सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय ने छात्रवृत्ति के लिए वार्षिक अभिभावकीय आय सीमा में आखिरी बार 2013 में संशोधन किया था। उस समय इसे 2 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये किया गया था। योजना के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, इस आय सीमा की समीक्षा और संशोधन हर दो साल में किया जाना चाहिए।

फोटो साभार : द मूकनायक
केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति की आय पात्रता सीमा में एक दशक से अधिक समय से कोई बदलाव नहीं किया है। इसको लेकर वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने सरकार पर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया है।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वार्षिक अभिभावकीय आय मानदंड को अंतिम बार 2013 में 2 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये किया था। योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, इस मानदंड को हर दो साल में संशोधित किया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2025 में दौसा से सांसद मुरारी लाल मीणा ने SC/ST छात्रों से जुड़ी छात्रवृत्ति योजनाओं में मौजूद गंभीर खामियों का मुद्दा संसद में उठाया था। उन्होंने खास तौर पर आय सीमा और छात्रवृत्ति की अपर्याप्त राशि जैसी विसंगतियों पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने विस्तृत लिखित उत्तर दिया। हालांकि, मंत्री के इस जवाब के बाद सरकार की उस प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े हो गए हैं कि वह वास्तव में वंचित वर्गों के छात्रों को सशक्त बनाने के लिए कितनी गंभीर है।
वीरेंद्र कुमार ने बताया कि छात्रवृत्ति की राशि राज्य सरकारों के साथ-साथ संबंधित मंत्रालयों और विभागों से विचार-विमर्श के बाद तय की जाती है। इन मानदंडों को स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी (SFC), एक्सपेंडिचर फाइनेंस कमेटी (EFC) और कैबिनेट जैसी सक्षम संस्थाओं की मंजूरी के बाद लागू किया जाता है।
सरकार के अनुसार, छात्रवृत्ति योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और छात्रवृत्ति राशि में आखिरी संशोधन 2023-24 में किया गया था। उदाहरण के तौर पर, SC छात्रों की प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति में दिन के छात्रों के लिए राशि 3,000 रुपये से बढ़ाकर 7,000 रुपये और छात्रावास में रहने वाले छात्रों के लिए 3,500 रुपये से बढ़ाकर 8,000 रुपये कर दी गई। इसी तरह, SC छात्रों की पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के तहत ग्रुप-1 के छात्रावास में रहने वाले छात्रों को अब 12,000 रुपये के बजाय 13,500 रुपये दिए जाते हैं।
मंत्री ने कहा कि आय सीमा और छात्रवृत्ति की राशि को जरूरत के अनुसार समय-समय पर संशोधित किया जाता है और इस प्रक्रिया में संबंधित हितधारकों से परामर्श भी किया जाता है। हालांकि, आय सीमा में बढ़ोतरी को लेकर सरकार ने न तो कोई निश्चित समयसीमा बताई और न ही किसी ठोस पहल की प्रतिबद्धता जताई।
कुछ श्रेणियों में छात्रवृत्ति की राशि में संशोधन जरूर किया गया है, लेकिन मंत्री के जवाब में बढ़ती महंगाई के प्रभाव का स्पष्ट तौर पर कोई उल्लेख नहीं किया गया। साथ ही, भविष्य में छात्रवृत्ति राशि में और बढ़ोतरी के लिए भी कोई स्पष्ट योजना या रोडमैप सामने नहीं रखा गया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राष्ट्रीय अभियंता संगठन (BANAE), राष्ट्रीय दलित संगठन महासंघ (NACDOR) और राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान (NCDHR) जैसे संगठनों ने छात्रवृत्ति के लिए निर्धारित आय सीमा की तुलना EWS यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सरकार द्वारा तय की गई आय सीमा से की है। इन संगठनों का कहना है कि EWS के लिए निर्धारित आय सीमा काफी अधिक है।
EWS कोटे के तहत शिक्षण संस्थानों में 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं और इसका लाभ लेने के लिए परिवार की वार्षिक आय की सीमा 8 लाख रुपये निर्धारित की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंजीनियर्स (BANAE) जैसे हितधारकों ने छात्रवृत्ति राशि बढ़ाने और आय सीमा संशोधित करने की मांग उचित ठहराई है, ताकि ये योजनाएं वंचित छात्रों को प्रभावी ढंग से सहायता प्रदान कर सकें।
BANAE के अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति की आय सीमा को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के अनुरूप हर दो साल में संशोधित किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि 2015 से पिछले 11 वर्षों में यह मानदंड छह बार संशोधित होना चाहिए था। जब सरकार ने 2019 में EWS कोटा शुरू किया, तो उसने आय मानदंड 8 लाख रुपये तय किया। इसका मतलब है कि छात्रवृत्ति योजना के तहत SC-ST छात्रों के साथ सरकार ने भेदभावपूर्ण व्यवहार किया है।
सोनारे ने कहा कि SC-ST अभिभावकों के लिए आय सीमा को बढ़ाकर कम से कम 12 लाख रुपये प्रति वर्ष किया जाना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक छात्र इस योजना के दायरे में आ सकें।
NACDOR के अध्यक्ष अशोक भारती ने आरोप लगाया कि सरकार सवर्ण और SC-ST समुदायों के गरीबों की पहचान के लिए अलग-अलग आय मानदंड अपना रही है। उन्होंने कहा कि यह भेदभावपूर्ण व्यवस्था है और आरोप लगाया कि सरकार मनुस्मृति की व्यवस्था को अक्षरशः लागू कर रही है, जिसके चलते सवर्ण और SC-ST समुदायों के गरीबों के लिए अलग-अलग आय सीमाएं तय की गई हैं।
भारती ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में संविधान के प्रावधानों के अनुरूप काम करती है, तो उसे इस असमानता को खत्म करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।
राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान (NCDHR) की सचिव बीना जे. पल्लिकल ने छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत आय सीमा में संशोधन में हो रही देरी को सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से जोड़ा। उन्होंने कहा कि आय सीमा बढ़ाकर 8 लाख रुपये करने की मांग को लेकर कई लोगों और संगठनों ने सरकार को अभ्यावेदन दिए हैं, लेकिन हर बार सरकार की ओर से यही जवाब मिलता है कि मामला अभी विचाराधीन है।
पल्लिकल ने कहा कि इस तरह की देरी चिंताजनक है और इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी प्रमुख कारण है। उनका आरोप है कि सत्तारूढ़ दल को लगता है कि मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं और अन्य लाभों के जरिए वह SC-ST समुदाय के गरीब मतदाताओं का समर्थन हासिल कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा के प्रमुख समर्थक समूहों का SC-ST समुदाय के लिए सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) की नीतियों के प्रति विरोध रहा है, जिसके कारण सरकार छात्रवृत्ति के लिए आय सीमा में संशोधन करने से हिचक रही है।
हालांकि, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार वित्त वर्ष 2026-27 से छात्रवृत्ति के लिए आय सीमा बढ़ाकर 4.5 लाख रुपये करने की योजना बना रही है। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले कैबिनेट की मंजूरी जरूरी है।
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फोटो साभार : द मूकनायक
केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति की आय पात्रता सीमा में एक दशक से अधिक समय से कोई बदलाव नहीं किया है। इसको लेकर वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों ने सरकार पर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया है।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और जनजातीय कार्य मंत्रालय ने वार्षिक अभिभावकीय आय मानदंड को अंतिम बार 2013 में 2 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये किया था। योजना के दिशानिर्देशों के अनुसार, इस मानदंड को हर दो साल में संशोधित किया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2025 में दौसा से सांसद मुरारी लाल मीणा ने SC/ST छात्रों से जुड़ी छात्रवृत्ति योजनाओं में मौजूद गंभीर खामियों का मुद्दा संसद में उठाया था। उन्होंने खास तौर पर आय सीमा और छात्रवृत्ति की अपर्याप्त राशि जैसी विसंगतियों पर सवाल उठाए थे। इसके जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार ने विस्तृत लिखित उत्तर दिया। हालांकि, मंत्री के इस जवाब के बाद सरकार की उस प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े हो गए हैं कि वह वास्तव में वंचित वर्गों के छात्रों को सशक्त बनाने के लिए कितनी गंभीर है।
वीरेंद्र कुमार ने बताया कि छात्रवृत्ति की राशि राज्य सरकारों के साथ-साथ संबंधित मंत्रालयों और विभागों से विचार-विमर्श के बाद तय की जाती है। इन मानदंडों को स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी (SFC), एक्सपेंडिचर फाइनेंस कमेटी (EFC) और कैबिनेट जैसी सक्षम संस्थाओं की मंजूरी के बाद लागू किया जाता है।
सरकार के अनुसार, छात्रवृत्ति योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा की जाती है और छात्रवृत्ति राशि में आखिरी संशोधन 2023-24 में किया गया था। उदाहरण के तौर पर, SC छात्रों की प्री-मैट्रिक छात्रवृत्ति में दिन के छात्रों के लिए राशि 3,000 रुपये से बढ़ाकर 7,000 रुपये और छात्रावास में रहने वाले छात्रों के लिए 3,500 रुपये से बढ़ाकर 8,000 रुपये कर दी गई। इसी तरह, SC छात्रों की पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति के तहत ग्रुप-1 के छात्रावास में रहने वाले छात्रों को अब 12,000 रुपये के बजाय 13,500 रुपये दिए जाते हैं।
मंत्री ने कहा कि आय सीमा और छात्रवृत्ति की राशि को जरूरत के अनुसार समय-समय पर संशोधित किया जाता है और इस प्रक्रिया में संबंधित हितधारकों से परामर्श भी किया जाता है। हालांकि, आय सीमा में बढ़ोतरी को लेकर सरकार ने न तो कोई निश्चित समयसीमा बताई और न ही किसी ठोस पहल की प्रतिबद्धता जताई।
कुछ श्रेणियों में छात्रवृत्ति की राशि में संशोधन जरूर किया गया है, लेकिन मंत्री के जवाब में बढ़ती महंगाई के प्रभाव का स्पष्ट तौर पर कोई उल्लेख नहीं किया गया। साथ ही, भविष्य में छात्रवृत्ति राशि में और बढ़ोतरी के लिए भी कोई स्पष्ट योजना या रोडमैप सामने नहीं रखा गया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर राष्ट्रीय अभियंता संगठन (BANAE), राष्ट्रीय दलित संगठन महासंघ (NACDOR) और राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान (NCDHR) जैसे संगठनों ने छात्रवृत्ति के लिए निर्धारित आय सीमा की तुलना EWS यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सरकार द्वारा तय की गई आय सीमा से की है। इन संगठनों का कहना है कि EWS के लिए निर्धारित आय सीमा काफी अधिक है।
EWS कोटे के तहत शिक्षण संस्थानों में 10 प्रतिशत सीटें आरक्षित हैं और इसका लाभ लेने के लिए परिवार की वार्षिक आय की सीमा 8 लाख रुपये निर्धारित की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर नेशनल एसोसिएशन ऑफ इंजीनियर्स (BANAE) जैसे हितधारकों ने छात्रवृत्ति राशि बढ़ाने और आय सीमा संशोधित करने की मांग उचित ठहराई है, ताकि ये योजनाएं वंचित छात्रों को प्रभावी ढंग से सहायता प्रदान कर सकें।
BANAE के अध्यक्ष नागसेन सोनारे ने कहा कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति की आय सीमा को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के अनुरूप हर दो साल में संशोधित किया जाना चाहिए था। उन्होंने कहा कि 2015 से पिछले 11 वर्षों में यह मानदंड छह बार संशोधित होना चाहिए था। जब सरकार ने 2019 में EWS कोटा शुरू किया, तो उसने आय मानदंड 8 लाख रुपये तय किया। इसका मतलब है कि छात्रवृत्ति योजना के तहत SC-ST छात्रों के साथ सरकार ने भेदभावपूर्ण व्यवहार किया है।
सोनारे ने कहा कि SC-ST अभिभावकों के लिए आय सीमा को बढ़ाकर कम से कम 12 लाख रुपये प्रति वर्ष किया जाना चाहिए, ताकि अधिक से अधिक छात्र इस योजना के दायरे में आ सकें।
NACDOR के अध्यक्ष अशोक भारती ने आरोप लगाया कि सरकार सवर्ण और SC-ST समुदायों के गरीबों की पहचान के लिए अलग-अलग आय मानदंड अपना रही है। उन्होंने कहा कि यह भेदभावपूर्ण व्यवस्था है और आरोप लगाया कि सरकार मनुस्मृति की व्यवस्था को अक्षरशः लागू कर रही है, जिसके चलते सवर्ण और SC-ST समुदायों के गरीबों के लिए अलग-अलग आय सीमाएं तय की गई हैं।
भारती ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में संविधान के प्रावधानों के अनुरूप काम करती है, तो उसे इस असमानता को खत्म करने की दिशा में कदम उठाना चाहिए।
राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान (NCDHR) की सचिव बीना जे. पल्लिकल ने छात्रवृत्ति योजनाओं के तहत आय सीमा में संशोधन में हो रही देरी को सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से जोड़ा। उन्होंने कहा कि आय सीमा बढ़ाकर 8 लाख रुपये करने की मांग को लेकर कई लोगों और संगठनों ने सरकार को अभ्यावेदन दिए हैं, लेकिन हर बार सरकार की ओर से यही जवाब मिलता है कि मामला अभी विचाराधीन है।
पल्लिकल ने कहा कि इस तरह की देरी चिंताजनक है और इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी प्रमुख कारण है। उनका आरोप है कि सत्तारूढ़ दल को लगता है कि मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं और अन्य लाभों के जरिए वह SC-ST समुदाय के गरीब मतदाताओं का समर्थन हासिल कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा के प्रमुख समर्थक समूहों का SC-ST समुदाय के लिए सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) की नीतियों के प्रति विरोध रहा है, जिसके कारण सरकार छात्रवृत्ति के लिए आय सीमा में संशोधन करने से हिचक रही है।
हालांकि, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि सरकार वित्त वर्ष 2026-27 से छात्रवृत्ति के लिए आय सीमा बढ़ाकर 4.5 लाख रुपये करने की योजना बना रही है। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव को लागू करने से पहले कैबिनेट की मंजूरी जरूरी है।
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