नोएडा मज़दूर आंदोलन से जुड़े मामले में कई लोगों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। परिजन और वकील आरोप लगा रहे हैं कि बिना उचित प्रक्रिया के लोगों को हिरासत में लिया गया। वहीं, पुलिस इसे साजिश करार दे रही है। यह मामला अब श्रम अधिकारों से आगे बढ़कर नागरिक स्वतंत्रताओं की बहस का विषय बन गया है।

फोटो साभार : पीटीआई/द वायर
अप्रैल में नोएडा के फैक्ट्री मजदूरों ने वेतन बढ़ाने, बेहतर कामकाजी माहौल और श्रम अधिकारों की मांग को लेकर जो आंदोलन शुरू किया था, अब उसे ‘साजिश’, ‘हिंसा’ और ‘मास्टरमाइंड’ जैसे आरोपों के रूप में पेश किया जा रहा है।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा इस आंदोलन से जुड़े बताकर जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनके परिवार, वकील और सहयोगियों का कहना है कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि असहमति को अपराध बनाने की एक व्यापक कार्रवाई है।
मई दिवस के अवसर पर यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जिन लोगों पर हिंसा भड़काने, साजिश रचने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं, वे आखिर हैं कौन? क्या वे वास्तव में हिंसा के पीछे के मुख्य लोग हैं, या फिर मजदूरों के समर्थन में खड़े होने की कीमत चुका रहे हैं?
आदित्य आनंद: इंजीनियर पेशेवर से ‘मास्टरमाइंड’ तक
पुलिस ने आदित्य आनंद को इस कथित साज़िश का मुख्य आरोपी बताया है। उन्हें 19 अप्रैल को तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया। यूपी एसटीएफ ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि श्रमिक आंदोलन की आड़ में हिंसा और आगजनी की योजना बनाने वालों में शामिल एक प्रमुख आरोपी को पकड़ा गया है। लेकिन परिवार की कहानी बिल्कुल अलग है।
आदित्य के भाई केशव आनंद का कहना है कि परिवार को गिरफ्तारी के आधार तक नहीं बताए गए। उन्हें केवल एक फोन कॉल के जरिए इसकी सूचना दी गई। उनका आरोप है कि अदालत ने 28 अप्रैल को दो दिन की कस्टडी दी थी, लेकिन उसके बाद आदित्य को कहाँ रखा गया, इसकी जानकारी न तो परिवार को दी गई और न ही वकीलों को।
केशव का कहना है कि अदालत के आदेश में वकीलों को पूछताछ के दौरान मौजूद रहने की अनुमति दी गई थी, फिर भी उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई। उनके शब्दों में, “उत्तर प्रदेश पुलिस कानून और न्यायिक प्रक्रिया की धज्जियाँ उड़ा रही है।” केशव आनंद का यह भी दावा है कि पुलिस के पास इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है और आदित्य को केवल राजनीतिक दबाव के चलते हिरासत में रखा गया है।
पुलिस का कहना है कि आदित्य उस व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन थे, जिसमें प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने की साज़िश रची जा रही थी। हालांकि, परिवार इस आरोप को सिरे से खारिज करता है। उनका कहना है कि जैसे ही ग्रुप में भड़काऊ संदेश आने लगे, अन्य सदस्यों ने उनका विरोध किया। परिवार के अनुसार, उसी ग्रुप में आदित्य के ऐसे वीडियो भी साझा किए गए थे, जिनमें वे लोगों से पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन जारी रखने की अपील करते नजर आते हैं।
परिवार का कहना है कि आदित्य आनंद 10 और 11 अप्रैल को केवल एक जागरूक नागरिक के रूप में मजदूरों के प्रदर्शन में समर्थन जताने पहुंचे थे। यह आंदोलन 9 अप्रैल से जारी था। परिजनों के अनुसार, जब आदित्य को लगा कि पुलिस कार्रवाई से स्थिति बिगड़ सकती है, तब उन्होंने लोगों से शांतिपूर्ण तरीके से धरना जारी रखने की अपील की और उनसे यह संकल्प भी दिलवाया कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहेगा।
परिवार के अनुसार, 10 और 11 अप्रैल तक, जब आदित्य और रूपेश रॉय प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे, तब तक कोई हिंसा नहीं हुई थी। उनका कहना है कि हालात उनकी गिरफ्तारी के बाद ही बिगड़े।
परिवार ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश लाए जाने के बाद आदित्य के साथ मारपीट की गई। उनके अनुसार, वाहन में बैठाते ही उनकी पिटाई शुरू कर दी गई और बाद में उन्हें एक अज्ञात स्थान पर ले जाकर कई लोगों ने घंटों तक पीटा। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
आदित्य आनंद ने 2016–19 बैच में एनआईटी जमशेदपुर से बीटेक की पढ़ाई पूरी की थी। वे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी जेनपैक्ट में कार्यरत रहे और नोएडा में रहते थे। परिवार के अनुसार, वे शुरू से ही पढ़ाई में मेधावी रहे और 12वीं में बिहार बोर्ड से अपने जिले में टॉपर रहे थे।
उनके भाई केशव आनंद का कहना है कि आदित्य को विदेशों से भी नौकरी के प्रस्ताव मिले थे और वे ऊंचे वेतन वाली नौकरी चुन सकते थे, लेकिन उन्होंने वंचित वर्गों के साथ काम करने का रास्ता अपनाया। नौकरी के साथ-साथ वे बच्चों को पढ़ाते थे और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़े रहते थे।
आदित्य मूल रूप से बिहार के हाजीपुर के रहने वाले हैं। उनके पिता, जिनका 2024 में निधन हो गया था, एक इंटर कॉलेज में शिक्षक थे, जबकि उनकी मां निजी शिक्षिका के रूप में कार्यरत रही हैं।
परिवार के अनुसार, आदित्य नौजवान भारत सभा से जुड़े रहे हैं। वे भगत सिंह की जयंती पर बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित करते थे और मेडिकल कैंप जैसे सामाजिक कार्यों में भी हिस्सा लेते थे। केशव आनंद कहते हैं, “जो व्यक्ति भगत सिंह की जयंती मनाता है और समाज के लिए काम करता है, उसे आज देशद्रोही बताया जा रहा है।”
हिमांशु ठाकुर: पीएचडी की तैयारी से कैद तक
24 वर्षीय हिमांशु ठाकुर को 18 अप्रैल को हिरासत में लिया गया। उनकी बहन नेहा के अनुसार, परिवार को इसकी सूचना करीब 24 घंटे बाद दी गई। उनका आरोप है कि गिरफ्तारी के समय न तो कोई वारंट दिखाया गया और न ही गिरफ्तारी के कारण बताए गए।
परिवार का आरोप है कि पुलिस ने फोन, डायरी और आईपैड तो जब्त कर लिए, लेकिन इसकी कोई जब्ती सूची नहीं दी। उनका यह भी कहना है कि 28 अप्रैल के कोर्ट आदेश के बाद उन्हें कहाँ ले जाया गया, इसकी जानकारी भी साझा नहीं की गई।
नेहा का आरोप है कि पुलिस हिरासत में हिमांशु के साथ मारपीट की गई। उनका कहना है कि हिमांशु का प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं था और उन्हें केवल आदित्य आनंद से संपर्क के आधार पर इस मामले में जोड़ा गया।
हिमांशु ठाकुर की गिरफ्तारी का असर उनके परिवार पर भी पड़ा है। उनकी बहन नेहा के अनुसार, गिरफ्तारी के बाद से उनके पिता की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। नेहा का कहना है कि उनके पिता सुन नहीं पाते, जिससे उन्हें पूरी स्थिति समझाना मुश्किल है, और इस पूरे घटनाक्रम ने उन्हें मानसिक रूप से गहराई से प्रभावित किया है।
हिमांशु दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से इतिहास में स्नातक हैं। उन्होंने डीयू से ही स्नातकोत्तर भी किया है, नेट परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं और पीएचडी में दाखिले की तैयारी कर रहे थे।
आकृति: ‘विचारधारा’ ही आरोप?
आकृति की ओर से पेश हुए वकील रजनीश चंद यादव का कहना है कि पुलिस अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि उन्हें किन धाराओं में गिरफ्तार किया गया। उनके मुताबिक, हर स्तर पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाली जा रही है।
वकील के अनुसार, पुलिस का मौखिक आरोप यह है कि आकृति वामपंथी विचारधारा से जुड़ी हैं और मजदूरों को भड़का रही थीं।
वे सवाल उठाते हैं कि यदि आकृति को 11 अप्रैल को हिरासत में ले लिया गया था, तो 13 अप्रैल की घटना में उनकी भूमिका कैसे संभव है?
वकील के अनुसार, आकृति 10 अप्रैल को हुए एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल थीं। रजनीश यादव ने कहा, ‘यह किस संविधान में लिखा है कि धरना-प्रदर्शन करना गैरकानूनी है? लोगों की अलग-अलग विचारधाराएं हो सकती हैं- किसी की कम्युनिस्ट, किसी की सोशलिस्ट, किसी की भाजपा से जुड़ी, लेकिन इससे किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।’
आकृति दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं और सोशल वर्क में पीएचडी की तैयारी कर रही हैं। वह पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं। उनके पिता गणशक्ति नामक अखबार में कार्यरत हैं।
रूपेश रॉय: हिरासत में टॉर्चर
रूपेश रॉय पेशे से ऑटो चालक हैं और मजदूर मुद्दों पर काम करने वाली पत्रिका ‘मज़दूर बिगुल’ से जुड़े रहे हैं। संगठन का दावा है कि रूपेश को 11 अप्रैल को ही हिरासत में ले लिया गया था, यानी 13 अप्रैल को हुई हिंसा से पहले। रूपेश के एक साथी के अनुसार, जब पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया, उस समय वे ‘मज़दूर बिगुल’ के लिए रिपोर्टिंग कर रहे थे।
25 अप्रैल को परिवार और दोस्तों की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया कि उनके वकीलों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत भेजी है, जिसमें हिरासत में यातना, फर्जी बरामदगी और सबूत गढ़ने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
प्रेस नोट में रूपेश के हवाले से कहा गया है कि उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी और मेडिकल जांच के दौरान उनकी चोटों का समुचित परीक्षण नहीं किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें नोएडा के एनएसईज़ेड क्षेत्र में एक स्थान पर ले गई, जहां पहले से केरोसिन की बोतलें और मशालें रखी थीं, और उन्हें ये सामान उठाने के लिए मजबूर कर उनका वीडियो बनाया गया।
वकीलों का कहना है कि मामले में दर्ज लगभग 14 एफआईआर में से अब तक उन्हें केवल एक की प्रति ही मिल सकी है, जबकि गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती से जुड़े आवश्यक दस्तावेज़ भी उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। शिकायत में इन सभी आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।
सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी पर सवाल
28 अप्रैल को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक सत्यम वर्मा सहित कई गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग की। मंच का कहना था कि सत्यम वर्मा को नोएडा के मजदूर आंदोलन से जुड़े हिंसा के मामले में “गैरकानूनी तरीके से” फंसाया गया है, जबकि उनका इस पूरे आंदोलन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
मंच की संयोजक कविता कृष्णपल्लवी ने आरोप लगाया कि सत्यम वर्मा को उनकी “आलोचनात्मक आवाज़” के कारण निशाना बनाया गया और उन्हें इस मामले में आरोपी बनाकर दबाव बनाने की कोशिश की गई। उनके अनुसार, 11 अप्रैल से ही बिना वारंट पूछताछ और दबाव की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, और बाद में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के तलाशी व जब्ती की कार्रवाई की गई, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और दस्तावेज बिना सीज़र मेमो के ले लिए गए।
कृष्णपल्लवी ने यह भी कहा कि सत्यम वर्मा इस दौरान नोएडा गए ही नहीं थे और न ही उनका मजदूरों या किसी एक्टिविस्ट से कोई प्रत्यक्ष संपर्क था।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी आरोप लगाया गया कि गिरफ्तारी के बाद सत्यम वर्मा को दो दिनों तक अदालत में पेश नहीं किया गया और उन्हें वकीलों से संपर्क करने तथा जरूरी दवाएं लेने की अनुमति भी नहीं दी गई।
वक्ताओं ने दावा किया कि इस पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन मजदूर आंदोलन से जुड़ी असहमति की आवाज़ों को भी “षड्यंत्र” के दायरे में रखकर दमन करने की कोशिश कर रहे हैं। मंच ने सभी गिरफ्तार लोगों की निष्पक्ष जांच कराने और उनकी तत्काल रिहाई की मांग की।
एफआईआर में गड़बड़ियां
द वायर हिंदी को इस मामले से जुड़ी तीन एफआईआर की प्रतियां मिलीं, जिनमें दर्ज जांच अधिकारियों के मोबाइल नंबर गलत पाए गए। नोएडा फेज-3 थाने में दर्ज इन तीनों एफआईआर में जहां अधिकारियों के मोबाइल नंबर होने चाहिए थे, वहां केवल 9 अंकों के नंबर दर्ज थे, जबकि सामान्यतः मोबाइल नंबर 10 अंकों के होते हैं। इतना ही नहीं, थाना प्रभारी अवधेश प्रताप का नंबर भी गलत दर्ज पाया गया।
प्रशासन से नहीं मिला जवाब
द वायर हिंदी ने इस मामले में दर्ज एफआईआर, गिरफ्तारियों और हिरासत में बंद लोगों के परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों पर उत्तर प्रदेश पुलिस का पक्ष जानने के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया।
सबसे पहले नोएडा फेज-2 थाने के एसएचओ से बातचीत की गई। उन्होंने कहा कि वे इस मामले पर टिप्पणी करने के लिए अधिकृत नहीं हैं और कमिश्नर कार्यालय के पेशकार से संपर्क करने को कहा।
इसके बाद कमिश्नर कार्यालय में पेशकार अभिनाश त्यागी से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने भी इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और मीडिया सेल से बात करने की सलाह दी।
मीडिया सेल से संपर्क करने पर अधिकारी विजय ने भी जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में आधिकारिक बयान केवल जॉइंट कमिश्नर ही जारी कर सकते हैं।
इसके बाद जॉइंट कमिश्नर राजीव नारायण मिश्रा से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो सकी। उन्हें प्रश्न भेज दिए गए हैं, और जवाब मिलते ही रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।
मजदूरों का गुस्सा!
पिछले महीने नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले हजारों मजदूर अप्रैल में सड़कों पर उतर आए। ये श्रमिक ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा और छोटे विनिर्माण उद्योगों में कार्यरत हैं। वर्षों से उन्हें करीब 10,000 से 15,000 रुपये मासिक वेतन मिल रहा है। महंगाई बढ़ती रही, लेकिन उनकी आय लगभग स्थिर बनी रही।
इनमें बड़ी संख्या प्रवासी मजदूरों की है, जो शहर के बाहरी इलाकों में छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं, परिवारों को पैसे भेजते हैं और सीमित आय में गुज़ारा करते हैं। इसी बीच घरेलू कामगार महिलाओं ने भी नोएडा की पॉश सोसाइटियों के बाहर वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया।
13 अप्रैल को हुई झड़प से पहले मजदूरों ने दो दिनों तक शांतिपूर्ण धरना दिया था। राज्य सरकार ने 11 अप्रैल को कुछ श्रमिक कल्याण उपायों की घोषणा की थी, जिनमें ओवरटाइम का दोगुना भुगतान और न्यूनतम मजदूरी में 21 प्रतिशत बढ़ोतरी शामिल थी। हालांकि, प्रदर्शनकारी इन उपायों को अपर्याप्त मान रहे थे।
हिंसा कैसे भड़की, इसे लेकर दो दावे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पुलिस ने बिना उकसावे बल प्रयोग किया। पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक हो गई थी, इसलिए कार्रवाई जरूरी थी।
इसके बाद नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने सात एफआईआर और 300 से अधिक गिरफ्तारियों की जानकारी दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना को राज्य के विकास को पटरी से उतारने की ‘साजिश’ बताया।
Related

फोटो साभार : पीटीआई/द वायर
अप्रैल में नोएडा के फैक्ट्री मजदूरों ने वेतन बढ़ाने, बेहतर कामकाजी माहौल और श्रम अधिकारों की मांग को लेकर जो आंदोलन शुरू किया था, अब उसे ‘साजिश’, ‘हिंसा’ और ‘मास्टरमाइंड’ जैसे आरोपों के रूप में पेश किया जा रहा है।
द वायर की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा इस आंदोलन से जुड़े बताकर जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनके परिवार, वकील और सहयोगियों का कहना है कि यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि असहमति को अपराध बनाने की एक व्यापक कार्रवाई है।
मई दिवस के अवसर पर यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जिन लोगों पर हिंसा भड़काने, साजिश रचने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप लगाए गए हैं, वे आखिर हैं कौन? क्या वे वास्तव में हिंसा के पीछे के मुख्य लोग हैं, या फिर मजदूरों के समर्थन में खड़े होने की कीमत चुका रहे हैं?
आदित्य आनंद: इंजीनियर पेशेवर से ‘मास्टरमाइंड’ तक
पुलिस ने आदित्य आनंद को इस कथित साज़िश का मुख्य आरोपी बताया है। उन्हें 19 अप्रैल को तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया। यूपी एसटीएफ ने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि श्रमिक आंदोलन की आड़ में हिंसा और आगजनी की योजना बनाने वालों में शामिल एक प्रमुख आरोपी को पकड़ा गया है। लेकिन परिवार की कहानी बिल्कुल अलग है।
आदित्य के भाई केशव आनंद का कहना है कि परिवार को गिरफ्तारी के आधार तक नहीं बताए गए। उन्हें केवल एक फोन कॉल के जरिए इसकी सूचना दी गई। उनका आरोप है कि अदालत ने 28 अप्रैल को दो दिन की कस्टडी दी थी, लेकिन उसके बाद आदित्य को कहाँ रखा गया, इसकी जानकारी न तो परिवार को दी गई और न ही वकीलों को।
केशव का कहना है कि अदालत के आदेश में वकीलों को पूछताछ के दौरान मौजूद रहने की अनुमति दी गई थी, फिर भी उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई। उनके शब्दों में, “उत्तर प्रदेश पुलिस कानून और न्यायिक प्रक्रिया की धज्जियाँ उड़ा रही है।” केशव आनंद का यह भी दावा है कि पुलिस के पास इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है और आदित्य को केवल राजनीतिक दबाव के चलते हिरासत में रखा गया है।
पुलिस का कहना है कि आदित्य उस व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन थे, जिसमें प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़काने की साज़िश रची जा रही थी। हालांकि, परिवार इस आरोप को सिरे से खारिज करता है। उनका कहना है कि जैसे ही ग्रुप में भड़काऊ संदेश आने लगे, अन्य सदस्यों ने उनका विरोध किया। परिवार के अनुसार, उसी ग्रुप में आदित्य के ऐसे वीडियो भी साझा किए गए थे, जिनमें वे लोगों से पूरी तरह शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन जारी रखने की अपील करते नजर आते हैं।
परिवार का कहना है कि आदित्य आनंद 10 और 11 अप्रैल को केवल एक जागरूक नागरिक के रूप में मजदूरों के प्रदर्शन में समर्थन जताने पहुंचे थे। यह आंदोलन 9 अप्रैल से जारी था। परिजनों के अनुसार, जब आदित्य को लगा कि पुलिस कार्रवाई से स्थिति बिगड़ सकती है, तब उन्होंने लोगों से शांतिपूर्ण तरीके से धरना जारी रखने की अपील की और उनसे यह संकल्प भी दिलवाया कि आंदोलन पूरी तरह अहिंसक रहेगा।
परिवार के अनुसार, 10 और 11 अप्रैल तक, जब आदित्य और रूपेश रॉय प्रदर्शन स्थल पर मौजूद थे, तब तक कोई हिंसा नहीं हुई थी। उनका कहना है कि हालात उनकी गिरफ्तारी के बाद ही बिगड़े।
परिवार ने आरोप लगाया है कि उत्तर प्रदेश लाए जाने के बाद आदित्य के साथ मारपीट की गई। उनके अनुसार, वाहन में बैठाते ही उनकी पिटाई शुरू कर दी गई और बाद में उन्हें एक अज्ञात स्थान पर ले जाकर कई लोगों ने घंटों तक पीटा। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
आदित्य आनंद ने 2016–19 बैच में एनआईटी जमशेदपुर से बीटेक की पढ़ाई पूरी की थी। वे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी जेनपैक्ट में कार्यरत रहे और नोएडा में रहते थे। परिवार के अनुसार, वे शुरू से ही पढ़ाई में मेधावी रहे और 12वीं में बिहार बोर्ड से अपने जिले में टॉपर रहे थे।
उनके भाई केशव आनंद का कहना है कि आदित्य को विदेशों से भी नौकरी के प्रस्ताव मिले थे और वे ऊंचे वेतन वाली नौकरी चुन सकते थे, लेकिन उन्होंने वंचित वर्गों के साथ काम करने का रास्ता अपनाया। नौकरी के साथ-साथ वे बच्चों को पढ़ाते थे और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से जुड़े रहते थे।
आदित्य मूल रूप से बिहार के हाजीपुर के रहने वाले हैं। उनके पिता, जिनका 2024 में निधन हो गया था, एक इंटर कॉलेज में शिक्षक थे, जबकि उनकी मां निजी शिक्षिका के रूप में कार्यरत रही हैं।
परिवार के अनुसार, आदित्य नौजवान भारत सभा से जुड़े रहे हैं। वे भगत सिंह की जयंती पर बच्चों के लिए कार्यक्रम आयोजित करते थे और मेडिकल कैंप जैसे सामाजिक कार्यों में भी हिस्सा लेते थे। केशव आनंद कहते हैं, “जो व्यक्ति भगत सिंह की जयंती मनाता है और समाज के लिए काम करता है, उसे आज देशद्रोही बताया जा रहा है।”
हिमांशु ठाकुर: पीएचडी की तैयारी से कैद तक
24 वर्षीय हिमांशु ठाकुर को 18 अप्रैल को हिरासत में लिया गया। उनकी बहन नेहा के अनुसार, परिवार को इसकी सूचना करीब 24 घंटे बाद दी गई। उनका आरोप है कि गिरफ्तारी के समय न तो कोई वारंट दिखाया गया और न ही गिरफ्तारी के कारण बताए गए।
परिवार का आरोप है कि पुलिस ने फोन, डायरी और आईपैड तो जब्त कर लिए, लेकिन इसकी कोई जब्ती सूची नहीं दी। उनका यह भी कहना है कि 28 अप्रैल के कोर्ट आदेश के बाद उन्हें कहाँ ले जाया गया, इसकी जानकारी भी साझा नहीं की गई।
नेहा का आरोप है कि पुलिस हिरासत में हिमांशु के साथ मारपीट की गई। उनका कहना है कि हिमांशु का प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं था और उन्हें केवल आदित्य आनंद से संपर्क के आधार पर इस मामले में जोड़ा गया।
हिमांशु ठाकुर की गिरफ्तारी का असर उनके परिवार पर भी पड़ा है। उनकी बहन नेहा के अनुसार, गिरफ्तारी के बाद से उनके पिता की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। नेहा का कहना है कि उनके पिता सुन नहीं पाते, जिससे उन्हें पूरी स्थिति समझाना मुश्किल है, और इस पूरे घटनाक्रम ने उन्हें मानसिक रूप से गहराई से प्रभावित किया है।
हिमांशु दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज से इतिहास में स्नातक हैं। उन्होंने डीयू से ही स्नातकोत्तर भी किया है, नेट परीक्षा उत्तीर्ण कर चुके हैं और पीएचडी में दाखिले की तैयारी कर रहे थे।
आकृति: ‘विचारधारा’ ही आरोप?
आकृति की ओर से पेश हुए वकील रजनीश चंद यादव का कहना है कि पुलिस अब तक यह स्पष्ट नहीं कर पाई है कि उन्हें किन धाराओं में गिरफ्तार किया गया। उनके मुताबिक, हर स्तर पर जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाली जा रही है।
वकील के अनुसार, पुलिस का मौखिक आरोप यह है कि आकृति वामपंथी विचारधारा से जुड़ी हैं और मजदूरों को भड़का रही थीं।
वे सवाल उठाते हैं कि यदि आकृति को 11 अप्रैल को हिरासत में ले लिया गया था, तो 13 अप्रैल की घटना में उनकी भूमिका कैसे संभव है?
वकील के अनुसार, आकृति 10 अप्रैल को हुए एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल थीं। रजनीश यादव ने कहा, ‘यह किस संविधान में लिखा है कि धरना-प्रदर्शन करना गैरकानूनी है? लोगों की अलग-अलग विचारधाराएं हो सकती हैं- किसी की कम्युनिस्ट, किसी की सोशलिस्ट, किसी की भाजपा से जुड़ी, लेकिन इससे किसी को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।’
आकृति दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ी हैं और सोशल वर्क में पीएचडी की तैयारी कर रही हैं। वह पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं। उनके पिता गणशक्ति नामक अखबार में कार्यरत हैं।
रूपेश रॉय: हिरासत में टॉर्चर
रूपेश रॉय पेशे से ऑटो चालक हैं और मजदूर मुद्दों पर काम करने वाली पत्रिका ‘मज़दूर बिगुल’ से जुड़े रहे हैं। संगठन का दावा है कि रूपेश को 11 अप्रैल को ही हिरासत में ले लिया गया था, यानी 13 अप्रैल को हुई हिंसा से पहले। रूपेश के एक साथी के अनुसार, जब पुलिस ने उन्हें हिरासत में लिया, उस समय वे ‘मज़दूर बिगुल’ के लिए रिपोर्टिंग कर रहे थे।
25 अप्रैल को परिवार और दोस्तों की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया कि उनके वकीलों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को शिकायत भेजी है, जिसमें हिरासत में यातना, फर्जी बरामदगी और सबूत गढ़ने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
प्रेस नोट में रूपेश के हवाले से कहा गया है कि उन्हें शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी और मेडिकल जांच के दौरान उनकी चोटों का समुचित परीक्षण नहीं किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें नोएडा के एनएसईज़ेड क्षेत्र में एक स्थान पर ले गई, जहां पहले से केरोसिन की बोतलें और मशालें रखी थीं, और उन्हें ये सामान उठाने के लिए मजबूर कर उनका वीडियो बनाया गया।
वकीलों का कहना है कि मामले में दर्ज लगभग 14 एफआईआर में से अब तक उन्हें केवल एक की प्रति ही मिल सकी है, जबकि गिरफ्तारी, तलाशी और जब्ती से जुड़े आवश्यक दस्तावेज़ भी उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। शिकायत में इन सभी आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।
सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी पर सवाल
28 अप्रैल को नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में ‘सत्यम वर्मा रिहाई मंच’ ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक सत्यम वर्मा सहित कई गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग की। मंच का कहना था कि सत्यम वर्मा को नोएडा के मजदूर आंदोलन से जुड़े हिंसा के मामले में “गैरकानूनी तरीके से” फंसाया गया है, जबकि उनका इस पूरे आंदोलन से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था।
मंच की संयोजक कविता कृष्णपल्लवी ने आरोप लगाया कि सत्यम वर्मा को उनकी “आलोचनात्मक आवाज़” के कारण निशाना बनाया गया और उन्हें इस मामले में आरोपी बनाकर दबाव बनाने की कोशिश की गई। उनके अनुसार, 11 अप्रैल से ही बिना वारंट पूछताछ और दबाव की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, और बाद में बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के तलाशी व जब्ती की कार्रवाई की गई, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और दस्तावेज बिना सीज़र मेमो के ले लिए गए।
कृष्णपल्लवी ने यह भी कहा कि सत्यम वर्मा इस दौरान नोएडा गए ही नहीं थे और न ही उनका मजदूरों या किसी एक्टिविस्ट से कोई प्रत्यक्ष संपर्क था।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी आरोप लगाया गया कि गिरफ्तारी के बाद सत्यम वर्मा को दो दिनों तक अदालत में पेश नहीं किया गया और उन्हें वकीलों से संपर्क करने तथा जरूरी दवाएं लेने की अनुमति भी नहीं दी गई।
वक्ताओं ने दावा किया कि इस पूरे मामले में पुलिस और प्रशासन मजदूर आंदोलन से जुड़ी असहमति की आवाज़ों को भी “षड्यंत्र” के दायरे में रखकर दमन करने की कोशिश कर रहे हैं। मंच ने सभी गिरफ्तार लोगों की निष्पक्ष जांच कराने और उनकी तत्काल रिहाई की मांग की।
एफआईआर में गड़बड़ियां
द वायर हिंदी को इस मामले से जुड़ी तीन एफआईआर की प्रतियां मिलीं, जिनमें दर्ज जांच अधिकारियों के मोबाइल नंबर गलत पाए गए। नोएडा फेज-3 थाने में दर्ज इन तीनों एफआईआर में जहां अधिकारियों के मोबाइल नंबर होने चाहिए थे, वहां केवल 9 अंकों के नंबर दर्ज थे, जबकि सामान्यतः मोबाइल नंबर 10 अंकों के होते हैं। इतना ही नहीं, थाना प्रभारी अवधेश प्रताप का नंबर भी गलत दर्ज पाया गया।
प्रशासन से नहीं मिला जवाब
द वायर हिंदी ने इस मामले में दर्ज एफआईआर, गिरफ्तारियों और हिरासत में बंद लोगों के परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों पर उत्तर प्रदेश पुलिस का पक्ष जानने के लिए संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया।
सबसे पहले नोएडा फेज-2 थाने के एसएचओ से बातचीत की गई। उन्होंने कहा कि वे इस मामले पर टिप्पणी करने के लिए अधिकृत नहीं हैं और कमिश्नर कार्यालय के पेशकार से संपर्क करने को कहा।
इसके बाद कमिश्नर कार्यालय में पेशकार अभिनाश त्यागी से संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने भी इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और मीडिया सेल से बात करने की सलाह दी।
मीडिया सेल से संपर्क करने पर अधिकारी विजय ने भी जानकारी देने से इनकार करते हुए कहा कि इस मामले में आधिकारिक बयान केवल जॉइंट कमिश्नर ही जारी कर सकते हैं।
इसके बाद जॉइंट कमिश्नर राजीव नारायण मिश्रा से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बातचीत नहीं हो सकी। उन्हें प्रश्न भेज दिए गए हैं, और जवाब मिलते ही रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।
मजदूरों का गुस्सा!
पिछले महीने नोएडा के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले हजारों मजदूर अप्रैल में सड़कों पर उतर आए। ये श्रमिक ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, कपड़ा और छोटे विनिर्माण उद्योगों में कार्यरत हैं। वर्षों से उन्हें करीब 10,000 से 15,000 रुपये मासिक वेतन मिल रहा है। महंगाई बढ़ती रही, लेकिन उनकी आय लगभग स्थिर बनी रही।
इनमें बड़ी संख्या प्रवासी मजदूरों की है, जो शहर के बाहरी इलाकों में छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं, परिवारों को पैसे भेजते हैं और सीमित आय में गुज़ारा करते हैं। इसी बीच घरेलू कामगार महिलाओं ने भी नोएडा की पॉश सोसाइटियों के बाहर वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया।
13 अप्रैल को हुई झड़प से पहले मजदूरों ने दो दिनों तक शांतिपूर्ण धरना दिया था। राज्य सरकार ने 11 अप्रैल को कुछ श्रमिक कल्याण उपायों की घोषणा की थी, जिनमें ओवरटाइम का दोगुना भुगतान और न्यूनतम मजदूरी में 21 प्रतिशत बढ़ोतरी शामिल थी। हालांकि, प्रदर्शनकारी इन उपायों को अपर्याप्त मान रहे थे।
हिंसा कैसे भड़की, इसे लेकर दो दावे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि पुलिस ने बिना उकसावे बल प्रयोग किया। पुलिस का कहना है कि भीड़ हिंसक हो गई थी, इसलिए कार्रवाई जरूरी थी।
इसके बाद नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने सात एफआईआर और 300 से अधिक गिरफ्तारियों की जानकारी दी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घटना को राज्य के विकास को पटरी से उतारने की ‘साजिश’ बताया।
Related
FIR से “कॉरपोरेट जिहाद” तक: TCS नासिक मामले में जांच को कैसे सांप्रदायिक मोड़ दिया गया
मानवाधिकार आयोग की भूमिका पर हाईकोर्ट सख्त, "मुस्लिमों पर हमले व लिंचिंग का संज्ञान क्यों नहीं"