आदिवासी वनवासी महासभा के संयोजक राजेन्द्र प्रसाद गोंड की रिहाई के लिए सहयोग की अपील

Written by Sabrangindia Staff | Published on: November 8, 2018
सोनभद्र. स्वराज अभियान राज्य कार्यसमिति ने आदिवासी वनवासी महासभा के संयोजक राजेंद्र प्रसाद गोंड की रिहाई के लिए मदद की अपील की है. स्वराज अभियान राज्य कार्यसमिति के सदस्य दिनकर कपूर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि राजेंद्र गोंड बीसों साल आदिवासी हितों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. लेकिन यूपी में भगवा राज आने के बाद आरएसएस के इशारे पर चल रही सरकार के निर्देश पर सोनभद्र जनपद में प्रशासन व पुलिस द्वारा चलाए दमन के कारण राजेंद्र गोंड पिछले डेढ़ माह से जेल में हैं. 

प्रतीकात्मक फोटो- इस फोटो का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है

दिनकर कपूर ने कहा कि पुलिस की कार्यप्रणाली और गैर जबाबदेही की हालत यह है कि राजेन्द्र प्रसाद गोंड की इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत की अर्जी 12 अक्टूबर को दाखिल की गयी थी और नियमानुसार दस दिन में हाईकोर्ट में जमानत अर्जी पर रिपोर्ट जिले के पुलिस अधिकारियों द्वारा जमा कर दी जाती है। इस अनुरूप हाईकोर्ट में 23 अक्टूबर को सुनवाई की तिथि नियत थी। परन्तु सुनवाई की तिथि पर ज्ञात हुआ कि पुलिस ने रिपोर्ट ही नहीं भेजी। सरकारी वकील ने एक सप्ताह का समय लिया और कोर्ट ने 2 नवम्बर की तिथि निश्चित की थी।

 2 नवम्बर को कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत ने राजेन्द्र प्रसाद की जमानत खारिज की है जबकि पुलिस विवेचना में राजेन्द्र प्रसाद गोंड़ नाम है। दरअसल यह भी पुलिस की लापरवाही का ही एक और उदाहरण है। राजेन्द्र की पुलिस गिरफ्तारी करना चाह रही थी और उनके परिवारजनों से बार-बार उनके थाने में समपर्ण को कह रही थी जिसे इंकार कर कानून में विश्वास होने के कारण पुलिस द्वारा फर्जी मुकदमों में फंसाने के बावजूद उन्होंने न्यायालय में आत्मसमर्पण किया। जो पुलिस को नागवार लगा और उनकी जमानत में विलम्ब हो इसलिए जानबूझकर आरएसएस व प्रशासन के इशारे पर पुलिस ने जमानत में अड़गा लगाने का काम किया। जो प्रभारी निरीक्षक म्योरपुर विवेचना कर रहे है उन्होंने यह जानते हुए कि विवेचना में राजेन्द्र प्रसाद गोंड़ को अभियुक्त बनाया गया है। आत्मसमर्पण के लिए डाले प्रार्थना पत्र पर भेजी अपनी रिपोर्ट में राजेन्द्र प्रसाद ही नाम भेजा। निचली अदालत में पुलिस अपनी रिपोर्ट में जो नाम भेजती है उसी नाम पर जमानत अर्जी दाखिल करने का प्रावधान है। परिणामस्वरूप हमारे अधिवक्ता ने उसी नाम पर जमानत अर्जी दाखिल की थी। वास्तव में पुलिस की इसी तरह की गैर जबाबदेही के कारण हजारों गरीब, आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक समाज के लोग जेलों में सड़ रहे है।

 
योगी सरकार बनने के बाद तो प्रदेश में हालात और भी बदतर हो गए है। कहीं भी कानून का राज नहीं दिखता प्रशासनिक व्यवस्था ध्वस्त हो गयी है। पूरे प्रदेश में ‘महंतई‘ चल रही है आरएसएस के संचालक व प्रचारक को प्रशासन ही नहीं मंत्रियों तक रिपोर्ट कर रहे है। उनके निर्देशन में जिलों में प्रशासनिक अमला काम कर रहा है। ‘ठोक दो‘ के माहौल में हालत इतनी बुरी हो गयी है कि कभी किसी नागरिक को बिना अपराध रात के अंधेरे में मार दिया जा रहा है, कभी शापिंग माल में धुसकर अपराधी हत्याएं कर रहे, दिन दहाड़े राजधानी में डकैतियां हो रही है, महिलाएं, व्यापारी व आम नागरिक असुरक्षित महसूस कर रहे है और अपराधियों के हौसले बुलंद है। 

लिलासी प्रकरण में ही आप देख सकते है हमने इस मामले में फर्जी तरीके से एसपी द्वारा फंसाए गए आदिवासी वनवासी महासभा के नेताओं की संलिप्तता की जांच सीबीसीआईडी से कराने के लिए मुख्यमंत्री कार्यालय को कई पत्रक दिए, प्रमुख सचिव गृह से मिलकर प्रत्यावेदन दिया। पर एसपी के विरूद्ध की गयी शिकायत की जांच एडीशनल एसपी से कराकर हमारे द्वारा दिए प्रत्यावेदन निरस्त कर दिए गए। यहां तक की दलितों-आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए बने एससी-एसटी आयोग के अध्यक्ष से मिलकर हमने प्रत्यावेदन दिया था और उन्होंने मण्ड़ालयुक्त मिर्जापुर से जांच कराने का आश्वासन दिया था। पर यह जांच हुई भी की नहीं और यदि हुई तो क्या हुआ आज तक पता नहीं है। 

दिनकर कपूर ने कहा कि सोनभद्र जनपद में आदिवासी वनवासी महासभा के नेताओं पर जुल्म इसलिए ढाया गया क्योंकि उन्होंने अपने सामाजिक राजनीतिक दायित्वों के तहत लिलासी गांव में चल रहे वनभूमि विवाद में आदिवासी महिलाओं को वनभूमि से गिरफ्तार करने की पुलिसिया कहानी को जांचकर असत्य पाया था और अखबारों में बयान जारी कर बताया था कि महिलाओं को वनभूमि से नहीं बल्कि घरों से गिरफ्तार किया गया है। अखबारों में यह बयान जारी करना ही प्रशासन को नागवार गुजरा और उसने इस पूरे आदिवासी बहुल्य अंचल में लोकतांत्रिक आवाज को ही खत्म करने की रणनीति के तहत दमन अभियान संचालित किया। 

निर्वाचित आदिवासी प्रधान डा0 चंद्रदेव गोंड़ को तत्कालीन एसडीएस दुद्धी विशाल यादव द्वारा अपने कार्यालय वार्ता के लिए बुलाकर गिरफ्तार कराया गया, रात में एसपी द्वारा खुद थाने में पहंुचकर उन पर सरकारी गवाह बनने और शीर्ष नेताओं के सम्बंध में बयान देने के लिए दबाब बनाया गया और ओबरा विधानसभा से प्रत्याशी रहे कृपाशंकर पनिका की गिरफ्तारी की गयी। राजेन्द्र प्रसाद गोड़ समेत अन्य नेताओं के घरों पर छापे डाले जाने लगे। अभी भी चंद्रदेव गोंड को जिला प्रशासन द्वारा विधि के विरूद्ध जाकर प्रधान का चार्ज नहीं दिया गया। वह हाईकोर्ट गए वहां से एक माह में निर्णय लेने का डीएम को आदेश दिया गया। इस आदेश पर बात करने पर डीएम कहते है कि मैं हाईकोर्ट में मुकदमा लड़ लूंगा पर चार्ज नहीं दूंगा। 

दरअसल आदिवासी बहुल्य सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली जनपद के नौगढ़ व चकिया तहसील में आदिवासी और वनाश्रित वनभूमि पर पुश्तैनी रूप से बसे है व अपनी आजीविका के लिए खेती किसानी करते है, उनका जीवन पूर्णरूप से वनोत्पादों पर निर्भर है। इन जमीनों से वनविभाग आए दिन उनकी बेदखली करता है। ऐसी हालत में वनाधिकार कानून 2006 बनने के बाद इस क्षेत्र में अपनी पुश्तैनी वनभूमि पर अधिकार की उम्मीद जगी थी। पर इस क्षेत्र में वनाधिकार कानून को मायावती सरकार में ही पूर्णतया विफल कर दिया गया। 

सोनभद्र जनपद में ही 65526 दावों में से 53506, मिर्जापुर में 3413 में से 3128 और चंदौली में 14088 में से 13998 दावे बिना विधिक प्रक्रिया का पालन किए हुए ही लम्बित/अस्वीकृत कर दिए गए। इस विधि के विरूद्ध कार्यवाही के खिलाफ स्वराज अभियान बनने के पूर्व से ही हम कार्य करते रहे है। आल इण्ड़िया पीपुल्स फ्रंट के घटक आदिवासी वनवासी महासभा की तरफ से हमने 2013 में ही हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की जिसमें कोर्ट ने हमारे पक्ष में निर्णय दिया। पर अखिलेश सरकार ने इसे लागू नहीं किया। योगी सरकार बनने के बाद इस पूरे क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बेदखली, दमन उत्पीड़न आदि की कार्यवाही शुरू हुई। इन हालातों में स्वराज अभियान के राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य अखिलेन्द्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में टीम ने ग्रामीणस्तर पर जाकर समस्याओं को देखा और वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन के बारे में तथ्य इकठ्ठे किए। 

इन तथ्यों के आधार पर पुनः हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी। आदिवासी वनवासी महासभा द्वारा दायर की गयी इस जनहित याचिका में पहली ही सुनवाई में 24 नवम्बर 2017 को मुख्य न्यायाधीश की खण्ड़पीठ ने आदिवासियों व अन्य परम्परागत वनाश्रितों किसी भी तरह के उत्पीड़न पर रोक लगा दी थी। इस रिट में डीएम सोनभद्र के द्वारा दाखिल काउंटर एफीडेविट तक में स्वीकार किया गया था कि वनाधिकार कानून के दावेदारों को सूचना नहीं दी गयी है और हाईकोर्ट के आदेश का अनुपालन किया जायेगा। इन्हीं स्थितियों में लिलासी गांव में वनभूमि विवाद के प्रकरण की जांच करने के लिए आदिवासी वनवासी महासभा की टीम ने वहां का दौरा किया था। अब हाईकोर्ट ने 11 अक्टूबर को जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए वनाधिकार की प्रक्रिया पुनः शुरू करने का आदेश दिया है। इसको भी लागू करने में सोनभद्र प्रशासन हीलाहवाली कर रहा है। दुद्धी तहसील में दावेदारों का प्रत्यावेदन तक स्वीकार करने से आरएसएस के निर्देश पर प्रशासन ने इंकार कर दिया। इस सम्बंध में जब हम आयुक्त समाज कल्याण विभाग, उ0 प्र0 से मिलने गए तो उन्हें इस आदेश के बारे में पता तक नहीं था। 

आपको यह भी बताना चाहेगें कि सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली में हम पिछले बीसियों साल से वैकल्पिक राजनीति के लिए काम करते रहे है। हमारी यह बराबर कोशिश रही है कि देश के बीस और प्रदेश के पांच सर्वाधिक पिछड़े क्षेत्रों में शामिल इस क्षेत्र का विकास हो, यहां सौहार्दपूर्ण माहौल रहे और आम नागरिकों, आदिवासियों, दलितों समेत समाज के गरीब तबके के लोकतांत्रिक अधिकार उन्हें हासिल हो सके। यहीं वजह है कि यहां सार्वजनिक सम्पत्ति, प्राकृतिक संसाधनों, खनन, वनसम्पदा और विकास कार्यो की लूट में लगी हुई ताकतों के निशाने पर हम हर वक्त रहते है। केन्द्र में मोदी की और प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद इन लूट की ताकतों का संरक्षणदाता इस क्षेत्र में आरएसएस बना हुआ है। 

आरएसएस के निर्देशन में जिला प्रशासन पूरे तौर पर काम कर रहा है। हालत इतनी बुरी है कि डीएम तक जनता से मिलने के आवंटित समय में आरएसएस के प्रचारकों के साथ अपने कार्यालय में घण्टों मीटिंग कर रहे है। लिलासी प्रकरण के बाद एक सोची समझी रणनीति के तहत आरएसएस की राजनीति और विचारधारा से असहमति के कारण वैकल्पिक राजनीति को ही खत्म के लिए हमले कराए गए और लोकतांत्रिक प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न किया गया। यहीं हाल पूरे देश का है आप खुद देख सकते है सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, आन्नद तेलतुम्बड़े जैसे अनेकों प्रतिबद्ध विचारक व सोशल एक्टिविस्ट का उत्पीड़न किया गया है। बहरहाल हमने धैर्य के साथ सोनभद्र में जारी दमन का मुकाबला किया और आरएसएस के दमन अभियान के विरूद्ध प्रतिकार अभियान चलाया जिसमें जनपद की वामपंथी व लोकतांत्रिक ताकतों ने सहयोग किया। इस सम्बंध में पूर्व आई0 जी0 एस0 आर0 दारापुरी के नेतृत्व में 20 अक्टूबर से लेकर 31 अक्टूबर तक यात्रा भी निकाली गयी जिसे भारी जनसमर्थन भी हासिल हुआ है। हम आपसे अपील करते है आप आरएसएस-भाजपा के इस दमन अभियान के विरूद्ध खड़े हो और प्रतिबद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता राजेन्द्र प्रसाद गोंड़ की रिहाई के लिए सरकार को लिखें और हर सम्भव मदद करें।