन पेश करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में पारित मूल अधिनियम की कई धाराओं और उपधाराओं में बदलती सामाजिक परिस्थितियों तथा विभिन्न संगठनों से मिले सुझावों को ध्यान में रखते हुए संशोधन आवश्यक हो गया था।
उन्होंने कहा कि मौजूदा अधिनियम की धारा 2 वर्तमान में मिजोरम में पुरुषों और महिलाओं से जुड़े सभी विवाहों को कवर करती है।
हालांकि, संशोधित प्रावधान के तहत यह अधिनियम अब केवल उन विवाहों पर लागू होगा, जिनमें दोनों पक्ष मिजो जनजाति से संबंधित हों या जहां पुरुष साथी मिजो जनजाति से हो।
संशोधन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लालदुहोमा ने सदन में कहा कि गैर-मिजो व्यक्ति से विवाह करने वाली मिजो महिलाएं अब मिजो विवाह एवं संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम तथा मिजो पारंपरिक कानून के दायरे में नहीं आएंगी।
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि गैर-मिजो से विवाह करने वाली ऐसी महिलाओं, उनके बच्चों और पोते-पोतियों को पारंपरिक कानून के तहत मिजो नहीं माना जाएगा। साथ ही, इस व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा भी प्राप्त नहीं होगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि संशोधन विधेयक प्रमुख नागरिक समाज संगठनों और वैधानिक संस्थाओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श और सुझावों के बाद तैयार किया गया है, जिनमें मिजो ह्मेइच्हे इंसुइख्खाम पावल, मिजोरम राज्य महिला आयोग, यंग मिजो एसोसिएशन, मिजोरम उपा पावल तथा मिजोरम विधि आयोग शामिल हैं।
वाईएमए की केंद्रीय समिति के एक नेता ने कहा कि धारा 2 में प्रस्तावित बदलाव मिजो महिलाओं द्वारा गैर-मिजो लोगों से बढ़ते विवाहों की पृष्ठभूमि में सुझाया गया था।
उनके अनुसार, ऐसी महिलाओं और उनके वंशजों को मिजो और अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता समाप्त करने का प्रावधान एक निवारक के रूप में काम कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यह संशोधन मिजो समुदाय के संभावित सामाजिक समावेशन के खतरे से बचाव का उपाय भी बन सकता है।
इस बीच, राज्य के सबसे बड़े महिला संगठन Mizo Hmeichhe Insuihkhawm Pawl (एमएचआईपी) ने शुक्रवार को राज्य सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग की। संगठन ने इसे मिजो महिलाओं के लिए संभावित रूप से “असुरक्षित” करार दिया।
वहीं, आलोचनाओं का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने कानून का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक मिजो कस्टमरी लॉ रिव्यू कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है, जिसमें 10 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
मेघालय में देश में सबसे ज्यादा एचआईवी पीड़ित, 10,000 से अधिक मरीजों का चल रहा इलाज
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डब्ल्यू. शायला ने बुधवार (25 फरवरी) को विधानसभा में बताया कि पूरे देश में एचआईवी संक्रमण के सर्वाधिक मामले मेघालय में दर्ज किए गए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में 10,000 से अधिक मरीजों का इलाज चल रहा है।
उन्होंने बताया कि स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार ने पहले ही 25 करोड़ रुपये की पांच वर्षीय इंटरवेंशन योजना को मंजूरी दे दी है।
न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, मंत्री ने बताया कि वर्तमान में राज्य में एचआईवी से पीड़ित 10,293 लोग एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) ले रहे हैं।
मेहताब चांडी ए. संगमा के प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया कि एचआईवी/एड्स के मामलों में हो रही “चिंताजनक वृद्धि” से निपटने के लिए अगले पांच वर्षों के लिए मिशन मोड कार्यक्रम के तहत 25 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है।
मंत्री के मुताबिक, पिछले दस वर्षों में इस बीमारी से संबंधित कुल 749 मौतें दर्ज की गई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 435 मौतें ईस्ट खासी हिल्स जिले में हुईं। इसके बाद वेस्ट जयंतिया हिल्स और ईस्ट जयंतिया हिल्स जिलों का स्थान रहा।
अन्य जिलों—री भोई, ईस्टर्न वेस्ट खासी हिल्स, वेस्ट खासी हिल्स, साउथ वेस्ट खासी हिल्स, वेस्ट गारो हिल्स, ईस्ट गारो हिल्स, साउथ गारो हिल्स, नॉर्थ गारो हिल्स और साउथ वेस्ट गारो हिल्स—में तुलनात्मक रूप से कम मौतें दर्ज की गईं।
शायला ने बताया कि यह उल्लेखनीय है कि दर्ज की गई सभी मौतें समय-समय पर होने वाले अवसरवादी संक्रमणों (opportunistic infections) के कारण हुईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी मृत्यु का कारण सीधे तौर पर एचआईवी/एड्स नहीं बताया गया।
संक्रमण में वृद्धि के कारणों पर मंत्री ने कहा कि एचआईवी और एड्स (रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम के तहत लागू गोपनीयता संबंधी प्रावधान, साथ ही इस बीमारी से जुड़ा सामाजिक कलंक, प्रभावी रोकथाम और नियंत्रण के प्रयासों के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
उन्होंने कहा, “एचआईवी की स्थिति को गोपनीय रखना अनिवार्य है। बिना सहमति के किसी की जांच नहीं की जा सकती और न ही किसी को उपचार लेने के लिए बाध्य किया जा सकता। सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक कलंक है, जिसके कारण लोग जांच कराने से हिचकिचाते हैं।”
उन्होंने बताया कि इन चुनौतियों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग उपचार बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान तेज कर रहा है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन ने वर्ष 2025-26 के लिए मेघालय एड्स नियंत्रण सोसाइटी को 17.8 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। यह राशि जागरूकता कार्यक्रमों, वेलनेस कार्यक्रमों, टारगेटेड आउटरीच, ओपिओइड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी सेंटर, स्क्रीनिंग और केयर सपोर्ट सेवाओं को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल की जाएगी।
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साभार :पीटीआई, प्रतीकात्मक तस्वीर
मेघालय सरकार ने शिलांग के प्रशिक्षण केंद्र में संदिग्ध मेनिंगोकोकल बैक्टीरियल संक्रमण से दो अग्निवीर प्रशिक्षुओं की मौत के बाद शुक्रवार, 27 फरवरी को स्वास्थ्य परामर्श जारी किया। सरकार ने लोगों से भीड़भाड़ वाली जगहों से दूर रहने और निर्धारित स्वास्थ्य प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करने की अपील की है।
‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के अनुसार, असम रेजिमेंटल सेंटर (एआरसी) के 30 से अधिक प्रशिक्षुओं में से एक की करीब एक सप्ताह पहले मिलिट्री हॉस्पिटल, शिलांग में मृत्यु हो गई थी। एक अन्य प्रशिक्षु का 23 फरवरी को निधन हुआ। बाकी प्रशिक्षुओं को क्वारंटीन कर मेडिकल निगरानी में रखा गया है।
मेनिंगोकोकल संक्रमण (Meningococcal infection) तेजी से फैलने वाली गंभीर बीमारी है, जो निस्सेरिया मेनिंगिटिडिस (Neisseria meningitidis) नामक बैक्टीरिया के कारण होती है। यह संक्रमण जानलेवा रूप ले सकता है और मेनिनजाइटिस (मस्तिष्क की झिल्लियों में सूजन) या मेनिंगोकोसेमिया (रक्त में गंभीर संक्रमण) का कारण बन सकता है। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार, सिरदर्द, गर्दन में जकड़न और त्वचा पर चकत्ते शामिल हैं।
द वायर ने लिखा कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के आयुक्त-सचिव जोराम बेदा ने 26 फरवरी को ‘मेनिंगोकोकल रोग’ को लेकर जारी परामर्श में बताया कि ईस्ट खासी हिल्स जिला निगरानी इकाई ने मामले की सक्रिय महामारी विज्ञान संबंधी जांच शुरू कर दी है।
परामर्श में कहा गया, “मामले की जांच, संपर्कों की पहचान, लैबोरेटरी रिव्यू और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की प्रक्रिया जारी है।”
सरकार ने लोगों को भरोसा दिलाया है कि हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है और स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है। राज्य के किसी अन्य हिस्से से अब तक कोई नया संदिग्ध मामला सामने नहीं आया है। सरकार ने यह भी बताया कि मानक प्रकोप प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल के तहत सभी जरूरी सार्वजनिक स्वास्थ्य कदम उठाए जा रहे हैं, जिनमें संक्रमित व्यक्तियों के निकट संपर्कों की पहचान और उनकी निगरानी शामिल है।
सरकार ने नागरिकों से अपील की है कि वे भीड़भाड़ वाली जगहों से दूरी बनाए रखें, भीड़ में मास्क का इस्तेमाल करें, श्वसन स्वच्छता का पालन करें और साबुन या सैनिटाइज़र से नियमित रूप से हाथ साफ करते रहें। इसके साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि अचानक तेज बुखार, सिरदर्द, उल्टी, तेजी से फैलने वाले बैंगनी धब्बों जैसे चकत्ते, बाद की अवस्था में हाथ-पैरों का पीला पड़ना, रक्त संचार में गड़बड़ी, शॉक या मल्टी-ऑर्गन फेलियर जैसे लक्षण नजर आएं, तो तुरंत निकटतम स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करें।
इस बीच, सेना के एक प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि असम रेजिमेंटल सेंटर में संदिग्ध मेनिंगोकोकल संक्रमण का कोई नया मामला दर्ज नहीं हुआ है। उन्होंने कहा, “सावधानी के तौर पर शुरुआती मामलों के संपर्क में आए लोगों को मिलिट्री अस्पताल में आइसोलेशन में रखा गया है। साथ ही मास्क पहनने और आवाजाही पर नियंत्रण से जुड़े प्रोटोकॉल जारी रखे गए हैं।”
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गुरुवार (26 फरवरी) को मणिपुर में हुई जातीय हिंसा की जांच के लिए 4 जून 2023 को गठित तीन सदस्यीय जांच आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बलबीर सिंह चौहान को सौंपी है।
सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, वे 1 मार्च से अध्यक्ष का पदभार ग्रहण करेंगे। अधिसूचना में यह भी उल्लेख किया गया है कि मौजूदा अध्यक्ष, सेवानिवृत्त जस्टिस अजय लांबा का इस्तीफा सरकार ने स्वीकार कर लिया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष नवंबर में आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 20 मई 2026 तक की समयसीमा दी गई थी। यह आयोग को दिया गया पांचवां विस्तार है। इससे पहले रिपोर्ट जमा करने की अंतिम तारीख 20 नवंबर 2025 निर्धारित की गई थी। जांच आयोग के दो कार्यालय हैं—एक मणिपुर के इंफाल में और दूसरा नई दिल्ली में।
मामले से जुड़े एक व्यक्ति के अनुसार, सेवानिवृत्त जस्टिस लांबा ने निजी कारणों से इस्तीफा दिया। उनके मुताबिक, जांच अब ऐसे अहम चरण में पहुंच गई है, जहां भौतिक साक्ष्य और गवाहों के बयान नई दिल्ली में दर्ज किए जाने हैं। इसके लिए समिति के सभी सदस्यों की प्रतिदिन नई दिल्ली स्थित कार्यालय में मौजूदगी जरूरी होगी। यात्रा और अन्य व्यवस्थाओं से जुड़ी व्यक्तिगत दिक्कतों के चलते उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया। बताया गया कि उनके इस्तीफे का जांच प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की अधिसूचना में उल्लेख किया गया है कि 4 जून 2023 को जारी मूल अधिसूचना तथा 13 सितंबर 2024, 3 दिसंबर 2024, 20 मई 2025 और 16 दिसंबर 2025 को किए गए संशोधनों के क्रम में, मणिपुर हिंसा जैसे सार्वजनिक महत्व के विषय की जांच के लिए गठित आयोग के अध्यक्ष पद से 28 फरवरी 2026 से प्रभावी जस्टिस अजय लांबा के इस्तीफे को स्वीकार कर लिया गया है। इसके बाद केंद्र सरकार ने जांच आयोग अधिनियम, 1952 की धारा 3(3) के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए 1 मार्च 2026 से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बलबीर सिंह चौहान को आयोग का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है।
यह आयोग, जिसकी अगुवाई पहले गौहाटी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अजय लांबा कर रहे थे, 3 जून 2023 को गठित किया गया था। समिति में सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हिमांशु शेखर दास और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अलोका प्रभाकर भी सदस्य के रूप में शामिल हैं। आयोग को 3 मई 2023 से शुरू हुई और विभिन्न समुदायों को निशाना बनाकर की गई हिंसा व दंगों के कारणों तथा उनके विस्तार की जांच का दायित्व सौंपा गया है।
आयोग को प्रारंभिक रूप से निर्देश दिया गया था कि वह अपनी पहली बैठक (4 जून 2023) से छह महीने के भीतर, यथाशीघ्र अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपे।
सरकारी अधिसूचना के मुताबिक, आयोग हिंसा से पहले हुई घटनाओं के क्रम और उससे जुड़े सभी तथ्यों की पड़ताल करेगा। साथ ही, यह भी जांचेगा कि संबंधित अधिकारियों या व्यक्तियों की ओर से किसी प्रकार की लापरवाही या कर्तव्य में चूक तो नहीं हुई। इसके अलावा, आयोग हिंसा और दंगों की रोकथाम तथा उनसे निपटने के लिए उठाए गए प्रशासनिक कदमों की पर्याप्तता का भी आकलन करेगा।
गौरतलब है कि मई 2023 में मणिपुर में मेईतेई और कुकी समुदायों के बीच जातीय हिंसा भड़क उठी थी। तब से अब तक करीब 260 लोगों की मौत हो चुकी है और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं।
कार्यकर्ता ने पूर्वी सीमांत क्षेत्र में अवैध कोयला खनन पर जताई चिंता
असम के पूर्वी सीमांत क्षेत्र में अवैध कोयला खनन के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए एक पर्यावरण कार्यकर्ता ने राज्य सरकार से मांग की है कि डिगबोई वन प्रभाग के तहत आने वाले चार संवेदनशील आरक्षित वनों को वन्यजीव अभयारण्य का दर्जा दिया जाए। उनका कहना है कि पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील तिराप-टिपोंग वन गलियारे की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम बेहद जरूरी है।
असम ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा को गोलाघाट के जिला आयुक्त के माध्यम से हाल ही में सौंपे गए एक ज्ञापन में पर्यावरण कार्यकर्ता अपूर्व बल्लभ गोस्वामी ने जगुन, लेखापानी और मार्गेरिटा वन रेंजों में कथित ‘रैट-होल’ खनन गतिविधियों का मुद्दा उठाया।
उन्होंने बताया कि तिनसुकिया जिले के डूमडूमा वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाली जगुन रेंज में जारी खनन गतिविधियां 231.65 वर्ग किलोमीटर में फैले देहिंग पटकाई राष्ट्रीय उद्यान से लगे वन क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव डाल रही हैं।
गोस्वामी ने सुझाव दिया कि तिराप, टिपोंग, सालेकी और मकुमपानी आरक्षित वनों को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया जाए। उनका मानना है कि अभयारण्य का दर्जा मिलने से अतिक्रमण और अवैध खनन के खिलाफ सख्त कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित होगी। उन्होंने तर्क दिया कि इससे कोयला पट्टी क्षेत्र की जैव विविधता, हाथियों के आवागमन गलियारों तथा महत्वपूर्ण नदी तंत्रों के दीर्घकालिक संरक्षण में मदद मिलेगी।
डिगबोई वन प्रभाग से जुड़े एक पूर्व वन अधिकारी ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया है। उनका कहना है कि उच्च कानूनी दर्जा मिलने से संवेदनशील वन क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था मजबूत होगी और नियमों के प्रभावी अनुपालन को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
एक स्थानीय वन्यजीव कार्यकर्ता ने यह भी कहा कि अभयारण्य की स्पष्ट और विधिवत निर्धारित सीमाएं तय होने से असम–अरुणाचल प्रदेश सीमा के कुछ हिस्सों में, खासकर धारा बदलने वाली लेका हाका नदी के आसपास, बार-बार उत्पन्न होने वाले अधिकार-क्षेत्र संबंधी भ्रम को दूर किया जा सकेगा। उनका मानना है कि इससे प्रशासनिक समन्वय बेहतर होगा और निगरानी व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सकेगी।
मिजोरम विधानसभा ने मंगलवार, 24 फरवरी को महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभावों वाले एक बड़े विधायी कदम के तहत सर्वसम्मति से मिजो विवाह एवं संपत्ति उत्तराधिकार (संशोधन) विधेयक, 2026 पारित किया, जिससे विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में राज्य के पारंपरिक कानूनों के दायरे में बदलाव किया गया है।
संशोधन के तहत अब वे मिजो महिलाएं, जिन्होंने गैर-मिजो व्यक्तियों से विवाह किया है, साथ ही उनके बच्चे और पोते-पोतियां, मिजो पारंपरिक कानून के दायरे में नहीं माने जाएंगे। यह प्रावधान संपत्ति के उत्तराधिकार से जुड़े मामलों पर भी लागू होगा।
इस विधेयक को मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने सदन में प्रस्तुत किया, जो विधि एवं न्याय विभाग का दायित्व भी संभाल रहे हैं। संशोधन पेश करते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 में पारित मूल अधिनियम की कई धाराओं और उपधाराओं में बदलती सामाजिक परिस्थितियों तथा विभिन्न संगठनों से मिले सुझावों को ध्यान में रखते हुए संशोधन आवश्यक हो गया था।
उन्होंने कहा कि मौजूदा अधिनियम की धारा 2 वर्तमान में मिजोरम में पुरुषों और महिलाओं से जुड़े सभी विवाहों को कवर करती है।
हालांकि, संशोधित प्रावधान के तहत यह अधिनियम अब केवल उन विवाहों पर लागू होगा, जिनमें दोनों पक्ष मिजो जनजाति से संबंधित हों या जहां पुरुष साथी मिजो जनजाति से हो।
संशोधन के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लालदुहोमा ने सदन में कहा कि गैर-मिजो व्यक्ति से विवाह करने वाली मिजो महिलाएं अब मिजो विवाह एवं संपत्ति उत्तराधिकार अधिनियम तथा मिजो पारंपरिक कानून के दायरे में नहीं आएंगी।
उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि गैर-मिजो से विवाह करने वाली ऐसी महिलाओं, उनके बच्चों और पोते-पोतियों को पारंपरिक कानून के तहत मिजो नहीं माना जाएगा। साथ ही, इस व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा भी प्राप्त नहीं होगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि संशोधन विधेयक प्रमुख नागरिक समाज संगठनों और वैधानिक संस्थाओं के साथ व्यापक विचार-विमर्श और सुझावों के बाद तैयार किया गया है, जिनमें मिजो ह्मेइच्हे इंसुइख्खाम पावल, मिजोरम राज्य महिला आयोग, यंग मिजो एसोसिएशन, मिजोरम उपा पावल तथा मिजोरम विधि आयोग शामिल हैं।
वाईएमए की केंद्रीय समिति के एक नेता ने कहा कि धारा 2 में प्रस्तावित बदलाव मिजो महिलाओं द्वारा गैर-मिजो लोगों से बढ़ते विवाहों की पृष्ठभूमि में सुझाया गया था।
उनके अनुसार, ऐसी महिलाओं और उनके वंशजों को मिजो और अनुसूचित जनजाति के रूप में मान्यता समाप्त करने का प्रावधान एक निवारक के रूप में काम कर सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यह संशोधन मिजो समुदाय के संभावित सामाजिक समावेशन के खतरे से बचाव का उपाय भी बन सकता है।
इस बीच, राज्य के सबसे बड़े महिला संगठन Mizo Hmeichhe Insuihkhawm Pawl (एमएचआईपी) ने शुक्रवार को राज्य सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग की। संगठन ने इसे मिजो महिलाओं के लिए संभावित रूप से “असुरक्षित” करार दिया।
वहीं, आलोचनाओं का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने कानून का बचाव किया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक मिजो कस्टमरी लॉ रिव्यू कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है, जिसमें 10 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
मेघालय में देश में सबसे ज्यादा एचआईवी पीड़ित, 10,000 से अधिक मरीजों का चल रहा इलाज
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डब्ल्यू. शायला ने बुधवार (25 फरवरी) को विधानसभा में बताया कि पूरे देश में एचआईवी संक्रमण के सर्वाधिक मामले मेघालय में दर्ज किए गए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में 10,000 से अधिक मरीजों का इलाज चल रहा है।
उन्होंने बताया कि स्थिति से निपटने के लिए राज्य सरकार ने पहले ही 25 करोड़ रुपये की पांच वर्षीय इंटरवेंशन योजना को मंजूरी दे दी है।
न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार, मंत्री ने बताया कि वर्तमान में राज्य में एचआईवी से पीड़ित 10,293 लोग एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) ले रहे हैं।
मेहताब चांडी ए. संगमा के प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया कि एचआईवी/एड्स के मामलों में हो रही “चिंताजनक वृद्धि” से निपटने के लिए अगले पांच वर्षों के लिए मिशन मोड कार्यक्रम के तहत 25 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है।
मंत्री के मुताबिक, पिछले दस वर्षों में इस बीमारी से संबंधित कुल 749 मौतें दर्ज की गई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 435 मौतें ईस्ट खासी हिल्स जिले में हुईं। इसके बाद वेस्ट जयंतिया हिल्स और ईस्ट जयंतिया हिल्स जिलों का स्थान रहा।
अन्य जिलों—री भोई, ईस्टर्न वेस्ट खासी हिल्स, वेस्ट खासी हिल्स, साउथ वेस्ट खासी हिल्स, वेस्ट गारो हिल्स, ईस्ट गारो हिल्स, साउथ गारो हिल्स, नॉर्थ गारो हिल्स और साउथ वेस्ट गारो हिल्स—में तुलनात्मक रूप से कम मौतें दर्ज की गईं।
शायला ने बताया कि यह उल्लेखनीय है कि दर्ज की गई सभी मौतें समय-समय पर होने वाले अवसरवादी संक्रमणों (opportunistic infections) के कारण हुईं। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी मृत्यु का कारण सीधे तौर पर एचआईवी/एड्स नहीं बताया गया।
संक्रमण में वृद्धि के कारणों पर मंत्री ने कहा कि एचआईवी और एड्स (रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम के तहत लागू गोपनीयता संबंधी प्रावधान, साथ ही इस बीमारी से जुड़ा सामाजिक कलंक, प्रभावी रोकथाम और नियंत्रण के प्रयासों के सामने बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
उन्होंने कहा, “एचआईवी की स्थिति को गोपनीय रखना अनिवार्य है। बिना सहमति के किसी की जांच नहीं की जा सकती और न ही किसी को उपचार लेने के लिए बाध्य किया जा सकता। सबसे बड़ी चुनौती सामाजिक कलंक है, जिसके कारण लोग जांच कराने से हिचकिचाते हैं।”
उन्होंने बताया कि इन चुनौतियों के बावजूद स्वास्थ्य विभाग उपचार बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान तेज कर रहा है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन ने वर्ष 2025-26 के लिए मेघालय एड्स नियंत्रण सोसाइटी को 17.8 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। यह राशि जागरूकता कार्यक्रमों, वेलनेस कार्यक्रमों, टारगेटेड आउटरीच, ओपिओइड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी सेंटर, स्क्रीनिंग और केयर सपोर्ट सेवाओं को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल की जाएगी।
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