'चलो दिल्ली': 'वोट चोरी' के खिलाफ हजारों लोगों ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया, ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की

Written by sabrang india | Published on: October 14, 2026
INDIA ब्लॉक की अगुवाई में 12 अक्टूबर को हुए मार्च में विपक्षी पार्टियां, वकील, छात्र संगठन और सिविल सोसाइटी के लोग दिल्ली की सड़कों पर उतरे। उन्होंने SIR प्रक्रिया को रोकने और कथित चुनावी हेरफेर के लिए जवाबदेही तय करने की मांग की।



बड़ी संख्या में लोग सोमवार, 12 अक्टूबर को मध्य दिल्ली की सड़कों पर उतर आए। विपक्षी पार्टियां, वकील, छात्र और सिविल सोसाइटी ग्रुप 'इंडिया' (INDIA) ब्लॉक के 'चलो दिल्ली – लोकतंत्र के लिए मार्च' में शामिल हुए। उनकी मांग थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जाए, वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) को तुरंत रोका जाए और लोकतांत्रिक विरोध के खिलाफ पुलिस की दमनकारी कार्रवाई बंद हो।





लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और 'इंडिया' ब्लॉक के अन्य नेताओं की अगुवाई में यह मार्च बाराखंबा रोड से सुप्रीम कोर्ट की ओर बढ़ा। मंडी हाउस और कनॉट प्लेस के बीच लोगों की भारी भीड़ जमा थी। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग थी कि बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाने और वोटर लिस्ट में बदलाव के दौरान हुई गड़बड़ियों के आरोपों पर ध्यान दिया जाए और चुनाव कराने वाली संस्था को जवाबदेह ठहराया जाए।









यह लामबंदी सिर्फ कांग्रेस या बड़ी विपक्षी पार्टियों तक ही सीमित नहीं थी। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन, CPI, छात्र संगठनों और सिविल सोसाइटी ग्रुप ने भी इस मार्च में हिस्सा लिया।







CPI(ML) लिबरेशन और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने कुमार को हटाने, SIR प्रक्रिया को रद्द करने और लोकतांत्रिक आवाजों के खिलाफ पुलिस दमन को खत्म करने की मांग की। CPI(ML) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य समेत उनके प्रतिनिधि मार्च में शामिल होने पहुंचे। CPI, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (AISF) और ऑल इंडिया यूथ फेडरेशन (AIYF) भी इस लामबंदी में शामिल हुए और कहा कि बैरिकेड्स और सुरक्षा कर्मियों की तैनाती जवाबदेही की मांग को दबा नहीं सकती।



10 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई की खबरों के बीच छात्र और युवा संगठनों की मौजूदगी खास तौर पर अहम थी। CPI(M) के महासचिव एम. ए. बेबी और वृंदा करात ने भी एके गोपालन भवन में छात्र और युवा प्रदर्शनकारियों के साथ मीडिया को संबोधित किया; इन प्रदर्शनकारियों ने पुलिस की बर्बरता का आरोप लगाया था।





इस जमावड़े में स्थापित पार्टी ढांचों से इतर लोग भी शामिल हुए। जब यह मार्च सेंट्रल दिल्ली से गुजरा, तो वकीलों, छात्रों, एक्टिविस्ट और आम नागरिकों की भागीदारी ने SIR प्रक्रिया और इसका विरोध करने वालों के साथ किए गए बर्ताव को लेकर चिंता का दायरा दिखाया।



लोगों की भारी भीड़ देखने लायक थी। 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च के लिए हजारों लोग जमा हुए थे, जबकि 'द वायर' ने बताया कि कांग्रेस सूत्रों के अनुसार भीड़ लगभग 50,000 थी। 'द वायर' के मुताबिक, इसमें शामिल होने वाले लोग उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे पड़ोसी राज्यों के साथ-साथ मुंबई से भी आए थे। इस भीड़ में वामपंथी पार्टियां, समाजवादी पार्टी, सिविल सोसाइटी संगठन और 'कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एंड पब्लिक अकाउंटेबिलिटी' (CJP) शामिल थे।

चुनावी जवाबदेही के लिए मार्च

यह मार्च SIR प्रक्रिया और 10 अक्टूबर को दिल्ली की सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों के साथ किए गए बर्ताव को लेकर कई दिनों से बढ़ रहे गुस्से के बाद निकाला गया। विपक्ष का आरोप है कि इस संशोधन प्रक्रिया से असली वोटरों के वोटिंग का अधिकार छिनने का खतरा है। साथ ही, विपक्ष ने भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और उसके प्रमुख ज्ञानेंद्र कुमार से जवाबदेही की मांग की है।



INDIA गठबंधन ने घोषणा की कि वह इन आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाएगा। 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के मुताबिक, राहुल गांधी ने SIR प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाने और गड़बड़ियों के आरोपों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। विपक्ष ने मांग की है कि इस प्रक्रिया को रोका जाए और 'वोट चोरी' के आरोपों पर कुमार इस्तीफा दें।

इसलिए, यह मार्च सिर्फ विपक्ष की एकता दिखाने का जरिया नहीं था। इसका मकसद वोटर लिस्ट और निर्वाचन आयोग के कामकाज से जुड़े विवाद को सीधे देश की सबसे बड़ी संवैधानिक अदालत तक ले जाना था, ताकि चुनावी ईमानदारी के सवाल को बड़े पैमाने पर राजनीतिक लामबंदी के केंद्र में लाया जा सके।

गठबंधन का संदेश जोरदार था। इंडियन नेशनल कांग्रेस के एक बयान में पार्टी ने कहा कि इस मार्च का मकसद लोकतंत्र और संविधान की रक्षा करना और वोट चोरी के आरोपों का सामना कर रहे लोगों की जवाबदेही तय करना था।

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में विपक्षी सांसदों ने कुमार के खिलाफ नारे लगाए। इस मुहिम में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, तृणमूल कांग्रेस की चेयरपर्सन ममता बनर्जी, शिवसेना (UBT) नेता संजय राउत और कांग्रेस नेता सचिन पायलट समेत गठबंधन के नेता और प्रतिनिधि शामिल हुए। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) की नेता वृंदा करात ने भी सरकार की आलोचना की और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) से कहा, "दिल्ली में जो हो रहा है, वह अभूतपूर्व है। हम चाहते हैं कि यह सरकार अपनी तानाशाही बंद करे। हम अब रुकेंगे नहीं।"





बैरिकेड्स, पाबंदियां और सुरक्षा जोन में बदला शहर


जब प्रदर्शनकारी बाराखंबा रोड पर इकट्ठा हुए और सुप्रीम कोर्ट की ओर बढ़ने की तैयारी करने लगे, तो पुलिस की कार्रवाई साफ दिखी। सड़कें सुरक्षाकर्मियों से भरी हुई थीं और रास्ते में कई परतों वाले बैरिकेड्स लगाए गए थे।

पत्रकार रौनक बाली ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर जाने वाली भगवान दास रोड पर कम से कम चार परतों वाले बैरिकेड्स और पुलिसकर्मी तैनात थे। लाउडस्पीकर से बार-बार घोषणा करके लोगों को बताया जा रहा था कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत पाबंदियां लागू हैं और उनसे शांतिपूर्वक इलाका छोड़ने को कहा जा रहा था।



लोकतांत्रिक भागीदारी के अपने अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए इकट्ठा हो रही भीड़ के बिल्कुल उलट सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। जब विपक्षी नेताओं को ले जा रही बस भीड़-भाड़ वाली सड़कों से धीरे-धीरे गुजरी, तो प्रदर्शनकारी इकट्ठा होते रहे, नारे लगाते रहे और अपनी माँगें रखते रहे। PTI ने यह भी बताया कि 'दिल्ली चलो' मार्च के दौरान बाराखंबा रोड के पास प्रदर्शनकारी बैरिकेड्स पर चढ़ गए।



ये पाबंदियां जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर डी-नोटिफ़ाई (मान्यता रद्द) करने की खबरों के बीच लगाई गई हैं। PTI ने बताया कि कांग्रेस ने इस फैसले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की आलोचना की और उन पर लोकतंत्र को राजनीतिक सुविधा का मामला मानने का आरोप लगाया।

अधिकारियों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बड़ी भीड़ को कैसे संभाला जाए। सवाल यह है कि क्या सार्वजनिक जगहों पर पाबंदियां और बड़े पैमाने पर सुरक्षा इंतजामों का इस्तेमाल इस तरह किया जा रहा है जिससे विरोध करने के अधिकार का इस्तेमाल करना और मुश्किल हो जाए। BNSS की धारा 163 कुछ खास हालात में एहतियाती आदेश जारी करने की इजाजत देती है; सिर्फ इसका इस्तेमाल करने से यह संवैधानिक सवाल हल नहीं हो जाता कि शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होने पर पाबंदियां जरूरी और उचित हैं या नहीं।

वकील सड़कों और कोर्ट के गलियारों में उतरे

10 अक्टूबर के प्रदर्शनों के दौरान वकीलों को हिरासत में लेने और उन पर पुलिस की कथित हिंसा की खबरों के बाद, इस लामबंदी में वकील भी विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए। विरोध जताने के एक अनोखे तरीके के तौर पर, दिल्ली हाई कोर्ट के वकील संविधान की प्रस्तावना पढ़ने के लिए इकट्ठा हुए। 'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रदर्शन उन घटनाओं के कुछ दिनों बाद हुआ जब पहले के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान वकीलों को हिरासत में लिया गया था और उन पर कथित तौर पर हमले हुए थे। 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अलग से रिपोर्ट दी कि वकीलों ने अपने साथियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई का विरोध करने के लिए काली पट्टियां बांधीं और संविधान पढ़ा।



कोर्ट के बाहर हो रही इस लामबंदी में सीनियर वकील भी शामिल हुए। वकील पारस नाथ सिंह की एक पोस्ट के मुताबिक, सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने वकीलों के एक ग्रुप की अगुवाई की, जो कुमार और वकीलों पर पुलिस की कथित बर्बरता के विरोध में सुप्रीम कोर्ट से मॉडर्न स्कूल तक मार्च कर रहे थे।



सीनियर वकील रेबेका जॉन ने इस प्रदर्शन में शामिल होने से जुड़े संवैधानिक पहलुओं को स्पष्ट किया। 'द वायर' से बात करते हुए उन्होंने कहा, "हमें अपनी सड़कों पर चलने का अधिकार है और हमें विरोध करने का भी अधिकार है।"



इस मुहिम में शामिल हुए योगेंद्र यादव ने कहा कि इस मार्च का मकसद न्यायपालिका पर दबाव डालना नहीं, बल्कि संविधान के संरक्षक के तौर पर उसकी भूमिका को मजबूत करना था। यह फर्क अहम है: विपक्ष का मकसद चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को अदालत के सामने लाना था, साथ ही यह भी कहना था कि लोकतांत्रिक जवाबदेही को सिर्फ़ राजनीतिक असहमति का मामला नहीं माना जा सकता।



10 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक: सड़कें विरोध का केंद्र बनी रहीं

सोमवार का मार्च उस घटना के दो दिन बाद हुआ जब दिल्ली में कुमार को हटाने की मांग को लेकर जंतर-मंतर तक मार्च करने की कोशिश कर रहे लोगों पर पुलिस ने सख्त कार्रवाई की थी। प्रदर्शनकारियों और वकीलों को हिरासत में लेने और उन पर कथित हमले की खबरों के बाद और विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट में वकीलों द्वारा संविधान की प्रस्तावना का पाठ करना भी शामिल था।

इस तरह, 12 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शनों में एक ऐसी मांग शामिल थी जो SIR के तात्कालिक मुद्दे से कहीं आगे की थी। उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन करने की कोशिश करने वालों के ख़िलाफ़ पुलिस की पाबंदियों और एहतियाती उपायों के बढ़ते इस्तेमाल को भी चुनौती दी।

मंडी हाउस और कनॉट प्लेस से बाराखंबा रोड की ओर बढ़ती भीड़, संविधान पढ़ते वकील, और विपक्षी नेताओं के साथ जुड़ते छात्र और युवा संगठन - ये सभी एक ही व्यापक बात का हिस्सा थे: चुनावी ईमानदारी और असहमति का अधिकार लोकतांत्रिक जवाबदेही के सवाल हैं, न कि सिर्फ़ कानून-व्यवस्था के मामले।

INDIA गठबंधन के लिए, यह मार्च चुनावी हेरफेर के आरोपों को सुप्रीम कोर्ट के सामने लाने और चुनाव आयोग के नेतृत्व के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग करने की एक कोशिश थी। वकीलों और नागरिक समाज के प्रतिभागियों के लिए, यह लोकतांत्रिक आवाज़ों को दबाने के लिए पुलिस की ताकत के कथित इस्तेमाल के ख़िलाफ़ भी एक विरोध प्रदर्शन था।

विस्तृत रिपोर्ट यहां, यहां और यहां पढ़ी जा सकती हैं।

Related

विरोध-प्रदर्शन की इजाजत नहीं, असहमति पर रोक: चुनाव आयोग को चुनौती देने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई

SIR पश्चिम बंगाल: ज्यादातर 'फॉर्म 7' अनुरोधों के कारण नाम हटाए गए; 'फॉर्म 6' के तहत नाम जुड़ने की संख्या कम रही

बाकी ख़बरें