“सरकार कैसे कह सकती है कि मैला ढोने की प्रथा खत्म हो गई है, जबकि हम आज भी सूखे शौचालयों की सफाई करते हैं?”

Written by sabrang india | Published on: September 3, 2026
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर की ये महिलाएं 1 सितंबर को नई दिल्ली आईं और उन्होंने बताया कि वे आज भी हाथों से इंसानी मल साफ कर रही हैं, क्योंकि उनके समुदायों में सूखे शौचालयों का इस्तेमाल जारी है।


साभार : मकतूब

चार राज्यों की उन महिलाओं ने संसद में केंद्र सरकार के उस दावे को चुनौती दी है जिसमें कहा गया था कि भारत में अब मैला ढोने की प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) नहीं है। उन्होंने पूछा, “सरकार कैसे कह सकती है कि मैला ढोने की प्रथा नहीं है, जबकि हमें आज भी रोज सूखे शौचालय साफ करने के लिए मजबूर किया जाता है?”

मकतूब की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर की ये महिलाएं 1 सितंबर को नई दिल्ली आईं और उन्होंने बताया कि वे आज भी हाथों से इंसानी मल साफ कर रही हैं, क्योंकि उनके समुदायों में सूखे शौचालयों का इस्तेमाल जारी है।

महिलाओं ने पूछा, “सरकार कैसे कह सकती है कि मैला ढोने की प्रथा नहीं है, जबकि हमें आज भी रोज़ सूखे शौचालय साफ करने के लिए मजबूर किया जाता है? हमें इस छुआछूत और गुलामी से कब आजादी मिलेगी?”

ये बातें ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ (SKA) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बताई गईं। इस संगठन ने मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने और सूखे शौचालयों को हटाने के लिए साल भर चलने वाला ‘INDIA @ 80’ अभियान शुरू किया है।

उत्तर प्रदेश के सीतापुर की 70 वर्षीय मुस्सी देवी ने कहा कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इंसानी मल साफ करने में बिता दी है और वे चाहती हैं कि मरने से पहले यह प्रथा खत्म हो जाए।

मध्य प्रदेश की अंगूरी बाई ने बताया कि 14 साल की उम्र में शादी के बाद उनकी सास उन्हें सूखे शौचालय साफ करने के लिए ले जाती थीं। उन्होंने कहा, “तब से मैं सूखे शौचालय साफ कर रही हूं।” उन्होंने सरकार से मांग की कि वह मजदूरों को इस प्रथा से आजाद करे।

बिहार की चंजोटिया देवी ने बताया कि वे 15 साल की उम्र से सूखे शौचालय साफ कर रही हैं। उन्होंने इस प्रथा को खत्म करने की मांग की ताकि “अगली पीढ़ी को किसी भी तरह से मैला ढोने का काम न करना पड़े।”

जम्मू-कश्मीर के मुजफ्फर अहमद शेख ने कहा कि कश्मीर में सूखे शौचालयों में मैला ढोने की प्रथा बड़े पैमाने पर जारी है, लेकिन इसे छिपाया जाता है क्योंकि लोग इसके बारे में बात करने से डरते हैं।

SKA बोर्ड की सदस्य नारायणम्मा ने बताया कि 600 सीटों वाले सूखे शौचालयों की सफाई करने के बाद उन्हें मैला ढोने की प्रथा से आजादी मिली थी। उन्होंने कहा कि अब वे अपना जीवन इस प्रथा को खत्म करने के लिए समर्पित कर रही हैं।

SKA की सदस्य दीप्ति सुकुमार ने कहा कि बार-बार बने कानूनों, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और सरकारी नीतियों के बावजूद मैला ढोने की प्रथा खत्म नहीं हो पाई है। उन्होंने कहा कि यह प्रथा “जाति, पितृसत्ता, छुआछूत और गुलामी” में गहराई से जुड़ी हुई है। कानून विशेषज्ञ उषा रामनाथन ने कहा कि सरकार को मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए इसे छुआछूत जैसा ही अपराध मानना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन लोकुर ने कहा कि SKA और प्रभावित समुदायों ने मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखी है, लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के लिए इसे खत्म करना प्राथमिकता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा कि उन्हें हैरानी है कि 40 से ज्यादा जिलों में अभी भी मैला ढोने की प्रथा और सूखे शौचालय मौजूद हैं। महिलाओं की बातें सुनकर उन्होंने कहा, “हर भारतीय को शर्म आनी चाहिए, जैसे वे खुद अपने सिर पर गंदगी ढो रहे हों।”

पटना हाई कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस अंजना प्रकाश ने कहा कि यह समस्या इतनी जटिल है कि इसे सिर्फ कानूनों से हल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “यह शर्म की बात है कि हम हमेशा राष्ट्रगान और गानों को लेकर तो चिंतित रहते हैं, लेकिन मैला ढोने की इस राष्ट्रीय शर्म को खत्म करने के बारे में कोई सोचता तक नहीं है।”

SKA के संस्थापक बेजवादा विल्सन ने कहा कि यह बात कि मजदूरों को मैला ढोने की प्रथा के अस्तित्व का “जीवंत सबूत” देने के लिए दिल्ली आना पड़ता है, जातिवादी सोच के बने रहने को दिखाती है।

विल्सन ने कहा, “मैंने यह लड़ाई तब शुरू की थी जब मैं 16 साल का था और अब मैं 63 साल का हूं। बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन सूखे शौचालयों में मैला ढोने की प्रथा अभी भी जारी है।”

विल्सन ने कहा कि उन्होंने अदालतों में सूखे शौचालयों और मैला ढोने की प्रथा के फोटो वाले सबूत जमा किए थे, लेकिन आरोप लगाया कि अदालतों ने उन तस्वीरों की जांच करने से इनकार कर दिया। उन्होंने केंद्र सरकार को एक साल के भीतर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने का अल्टीमेटम दिया और कहा कि SKA ने एक एक्शन प्लान तैयार किया है और “इसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।”

इस कार्यक्रम में अर्थशास्त्री, वकील, एक्टिविस्ट, लेखक, शिक्षाविद और अन्य जानी-मानी हस्तियां शामिल हुईं। इन सभी ने हाथ से मैला ढोने की प्रथा (मैनुअल स्कैवेंजिंग) को खत्म करने और सूखे शौचालयों को हटाने की दिशा में काम करने का संकल्प लिया।

अगस्त में खत्म हुए संसद के मॉनसून सत्र के दौरान, सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने लोकसभा को बताया कि 2024-25 में सभी जिलों में किए गए एक नए सर्वे में कोई भी मैनुअल स्कैवेंजर (हाथ से मैला ढोने वाला) नहीं मिला।

अठावले विपक्ष के नेता राहुल गांधी के एक लिखित सवाल का जवाब दे रहे थे। ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “देश के सभी जिलों ने सर्वे पूरा कर लिया है और खुद को मैनुअल स्कैवेंजर्स से मुक्त घोषित कर दिया है।”

हालांकि, मंत्री ने यह भी बताया कि 2013 और 2018 में किए गए दो पिछले सर्वे में 58,098 मैनुअल स्कैवेंजर्स की पहचान की गई थी।

अठावले ने मैनुअल स्कैवेंजिंग और खतरनाक सफाई के बीच अंतर भी बताया। उन्होंने कहा कि खतरनाक सफाई का मतलब है बिना सुरक्षा उपकरण, सफाई के औजार और अन्य सुरक्षा सावधानियों के सीवर या सेप्टिक टैंक की हाथ से सफाई करना। 2013 के कानून के तहत, मैनुअल स्कैवेंजर वह व्यक्ति है जिसे अस्वच्छ शौचालय से इंसानी मल को हाथ से साफ करने, उठाने या हटाने के काम पर रखा गया है।

इससे पहले, सफाई कर्मचारी आंदोलन (SKA) ने केंद्र सरकार पर सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई करने वाले सफाई कर्मचारियों की मौतों के आंकड़े कम बताने का आरोप लगाया था। संगठन का दावा था कि जनवरी 2021 और जुलाई 2026 के बीच 593 लोगों की मौत हुई, जबकि सरकार ने संसद को बताया कि केवल 332 मौतें हुईं, यानी 261 मौतों का कोई हिसाब नहीं दिया गया।

‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013’ के तहत मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक है। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को बार-बार निर्देश दिया है कि वे इस प्रथा को खत्म करें और सफाई के काम में मशीनों के इस्तेमाल को सुनिश्चित करें। इसके बावजूद, देश भर में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान सफाई कर्मचारियों की जान जा रही है।

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