प्रयागराज: पानी भरे रास्ते में ‘बांस के पुल’ पर स्कूल जाने को मजबूर बच्चे

Written by sabrang india | Published on: August 29, 2026
प्रयागराज के फूलपुर में विकास के दावों की पोल खोलती एक तस्वीर सामने आई है। यहां बच्चे आज भी जान जोखिम में डालकर स्कूल जाने को मजबूर हैं। बदहाल रास्ते और जर्जर लकड़ी का पुल सरकारी विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।


साभार: द मूकनायक

हाल ही में 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। शहरों की जगमगाती इमारतों और लाल किले की प्राचीर से नजर आने वाली आज़ादी की भव्य तस्वीर के पीछे भारत की एक बेहद मार्मिक और कड़वी सच्चाई भी छिपी है। यह सच्चाई उन लोगों की है, जो आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जिनकी आवाज़ विकास के शोर में कहीं दबकर रह गई है।

ऐसी ही संघर्ष की कहानी स्मार्ट सिटी कहे जाने वाले प्रयागराज के फूलपुर विधानसभा क्षेत्र स्थित कोटवा गांव की है। मुख्य रूप से निषाद और सोनकर बहुल इस इलाके के लोग आज भी रास्ते के लिए जूझ रहे हैं। यहां के उच्च प्राथमिक विद्यालय तक पहुंचने के लिए कोई सुरक्षित सड़क नहीं है।

‘द मूकनायक’ की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा के मौलिक अधिकार को पाने के लिए यहां के स्कूली बच्चे रोज़ाना अपनी जान जोखिम में डालते हैं। ये मासूम बच्चे, जिन्हें आज के दौर में ‘जेन अल्फा’ कहा जाता है, तालाब में तब्दील हो चुके गहरे पानी के बीच से गुजरने और एक जर्जर बांस-लकड़ी के पुल के सहारे स्कूल जाने को विवश हैं। यह कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि पिछले 10 से 15 वर्षों से यहां के बच्चे इसी तरह शिक्षा की ओर तैरकर पहुंच रहे हैं।

एक तरफ महानगरों के आधुनिक और सुविधाओं से लैस स्कूल हैं, तो दूसरी तरफ कोटवा गांव का यह विद्यालय, जहां तक पहुंचने के लिए एक सड़क तक सरकार उपलब्ध नहीं करा पाई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार आला अधिकारियों से शिकायत की और स्कूल तक रास्ता बनवाने की गुहार लगाई, लेकिन उनकी आवाज़ सरकारी दफ्तरों और फाइलों के बीच दबकर रह गई। हालात यह हैं कि बार-बार शिकायतों के बावजूद अब तक किसी अधिकारी ने इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया।

रिपोर्ट के अनुसार, गांव के एक बुजुर्ग ने अपना नाम न छापने की शर्त पर इस व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया। उनका कहना है कि हर दिन जान जोखिम में डालकर बच्चे स्कूल जाते हैं।

यह उन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के लिए शर्म का विषय है, जो वोट के लिए विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं। वर्तमान में यहां के सांसद प्रवीन पटेल और विधायक दीपक पटेल हैं। दोनों ही सत्ताधारी दल भाजपा से आते हैं।

प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि प्रयागराज के जिलाधिकारी मनीष वर्मा से इस गंभीर मुद्दे पर बात करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। ऐसा लगता है कि दशकों से स्कूल तक सड़क की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे ग्रामीणों के प्रार्थना-पत्र सरकारी दफ्तरों की फाइलों में ही दबकर रह गए हैं। ग्रामीणों की शिकायतों और उनकी परेशानियों का आलम यह है कि मानो सरकारी मशीनरी ने उनके आवेदनों को समोसा-पकौड़ी के साथ निपटाकर इसी बारिश के पानी में बहा दिया हो।

हालात के आगे हार मानने के बजाय स्थानीय ग्रामीणों ने अपने बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी खुद उठाई है। जलमग्न हो चुके रास्ते पर उन्होंने अपने सीमित संसाधनों से लकड़ी का एक अस्थायी पुल तैयार किया है, ताकि उनके नौनिहालों के कदम किसी तरह स्कूल तक पहुंच सकें। सरकारी व्यवस्था की बेरुखी के बीच ग्रामीणों की यह पहल न सिर्फ उनके संघर्ष और जज़्बे को दिखाती है, बल्कि बच्चों की शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की भी मिसाल है। ग्रामीणों के इस हौसले और जज़्बे की निश्चित तौर पर सराहना की जानी चाहिए।

इस बदहाली के बीच सरकारी खर्च के आंकड़े भी हैरान करने वाले हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले आठ वर्षों में योगी सरकार ने प्रचार-प्रसार पर करीब 6,800 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। यानी औसतन हर दिन लगभग 2 करोड़ रुपये सिर्फ विज्ञापनों पर खर्च किए गए। वहीं, कांवड़ यात्रा के दौरान फूलों की बारिश से लेकर महाकुंभ के आयोजन तक सरकारी खजाने से भारी-भरकम रकम खर्च की गई। ऐसे में सवाल उठता है कि जब करोड़ों-अरबों रुपये प्रचार और आयोजनों पर खर्च किए जा सकते हैं, तो क्या गांव के बच्चों के स्कूल तक पहुंचने के लिए एक पक्की सड़क बनाना इतना मुश्किल है?

धर्म और प्रचार के लिए खजाना खोल देने वाली सरकार के पास इन मासूमों के भविष्य की नींव मजबूत करने का न तो वक्त है और न ही इच्छाशक्ति। स्मार्ट सिटी के दावों के बीच कोटवा गांव का यह जर्जर लकड़ी का पुल सत्ता से सीधा सवाल कर रहा है कि क्या शिक्षा का मौलिक अधिकार केवल कागज़ों तक ही सीमित है?

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