माधव गाडगिल का विज्ञान में अटूट विश्वास

Written by sabrang india | Published on: January 9, 2026
प्रख्यात पर्यावरण वैज्ञानिक माधव गाडगिल का बुधवार, 7 जनवरी की देर रात पुणे में बीमारी के बाद निधन हो गया। उन्हें 1981 में पद्म श्री और 2006 में पद्म भूषण सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था।



जाने-माने पर्यावरण वैज्ञानिक और इकोलॉजिस्ट माधव गाडगिल का 7 जनवरी को महाराष्ट्र के पुणे में एक संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया। वे 82 वर्ष के थे। उनका अंतिम संस्कार गुरुवार (8 जनवरी) को शाम 4 बजे पुणे के वैकुंठ श्मशान घाट में किया गया।

बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) में सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज की स्थापना करने वाले गाडगिल करीब आधी सदी से अधिक समय तक भारत की पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर अध्ययन करते रहे। उन्होंने पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक महत्व पर शोध की शुरुआत की थी। इसी कार्य के लिए 2024 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट’ श्रेणी के तहत ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ पुरस्कार से सम्मानित किया था। इससे पहले उन्हें 1981 में पद्म श्री और 2006 में पद्म भूषण से नवाजा गया था।

पंद्रह वर्ष पहले, माधव गाडगिल ने अपने सबसे चर्चित कार्यों में से एक के रूप में 2011 में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) के अध्यक्ष के तौर पर सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस पैनल ने फील्ड विज़िट, स्थानीय समुदायों से संवाद और विस्तृत अध्ययन के बाद रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट में छह राज्यों में फैले पश्चिमी घाट क्षेत्र को तीन श्रेणियों के इको-सेंसिटिव ज़ोन में बांटा गया था—ग्रेड 1 (सबसे अधिक संवेदनशील), ग्रेड 2 (उच्च संवेदनशील) और ग्रेड 3 (मध्यम संवेदनशील)। इसमें ESZ-1 क्षेत्रों में खनन और पत्थर खनन पर रोक सहित कई अहम सिफारिशें की गई थीं।

विडंबना यह रही कि सभी राज्यों ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया और कई ने इसे “अव्यावहारिक” बताया। चौदह साल बाद भी यह रिपोर्ट पश्चिमी घाट वाले छह में से किसी भी राज्य में किसी रूप में लागू नहीं की गई है। इसके बाद कृष्णास्वामी कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में गठित एक अन्य पैनल ने संशोधित रिपोर्ट सौंपी, जिसमें इको-सेंसिटिव घोषित किए जाने वाले क्षेत्र को और कम कर दिया गया।

पिछले वर्ष द हिंदू को दिए एक साक्षात्कार में गाडगिल ने पश्चिमी घाट में लगातार बढ़ती आपदाओं पर चिंता जताई थी और कहा था कि उनसे बचाव के लिए उनकी रिपोर्ट की सिफारिशें बेहद जरूरी हैं। उन्होंने कहा, “हमने जो देखा, वह लोगों पर थोपा जा रहा विकास का एक मॉडल था—खनन गतिविधियां और प्रदूषण फैलाने वाली उद्योग बिना लोगों की सहमति के उन पर थोपे जा रहे थे। वहीं, संरक्षण के प्रयास भी वन विभाग द्वारा ऊपर से नीचे, तानाशाही तरीके से लागू किए जा रहे थे, जो अक्सर क्रूर और लोगों के खिलाफ होते थे।”

पश्चिमी घाट पर इस रिपोर्ट के अलावा, उनके कार्यक्षेत्र में पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान, समुदायों की भागीदारी, भारत के पर्यावरणीय संघर्ष, पर्यावरण आंदोलन और अनेक अन्य विषय शामिल थे।

माधव गाडगिल ने 1992 में दिस फिशर्ड लैंड से लेकर 2023 में ए वॉक अप द हिल – लिविंग विद पीपल एंड नेचर तक कई पुस्तकों का लेखन और सह-लेखन किया। उन्होंने वैज्ञानिकों, संरक्षणवादियों और कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर ग्रेट निकोबार द्वीप में प्रस्तावित विनाशकारी विकास परियोजनाओं पर भी तीखी आलोचना की थी। उनका कहना था, “यदि भारत को कानून का पालन करने वाला देश बनना है, तो वन अधिकार अधिनियम शोम्पेन और निकोबारी लोगों पर भी लागू होना चाहिए। वे क्षेत्र अछूते रहने चाहिए और विशेष रूप से संवेदनशील जनजातीय समूहों के सामुदायिक वन संसाधन के रूप में संरक्षित किए जाने चाहिए। दुर्भाग्य से, हम लगातार इन कानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं।”

हिम्मत और दृढ़ संकल्प के प्रतीक माधव गाडगिल का हमेशा यह विश्वास रहा कि वैज्ञानिकों को, अन्य सभी शिक्षाविदों की तरह, सत्ता के सामने सच बोलने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए।

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