संकट में किताबें: बंगाल में वामपंथी किताबों के स्टॉल, कलकत्ता उच्च न्यायालय का हस्तक्षेप और हिटलर के जर्मनी से मिली चेतावनी

Written by sabrang india | Published on: October 19, 2026
बुलडोज़र पीछे हट गया और अदालत ने अस्थायी राहत दे दी। लेकिन यह तय करने का अधिकार किसे है कि बंगाल की सार्वजनिक जगहों पर किन विचारों को जगह मिल सकती है?
 

Image: Dipankar Bhattacharya

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का समय अब सार्वजनिक जगहों पर कब्जा करने, किनके विचारों का प्रचार हो सकता है और राज्य की सांस्कृतिक पहचान तय करने का अधिकार किसके पास है, इन मुद्दों पर बढ़ते टकराव का केंद्र बन गया है। दशकों से, वामपंथी दलों द्वारा लगाए जाने वाले बुकस्टॉल इन उत्सवों का एक जाना-पहचाना हिस्सा रहे हैं। यहां किताबों, कला और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनीतिक साहित्य भी उपलब्ध होता है, जो इन उत्सवों में जान फूंकते हैं। हालांकि, इस साल पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) - CPM, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन और अन्य वामपंथी संगठनों से जुड़े स्टॉलों पर हमले, तोड़फोड़, धमकियां मिलने और उन्हें हटाने की कोशिशों की खबरें सामने आई हैं। यह विवाद तब और गहरा गया जब सुवेंदु अधिकारी की ओर से दुर्गा पूजा कमेटियों को चेतावनी दी गई कि वे उन वामपंथी बुकस्टॉलों को जगह न दें, जो 'दुर्गा पूजा' के बजाय 'शरोदोत्सव' शब्द का इस्तेमाल करते हैं।

यह टकराव 17 अक्टूबर, शनिवार की रात जाधवपुर में तब चरम पर पहुंच गया, जब कोलकाता नगर निगम की एक टीम, पुलिस और केंद्रीय बलों के साथ, CPM के एक बुकस्टॉल को तोड़ने पहुंची। पार्टी का कहना है कि उनके पास इसके लिए जरूरी अनुमतियां थीं। वामपंथी समर्थकों ने पूरी रात इस कार्रवाई का विरोध किया, जिसके चलते कई घंटों के टकराव के बाद तोड़ने आई टीम को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद CPM ने कलकत्ता उच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। अदालत ने 20 अक्टूबर को उनकी याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई, जिससे उस बुकस्टॉल को कुछ समय के लिए राहत मिल गई।



यह फौरी राहत स्वागत योग्य है। लेकिन यह एक और चिंताजनक सवाल भी खड़ा करता है: एक बुकस्टॉल को लेकर शुरू हुआ विवाद इतना कैसे बढ़ गया कि इसमें पुलिस, नगर निगम के अधिकारी और राजनीतिक प्रदर्शनकारी शामिल हो गए, और मामला अदालत के दखल तक पहुंच गया?





इस घटना को बोंगांव में CPM के एक बुकस्टॉल से जुड़े पहले के एक विवाद और उस पर आए अदालती आदेश के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। याचिका में आरोप लगाया गया था कि CPI(M) को अपना पारंपरिक बुकस्टॉल लगाने से रोका गया, जबकि उसी जगह पर 'हिंदू जागरण मंच' के स्टॉल को लगाने की अनुमति दे दी गई। वामपंथी दल ने अदालत को बताया कि वे दशकों से दुर्गा पूजा पंडालों के पास किताबों के स्टॉल लगाते आ रहे हैं। उनकी याचिका में लगभग 50 से 60 साल पुरानी परंपरा का जिक्र है। एक एकल-न्यायाधीश पीठ (सिंगल-जज बेंच) ने पार्टी को अपनी तय जगह के 100 मीटर के दायरे में स्टॉल लगाने की अनुमति दी थी। साथ ही, अधिकारियों को यह जांचने का निर्देश दिया था कि क्या 'हिंदू जागरण मंच' से जुड़ा स्टॉल जरूरी अनुमति के साथ लगा है। 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार, 16 अक्टूबर को राज्य सरकार की चुनौती के बाद एक खंडपीठ (डिवीजन बेंच) ने उस आदेश पर रोक लगा दी। इसके चलते, दुर्गा पूजा के बचे हुए दिनों में CPM का स्टॉल नहीं लग सका।

बोंगांव की कार्यवाही और जादवपुर का टकराव कानूनी रूप से अलग-अलग मामले हैं। बोंगांव मामले में खंडपीठ द्वारा लगाई गई रोक को, जादवपुर के स्टॉल को हटाने का आदेश नहीं माना जा सकता। इसी तरह, जादवपुर की याचिका पर सुनवाई करने का हालिया फैसला यह भी साबित नहीं करता कि अदालत ने हर तरह की प्रशासनिक कार्रवाई पर पूरी तरह से रोक (ब्लैंकेट इंजंक्शन) लगा दी है। फिर भी, इन दोनों मामलों के अलग होने से 'कानूनी अधिकार' का सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। जादवपुर के स्टॉल को हटाने की कोई भी कोशिश अपने आप में कानूनी आधार पर टिकी होनी चाहिए, न कि इस धारणा पर कि बोंगांव का अलग आदेश इस मामले को सुलझा देता है।

CPM राज्य समिति के सदस्य सुदीप सेनगुप्ता ने 'द टेलीग्राफ' को बताया कि जादवपुर के स्टॉल के पास कोलकाता पुलिस, कोलकाता नगर निगम और बिजली आपूर्ति से जुड़े संबंधित अधिकारियों की जरूरी अनुमतियां थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत में छुट्टियां शुरू होने के बाद अधिकारी इसे हटाने आ गए। इन दावों से एक सीधा सवाल उठता है: अगर अनुमतियां मिल चुकी थीं, तो अधिकारी किस कानूनी आधार पर स्टॉल को हटाना चाह रहे थे, और ऐसा करने से पहले उन्होंने किस प्रक्रिया का पालन किया?

शनिवार रात को स्टॉल हटाने की कोशिश का विरोध किया गया, जिसके बाद पुलिस और केंद्रीय बल और बड़ी संख्या में वहां पहुंच गए। CPM नेता सुदीप सेनगुप्ता और सृजन भट्टाचार्य समेत वामपंथी समर्थकों ने रविवार तड़के तक अपना विरोध जारी रखा। खबरों के अनुसार, पुलिस ने कई बार ढांचे को तोड़ने की कोशिश की, जबकि समर्थकों ने नारे लगाकर जवाब दिया और वहां से हटने से इनकार कर दिया। आखिरकार यह अभियान जादवपुर वाले स्टॉल को तोड़े बिना ही खत्म हो गया, हालांकि 'सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (कम्युनिस्ट)' (SUCI) और 'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स' (APDR) से जुड़े स्टॉलों को हटा दिए जाने की खबर है।

जो कुछ हो रहा है, वह केवल किसी धार्मिक उत्सव के दौरान अस्थायी ढांचों को लेकर उपजा विवाद नहीं है। यह बिना किसी डर-दबाव के अपने राजनीतिक विचारों को फैलाने के अधिकार, सार्वजनिक अधिकारियों की निष्पक्ष रूप से काम करने की जिम्मेदारी, और सांस्कृतिक भागीदारी को वैचारिक अनुरूपता (ideological conformity) की परीक्षा में बदलने देने के खतरे से जुड़ा एक टकराव है।

जब किताबों का स्टॉल राजनीतिक निशाना बन जाए

जादवपुर की घटना कोई इकलौती मिसाल नहीं है। पूरे पश्चिम बंगाल में, वामपंथी दलों ने दुर्गा पूजा से पहले के हफ्तों में अपने मौसमी (सीजनल) बुक स्टॉलों पर हमलों, धमकियों, तोड़फोड़ और कामकाज में रुकावट डाले जाने की शिकायतें की हैं। 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने वामपंथी बुक स्टॉलों पर हुए हमलों के बारे में रिपोर्ट दी है, जिसमें CPM के इन आरोपों का जिक्र है कि उनके स्टॉलों को BJP समर्थकों ने निशाना बनाया है। BJP के प्रदेश अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने अपनी पार्टी की संलिप्तता से इनकार किया है और कहा है कि इस बारे में अधिकारियों से शिकायत की जानी चाहिए। इन सभी आरोपों की अलग-अलग जांच होनी चाहिए; केवल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होने के आधार पर ही किसी को दोषी नहीं माना जा सकता। लेकिन, जिस तरह से ये घटनाएं कई जगहों पर सामने आई हैं, उसे देखते हुए इस पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।

'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, कोलकाता में CPM ने कथित हमलों, धमकियों और पार्टी से जुड़े बुक स्टॉलों को खुलने से रोकने की कोशिशों को लेकर कम से कम 10 पुलिस शिकायतें दर्ज कराई हैं। इन शिकायतों में SUCI(C) से जुड़े स्टॉलों पर तोड़फोड़, बैनर फाड़ने, किताबें नष्ट करने और एक हमले का जिक्र है, जिसमें पार्टी का एक वरिष्ठ सदस्य घायल हो गया था। रविवार को बारासात में, BJP समर्थकों द्वारा किए गए कथित हमले में CPM के पांच समर्थक घायल हो गए। असल में क्या हुआ था, यह जानने के लिए पुलिस की कार्रवाई और जांच के नतीजे बहुत महत्वपूर्ण हैं।

मालदा के चंचल इलाके में, CPM ने आरोप लगाया है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनके कार्यकर्ताओं को धमकाया और मार्क्सवादी साहित्य बेचने वाले एक स्टॉल को जबरन बंद करवा दिया। CPM के जिला सचिवालय सदस्य अनिमेष सिन्हा ने बताया कि पार्टी ने स्थानीय पुलिस थाने में लिखित सूचना दी थी, जिसकी उन्हें पावती (acknowledgement) भी मिली है। वहीं, बजरंग दल के एक कार्यकर्ता ने आरोप लगाया कि पार्टी द्वारा देवी दुर्गा की तस्वीर न लगाना हिंदू धर्म का अपमान है। यह आरोप इस टकराव के पीछे छिपी एक चिंताजनक सोच को उजागर करता है: कि किसी धार्मिक उत्सव के दौरान किताबें बेचने वाले राजनीतिक संगठन को, वहां हिस्सा लेने के लिए, धार्मिक अनुरूपता (religious conformity) दिखानी ही होगी।

किसी बुक स्टॉल को अपना अस्तित्व साबित करने के लिए कोई धार्मिक तस्वीर लगाने की जरूरत नहीं होती। किसी राजनीतिक संगठन को सार्वजनिक जगह पर अपना साहित्य बांटने से पहले किसी खास धार्मिक पहचान को मानने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। जब तक कि कोई विशेष कानूनी शर्त न हो, तब तक यह मांग करना कि मार्क्सवादी साहित्य के साथ किसी देवी-देवता की तस्वीर भी होनी चाहिए, कोई निष्पक्ष प्रशासनिक शर्त नहीं है। यह एक वैचारिक मांग है।

इस विवाद को 10 सितंबर को सुवेंदु अधिकारी की उस चेतावनी ने और हवा दे दी, जिसमें उन्होंने दुर्गा पूजा समितियों से कहा था कि वे ऐसे वामपंथी बुकस्टॉलों को जगह न दें, जो 'दुर्गा पूजा' शब्द का इस्तेमाल करने के बजाय 'शरोदोत्सव' (शरद ऋतु का उत्सव) शब्द का प्रयोग करते हैं। 'द टेलीग्राफ' की रिपोर्ट के अनुसार, इस चेतावनी में समितियों से कहा गया था कि वे ऐसे स्टॉलों को जगह न दें। इस बयान का महत्व इस बात में है कि यह सार्वजनिक सांस्कृतिक जगहों तक पहुंच को, किसी राजनीतिक संगठन द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों से जोड़ने की कोशिश करता है।

दुर्गा पूजा एक हिंदू धार्मिक त्योहार है। इस तथ्य को मानने का मतलब यह नहीं है कि इससे जुड़ी हर सार्वजनिक गतिविधि को धार्मिक निष्ठा की परीक्षा बना दिया जाए। बंगाल में पूजा का मौसम अब एक बड़ा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर बन गया है, जहां धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ कला, साहित्य, प्रदर्शन, सार्वजनिक सभाएं और राजनीतिक चर्चाएं भी होती हैं। मार्क्सवादी, समाजवादी, उदारवादी और अन्य तरह का साहित्य बेचने वाले बुकस्टॉल इसी व्यापक सांस्कृतिक जीवन का हिस्सा हैं।

विचारों को फैलाने का अधिकार इस बात पर निर्भर नहीं हो सकता कि वे विचार राजनीतिक सत्ता या भीड़ के सबसे मुखर हिस्से को पसंद आते हैं या नहीं। वामपंथी दल लंबे समय से पूजा स्थलों पर मौजूद रहे हैं, जहां वे राजनीतिक लेखन, साहित्यिक कृतियां और अन्य प्रकाशन बेचने वाले बुकस्टॉल लगाते हैं। 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार राज्य भर में इन स्टॉलों को लेकर विवाद हुए हैं। 'ऑल्ट न्यूज़' के अनुसार, सीपीएम और अन्य वामपंथी दलों का कहना है कि वे हमेशा की तरह पुलिस को सूचित करते रहे हैं और जरूरी शुल्क भी चुकाते रहे हैं; वहीं, प्रशासन का कहना है कि कुछ स्टॉलों के पास जरूरी अनुमतियां नहीं थीं।

किसी स्टॉल को हटाने की प्रशासनिक शक्ति का मतलब किसी विचार को दबाने की शक्ति नहीं है

यह विवाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और कानून के शासन जैसे संवैधानिक सिद्धांतों को प्रमुखता से सामने लाता है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जिस पर अनुच्छेद 19(2) के तहत उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अनुच्छेद 19(6) के अधीन, अनुच्छेद 19(1)(g) भी वैध व्यावसायिक गतिविधियों के संदर्भ में प्रासंगिक है। इसमें कौन-से अधिकार शामिल होंगे, यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा- जैसे कि जगह की प्रकृति, आवश्यक अनुमतियाँ और अधिकारियों का आचरण।

किसी राजनीतिक बुकस्टॉल के पास किसी भी सार्वजनिक स्थान पर कब्जा करने का बिना शर्त अधिकार नहीं होता है। नगर निकाय सार्वजनिक भूमि, पैदल चलने वालों की आवाजाही, बिजली कनेक्शन, सुरक्षा और लाइसेंसिंग को विनियमित कर सकते हैं। लेकिन सार्वजनिक स्थान को विनियमित करने का अधिकार, यह तय करने की असीमित शक्ति नहीं देता कि वहां किन राजनीतिक विचारों का प्रचार-प्रसार किया जा सकता है।

जहां विवाद अनुमतियों से जुड़ा हो, वहां अधिकारियों को उस विशिष्ट नियम की पहचान करनी चाहिए जिसका उल्लंघन हुआ है, और अपने निर्णय के लिए एक स्पष्ट और समीक्षा योग्य आधार प्रदान करना चाहिए। यदि किसी स्टॉल के पास वैध अनुमति है, तो अधिकारियों को उस स्टॉल के कामकाज में बाधा डालने वाली किसी भी कार्रवाई के लिए कानूनी आधार बताना होगा। यदि हिंसा का खतरा हो, तो पुलिस को उन लोगों की सुरक्षा करनी चाहिए जो अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग कर रहे हैं, और डराने-धमकाने के विश्वसनीय आरोपों की जांच करनी चाहिए।

बोंगांव से जुड़ी पिछली कार्यवाही इस मानक के महत्व को रेखांकित करती है। गुरुवार, 15 अक्टूबर को, जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने बोंगांव पुलिस जिले के पुलिस अधीक्षक और बोंगांव पुलिस स्टेशन के प्रभारी निरीक्षक को निर्देश दिया कि वे सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखें और पर्याप्त सुरक्षा तैनात करें, ताकि CPI(M) दुर्गा पूजा के दौरान अपना बुकस्टॉल लगा सके और किताबें बेच सके। यह अनुमति पार्टी कार्यालय के 100 मीटर के दायरे में एक स्थान के लिए दी गई है, जो पंडाल के पास स्थित है। पुलिस को यह भी निर्देश दिया गया है कि वे दूसरों को पार्टी की गतिविधियों में बाधा डालने से रोकें और 23 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में अनुपालन रिपोर्ट (compliance report) पेश करें। 'लाइवलॉ' (LiveLaw) की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस भट्टाचार्य ने कहा कि लोकतंत्र में अलग-अलग राजनीतिक विचारों और विचारधाराओं का प्रसार स्वागत योग्य है, क्योंकि इससे लोकतंत्र "सार्थक, सुदृढ़ और परिपक्व" बनता है। बाद में, डिवीजन बेंच द्वारा लगाई गई रोक (stay) ने इस मामले की स्थिति को बदल दिया। सामने आए हमलों से यह खतरा उजागर होता है कि अगर निजी राजनीतिक समूहों को सांस्कृतिक गतिविधियों पर नियंत्रण करने की छूट दी जाए, तो क्या हो सकता है। किसी बुकस्टॉल को इसलिए बंद करने की मांग करना कि वहां मार्क्सवादी साहित्य है, या इसलिए कि वहां किसी खास धार्मिक तस्वीर को नहीं लगाया गया है- यह कानूनी नियमों का विकल्प नहीं हो सकता।

ऐतिहासिक चेतावनी

हिटलर के जर्मनी का इतिहास हमें एक गंभीर चेतावनी देता है कि अगर राजनीतिक दमन को सामान्य मान लिया जाए, तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं। इस तुलना का मतलब यह नहीं है कि आज के हर टकराव को नाज़ीवाद मान लिया जाए, और न ही यह कि पश्चिम बंगाल में पहले से ही नाजी तानाशाही चल रही है। ऐतिहासिक परिस्थितियां अलग हैं। ध्यान देने वाली बात नाजी सत्ता के कब्जे की एक खास और प्रमाणित घटना है: राजनीतिक विरोधियों, खासकर कम्युनिस्टों को सुनियोजित तरीके से निशाना बनाना, जिसके बाद संवैधानिक सुरक्षाओं को खत्म कर दिया गया और राजनीतिक बहुलवाद को नष्ट कर दिया गया।



27 फरवरी 1933 को, जर्मनी की संसद 'राइखस्टाग' (Reichstag) में आग लगा दी गई। नाजी नेतृत्व ने इस घटना का फायदा उठाते हुए इसे कम्युनिस्ट साजिश का सबूत बताया, जबकि यह दावा पूरी तरह झूठा था कि यह आग किसी सुनियोजित कम्युनिस्ट विद्रोह का हिस्सा थी। अगले ही दिन, राष्ट्रपति पॉल वॉन हिंडनबर्ग ने 'राइखस्टाग फायर डिक्री' (आदेश) जारी किया। इसके तहत कई महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षाएं निलंबित कर दी गईं, जिनमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की आजादी और सभा करने के अधिकार शामिल थे। इससे राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार करना और हिरासत में लेना आसान हो गया, प्रकाशनों पर रोक लगा दी गई, और पुलिस की शक्तियों पर लगी पाबंदियां हटा दी गईं। 'यूनाइटेड स्टेट्स होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम' के अनुसार, यह आदेश नाजी तानाशाही स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम था। कम्युनिस्टों पर हमला इस प्रक्रिया का कोई इत्तेफाकन नतीजा नहीं था, बल्कि यह इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में था।

इस आदेश के बाद, कम्युनिस्ट प्रतिनिधियों को गिरफ्तार कर लिया गया या उन्हें राजनीतिक गतिविधियों में स्वतंत्र रूप से हिस्सा लेने से रोक दिया गया। 23 मार्च 1933 को, नाजी सरकार ने 'इनेबलिंग एक्ट' (Enabling Act) पारित करवाया। इसके जरिए हिटलर के मंत्रिमंडल को संसद की सहमति के बिना कानून बनाने की शक्ति मिल गई- यहां तक कि वे ऐसे कानून भी बना सकते थे जो मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन करते हों। नाजी नेतृत्व ने डराने-धमकाने और उत्पीड़न का सहारा लेकर इस कानून को पास करवाया, और 81 कम्युनिस्ट प्रतिनिधियों तथा 26 सोशल डेमोक्रेटिक प्रतिनिधियों को उनकी सीटों पर बैठने से रोक दिया। 'यूनाइटेड स्टेट्स होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम' के दस्तावेजों के अनुसार, यह कानून हिटलर की तानाशाही की नींव बना।

जर्मन लोकतंत्र का विनाश उन सभी समूहों के दमन से एक साथ या एक ही तरीके से शुरू नहीं हुआ, जिन्हें बाद में नाजी शासन ने अपना निशाना बनाया। इसमें विपक्ष, नागरिक स्वतंत्रता और संस्थागत नियंत्रणों को धीरे-धीरे खत्म करने की प्रक्रिया शामिल थी। कम्युनिस्ट सबसे पहले और सबसे प्रमुख राजनीतिक लक्ष्यों में से थे। उनके दमन ने ऐसी स्थितियां पैदा करने में मदद की, जिनमें नाजी अन्य राजनीतिक विरोधियों, स्वतंत्र संगठनों और अंततः पूरे समुदायों के खिलाफ कार्रवाई कर सके।

किसी सरकार का कम्युनिस्टों से असहमत होना और एक ऐसा राजनीतिक माहौल होना, जिसमें कम्युनिस्ट साहित्य को प्रतिबंधित करने लायक माना जाए- इन दोनों बातों में फर्क है। किसी तटस्थ नगरपालिका नियम को लागू करने और प्रशासनिक तंत्र का इस तरह इस्तेमाल करने में फर्क है, जिससे चुनिंदा लोगों के साथ भेदभाव होने पर गंभीर सवाल उठते हों। किसी धार्मिक समुदाय का अपनी परंपराओं को मनाना और इस बात पर जोर देना कि सार्वजनिक संस्कृति में शामिल होने के लिए वैचारिक या धार्मिक रूप से एक जैसा होना जरूरी है- इन दोनों में फर्क है। इन अंतरों को बनाए रखना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि जब ये अंतर मिटा दिए जाते हैं, तो क्या हो सकता है।

बंगाल का बौद्धिक इतिहास कई परस्पर विरोधी परंपराओं से मिलकर बना है: धार्मिक सुधार, उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन, तर्कवाद, मानवतावाद, मार्क्सवाद, सामाजिक आलोचना और कई तरह की साहित्यिक व राजनीतिक धाराएं। कोई समाज अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक परंपराओं पर तब भरोसा नहीं दिखाता, जब वह उन परंपराओं को चुनौती देने वाले साहित्य को दबा देता है। कोई उत्सव तब अधिक सार्थक नहीं हो जाता, जब उसमें उन नागरिकों को शामिल होने से रोक दिया जाए, जिनकी राजनीतिक मान्यताएं उत्सव के आयोजकों से अलग हैं। और कोई लोकतंत्र तब मजबूत नहीं होता, जब वह सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले समूह को यह तय करने की छूट दे दे कि किन आवाजों को सुना जाना चाहिए।

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