क्या आप वाकई ज्ञान का लोकतन्त्र और हिंदी की भलाई चाहते हैं?

Written by Sanjay Sarman Jothe | Published on: September 14, 2018
भारत में भाषा जोड़ने के लिए नहीं बल्कि तोड़ने के लिए इस्तेमाल होती आई है। राज्यों का गठन भाषावार हुआ है। प्राचीन उल्लेख हैं शास्त्रार्थों के बारे में, शास्त्रार्थ इस बात का नहीं होता था कि शास्त्र में सत्य है या नहीं बल्कि इस बात का होता था कि शुद्ध व्याकरण के अनुसार शास्त्र का अर्थ क्या है।



शास्त्रार्थ शब्द ही शास्त्र और अर्थ से मिलकर बना है। चाणक्य के बारे में कथा है कि वो व्याकरण के आतंक से सबको हलकान कर देता था और लोग हार मान लेते थे।

कबीर रविदास और रामतीर्थ पर भी आरोप ये नहीं थे कि ये ग्यानी नहीं हैं बल्कि आरोप ये था कि इन्हें संस्कृत नहीं आती। भाषा और व्याकरण की भी यहां जाति होती है।

वैसे हिंदी हिंदी चिल्लाने वालों को एक सलाह फ्री में दी जा सकती है। उन्हें हिंदी का कल्याण करने से पहले हजार बार सोचना चाहिए। हिंदी के विकास का मतलब होगा आम जन के ज्ञान के अधिकार का समर्थन और शिक्षा सहित ज्ञान विज्ञान का लोकतांत्रीकरण।

इसका सीधा मतलब हुआ दलित आदिवासी और ओबीसी की ज्ञान विज्ञान में बढ़ी हुई भागीदारी। ये भागीदारी पहले संस्कृत, अरबी, फ़ारसी ने कण्ट्रोल की थी और अब अंग्रेजी ने ये महान दायित्व उठा रखा है। इसी का सत्परिणाम है कि मुट्ठी भर सवर्ण जन इंग्लिश के सहारे मलाई काट रहे हैं।

उनके बच्चों को भी देखिये वे किन स्कूल कॉलेजों में पढ़ते हैं। वे "चन्दा मामा दूर के नहीं गाते" बल्कि "टुंकल टुंकल लिटिल इष्टार" गाते हैं।

हिंदी का व्यापक प्रचार होने पर और हिंदी में ज्ञान विज्ञान का सृजन होने पर ज्ञान की राजनीति मलाईदार वर्ग के काबू से बाहर हो जायेगी।

काबू से बाहर होते ही देश के सनातन ठेकेदारों का ठेका खत्म हो सकता है।

दुबारा सोच लीजिये, क्या आप वाकई ज्ञान का लोकतन्त्र और हिंदी की भलाई चाहते हैं? बाद में न कहियेगा कि समय रहते बताया नहीं!!!