पिछले दस वर्षों में मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को जजों के खिलाफ 8,630 शिकायतें मिलीं: सरकार

Written by sabrang india | Published on: February 16, 2026
अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि Chief Justice of India के कार्यालय को पिछले दस वर्षों के दौरान उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा (सिटिंग) न्यायाधीशों के खिलाफ कुल 8,630 शिकायतें प्राप्त हुई हैं। हालांकि, मंत्रालय की ओर से दिए गए जवाब में इन शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई, इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई।



केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने शुक्रवार, 13 फरवरी को संसद में बताया कि पिछले दस वर्षों में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के कार्यालय को वर्तमान न्यायाधीशों के खिलाफ कुल 8,630 शिकायतें प्राप्त हुई हैं।

‘बार एंड बेंच’ की रिपोर्ट के अनुसार, यह जानकारी सरकार की ओर से विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) के सांसद माथेस्वरन वी.एस. द्वारा लोकसभा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में दी।

गौरतलब है कि माथेस्वरन वी.एस. ने मंत्रालय से उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार, यौन दुराचार अथवा अन्य गंभीर अनियमितताओं से जुड़ी शिकायतों का विवरण मांगा था।

इसके उत्तर में विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने सर्वोच्च न्यायालय से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर लिखित जवाब देते हुए बताया कि मौजूदा (सिटिंग) न्यायाधीशों के खिलाफ कुल 8,630 शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें सबसे अधिक 1,170 शिकायतें वर्ष 2024 में प्राप्त हुईं, जबकि सबसे कम 518 शिकायतें वर्ष 2020 में सीजेआई कार्यालय को मिलीं।

अपने प्रश्न में माथेस्वरन वी.एस. ने यह भी जानना चाहा था कि इन शिकायतों पर कोई कार्रवाई की गई है या नहीं।

हालांकि, मंत्रालय के जवाब में इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि शिकायतों पर की गई कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध क्यों नहीं है।

द वायर ने लिखा कि इस संबंध में सांसद द्वारा एक और सवाल यह उठाया गया था कि क्या केंद्र सरकार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार, यौन दुराचार या अन्य गंभीर अनियमितताओं से संबंधित उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों के रिकॉर्ड या डेटाबेस को बनाए रखने के लिए उपयोग की जाने वाली किसी व्यवस्था की जानकारी है।

यदि हां, तो विगत दस वर्षों में ऐसी कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं और उन पर वर्षवार क्या कार्रवाई की गई।

प्रश्न में यह भी पूछा गया था कि क्या सरकार न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने, उनकी निगरानी करने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कोई दिशा-निर्देश जारी करने या ठोस कदम उठाने पर विचार कर रही है।

इन सभी सवालों के उत्तर में केवल इतना कहा गया कि Chief Justice of India तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के तहत न्यायाधीशों के विरुद्ध शिकायतें प्राप्त करने के लिए सक्षम हैं।

जवाब में आगे बताया गया कि केंद्रीयकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (सीपीग्राम) या अन्य किसी माध्यम से उच्च न्यायपालिका के सदस्यों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों को भारत के मुख्य न्यायाधीश या संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया जाता है, जो ऐसी शिकायतें प्राप्त करने के लिए अधिकृत हैं।

हालांकि, मंत्री ने माथेस्वरन के इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया कि क्या सरकार उच्च न्यायपालिका के सदस्यों के विरुद्ध शिकायतों की व्यवस्थित रिकॉर्डिंग, उनकी निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कोई दिशा-निर्देश जारी करने या ठोस कदम उठाने का प्रस्ताव रखती है।

इस मामले पर पत्रकार सौरभ दास ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मद्रास उच्च न्यायालय के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश टी. राजा के खिलाफ भ्रष्टाचार और कदाचार संबंधी उनकी याचिका में, दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने शपथपत्र देकर कहा है कि मांगे गए प्रारूप में डेटा उपलब्ध नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ऐसा है, तो संसद को वर्षवार आंकड़े किस आधार पर उपलब्ध कराए गए?

दास ने आगे प्रश्न किया कि क्या सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष शपथ पर गलत बयान दिया है। उन्होंने इसे अभूतपूर्व स्थिति बताते हुए कहा कि यदि डेटा देने से इनकार कर किसी न्यायाधीश का संरक्षण किया जा रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने यह भी पूछा कि आखिर किसका संरक्षण किया जा रहा है, ऐसा क्यों किया जा रहा है, और उनके आरटीआई प्रश्न का ‘हां’ या ‘ना’ में उत्तर देने से किस बात का डर है। उनके अनुसार, मामला यहां तक पहुंच गया कि माननीय उच्च न्यायालय को भी गुमराह किया गया, और अब जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

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