साहिल वाकोडे की मौत और जातिगत भेदभाव के आरोपों को लेकर उनके माता-पिता की भूख हड़ताल जारी है। इस बीच मुंबई पुलिस ने IIT बॉम्बे के रास्ते को बैरिकेड लगाकर बंद कर दिया और सिविल सोसाइटी के नेताओं को हिरासत में ले लिया।

मुंबई पुलिस ने बुधवार, 14 अक्टूबर को IIT बॉम्बे के बाहर जमा हुए अंबेडकरवादी नेताओं और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को हिरासत में ले लिया। ये लोग ‘चलो IIT बॉम्बे’ के आह्वान पर वहां इकट्ठा हुए थे। उनकी मांग थी कि दूसरे वर्ष के बीटेक छात्र साहिल वाकोडे की मौत के लिए जवाबदेही तय की जाए और जातिगत भेदभाव के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो। हिरासत में लिए गए लोगों में राहुल सोनपिंपले, दीपाली साल्वे और संभाजी भगत शामिल थे। यह विरोध प्रदर्शन साहिल के माता-पिता के समर्थन में आयोजित किया गया था, जो लगभग दो सप्ताह से भूख हड़ताल पर हैं। वे संस्थान से जवाब मांग रहे हैं और अपने बेटे की मौत की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।

‘द फेडरल’ के अनुसार, साहिल के पिता रवींद्र वाकोडे के आह्वान पर IIT बॉम्बे के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। IANS ने भी परिवार का समर्थन कर रहे प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबर दी है। पुलिस का रवैया काफी सख्त था। पूरे कैंपस में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया, प्रवेश पर रोक लगा दी गई और अपनी मांगें प्रशासन के सामने रखने जा रहे लोगों को हिरासत में ले लिया गया। अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को प्रशासन से बातचीत करने का मौका देने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।


सवाल यह उठता है कि अगर प्रशासन के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो अपनी बात रखने के लिए आए प्रतिनिधिमंडल को सुनने के बजाय पुलिस की पाबंदियों और हिरासत का सामना क्यों करना पड़ा?
परिवार जवाब मांग रहा है, लेकिन पुलिस ने प्रवेश से रोका
स्वतंत्र पत्रकार ग्रीष्मा कुथार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि मार्च से पहले ही पुलिसकर्मी पूरे IIT बॉम्बे कैंपस में फैल गए थे और लोगों को कैंपस में घुसने से रोक रहे थे। जब पूछा गया कि साहिल के माता-पिता को ही अंदर क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है, तो एक पुलिस अधिकारी ने कथित तौर पर जवाब दिया, “वे यहां क्यों आएंगे?”

यह बातचीत काफी परेशान करने वाली है, क्योंकि साहिल के माता-पिता अपने बेटे की मौत के बाद जवाबदेही की मांग को लेकर पिछले दो सप्ताह से भूख हड़ताल पर हैं। उनकी इस लड़ाई पर संस्थान की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली है। इसके बजाय उनके समर्थकों को कैंपस में प्रवेश करने और प्रशासन तक पहुंचने से रोक दिया गया।
दलित-बहुजन छात्रों को केवल संस्थान के आश्वासनों से कहीं अधिक की जरूरत है
‘महाराष्ट्र टाइम्स’ के अनुसार, छात्र संगठनों और अंबेडकरवादी समूहों ने एक निष्पक्ष जांच समिति बनाने, IIT बॉम्बे के निदेशक से स्पष्ट जवाब देने तथा जातिगत भेदभाव के आरोपों और छात्रों की सुरक्षा के मामले में ठोस कार्रवाई करने की मांग की है। उन्होंने संस्थागत भेदभाव को लेकर व्यापक चिंताएं भी जताई हैं, जिनमें आरक्षण रोस्टर से जुड़े पुराने विवाद भी शामिल हैं।
प्रदर्शनकारी एक ऐसा सवाल उठा रहे हैं जिसे संस्थान अनदेखा नहीं कर सकता: एक ऐसे संस्थान में, जिससे समान अवसर सुनिश्चित करने की उम्मीद की जाती है, वहां दलित-बहुजन छात्र भेदभाव और सुरक्षा को लेकर लगातार चिंताएं क्यों जता रहे हैं?
साहिल की मौत की जांच में तथ्यों का पता निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से लगाया जाना चाहिए। साथ ही प्रशासन की यह जिम्मेदारी है कि वह भेदभाव के आरोपों पर ध्यान दे, जहां सबूत हों वहां संस्थागत कमियों की जांच करे, और यह सुनिश्चित करे कि छात्रों की शिकायतों पर एक विश्वसनीय प्रतिक्रिया मिले।
ये जिम्मेदारियां एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। निष्पक्ष जांच की मांग करने का मतलब यह नहीं है कि जांच के नतीजे पहले से तय मान लिए गए हैं। जवाबदेही की मांग करने का मतलब कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालना नहीं है। और जातिगत भेदभाव को लेकर जताई गई चिंताओं को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें विरोध-प्रदर्शन के जरिए उठाया जा रहा है।
विस्तृत रिपोर्ट यहां और यहां पढ़ी जा सकती हैं।
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‘द फेडरल’ के अनुसार, साहिल के पिता रवींद्र वाकोडे के आह्वान पर IIT बॉम्बे के बाहर प्रदर्शन कर रहे लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। IANS ने भी परिवार का समर्थन कर रहे प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबर दी है। पुलिस का रवैया काफी सख्त था। पूरे कैंपस में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया, प्रवेश पर रोक लगा दी गई और अपनी मांगें प्रशासन के सामने रखने जा रहे लोगों को हिरासत में ले लिया गया। अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को प्रशासन से बातचीत करने का मौका देने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया।


सवाल यह उठता है कि अगर प्रशासन के पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है, तो अपनी बात रखने के लिए आए प्रतिनिधिमंडल को सुनने के बजाय पुलिस की पाबंदियों और हिरासत का सामना क्यों करना पड़ा?
परिवार जवाब मांग रहा है, लेकिन पुलिस ने प्रवेश से रोका
स्वतंत्र पत्रकार ग्रीष्मा कुथार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट किया कि मार्च से पहले ही पुलिसकर्मी पूरे IIT बॉम्बे कैंपस में फैल गए थे और लोगों को कैंपस में घुसने से रोक रहे थे। जब पूछा गया कि साहिल के माता-पिता को ही अंदर क्यों नहीं जाने दिया जा रहा है, तो एक पुलिस अधिकारी ने कथित तौर पर जवाब दिया, “वे यहां क्यों आएंगे?”

यह बातचीत काफी परेशान करने वाली है, क्योंकि साहिल के माता-पिता अपने बेटे की मौत के बाद जवाबदेही की मांग को लेकर पिछले दो सप्ताह से भूख हड़ताल पर हैं। उनकी इस लड़ाई पर संस्थान की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली है। इसके बजाय उनके समर्थकों को कैंपस में प्रवेश करने और प्रशासन तक पहुंचने से रोक दिया गया।
दलित-बहुजन छात्रों को केवल संस्थान के आश्वासनों से कहीं अधिक की जरूरत है
‘महाराष्ट्र टाइम्स’ के अनुसार, छात्र संगठनों और अंबेडकरवादी समूहों ने एक निष्पक्ष जांच समिति बनाने, IIT बॉम्बे के निदेशक से स्पष्ट जवाब देने तथा जातिगत भेदभाव के आरोपों और छात्रों की सुरक्षा के मामले में ठोस कार्रवाई करने की मांग की है। उन्होंने संस्थागत भेदभाव को लेकर व्यापक चिंताएं भी जताई हैं, जिनमें आरक्षण रोस्टर से जुड़े पुराने विवाद भी शामिल हैं।
प्रदर्शनकारी एक ऐसा सवाल उठा रहे हैं जिसे संस्थान अनदेखा नहीं कर सकता: एक ऐसे संस्थान में, जिससे समान अवसर सुनिश्चित करने की उम्मीद की जाती है, वहां दलित-बहुजन छात्र भेदभाव और सुरक्षा को लेकर लगातार चिंताएं क्यों जता रहे हैं?
साहिल की मौत की जांच में तथ्यों का पता निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से लगाया जाना चाहिए। साथ ही प्रशासन की यह जिम्मेदारी है कि वह भेदभाव के आरोपों पर ध्यान दे, जहां सबूत हों वहां संस्थागत कमियों की जांच करे, और यह सुनिश्चित करे कि छात्रों की शिकायतों पर एक विश्वसनीय प्रतिक्रिया मिले।
ये जिम्मेदारियां एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। निष्पक्ष जांच की मांग करने का मतलब यह नहीं है कि जांच के नतीजे पहले से तय मान लिए गए हैं। जवाबदेही की मांग करने का मतलब कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालना नहीं है। और जातिगत भेदभाव को लेकर जताई गई चिंताओं को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें विरोध-प्रदर्शन के जरिए उठाया जा रहा है।
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