मोदी सरकार से प्रेस स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक अधिकारों पर नीदरलैंड में तीखे सवाल, भारतीय राजनयिक से हुई बहस

Written by sabrang india | Published on: May 19, 2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 12 वर्षों से अधिक लंबे कार्यकाल के दौरान नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूरी बनाए रखते आए हैं। इसमें विदेश दौरों के दौरान आयोजित होने वाली खुली और बिना पूर्व-निर्धारित सवालों वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस भी शामिल हैं। इसके बजाय, वे आमतौर पर मेजबान देशों के नेताओं के साथ पहले से तैयार संयुक्त बयान जारी करने को प्राथमिकता देते रहे हैं।


Photo: @MEAIndia/X via PTI

प्रधानमंत्री मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान हेग में हुई एक प्रेस ब्रीफिंग में विवाद की स्थिति पैदा हो गई।

इस दौरे का मुख्य उद्देश्य व्यापार, रक्षा और सेमीकंडक्टर तकनीक जैसे क्षेत्रों में भारत-नीदरलैंड संबंधों को मजबूत करते हुए उन्हें ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ के स्तर तक ले जाना था। लेकिन प्रेस ब्रीफिंग के दौरान डच पत्रकारों और एक भारतीय राजनयिक के बीच हुई तीखी बहस ने पश्चिमी मीडिया की स्वतंत्र कार्यशैली और मोदी सरकार की नियंत्रित जनसंपर्क व्यवस्था के बीच मौजूद तनाव को उजागर कर दिया।

क्या है मामला?

द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, नरेंद्र मोदी के सम्मान में हेग के बाहर स्थित डच प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास कैटशुइस में आयोजित रात्रिभोज से पहले प्रधानमंत्री रॉब येटेन ने स्थानीय पत्रकारों से बातचीत की। इस दौरान येटेन से नीदरलैंड और भारत के संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर सवाल पूछे गए।

मोदी के पहुंचने से ठीक पहले येटेन ने पत्रकारों से कहा कि मोदी की BJP सरकार के तहत “भारत में हो रहे घटनाक्रमों” को लेकर नीदरलैंड और यूरोपीय संघ के अन्य सदस्य देशों के बीच चिंताएं मौजूद हैं।

इसके बाद यह मामला तब और चर्चा में आ गया, जब प्रमुख डच अखबार डे फोल्क्सक्रांट के पत्रकार अशवंत नंद्राम ने आधिकारिक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान इसे सीधे तौर पर उठाया। उन्होंने भारतीय प्रतिनिधिमंडल से सवाल करते हुए कहा:

“मैं डच अखबार डे फोल्क्सक्रांट के लिए पत्रकार हूं। मेरे कुछ सवाल हैं। नीदरलैंड में यह परंपरा रही है कि ऐसी यात्रा के बाद दोनों प्रधानमंत्री सवालों के जवाब देने के लिए उपलब्ध होते हैं। मैं जानना चाहता हूं कि आज ऐसा क्यों नहीं हो रहा है।

दूसरी बात यह है कि आज प्रधानमंत्री रॉब येटेन ने अपने बयान में कहा कि नीदरलैंड और यूरोपीय संघ को प्रेस की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर चिंता है, जिनमें मुस्लिम समुदाय और अन्य छोटे समुदाय शामिल हैं। मैं जानना चाहता हूं कि इस पर भारत सरकार की क्या प्रतिक्रिया है?”

अशवंत नंद्राम के सीधे और तीखे सवालों के जवाब में विदेश मंत्रालय के सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने आक्रामक अंदाज में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने वही तर्क दोहराया, जिसका इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक नेतृत्व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठने वाली मानवाधिकार संबंधी आलोचनाओं को खारिज करने के लिए करता रहा है।

राजनयिक ने पत्रकार की चिंताओं को उसकी “जानकारी की कमी” बताकर खारिज करने की कोशिश की। उन्होंने कहा, “ऐसे सवाल आमतौर पर तब उठते हैं, जब सवाल पूछने वाले व्यक्ति के पास पर्याप्त समझ या जानकारी नहीं होती।”

इसके बाद उन्होंने भारत की 1.4 अरब आबादी, व्यापक चुनावी भागीदारी और 90 करोड़ स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यह देश “बहस और असहमति से भरा एक जीवंत लोकतंत्र” है। उन्होंने इसे सक्रिय नागरिक समाज का प्रमाण बताया। उन्होंने यह भी दावा किया कि आजादी के समय भारत में अल्पसंख्यकों की आबादी लगभग 11 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 20 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। साथ ही उन्होंने आलोचकों को चुनौती देते हुए कहा कि वे किसी ऐसे अन्य देश का उदाहरण दें, जहां अल्पसंख्यक आबादी में इस तरह की वृद्धि देखने को मिली हो।

अपने बचाव में उन्होंने भारत की 5,000 साल पुरानी बहुलतावादी विरासत का भी जिक्र किया और कहा कि ईसाई धर्म, इस्लाम और यहूदी धर्म जैसे समुदायों को भारत में ऐतिहासिक रूप से शरण मिली और उन्हें किसी संस्थागत उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा।

हालांकि, आलोचना को पत्रकार की “समझ की कमी” बताकर खारिज करने की भारतीय राजनयिक की कोशिश उस समय कमजोर पड़ गई, जब डच अखबार NRC की पत्रकार मेरेल थी ने आगे सवाल उठाते हुए स्पष्ट किया कि ये चिंताएं किसी पत्रकार की व्यक्तिगत राय या पक्षधरता नहीं हैं, बल्कि स्वयं डच प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए बयानों की प्रतिध्वनि हैं।

इसके बाद हुई तीखी बहस ने उस अहम क्षण को उजागर कर दिया, जब लगातार उठ रहे सवालों के दबाव में तयशुदा कूटनीतिक रणनीति बिखरती नजर आने लगी:

मेरेल थी ने कहा: “मेरा नाम मेरेल थी है और मैं डच अखबार NRC से हूं। और जब आप मेरे सहयोगी का जिक्र कर रहे थे, तो वह दरअसल हमारे प्रधानमंत्री के उस बयान का हवाला दे रहे थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें भारत में अल्पसंख्यकों और प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर चिंता है। तो क्या हमारे प्रधानमंत्री के ऐसा कहने से आपको परेशानी होती है?”

इस पर सिबी जॉर्ज ने जवाब दिया: “नहीं, मैं सिर्फ उस विषय पर तथ्यात्मक स्थिति बता रहा था। और वही तथ्यात्मक स्थिति बनी हुई है। भारत को समझने और भारत की सराहना करने के लिए आपको भारत के बारे में अधिक समझ विकसित करनी होगी।”

इसके जवाब में मेरेल थी ने कहा: “तो फिर प्रधानमंत्री [येटेन] को भारत को और बेहतर समझने की जरूरत है, क्योंकि यह बात हम नहीं कह रहे हैं।”

इसके बाद जॉर्ज ने कहा: “मैंने वह बयान नहीं देखा है। मैं उस सवाल का जिक्र कर रहा हूं, जो उस विषय पर उठाया गया था, यानी स्वतंत्रता के मुद्दे पर। और मुझे लगता है कि मैंने स्पष्ट कर दिया है कि भारत कितना खूबसूरत देश है। धन्यवाद।”

“मैंने वह बयान नहीं देखा है” कहकर भारतीय राजनयिक ने एक तरह से सोच-समझकर पीछे हटने की कोशिश की, ताकि मेजबान देश के साथ सीधे कूटनीतिक विवाद की स्थिति पैदा न हो। इससे उन्हें उस वास्तविकता से बच निकलने का अवसर मिल गया कि नीदरलैंड के प्रधानमंत्री — यानी वह नेता जो भारतीय प्रधानमंत्री की मेजबानी कर रहे थे — मोदी सरकार के लोकतांत्रिक और मानवाधिकार रिकॉर्ड को लेकर गंभीर चिंताएं रखते हैं।

यह पूरा घटनाक्रम नई दिल्ली द्वारा प्रस्तुत की गई छवि और देश के भीतर मौजूद वास्तविक परिस्थितियों के बीच के गहरे अंतर को उजागर करता है। साथ ही, यह उस व्यवस्था की संवेदनशीलता और कमजोरी को भी सामने लाता है, जो स्वतंत्र जांच-पड़ताल और आलोचनात्मक सवालों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाती।

जब मोदी सरकार को अपने नियंत्रित मीडिया माहौल से बाहर निकलकर सीधे और कठिन सवालों का सामना करना पड़ा, तो वह कई मुद्दों पर ठोस और तथ्याधारित जवाब देने में कमजोर नजर आई। इस घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि खुद को “लोकतंत्र की जननी” बताने वाले दावों के बावजूद, जवाबदेही और आलोचनात्मक प्रश्नों को लेकर व्यवस्था में गहरी असहजता मौजूद है।

इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि जब मोदी सरकार की पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय सफाई और बचाव की रणनीति का सामना स्वतंत्र प्रेस के बिना तयशुदा और सीधे सवालों से होता है, तो उसकी सीमाएं उजागर होने लगती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने 12 वर्षों से अधिक लंबे कार्यकाल के दौरान नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस से दूरी बनाए रखते आए हैं। इसमें विदेशी दौरों के दौरान आयोजित होने वाली खुली और बिना पूर्व-निर्धारित सवालों वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस भी शामिल हैं। इसके बजाय, वे आमतौर पर मेजबान देशों के नेताओं के साथ पहले से तैयार संयुक्त बयान जारी करने को प्राथमिकता देते रहे हैं।

नीदरलैंड जैसे लोकतांत्रिक देशों में, जहां मीडिया के प्रति जवाबदेही को कूटनीतिक परंपरा का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है, वहां पत्रकार इस तरह की दूरी और नियंत्रण को लोकतांत्रिक अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश के रूप में देखते हैं।

वर्ष 2023 में, जब व्हाइट हाउस ने घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन संयुक्त रूप से एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे, तब व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने रॉयटर्स से कहा था कि यह “एक बड़ी बात” है। अधिकारी के अनुसार, मोदी लंबे समय से भारत में मीडिया के सीधे सवालों से बचने के लिए जाने जाते रहे हैं।

लंदन में नवंबर 2015 के बाद यह पहली बार था, जब मोदी ने किसी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जवाब दिए थे। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में द वॉल स्ट्रीट जर्नल की पत्रकार सबरीना सिद्दीकी ने मोदी से पूछा था:

“भारत लंबे समय से खुद को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताता रहा है, लेकिन कई मानवाधिकार संगठन कहते हैं कि आपकी सरकार ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव किया है और अपने आलोचकों की आवाज दबाने की कोशिश की है। आप और आपकी सरकार मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों को बेहतर बनाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाने को तैयार हैं?”

रिपोर्ट के अनुसार, इसके जवाब में मोदी ने सीधे उत्तर देने से बचते हुए भारत के संविधान का जिक्र किया। लेकिन इसके बाद सबरीना सिद्दीकी को ऑनलाइन भारी ट्रोलिंग और हमलों का सामना करना पड़ा। हिंदुत्व समर्थक नेताओं और समर्थकों ने उन्हें निशाना बनाया, यहां तक कि बाइडेन प्रशासन को भी इस ऑनलाइन उत्पीड़न की कड़ी निंदा करनी पड़ी।

30 अप्रैल को जारी रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के 2026 विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। 

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