1984 सिख क़त्ले-आम की 42वीं बरसी-भारतीय राज्य और समाज का लक़वे का शिकार होना! 

Written by Shamsul Islam | Published on: November 2, 2026
प्रधान मंत्री मोदी जो कम-से-कम चुनाव के समय इस मुद्दे को कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने के लिये ज़रूर उठाते थे, दिल्ली विधान सभा के चुनाव (फ़रवरी 2025), बिहार विधान के चुनाव (नवंबर 2025), पश्चिम बंगाल चुनाव (अप्रैल 2026) के प्रचार के दौरान इस जघन्य जन संहार पर चुप्पी साधे रहे। इस तरह सिखों के 1984 के देश व्यापी क़त्ले-आम में क़ातिलों को सज़ा देना तो दूर रहा उनकी पहचान करने की भी कोई उम्मीद नहीं बची है। 


फोटो साभार : बीबीसी

लगभग पिछले तीन दशकों से लेखक हर साल नवम्बर महीने के आरम्भ में देश को, 1984 में संयोजित ढंग से किये गए सिखों के क़त्ले-आम के बारे में इस सच्चाई से अवगत कराता रहा है कि इस शर्मनाक जनसंहार के मुजरिमों को सज़ा देना तो दूर की बात रही, क़ातिलों की पहचान तक नहीं हो पाई है। देश के दूसरे सब से बड़े धार्मिक अल्पसंख्यक सम्प्रदाय के जनसंहार पर प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारतीय गणतंत्र और न्यायपालिकाएं सभी मूक दर्शक बनी रहे हैं या मुजरिमों की तलाश का पाखंड किया है। इस क़त्ले-आम की हर बरसी पर में उम्मीद करता था की आने वाले साल में ज़रूर इन्साफ मिल जाएगा और मुझे अगली बार इस दर्दनाक और शर्मनाक कहानी को दोहराना नहीं पड़ेगा। लेकिन पिछले बीते साल भी भारतीय राज्य ने वही अपराधिक रवैये का अनुसरण किया। और मैं एक बार फिर अंधी-गूंगी-बहरी राजसत्ता को शर्म दिलाने का प्रयास कर रहा हूँ।  

प्रधान मंत्री मोदी जो कम-से-कम चुनाव के समय इस मुद्दे को कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने के लिये ज़रूर उठाते थे, दिल्ली विधान सभा के चुनाव (फ़रवरी 2025), बिहार विधान के चुनाव (नवंबर 2025), पश्चिम बंगाल चुनाव (अप्रैल 2026) के प्रचार के दौरान इस जघन्य जन संहार पर चुप्पी साधे रहे। इस तरह सिखों के 1984 के देश व्यापी क़त्ले-आम में क़ातिलों को सज़ा देना तो दूर रहा उनकी पहचान करने की भी कोई उम्मीद नहीं बची है। 

दिल्ली में 2,800 और देशभर में 3,350 सिखों के जनसंहार (आधिकारिक आँकड़े, जबकि स्वतंत्र स्रोतों का अनुमान है कि मृतकों की संख्या लगभग 8,000-17,000 है) के पीड़ित परिवारों को  न्याय मिलने की 41वीं वर्षगांठ पर स्थिति क्या थी, शेखर सिंह ने (‘द ट्रिब्यून’ चंडीगढ़, October 31, 2025) ने बताया था:

“इकतालीस साल पहले, दिल्ली किसी विदेशी दुश्मन के कारण, बल्कि देश के भीतर के अपराधियों के कारण जल रही थी। 31 अक्टूबर और 7 नवंबर, 1984 के बीच, भीड़ सड़कों पर घूम-घूम कर सिखों का शिकार करती रही, घरों में आग लगाती रही और गुरुद्वारों में आग लगाती रही। दर्ज किए गए 650 मामलों में से 362 में आरोपपत्र दाखिल किए गए, लेकिन केवल 39 में ही दोषसिद्धि हुई। सबूतों, गवाहों या पुलिस की इच्छाशक्ति के अभाव में लगभग 300 मामले खारिज हो गए। अब, मुश्किल से 20 मामले ही बचे हैं, जो दिल्ली की निचली अदालतों में या उच्च न्यायालय में अपील के लिए लंबित हैं। बाकी को व्यवस्था की खामोशी ने निगल लिया है।

“ये आँकड़े एक ऐसे लोकतंत्र की कहानी बयां करते हैं जो अपने मृतकों को भूल गया है। इस हफ़्ते, जब शहर इंदिरा गांधी की हत्या और उसके बाद हुई हिंसा की बरसी मना रहा है, अदालतें अभी भी पीली पड़ती फाइलों और धुंधली होती यादों को खंगाल रही हैं—एक ऐसी न्याय प्रक्रिया जो समय से भी धीमी गति से आगे बढ़ रही है।”

इस क़त्ल-ए-आम की 42वीं बरसी पर हालात जियों-के-तियों हैं इस का ख़ुलासा अवकाश-प्राप्त न्यायधीश आर.एस. सोढ़ी ने कहा: 

“त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी और मंगोलपुरी में, आदमियों को घसीटकर गलियों में लाया गया और जिंदा जला दिया गया। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। बच्चों ने अपने पिताओं को मरते देखा और फिर राहत शिविरों में भूखे रहे। राजधानी और उसके आसपास आने वाली ट्रेनों को रोक दिया गया, और पगड़ी पहने यात्रियों को बाहर निकालकर मार डाला गया। सेना को समय रहते तैनात नहीं किया गया, और कई इलाकों में पुलिसकर्मी या तो एक तरफ खड़े रहे या फिर भीड़ का साथ दिया। कुछ ही हफ्तों के भीतर, नए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने एक रैली के दौरान कहा कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती हिलती है। ऐसा लग रहा था मानो उन्होंने इस त्रासदी को पहले ही स्वीकार कर लिया हो।”

“न्याय मिलने में बहुत देर लगी। एक हिसाब से, इन हत्याओं की जांच के लिए 11 आयोग और समितियां बनीं, लेकिन नतीजा लगभग कुछ नहीं निकला... जब भी कोई बस या ट्रेन हादसा होता है, तो सरकार तुरंत मान लेती है कि मृतकों के परिवारों को कुछ मुआवजा मिलना चाहिए और एक-दो दिन के भीतर मुआवजे का ऐलान कर देती है। 1984 के पीड़ितों का दावा कहीं ज्यादा मजबूत था, क्योंकि कई इलाकों में पुलिस बस तमाशबीन बनी रही और गवाहों ने जिन लोगों के नाम लिए, वे सत्ताधारी पार्टी से जुड़े थे। फिर भी, जो राहत दी गई, वह मृतकों के परिवारों को मुआवजा देने के बजाय, मुख्य रूप से संपत्ति और घर के नुकसान की भरपाई के लिए थी। मौत के लिए मुआवजा 10,000 रुपये (बाद में 20,000 रुपये) तय किया गया था, जबकि पूरी तरह से नष्ट हुए एक घर के लिए भी 10,000 रुपये का मुआवजा रखा गया था।

“1996 में हाई कोर्ट ने 3.5 लाख रुपये की राहत देने का आदेश दिया था, जो 2006 में एक केंद्रीय पैकेज के ज़रिए परिवारों तक पहुँच पाई। इसके अलावा, 2014 में मारे गए 3,325 लोगों के परिजनों के लिए 5 लाख रुपये और मंज़ूर किए गए। पेंशन और नौकरियों के वादों को पूरा करने का काम भी बहुत अधूरा और असंगत रहा है। 2023 तक, 10 राज्यों ने यह तक नहीं बताया कि उन्होंने कितनी रकम का भुगतान किया है। एक ऐसा राज्य जो दुर्घटनाओं के मामलों में तो तुरंत मुआवज़ा देता है, लेकिन एक ऐसे नरसंहार के लिए—जिसे वह रोक नहीं पाया—चार दशकों तक किश्तों में भुगतान करता है; उसने अपने सिख नागरिकों को यह बता दिया है कि उनकी जान की क्या कीमत है।”
[‘India must never forget scars of 1984’, The Tribune, Chandigarh. October 31, 2026.  Link: https://www.tribuneindia.com/news/comment/india-must-never-forget-scars-...

2014 तक राजसत्ता के पाखंड का ब्यौरा 

1984 नवम्बर के आरम्भ में हत्यारी टोलियों को खुली छूट देने के बाद, देश में राज कर रही राजीव गाँधी की कांग्रेसी सरकार को, विश्वभर में मिल रही धित्कार के बाद इस क़त्लेआम के ज़िम्मेदार आतंकियों के ख़िलाफ़ क़दम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा। 'दंगों' की जाँच के लिए एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, वेद मरवाह के तहत जाँच आयोग 1984 के अंत में नियुक्त किया गया। जब मरवाह आयोग अपनी ‘विस्फोटक’ रपट लगभग तैयार कर चुका था, इसे 1985 के  मध्य बर्ख़ास्त कर दिया गया। अब सुप्रीम कोर्ट के एक सेवारत्त वरिष्ठ न्यायधीश, रंगनाथ मिश्र के अध्यक्षता में '1984 दंगों' पर एक नया आयोग बनाया गया। मिश्र आयोग ने 1987 में अपनी रपट पेश करदी।  इस का सब से शर्मनाक पहलू यह था की सरकारी समझ के अनुकूल, मिश्र आयोग ने जिस सच्चाई (या सच्चाई को दबाने) की खोज की उस के अनुसार, "यह दंगे सहज रूप से शुरू हुवे लेकिन बाद में  इस का नेतर्त्व ग़ुंडों के हाथों में आगया।" न्याय की देवी के इस संरक्षक, न्यायधीश मिश्र ने इस क़त्लेआम को 'दंगे' (इस का मतलब होता है जब दोनों ओर से हिंसा हो) 'सहज' घोषित कर दिया। हुक्मरानों ने इस सेवा के लिए उन्हें नवाज़ा भी। कांग्रेसी सरकार ने उन्हें 6 साल के लिए राज्य सभा की ज़ीनत बनने का अवसर दिया।       

अब तक 14 जाँच आयोग बिठाए जा चुके हैं और यह सिलसिला ख़त्म होने की कोई उम्मीद नहीं है। भारतीय राज्य के लिए यह एक रिवाज बन गया है की पंजाब और दिल्ली (जहाँ सिख मतदाताओं की बड़ी तादाद है) में जब भी चुनाव होने वाले हौं तो एक नए आयोग की घोषणा कर दी जाये या क़त्लेआम में मारे गए लोगों के परिवारों को कुछ और मुआवज़ा देने की घोषणा कर दी जाए।  मशहूर वकील, एच एस फूलका जिन्हों ने 1984 के जनसंहार के ज़िम्मेदार तत्वों को सज़ा दिलाने के लिए बेमिसाल काम किया है, बहुत दुःख के साथ बताते हैं कि इस क़त्लेआम में शामिल बहुत सारे नेता किसी सज़ा के भागी होने के बजाए शासक बन बैठे और वह भी इस वजह से की उन्हों ने इस जनसंहार में हिस्सा लिया था।    

इस क़त्ले-आम की हर बरसी के नज़दीक आते भारतीय राज्य कुछ इस तरह का शोर ज़रूर मचाता है जैसे की वह क़ातिलों को सज़ा दिलाने के काम में ज़ोर-शोर से लगा है। 37वीं बरसी से पहले 2021 में सरकार की तरफ़ से दो सूचनायें दी गयीं। राष्ट्रीय अल्पसंखयक आयोग ने अक्टूबर 30, 2021 को बताया कि उस ने दिल्ली, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार, हरयाणा, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से इस बात का ब्यौरा माँगा है कि पीड़ित सिख परिवारों के कितना हर्जाना दिया गया है और क़ातिलों को खोजने और सज़ादिलाने के लिए किया क़दम उठाए गए हैं। इस से पहले जनवरी 2021 में उत्तर प्रदेश सरकार से यह जानकारी मिली थी कि कानपूर में जिस एक घर में 1984 में सिखों को क़त्ल किया गया था उसे खोलकर सबूत इकठ्ठा किये गए हैं। यह सब करने में केवल 37 साल लग गये! 42 साल होते-होते तो यह सब चर्चाएं भी बंद हो गई हैं।        

मौजूदा भाजपा/आरएसएस शासकों दुवारा धोका 

भाजपा/आरएसएस का दावा है कि वे हिन्दू-सिख एकता के झंडाबरदार हैं। हालांकि वे यह बताने से भी नहीं थकते कि सिख धर्म स्वतंत्र धर्म ना होकर हिन्दू धर्म का ही हिस्सा है। जब कांग्रेस का राज था तब वे 1984 के क़त्लेआम के ज़िम्मेदार अपराधियों को सज़ा नहीं दिला पाने के लिए कांग्रेस को दोषी मानते रहे हैं। 2014 के संसदीय चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान मोदी ने झाँसी की एक सभा में (अक्तूबर 25, 2013) कांग्रेस से सवाल पूछे कि वह यह बताए की वे कौन लोग थे जिन्हों ने "1984 में हज़ारों सिखों का क़त्ल किया" और " क्या किसी एक को भी सिखों के जनसंहार के लिए सज़ामिली है?" भाजपा/आरएसएस के प्रधान मंत्रीपद के प्रतियाशी मोदी ने 2014 के चुनावों के दौरान पंजाब और इस के बाहर लगातार 1984 में "सिखों के क़त्लेआम" का मुद्दा उठाया, जो बहुत जाएज़ था। मोदी ने प्रधान मंत्री बनने के बाद भी (अक्तूबर 31 2014) इस सच्चाई को माना कि इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद घटी सिख विरोधी हिंसा एक तरह का "एक ख़ंजर  था जो भारत देश के सीने में घोंप दिया गया।  हमारे अपने लोगों के क़त्ल हुए, यह हमला किसी एक सम्प्रदाए पर नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र पर था।" 2024 के चुनाव में मोदी पूरी तरह ख़मोश रहे। 

हिंदुत्व की प्रतिमा और आरएसएस के विचारक, प्रधान मंत्री मोदी इस बात पर दुःख जताते रहे हैं कि 1984 के जनसंहार के मुजरिमों की तलाश और उनको सज़ादेने का काम कांग्रेस के सरकारों ने नहीं किया। लेकिन मोदी इस शर्मनाक सच्चाई को छुपा गए कि 1984 के बाद सत्तासीन अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार जिस ने 1998 से 2004 तक देश पर राज किया, ने भी हत्यारों को पहचानने और उन्हें सज़ादिलाने के लिए चुप्पी ही साधे रखी। मोदी इस सच को भी छुपा गए की उन के राजनैतिक गुरु, एल के अडवाणी ने अपनी आत्मकथा में (पृष्ठ 430) इस बात का गुणगान किया है की कैसे भाजपा ने इंदिरा गाँधी को 'ऑपरेशन ब्लुस्टार' (1 से 8 जून 1984) करने के लिए प्रेरित किया।  याद रहे कि इस बदनाम सैनिक अभियान में सैंकड़ो सिख स्वर्ण मंदिर, अमृतसर में मारे गए और इसी का एक दुखद परिणाम प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या थी। प्रसिद्द पत्रकार, मनोज मित्ता जिन्हों ने 1984 के क़त्लेआम से सम्बंधित शासकों के काले कारनामों को सार्वजानिक करने में हिरावल भूमिका निभायी है, ने इस त्रासदी पर लिखी अपनी दिल-दहला देने वाली पुस्तक, When a Tree Shook Delhi: The 1984 Carnage and Its Aftermath, में साफ़ लिखा कि, 
"भाजपा की हकूमत के बावजूद ऐसी कोई भी इच्छा-शक्ति देखने को नहीं मिलती जिस से यह ज़ाहिर हो की जो क़त्लेआम कांग्रेस के राज में हुवा था उस के ज़िम्मेदार लोगों को सज़ादिलानी है। ऐसा लगता है मानो 1984 और 2002 (गुजरात में मुसलमानों का क़त्लेआम) के आयोजकों के बीच एक मौन सहमती हो"।

आरएसएस के श्रेष्ट विचारक नाना देशमुख [मोदी सरकार द्वारा 2019 में भारत रत्न से सम्मानित]  ने 1984 में सिखों के क़त्ले-आम को जायज़ ठराया था

ऐसा मत केवल आरएसएस के आलोचकों का ही नहीं है बल्कि आरएसएस के अभिलेखागार में उस काल के दस्तावेज़ों के अध्ययन से यह सच उभरकर सामने आता है कि आरएसएस ने इस क़त्लेआम को एक स्वाभाविक घटना के रूप में लिया, इंदिरा गाँधी की म्हणता के गुणगान किए और नए प्रधान मंत्री के तौर पर राजीव गाँधी को पूरा समर्थन देने का वायदा किया।    

इस संबंध में 1984 में सिखों के कत्लेआम के संबंध में एक स्तब्धकारी दस्तावेज़  का जिसे आरएसएस ने बहुत सारे शर्मनाक दस्तावेज़ों की तरह छुपाकर रखा हुआ है, के बारे में जानना ज़रूरी है। इसे आरएसएस के सुप्रसिद्ध विचारक और नेता नाना देशमुख (अब नहीं रहे) ने नवंबर 8, 1984 को वितरित किया था।

31 अक्तूबर 1984 को अपने ही दो सुरक्षा गार्डों द्वारा जो सिख थे, श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या के बाद भारत भर में हजारों निर्दोश सिख पुरूषों, महलाओं एवं बच्चों को जिन्दा जला दिया गया, हत्या कर दी गयी और अपंग बना दिया गया। सिखों के सैकड़ों धार्मिक स्थलों को नष्ट कर दिया गया, तथा सिखों के अनगिनत वाणिज्यिक एवं आवासीय संपत्ति लूटी गयी और तबाह कर दी गयी। यह सामान्य विश्वास रहा है कि इस जनसंहार के पीछे कांग्रेस प्रायोजित अपराधियों/कार्यकर्ताओं का हाथ था, यह सही हो सकता है। लेकिन दूसरी फासिस्ट एवं सांप्रदायिक ताक़तें भी थीं, जिन्होंने इस जनसंहार में सक्रिय हिस्सा लिया, जिनकी भूमिका की कभी भी जांच नहीं की गयी। यह दस्तावेज़  उन सभी अपराधियों को बेपर्दा करने में मदद कर सकता है जिन्होंने निर्दोश सिखों के साथ होली खेली जिनका इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ भी लेना-देना नहीं था। यह दस्तावेज़  इस बात पर रौशनी डाल सकता है कि इतने कैडर आये कहां से और जिसने पूरी सावधानी से सिखों के नरंसहार को संगठित किया। जो लोग 1984 के जनसंहार तथा अंगभंग के प्रत्यक्षदर्षी थे वे हत्यारे, लुटेरे गिरोहों की तेज़ी एवं सैनिक-फूर्ति से भौंचक थे जिन्होंने निर्दोश सिखों को मौत के घाट उतारा (बाद में बाबरी मस्जिद के ध्वंस, डा. ग्राहम स्टेन्स एवं दो पुत्रों को ज़िंदा जला देने और 2002 में गुजरात में मुसलमानों के जनसंहार के दौरान देखा गया)। यह कांग्रेस के ठगों की क्षमता के बाहर था। देशमुख का दस्तावेज़ 1984 के हत्यारों की पहचान में ज़बरदस्त मदद कर सकता है, जिन्होंने इस जनसंहार में कांग्रेसी गुंडों की मदद की। यह दस्तावेज़  भारत के सभी अल्पसंख्यकों के प्रति आरएसएस के पतित एवं फासिस्ट दृश्टिकोण को दर्शाता है। आरएसएस यह दलील देता रहा है कि वे मुसलमानों एवं ईसाइयों के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि वे विदेशी धर्मों के अनुयायी हैं। यहां हम पाते हैं कि वे सिखों के जनसंहार को भी उचित ठहराते हैं जो स्वयं उनकी अपनी श्रेणीबद्धता की दृश्टि से भी अपने ही देश के एक धर्म के अनुयायी थे। 
इस दस्तावेज़  में हम आरएसएस के श्रेष्ट नेता के मुँह से ही सुनेंगे कि आरएसएस तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व की तरह यह विश्वास करता था कि निर्दोश सिखों का जनसंहार उचित था। इस दस्तावेज़ में नाना देशमुख ने बड़ी चालाकी से सिख समुदाय के जनसंहार को उचित ठहराने का प्रयास किया है जैसा कि हम नीचे देखेंगेः 

1. सिखों का जनसंहार किसी ग्रुप या समाज-विरोधी तत्वों का काम नहीं था बल्कि वह क्रोध एवं रोष की सच्ची भावना का परिणाम था। 
2. नाना श्रीमती इंदिरा गांधी के दो सुरक्षा कर्मियों जो सिख थे, की कार्रवाई को पूरे सिख समुदाय से अलग नहीं करते हैं। उनके दस्तावेज़ से यह बात उभरकर सामने आती है कि इंदिरा गांधी के हत्यारे अपने समुदाय के किसी निर्देश के तहत काम कर रहे थे। इसलिए सिखों पर हमला उचित था। 
3. सिखों ने स्वयं इन हमलों को न्यौता दिया, इस तरह सिखों के जनसंहार को उचित ठहराने के कांग्रेस दुवारा प्रतिपादित सिद्धांत को आगे बढ़ाया। 
4. उन्होंने ‘आपरेशन ब्लू-स्टार’ को महिमामंडित किया और किसी तरह के उसके विरोध को राश्ट्र-विरोधी बताया है। जब हज़ारों की संख्या में सिख मारे जा रहे थे तब वे सिख उग्रवाद के बारे में देश को चेतावनी दे रहे थे, इस तरह इन हत्याओं का सैद्धांतिक रूप से बचाव करते हैं। 
5. उन के अनुसार समग्र रूप से सिख समुदाय ही पंजाब में हिंसा के लिए ज़िम्मेदर है। 
6. सिखों को आत्म-रक्षा में कुछ भी नहीं करना चाहिए बल्कि हत्यारी भीड़ के ख़िलाफ़ धैर्य एवं सहिश्णुता दिखानी चाहिए। 
7. हत्यारी भीड़ नहीं, बल्कि सिख बुद्धिजीवी जनसंहार के लिए जिम्मेवार हैं। उन्होंने सिखों को खाड़कू समुदाय बना दिया है, हिन्दू पहचान से अलग कर दिया है और राश्ट्रवाद विरोधी बना दिया है। इस तरह उन्हों ने स्वयं राश्ट्रवादी भारतीयों से हमले को न्यौता दिया है। यहां फिर वे सभी सिखों को एक ही गिरोह का हिस्सा मानते हैं और हमले को राश्ट्रवादी हिन्दुओं की एक प्रतिक्रिया। 
8. वे श्रीमती इन्दिरा गांधी को एकमात्र ऐसा नेता मानते हैं जो देश को एकताबद्ध रख सकीं और एक ऐसी महान नेता की हत्या पर ऐसे क़त्लेआम को टाला नहीं जा सकता था। 
9. राजीव गांधी जो श्रीमती इंदिरा गांधी के उत्तराधिकारी एवं भारत के प्रधानमंत्री बने और यह कहकर सिखों की राश्ट्रव्यापी हत्याओं को उचित ठहराया कि ‘‘जब एक विशल वृक्ष गिरता है जो हमेश कम्पन महसूस किया जाता है।’’ नाना दस्तावेज़  के अंत में इस बयान की सराहना करते हैं और उसे अपना आशीर्वाद देते हैं। 
10. यह दुखद है कि सिखों के जनसंहार की तुलना गांधी जी की हत्या के बाद आरएसएस पर हुए हमले से की जाती है और हम यह पाते हैं कि नाना सिखों को चुपचाप सब कुछ सहने की सलाह देते हैं। हर कोई जानता है कि गांधीजी की हत्या आरएसएस की प्रेरणा से हुई जबकि आम सिखों को श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या से कुछ भी लेना-देना नहीं था। 


11. केन्द्र में कांग्रेस सरकार से अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा के नियंत्रित करने के उपायों की मांग करते हुए एक भी वाक्य नहीं लिखा गया है। ध्यान दें, नाना ने 8 नवंबर 1984 को यह दस्तावेज़ प्रसारित किया और 31 अक्तूबर से उपर्युक्त तारीख तक सिखों को हत्यारे गिरोहों का सामना करने के लिए अकेले छोड़ दिया गया। नाना को इस सबके लिए कोई भी चिन्ता नहीं है। 

12. आरएसएस को सामाजिक काम करते हुए ख़ासकर अपने ख़ाकी निककर-धारी कार्यकर्ताओं को फ़ोटो समेत प्रचार-सामग्री प्रसारित करने का बड़ा शौक़े है। 1984 की हिंसा के दौरान ऐसा कुछ भी नहीं है। वास्तव में, नाना के लेख में घिरे हुए सिखों को आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा बचाने का कोई ज़िक्र नहीं किया गया है। 


नाना देशमुख दुवारा प्रसारित मूल दस्तावेज़ यहाँ प्रस्तुत है। यह दस्तावेज़ जॉर्ज फर्नांडेस को मिला था और उन्हों ने इसे अपनी हिंदी पत्रिका 'प्रतिपक्ष' में तभी 'इंका-आरएसएस गठजोड़' शीर्षक से छापा था।  



नाना देशमुख को 'भारत रत्न' से नवाज़ा गया 

शायद अभी 1984 की हिंसा में मारे गए और तबाह हुवे सिखों के साथ पूरी नाइंसाफ़ी नहीं हुई हो तो देश के पिछले गणतंत्र दिवस (2019) के मौक़े पर देशमुख को मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' प्रदान करने की घोषणा की गयी। प्रधान मंत्री मोदी ने उनकी तारीफ़ के पुल  बांधते हुवे कहा, "वे  दीनता, दया और दबेकुचले लोगों की सेवा के मूर्तिमान थे। वे वास्तविक रूप से भारत रत्न हैं!" अगर किसी ने  'ज़ख्म पर नमक छिड़कना' मुहावरे को समझना हो तो इस से बेहतर कोई उद्धरण नहीं हो सकता।   

1984 के क़त्लेआम पर मनमोहन सिंह (प्रधानमंत्री 2004-2014) की माफ़ी का आरएसएस ने विरोध किया।

1984 में ही नहीं, उस के बाद भी, यहां तक की मौजूदा समय में भी आरएसएस इस जनसंहार पर पर्दा डालने में लगा है। यह जानकर किसी को भी शर्म आ सकती है कि आरएसएस के एक वरिष्ठ शिक्षा-सम्बन्धी निति निर्धारक, दीना नाथ बत्रा ने यह मांग की है की मनमोहन सिंह ने कांग्रेस का प्रधान मंत्री रहते हुवे संसद के सामने 1984 की हिंसा के लिए जो माफ़ी मांगी थी उस के तमाम सन्दर्भ स्कूली किताबों से निकल दिए जाएँ। याद रहे की अगस्त 12, 2005 को तत्कालीन प्रधान मंत्री, मनमोहन सिंह ने संसद के समक्ष माफ़ी मांगते हुए कहा था, "मुझे सिखों से माफ़ी मांगते हुए ज़रा सा भी संकोच नहीं है। मैं सिर्फ़ सिखों से ही नहीं बल्कि समस्त भारतीय राष्ट्र से माफ़ी मांगता हूँ की 1984 में जो कुछ हुआ वह हमारे संविधान में लिखित भारतीय राष्ट्रवाद की भावना के ख़िलाफ़ था।" 

यह दस्तावेज़  भारत के सभी अल्पसंख्यकों के प्रति आरएसएस के असली पतित एवं फासिस्ट दृष्टिकोण को दर्शाता है। आरएसएस यह दलील देता रहा है कि वे मुसलमानों एवं ईसाइयों के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि वे ‘विदेशी’ धर्मों के अनुयायी हैं। यहां हम पाते हैं कि वे सिखों के जनसंहार को भी उचित ठहराते हैं जो स्वयं उनकी अपनी श्रेणीबद्धता की दृष्टि से भी अपने ही देश के एक धर्म के अनुयायी हैं।

यह दुखद ब्यौरा केवल एक सच को रेखांकित करता है और वह यह है की 1984 के सिखों के क़त्लेआम के मामले में आरएसएस/भाजपा अपने आप को कांग्रेस से भिन्न साबित करने के लिए चाहे जो भी दावे करे लेकिन दोनों में तनिक भी अंतर् नहीं है। इन दोनों से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। 

दो तरह का न्याय

जब भी देश में अल्पसंख्यकों और दलितों के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर हिंसा होती है, अपराधियों की कभी न ख़त्म होने वाली तलाश जारी रहती है और अपराधियों को कभी दंडित नहीं किया जाता है। अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा की प्रमुख घटनाएं जैसे नेल्ली जनसंहार  (1983), सिख जनसंहार  (1984), मुस्लिम युवाओं का हाशिमपुरा कस्टोडियल जनसंहार  (1987), अयोध्या मस्जिद विध्वंस से पहले/बाद में मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा (1990-92), गुजरात जनसंहार  (2002) और कंधमाल में ईसाइयों का सफ़ाया (2008) इस वास्तविकता के प्रमाण हैं। 

लेकिन जब पीड़ित दलित या अल्पसंख्यक होते हैं तो ऐसी कोई तात्कालिकता नहीं दिखाई जाती है। ऐसे मामलों में भारतीय राज्य आयोग पर आयोग बनाने का कभी न ख़त्म होने वाला खेल खेलना शुरू कर देता है ताकि जघन्य अपराध जनता की स्मृति से ग़ायब हो जायें। 1984 में भारत के विभिन्न हिस्सों में सिखों का भीषण जनसंहार भारतीय न्याय प्रणाली के इस आपराधिक रवैये का जीता जागता सबूत है।

दलित विरोधी हिंसा की स्थिति भी इस से अलग नहीं है। दलितों के उत्पीड़न और जनसंहार  की प्रमुख घटनाएं; 1968 किल्वेनमनी जनसंहार, 1997 मेलावलावु जनसंहार, 2013 मरक्कनम दलित विरोधी हिंसा, 2012 धर्मपुरी दलित विरोधी हिंसा (सभी तमिलनाडु में), 1985 करमचेडु जनसंहार, 1991 त्सुंदूर जनसंहार  (सभी आंध्र प्रदेश में), 1996 बथानी टोला जनसंहार, 1997 लक्ष्मणपुर बाथे जनसंहार (सभी बिहार में), 1997 रमाबाई हत्याएं, मुंबई, 2006 खैरलांजी हत्याकांड, 2014 जावखेड़ा हत्याकांड, (सभी महाराष्ट्र में), 2000 (कर्नाटक में जाति उत्पीड़न), मृत गाय की खाल निकालने के लिए 5 दलितों को पीट-पीटकर मार डाला गया 2006, 2011 में मिर्चपुर हत्याएं (सभी हरियाणा में), 2015 डंगावास (राजस्थान) में दलित विरोधी हिंसा दलित उत्पीड़न की हजारों घटनाओं में से कुछ हैं। इन सभी मामलों में अभी तक अपराधियों की पहचान नहीं हो पाई है। पहचान किए जाने पर भी सज़ा मिलने का प्रतिशत 20% से अधिक नहीं है।

दूसरी ओर, दलित, मज़दूर वर्ग और हिंसा के अल्पसंख्यक 'अपराधियों' को विशेष जांच दल गठित करके और फ़ास्ट ट्रैक अदालतों द्वारा दंडित करके कुशलतापूर्वक मुकदमा चलाया जाता है। 'न्याय', 'राष्ट्रीय सुरक्षा' और 'समाज की इच्छा' का मान रखने के नाम पर उन्हें फांसी दी जाती है और जेल में डाल दिया जाता है।

1984 के मुजरिमों की खोज और उनको उचित सज़ा  दिलाने का मक़सद तभी पूरा हो सकता है, जब हम भारतीय एक साथ 38 साल से चल रहे 'न्याय के पाखंड' के ख़िलाफ़ लामबंद होंगे। यह लड़ाई सिखों को इन्साफ़ दिलाने के लिए ही नहीं है बल्कि एक प्रजातान्त्रिक-धर्मनिरपेक्ष देश को बचाने की भी है।   

यह तस्वीर सिखों के जनसंहार के ख़िलाफ़ 1984-1985 में बड़ी तादाद में किए गये निशांत नाट्य मंच के नुक्कड़ नाटक ‘साधारण लोग’ की एक प्रस्तुति की है जिस में लेखक भी एक भूमिका निभा रहा है। 
1984 के नरसंहार के दोषियों को खोजने में भारतीय राज्य की ज़िम्मेदारी से बचने की आपराधिक कोशिश जानबूझकर और सोची-समझी थी। इसमें शामिल अपराधियों की पहचान सार्वजनिक होने के बावजूद। प्रमुख मानवाधिकार संगठनों, जैसे पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल राइट्स, ने नवंबर के अंत तक एक तथ्यात्मक ग्राउंड रिपोर्ट प्रकाशित कर दी थी, जिसमें शहर भर की घटनाओं का विस्तृत विवरण और इसमें शामिल अपराधियों के नाम शामिल थे। 'दोषी कौन हैं?' शीर्षक वाली यह रिपोर्ट, जनसंहार में जीवित बचे लोगों, विभिन्न धर्मों के नागरिक समाज के सदस्यों, जो नरसंहार के खिलाफ थे और जिन्होंने कई जगहों पर सिखों की रक्षा और बचाव में अहम भूमिका निभाई थी, के प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों पर आधारित थी। राज्य ने इस रिपोर्ट को कूड़ेदान में फेंक दिया, लेकिन यह आज तक नरसंहार का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

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