मिनाब गर्ल्स स्कूल में ट्रम्प सर और नेतन्याहु सर की क्लास

Written by अंशु मालवीय | Published on: April 8, 2026


Image Credit: Amirhossein Khorgooei/ISNA/West Asia News Agency via Reuters

बच्चियो!

दुनिया में अमन  के लिए

हमें तुम्हारे नन्हे गुलाबी बस्तों में रखी

किताबें चाहिए

जम्हूरियत की ;

पेंसिलें चाहिये मुल्कों की

जिनकी नोकें बनाई जाएँगी

मेड इन  यू एस ए शार्पनर से

हमें चाहिये रोटियाँ

तुम्हारे टिफिन की रोटियाँ

जिन्हें टिफिन में रखते वक़्त

अल्लाह को याद करती थीं माएँ

 तुमको रोटियाँ सौंपती थीं

और

तुम्हें अल्लाह को

सक़ीना....

फातिमा....

फातिमा अल सुगरा

तुम्हारी रोटियाँ जल गईं मिसाइलों के ताप में

अब राख चबाओ

और गाओ


ये सितारे नहीं

मिसाइले हैं बच्चियो

टपकती हुई बरसती हुई

तुम्हारे मुल्क पर

ये सितारे नहीं

मिसाइले हैं बच्चियो

जो हजार साल के किसी मिथकीय वादे का बारूद लेकर

बरस रहीं हैं तुम पर

जिन मिसाइलों पर लिखा है ‘The Hope’

उम्मीदें...

सरकश उम्मीदें

बमबार उम्मीदें

आक्रांता उम्मीदें....

लिंचिंग का ख्वाब देखकर

हिंदुस्तान में घबराकर जाग उठता है कवि....

टूटी हुई खिड़कियों के फट्टे से चेलो बजाता

वादक रो पड़ता है

लेबनान के मलबे पर

होर्मूज़ की खाड़ी में नूह की कश्ती पर

भेड़ें विलाप करती हैं 

इंसानों की तरह 

समंदर में मिल जाता है उनके मुँह का झाग

जलता हुआ तेल उतराता है

पानी की सतह पर

हम तवारीख के खंजर से

नक्शे पर जुगराफिया बनाते हैं बच्चियो....

खून-ए-मुस्तक़बिल में डुबाओ उँगलियाँ और

इस नक्शे पर लिखो

Make America Great Again  

कॉर्पेट बॉम्बिंग की गड़गड़ाहट से

कांपती है धरती... सदियों के आरपार बिछड़े तीन भाई

पुकारते हैं इक दूजे को  

एक भाई सिनाई के रोशन अंधकार में

बेहोश पड़ा था युगों से

दूसरा सदियों से लटका हुआ है सूली पर येरूशलम की पहाड़ियों में

उसके घाव से टपक रही है रक्त क्षमा

तीसरा चल रहा है

एक मुसलसल हिजरत में

उसके पैर के छालों में खिल रहे हैं

सदाक़त के सफ़ेद फूल

तीनों पुकारतें हैं इक-दूसरे को

आवाज़ें बैलिस्टिक मिसाइलों की तरह

पंख फैलाती हैं

आसमान में   

इंटेरसेप्टर्स को चकमा देती.... 

आज जिन भाइयों के बीच

फैली है सदियों की रेत

एक ही मिट्टी के जाए थे........ चल पड़े हैं  

खून आलूदा मिट्टी माथे पर मलकर

काल यात्री.... तीन भाई

युगों के आर-पार

सुदूर बचपन की स्मृतियों को   

चोगे  में उड़से हुए

चबाते हुए फिरऔन के दहकते अंगारों को

लाठी से चीरते सागर धाराएँ

पीठ पर ढोते सलीब

बेड़ियाँ खनकतीं हैं धमाकों के पार्श्व में

घोड़े के अयालों में उलझ जाती है दाढ़ी 

ऊँट के रोएँ का जैकेट पहने  

मशक में लिए तेल

भूनी हुई टिड्डियाँ चबाते और पीते

बनमधु के घूँट

चले आ रहे हैं तीन भाई .... अनजान ....  अजनबी ..... दुश्मन

दूर से आती किसी पुकार पर तैरते हुए

फ़ारस की एक पहाड़ी पर बैठा है आदियोगी

दाढ़ी फैली है

समंदरों में शैवालों से उलझती

चोगा फैला है

विशाल रेगिस्तानों की मरीचिकाओं में   

प्यास की लहर उठाता...

माथे पर बँधा सफेद पटका

लहरता चल गया है हिंदुकुश तक

उसके एक हाथ में लोहे की पुस्तक है

दूसरी  हथेली पर जल रही आग की लपटें

‘ऐ काफ़िरान-ए-दुनिया’...

हमने पानी से नहीं

आग से बपतिस्मा लिया है ….

मंत्र पढ़ता है बूढ़ा नबी....

‘हमारे लिए बस काफी है ईद-ओ-नवरोज़

जंग सरमायादारों का त्योहार है’

त्योहारों पर सजते हैं

हथियारों के बाज़ार

आते हैं सौदागर-ओ-खरीदार

इस लहराते हुए बाज़ार के बीच में एक

नरमाँसभक्षी पीडोफाइल जज़ीरा है

जहां जुटते हैं

सौदागर

ताकतवर और ताकत के दलाल

बुद्धिजीवी

वैज्ञानिक

कलाकार

जनसंख्या विनाश वैक्सीन बनाते

जादूगर

मासूम बच्चियों के गोश्त से सोना बनाने वाले

कीमियागर और

इन सब के बीच विश्वगुरु है मुजरा करता हुआ...

वासना की तालों  

और कराहों की लय पर नाचते हैं भेड़िये

बच्चियों की नंगी पीठों की मेज पर

तेल का बंटवारा होता है

होता है हथियारों का

बँटवारा होता है धरती का

तुम्हारी नंगी पीठें नहीं मिलीं

मिनाब की बच्चियो

इसलिए तुम्हें मिसाइलों के क्लास मिले

ट्रम्प सर और

नेतन्याहू सर की क्लास

वो क्लास जिसका कोर्स तैयार किया था

एपस्टीन सर ने....!

तुम्हारी क्लास के बाहर खड़े हैं

तुम्हारी बेपर्दा माएँ... तुम्हारे निहत्थे बाप

उनकी मेहनत उनकी उज़रत

पानी से भरी हुई बिल्लौरी आँखें लिये तुम्हारे भाई बहन

तुम्हारी उजड़ी तहज़ीब

तुम्हारी क़दीम जर्जर तवारीख  

तुम्हारे दम घुटते समंदर

तुम्हारी चीखती नदियाँ

तुम्हारे घायल पहाड़

तुम्हारे हाथों बनाये मिट्टी के घरौंदे

सर ब जानु,सर बरहना

सबसे पीछे खड़ा है

एक शख्स

अपना कफन ओढ़कर

उसके कफ़न पर लहू के दाग़ हैं

उसकी शाहरग पर चमकता है नबी का बोसा

लब्बैक या इन्क़लाब....

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