CJP व अन्य नागरिक समूहों ने चेतावनी दी कि महाराष्ट्र का धर्मांतरण-विरोधी विधेयक निजता और स्वतंत्रता के लिए खतरा है

Written by sabrang india | Published on: March 12, 2026
35 नागरिक समाज और महिला अधिकार समूहों के एक गठबंधन ने महाराष्ट्र कैबिनेट द्वारा प्रस्तावित ‘धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026’ को मंज़ूरी दिए जाने का विरोध किया। इसे निजता और महिलाओं की स्वायत्तता पर हमला बताते हुए उन्होंने कहा कि यह विधेयक “लव जिहाद” की अवधारणा पर आधारित है और चेतावनी दी कि यदि विधानसभा इसे पारित करती है, तो वे इस कानून को अदालत में चुनौती देंगे।



35 सिविल सोसाइटी संगठनों, महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों और संवैधानिक अधिकारों की वकालत करने वाले समूहों के एक गठबंधन ने महाराष्ट्र कैबिनेट द्वारा नए धर्मांतरण विरोधी मसौदा कानून को मंज़ूरी दिए जाने पर गहरी चिंता जताई है। सरकार पर 'लव जिहाद' के झूठे नैरेटिव के आधार पर इस विधेयक को आगे बढ़ाने का आरोप लगाते हुए, इन संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर विधानसभा इसे पास कर देती है, तो वे इसे कानूनी तौर पर चुनौती देंगे।

प्रस्तावित कानून, जिसका नाम 'धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2026' है, कथित तौर पर धार्मिक धर्मांतरणों और अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच रिश्तों को रेगुलेट करने के लिए बनाया गया है। हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि यह विधेयक निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार पर सीधा हमला है। हालांकि, बिल का आधिकारिक मसौदा अभी तक आम लोगों के सामने नहीं आया है, लेकिन सरकारी प्रतिनिधियों ने संकेत दिया है कि यह कानून उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में लागू इसी तरह के कानूनों की तुलना में कहीं ज्यादा सख्त होगा।

CJP की सचिव तीस्ता सेतलवाड़ ने कहा, "यह बिल महिलाओं की स्वायत्तता और भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर सीधा हमला है। इसकी कुछ विशेषताएं, जैसे धर्मांतरण से पहले अनुमति लेना, धर्मांतरण से पहले नोटिस देना और रिश्तेदारों को आपराधिक कार्रवाई शुरू करने की अनुमति देना, असंवैधानिक हैं। विपक्षी दलों को इसके खिलाफ एक स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।" उन्होंने आगे कहा कि यदि महाराष्ट्र सरकार इस कानून को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो CJP इसे चुनौती देगी।

गठबंधन ने इस बात पर जोर दिया कि भले ही इस कानून को धोखाधड़ी से होने वाले धर्मांतरणों को रोकने के एक उपाय के तौर पर पेश किया गया हो, लेकिन इसके इर्द-गिर्द चल रही राजनीतिक चर्चाओं में 'लव जिहाद' के नैरेटिव पर ही ज्यादा जोर दिया गया है। उन्होंने इस बात को भी उजागर किया कि केंद्र सरकार ने 2020 में संसद में कहा था कि 'लव जिहाद' की कोई कानूनी परिभाषा नहीं है और केंद्रीय एजेंसियों ने इस तरह का कोई भी मामला रिपोर्ट नहीं किया है।



बुधवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़' की ऑर्गेनाइज़िंग सेक्रेटरी, एडवोकेट लारा जेसानी ने कहा, "जबरदस्ती धर्मांतरण के बारे में कोई डेटा उपलब्ध नहीं है और इसलिए हमें यह भी नहीं पता कि क्या हमें जबरदस्ती धर्मांतरण की समस्या से निपटने की जरूरत है भी या नहीं। इस तरह के नैरेटिव ने नफरत भरे बयानों (हेट स्पीच) को बढ़ावा दिया है, खासकर महाराष्ट्र में, जहां पिछले तीन सालों में नफरत भरे बयानों के सबसे ज्यादा मामले सामने आए हैं। वैसे भी, 'विशेष विवाह अधिनियम' (Special Marriage Act) के तहत दो बालिग लोगों के लिए आपसी सहमति से शादी करना पहले से ही काफी मुश्किल है, क्योंकि उन्हें 'विजिलेंटे ग्रुप्स' (कानून अपने हाथ में लेने वाले समूहों) द्वारा निशाना बनाए जाने का डर सताता रहता है।"

सिविल सोसाइटी संगठनों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि इस बिल को बिना किसी सार्वजनिक चर्चा, बारीकी से जांच-पड़ताल और बहस के ही पेश कर दिया गया है। उन्होंने इस बात को भी उजागर किया कि महाराष्ट्र का यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है, जब देश के कई राज्यों में लागू इसी तरह के धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को लेकर पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) द्वारा दायर की गई कई रिट याचिकाएं 2020 से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

इस गठबंधन ने मांग की है कि राज्य सरकार तुरंत इस मसौदे को सार्वजनिक करे, जनता और नागरिक समाज संगठनों से परामर्श करे, बिल को विस्तृत जांच के लिए एक विधायी स्थायी समिति के पास भेजे, बिना किसी सार्थक लोकतांत्रिक बहस के इस कानून को पारित करने से बचे, और जबरन धर्मांतरण पर ऐसा अनुभव पर आधारित आंकड़े जारी करे जो इस तरह के कानून की आवश्यकता को सही ठहराता हो।

'ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन' के मुंबई अध्यक्ष और 'मुंबई फॉर पीस' आंदोलन के संस्थापक सदस्य आमिर काजी ने कहा, "युवाओं को अपनी सोच का दायरा बढ़ाना चाहिए, लेकिन इस तरह के कानून हमारी सोच को सीमित करते हैं। महाराष्ट्र के युवा प्रगतिशील हैं और ऐसी विचारधारा में विश्वास नहीं रखते।" उन्होंने आगे कहा कि इन संगठनों ने इस कानून के बारे में युवाओं के बीच जागरूकता फैलाने और एक हस्ताक्षर अभियान शुरू करने की योजना बनाई है।

'बॉम्बे कैथोलिक सभा' के प्रवक्ता डॉल्फ़ी डिसूज़ा ने जबरन धर्मांतरण को परिभाषित करने के लिए 'प्रलोभन' (allurement) जैसे शब्दों के ढीले-ढाले इस्तेमाल पर चिंता जताई। उन्होंने सुझाव दिया कि इससे शिक्षा जैसे उन परोपकारी कार्यों को भी अपराध की श्रेणी में डाला जा सकता है, जिन्हें ईसाई संगठन बड़े पैमाने पर करते हैं।



हालांकि, प्रस्तावित कानून का मसौदा अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है, जिससे पारदर्शिता, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और मौलिक अधिकारों पर इस कानून के संभावित प्रभावों को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं।

भाग लेने वाले नागरिक समाज संगठन इस बात पर जोर देते हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर दूरगामी प्रभाव डालने वाले किसी भी कानून का मसौदा बिना सार्वजनिक परामर्श, जांच-पड़ताल और बहस के तैयार और पेश नहीं किया जा सकता।

“लव जिहाद” के इर्द-गिर्द बनाए गए धर्मांतरण-विरोधी कानूनों का बढ़ता चलन

महाराष्ट्र का प्रस्तावित कानून, “धर्म की स्वतंत्रता” कानूनों की आड़ में कई राज्यों में पहले से ही लागू किए गए धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के पैटर्न पर ही आधारित प्रतीत होता है।

संगठनों ने कहा कि, हालांकि इन्हें जबरदस्ती या धोखाधड़ी से होने वाले धार्मिक धर्मांतरणों को रोकने के उपायों के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन इन कानूनों को अक्सर राजनीतिक रूप से “लव जिहाद” के नैरेटिव के जरिए सही ठहराया जाता रहा है, यह एक ऐसी साजिश की थ्योरी है जिसके तहत यह आरोप लगाया जाता है कि मुस्लिम पुरुष, हिंदू महिलाओं को शादी के जाल में फंसाकर उनका धर्मांतरण करने की एक सोची-समझी साजिश रचते हैं।

भाग लेने वाले नागरिक समाज संगठनों ने चेतावनी दी है कि इस तरह की सोच, अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच बनने वाले रिश्तों को कलंकित करती है, सांप्रदायिक अविश्वास को बढ़ावा देती है, और वयस्क लोगों के अपने जीवनसाथी और अपने धर्म को चुनने के संवैधानिक अधिकार को कमजोर करती है।

संगठनों ने कहा है कि रिपोर्ट्स से पता चलता है कि प्रस्तावित कानून धार्मिक धर्मांतरण पर दखल देने वाला रेगुलेटरी सिस्टम लागू करेगा, जिसमें ये शामिल हैं:

● धर्मांतरण से पहले एक तय अधिकारी से अनिवार्य पूर्व अनुमति

● किसी व्यक्ति के अपना धर्म बदलने से पहले 60 दिन पहले सूचना देने की शर्त

● धर्मांतरण के 25 दिनों के भीतर अनिवार्य पंजीकरण; ऐसा न करने पर धर्मांतरण को अमान्य घोषित किया जा सकता है

● एक ऐसा प्रावधान जो रिश्तेदारों को जबरदस्ती का आरोप लगाकर आपराधिक जांच शुरू करवाने की अनुमति देता है

● गैर-जमानती अपराध, जिनके लिए कथित तौर पर सात साल तक की जेल और 5 लाख रूपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है

इन संगठनों ने कहा है कि प्रस्तावित कानून भारत के संविधान के कई प्रावधानों के तहत गंभीर संवैधानिक चिंताएं पैदा करता है। 'अनुच्छेद-25’ धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जिसमें किसी के धर्म को अपनाने और बदलने का अधिकार भी शामिल है। 'निजता का अधिकार’ जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में मान्यता दी थी, विवाह, पारिवारिक जीवन और विश्वास से जुड़े निजी निर्णयों की रक्षा करता है। इसके अलावा, 'अनुच्छेद 14 और 21’ कानून के समक्ष समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा की गारंटी देते हैं।

इस बैठक में भाग लेने वाले नागरिक समाज संगठनों का कहना है कि पहले से सूचना देने की शर्तें, निजी धर्मों के बारे में पुलिस की जांच-पड़ताल और विवाह या धर्मांतरण से जुड़ी आपराधिक सजा, निजी निर्णयों को प्रशासनिक और पुलिस निगरानी के दायरे में लाकर, व्यक्ति और राज्य के बीच के संबंध को मौलिक रूप से बदल देती हैं।

सुप्रीम कोर्ट में धर्मांतरण-विरोधी कानूनों को लेकर चल रही संवैधानिक चुनौती

महाराष्ट्र का यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है, जब कई राज्यों में इसी तरह के धर्मांतरण-विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता को लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही चुनौती चल रही है।

रिट याचिकाओं का एक समूह—जिसे सबसे पहले मुंबई स्थित 'सिटिजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP) ने दायर किया था और जो सुप्रीम कोर्ट में मुख्य याचिकाकर्ता है- साल 2020 से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ये याचिकाएं अंतरात्मा की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के समक्ष समानता और धर्मांतरण तथा अंतर-धार्मिक संबंधों को विनियमित करने में राज्य की शक्ति की सीमाओं के बारे में मौलिक संवैधानिक सवाल खड़े करती हैं। इस मामले में सुनवाई, जो रुक-रुककर होती रही है और जिसमें CJP ने सबसे आपत्तिजनक प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगाने की जोरदार मांग की है, वह 11 मार्च, 2026 को भी निर्धारित है।

मूल रूप से उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में लागू कानूनों के खिलाफ दायर की गई इन याचिकाओं का दायरा बाद में -अदालत की अनुमति से- बढ़ा दिया गया, ताकि इसमें छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, झारखंड और कर्नाटक में लागू इसी तरह के कानूनों को भी शामिल किया जा सके। परिणामस्वरूप, चल रही ये कार्यवाही अब नौ राज्यों के धर्मांतरण-विरोधी कानूनों से संबंधित है, जिनमें से प्रत्येक को "धर्म की स्वतंत्रता" या "अवैध धर्मांतरण निषेध" कानून के रूप में तैयार किया गया है।

याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि हालांकि इन कानूनों को औपचारिक रूप से जबरदस्ती या धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण के खिलाफ सुरक्षा उपायों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन इनकी बनावट और कार्यान्वयन ने एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार कर दिया है, जो स्वैच्छिक धार्मिक धर्मांतरण को स्वाभाविक रूप से ही संदिग्ध मानता है- विशेष रूप से तब, जब यह अंतर-धार्मिक संबंधों या विवाह के संदर्भ में होता है। जिन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, उनमें ये शामिल हैं:

● डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के सामने अनिवार्य पूर्व घोषणाएं
● धर्मांतरण के कारणों की पुलिस जांच
● विवाह से जुड़े धर्मांतरण को अपराध घोषित करना
● रिश्तेदारों या गैर-संबंधित व्यक्तियों द्वारा तीसरे पक्ष की शिकायतें
● सबूत का बोझ उलटा करना
● ज़मानत के कड़े प्रावधान और बढ़ी हुई सजा

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ये प्रावधान अंतरात्मा की स्वतंत्रता के प्रयोग को कार्यपालिका की जांच और पुलिस की छानबीन के अधीन कर देते हैं, जिससे इसके दुरुपयोग और उत्पीड़न का रास्ता खुल जाता है - विशेष रूप से आपसी सहमति वाले वयस्क जोड़ों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ।

अप्रैल 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने CJP द्वारा दायर उन याचिकाओं पर सुनवाई की, जिनमें कुछ सबसे ज्यादा दखल देने वाले प्रावधानों के खिलाफ अंतरिम राहत की मांग की गई थी; इनमें वे प्रावधान भी शामिल थे जिनके तहत पहले से घोषणा करना जरूरी था और जो तीसरे पक्ष को शिकायत करने की अनुमति देते थे। 

कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया, जिससे यह संकेत मिला कि यह मामला गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े करता है, जिन पर विस्तार से विचार करने की आवश्यकता है।

इसी तरह के कानूनों की जांच कर रहे कई हाई कोर्ट पहले ही उन प्रावधानों के बारे में चिंता व्यक्त कर चुके हैं जो आपसी सहमति वाले वयस्कों की स्वायत्तता में दखल देते हैं। उदाहरण के लिए, गुजरात हाई कोर्ट ने 'गुजरात धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम' के उन प्रावधानों पर रोक लगा दी थी जो धर्मांतरण से जुड़ी अंतर-धार्मिक शादियों को अपराध मानते थे, जबकि मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अधिकारियों के सामने पहले से घोषणा करने की शर्त वाले प्रावधानों पर रोक लगा दी थी।

इसमें शामिल संगठन इस बात पर जोर देते हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इसी तरह के कानूनों की संवैधानिक वैधता पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है, तो ऐसे समय में एक और धर्मांतरण-विरोधी कानून लाना विधायी विवेक और संवैधानिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

महाराष्ट्र में अंतर-धार्मिक शादियों की निगरानी के पहले के प्रयास

प्रस्तावित कानून को महाराष्ट्र सरकार द्वारा अंतर-धार्मिक शादियों की निगरानी के लिए किए गए पहले के प्रयासों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

दिसंबर 2022 में, राज्य सरकार ने एक सरकारी प्रस्ताव जारी किया, जिसके तहत एक समिति का गठन किया गया। इस समिति को अंतर-धार्मिक शादियों की निगरानी का काम सौंपा गया था। इस फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में कई संगठनों द्वारा चुनौती दी गई थी, जिनमें 'सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस' (CJP), 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़' (PUCL), 'फोरम अगेंस्ट द ऑप्रेशन ऑफ वीमेन' (FAOW), और 'इंडियन मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी' (IMSD) शामिल थे।

याचिका में यह तर्क दिया गया है कि इस तरह की निगरानी निजता के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वयस्क महिलाओं की स्वायत्तता का उल्लंघन करती है, और अंतर-धार्मिक जोड़ों को निगरानी और उत्पीड़न के जोखिम में डालती है। यह मामला अभी भी बॉम्बे हाई कोर्ट में लंबित है।

पारदर्शिता और लोकतांत्रिक जांच की मांग

प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिस्सा ले रहे नागरिक समाज संगठन महाराष्ट्र सरकार से ये मांग कर रहे हैं:

1. बिल का मसौदा तुरंत सार्वजनिक किया जाए।
2. नागरिक समाज, महिला समूहों, कानूनी विशेषज्ञों और अल्पसंख्यक अधिकारों के संगठनों को शामिल करते हुए सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया शुरू की जाए।
3. बिल को विस्तृत जांच के लिए एक विधायी स्थायी समिति के पास भेजा जाए।
4. बिना किसी सार्थक लोकतांत्रिक बहस के इस कानून को पेश करने या पारित करने से परहेज़ किया जाए।
5. शादी या किसी अन्य तरीके से तथाकथित 'जबरदस्ती' धर्म परिवर्तन के आंकड़े जारी किए जाएं, जिनकी वजह से महाराष्ट्र में ऐसे कानून की जरूरत बताई जा रही है।

मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले कानून को अपारदर्शी प्रक्रियाओं या जल्दबाज़ी में की गई विधायी प्रक्रियाओं के जरिए पारित नहीं किया जाना चाहिए।

संवैधानिक स्वतंत्रता की रक्षा का आह्वान

हिस्सा ले रहे नागरिक समाज संगठन इस बात पर जोर देते हैं कि धर्म के मामलों में व्यक्तियों को जबरदस्ती या धोखाधड़ी से बचाने का काम मौजूदा आपराधिक कानून के प्रावधानों के जरिए पहले से ही किया जा रहा है।

इस समय जो दांव पर लगा है, वह अपराध की रोकथाम नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन के सबसे निजी क्षेत्रों में राज्य की शक्ति का विस्तार है।

भारत का संवैधानिक ढांचा यह मानता है कि आस्था, शादी और पहचान से जुड़े फैसले व्यक्तियों के होते हैं न कि राज्य, परिवारों या स्वयंभू समूहों के।

प्रस्तावित कानून अंतर-धार्मिक संबंधों और धार्मिक चुनाव के इर्द-गिर्द निगरानी, शक और अपराधीकरण का माहौल बनाकर इन सिद्धांतों को कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है।
इसलिए नागरिक समाज समूह महाराष्ट्र सरकार से आग्रह करते हैं कि वह विधायी प्रक्रिया को रोक दे, कानून का मसौदा सार्वजनिक जांच के लिए जारी करे और यह सुनिश्चित करे कि भविष्य की किसी भी नीति के लिए संवैधानिक स्वतंत्रता ही मार्गदर्शक ढांचा बनी रहें।

प्रेस कॉन्फ्रेंस का समर्थन और आयोजन करने वाले संगठन:

1. पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (PUCL)
2. सिटिज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP)
3. मुंबई फॉर पीस
4. एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR)
5. महाराष्ट्र स्त्री मुक्ति परिषद (MSMP)
6. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म (CSSS)
7. हसरत-ए-ज़िंदगी मामूली
8. फोरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ वीमेन
9. क्रिश्चियन डेवलपमेंट एसोसिएशन
10. द बॉम्बे कैथोलिक सभा
11. आर्क फाउंडेशन
12. धनक फॉर ह्यूमैनिटी
13. इंडिया लव प्रोजेक्ट
14. दलित ह्यूमन राइट्स डिफेंडर्स नेटवर्क
15. नेशनल काउंसिल ऑफ वीमेन लीडर्स
16. रूपांतर
17. सिटिजन्स फॉर द कॉन्स्टिट्यूशन
18. परचम
19. सावित्री फातिमा फाउंडेशन
20. इंडियन मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी
21. मजलिस
22. पानी हक समिति
23. सेंटर फॉर प्रमोटिंग डेमोक्रेसी
24. प्लेटफॉर्म फॉर सोशल जस्टिस
25. माजलगाँव विकास प्रतिष्ठान
26. मासूम, पुणे
27. भारतीय महिला फेडरेशन, महाराष्ट्र
28. स्त्री मुक्ति संघटना
29. संविधान प्रचारक चलवल
30. मुस्लिम सत्यशोधक मंडल (महाराष्ट्र)
31. बेबाक कलेक्टिव
32. भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA)
33. जागृत कास्तकारी संगठन
34. म्यूज़ फाउंडेशन
35. स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ इंडिया (SIO)
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