काल्पनिक राजा, राजवंशो की जातीय रिब्रांडिंग, और नीतिगत विफलताओं को सांप्रदायिक एवं जातिय टकराव द्वारा ढकने के उद्देश्य से किय गए इतिहास विकृतिकरण।
भूमिका: भाजपा का बौद्धिक सहारा के रूप में इतिहास
हाल में फिल्म धुरंधर की आलोचना एक साफ पैटर्न दिखाती है—इतिहास को बहुत सरल कहानियों में बदल देना, जहाँ “हिंदू वीरता” और “बाहरी खतरा” को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। फिल्म में नायकों के अजय सान्याल (ब्राह्मण), सुषांत सिन्हा (बनिया) और जसकीरत सिंह रंगी (जाट सिख) जैसे नाम रखना, और तथ्यों को गलत तरीके से पेश करना—जैसे नोटबंदी के समय उत्तर प्रदेश के डीजीपी के रूप में जावेद अहमद की जगह प्रशांत कुमार को दिखाना—यह बताता है कि दक्षिणपंथ किन पहचानों को महत्व देता है और किन्हें नजरअंदाज करता है।
लेकिन यह सिर्फ धर्म या मुस्लिम-विरोध तक सीमित नहीं है। इसके जरिए एक और काम होता है—ज्ञान पर ब्राह्मणों का दबदबा मजबूत करना और व्यापारी वर्ग की ताकत को सही ठहराना। साथ ही, “हिंदू एकता” के नाम पर मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाते हुए, गैर-ब्राह्मण और गैर-बनिया समुदायों के बीच भी दूरी बढ़ाई जाती है।
यानी, हिंदुत्व में इतिहास को तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल किया जाता है ताकि असली समस्याओं और नीतिगत विफलताओं से ध्यान हटाया जा सके और समाज में टकराव पैदा किया जा सके।
कॉर्पोरेट हितों की पूर्ति के लिए इतिहास पर विवाद
22 दिसंबर को, भील समुदाय को संबोधित करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता और पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया ने महाराणा प्रताप पर ऐसी टिप्पणी की, जिसे व्यापक रूप से अपमानजनक माना गया—विडंबना यह है कि भाजपा लंबे समय से प्रताप जैसे व्यक्तित्व का भावनात्मक राजनीतिक उपयोग करती रही है। इस पर भारतीय आदिवासी पार्टी के नेता राजकुमार रोत ने तीखी आलोचना की और कहा कि प्रताप का आदिवासी ऐतिहासिक स्मृति में आज भी महत्वपूर्ण स्थान है।
भाजपा के व्यापक दायरे के भीतर भी असहजता दिखने लगी है। 2 जनवरी को, राजनाथ सिंह की उपस्थिति में एक कार्यक्रम में बोलते हुए विश्वराज सिंह मेवाड़ ने इतिहास के राजनीतिक दुरुपयोग को बंद करने की जरूरत पर जोर दिया।
कटारिया की टिप्पणी में एक राजनीतिक संकेत भी छिपा था। जिस क्षेत्र की बात हो रही है, वहाँ खनन का नियंत्रण मुख्यतः जैन और अग्रवाल व्यापारिक समूहों के पास है, जबकि भील और राजपूत जैसे आदिवासी और कृषक समुदाय संख्या में अधिक होते हुए भी पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान का बड़ा हिस्सा झेलते हैं। इस संदर्भ में, रोत की सीधी आलोचना और मेवाड़ की संतुलित अपील दोनों यह दिखाती हैं कि आदिवासी और कृषक इतिहास के राजनीतिक और आर्थिक हितों के लिए इस्तेमाल किए जाने को लेकर असंतोष बढ़ रहा है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि आज आरएसएस-भाजपा का प्रोजेक्ट केवल इतिहास के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उससे आगे बढ़ चुका है। अब इसमें नए “हिंदू योद्धाओं” की कल्पना करना, ऐतिहासिक वंशों की जातिय पहचान बदलना , और इन्हें सोशल मीडिया, लोकप्रिय साहित्य और राज्य समर्थित ढाँचों (स्टेट स्पोंसर्ड इंफ्रास्ट्रक्चर) के जरिए स्थापित करना शामिल है।
इसे समझना जरूरी है, क्योंकि यही वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हिंदुत्व और जाति-आधारित पार्टियां मिलकर उत्तर भारत को साम्प्रदायिक और जाति आधार पर नए तरीके से गढ़ रही हैं, और साथ ही इतिहास की समझ और सार्वजनिक बौद्धिकता को धीरे-धीरे कमजोर कर रही हैं।
मिथकीय इतिहास की हिंदुत्व फैक्ट्री
आरएसएस और उसके महाराष्ट्रीय नेतृत्व ने जहाँ एक ओर विक्रम संपथ जैसे लेखकों की मदद से सावरकर जैसे व्यक्तित्वों की छवि को साफ-सुथरा बनाने की कोशिश की है , और शिवाजी, संभाजी तथा पेशवाओं पर भव्य महिमामंडन—उपन्यासों और बड़े बजट की फिल्मों के जरिए—तैयार करने का काम किया ह। किन्तु दूसरी और हिंदुत्व का व्यापक तंत्र उत्तर भारत कई काल्पनिक “ऐतिहासिक” पात्र गढ़ने का काम करता आया है । इन गढ़ी हुई कथाओं का इस्तेमाल जातीय दरारों को भुनाने और लक्षित समुदायों के बीच ऐतिहासिक समझ को कमजोर करने के लिए किया जाता है।
हाल के वर्षों में, भाजपा से जुड़े मंचों ने राजा सुधनवा चौहान की कहानियाँ फैलायी हैं, जिन्हें माहिष्मति का शासक बताया जाता है और जिनका साम्राज्य अजमेर–सांभर के ऐतिहासिक चौहानों से भी बड़ा बताया जाता है, साथ ही उन्हें आदि शंकराचार्य का शिष्य भी कहा जाता है। इसी तरह, किरणदेवी नामक एक पात्र की कहानी भी प्रचारित की गई है। पी एन ओक की काल्पनिक कहानी के अनुसार बादशाह अकबर हिन्दू राजाओ की बीवियों को मीणा बाजार बुलाते थे और वहां उनसे बदसलूखी करते थे, तब इस काल्पनिक रानी ने उन्हें खंजर दिखाकर डराने का कार्य किया था। असल में मीणा बाजार की पूरी कहानी ही काल्पनिक, स्त्रीविरोधी, जातिवादी और सांप्रदायिक है।
इनमें से किसी भी पात्र का उल्लेख न तो शिलालेखों में मिलता है, न ऐतिहासिक ग्रंथों में, और न ही स्थानीय लोक परंपराओं में। इसके विपरीत, लंबे समय तक राजनीतिक प्रभुत्व के कारण—मुगलों या सिखों के समान—राजपूत इतिहास विभिन्न हिंदू, इस्लामी और सिख स्रोतों में अच्छी तरह दर्ज है, जिससे इस तरह की गढ़ी हुई कहानियों को आसानी से गलत साबित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, जी.एच. ओझा, नामवर सिंह और सिंथिया टैल्बॉट जैसे विद्वानों ने सोलहवीं सदी के पृथ्वीराज रासो को अस्वीकार करते हुए समकालीन पृथ्वीराज विजय महाकाव्य (जयानक द्वारा रचित) को अधिक विश्वसनीय माना है। सिंथिया टैल्बॉट के अनुसार, एक सदी से अधिक समय से विद्वानों द्वारा खारिज किए जाने के बावजूद, रासो की बारहवीं सदी की प्रामाणिकता के दावे आज भी लोकप्रिय संस्कृति में बने हुए हैं, जो एक अवधारणा है ।
किन्तु इस रणनीति का वास्तविक निशाना वे समुदाय हैं जिनका लंबे समय तक राजनीतिक प्रभुत्व नहीं रहा और जो अब ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में अपने लिए एक सैन्य या राजसिय अतीत की तलाश कर रहे हैं।
फुले–आंबेडकरवाद के खिलाफ गढ़ी गई वीरता की कहानियों
मनोशी सिन्हा रावल की 2019 की किताब सैफरन-स्वोर्ड्स, जिसे गरुड़ा प्रकाशन ने प्रकाशित किया, ऐसे कई गढ़े हुए किस्सों को “इतिहास” के रूप में पेश करके मुख्यधारा में ले आई।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत , रतन शारदा और केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा समर्थित यह किताब दिखाती है कि किस तरह मिथकों को वैधता दी जाती है।
इसमें जिन पात्रों को बढ़ावा दिया गया है, उनमें रामप्यारी गुज्जरी, जोगराज सिंह गुर्जर और हरवीर सिंह गुलिया जैसे नाम शामिल हैं, जिनके बारे में दावा किया जाता है कि उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 40,000 की सेना संगठित की और तैमूर-ए-लंग को हराया—यहाँ तक कि यह भी कहा जाता है कि हरवीर सिंह गुलिया द्वारा दिए गए घावों से तैमूर की मृत्यु हुई। इस दावे को पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी सार्वजनिक रूप से दोहराया था। जब ऑल्ट -न्यूज़ ने इस पर ऐतिहासिक प्रमाण मांगे, तो इतिहासकार हेरम्ब चतुर्वेदी ने इसे “पूरी तरह बेतुका” बताया।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जमींदार जातियों के बीच इस तरह की “वीरता की कहानियों” के निर्माण और दलितों के खिलाफ बढ़ती हिंसा के बीच संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ये कथाएँ ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था के भीतर एक कृत्रिम जातीय श्रेष्ठता का भाव पैदा करती हैं, जो असली सामाजिक असमानताओं से ध्यान हटाती हैं और फुले-आंबेडकरवादी राजनीति द्वारा बनी एकजुटता को कमजोर करती हैं।
अमीरों के लिए विकास, गरीबों के लिए प्रतीकात्मक गर्व — और मुस्लिम अतीत का मिटाया जाना
हिंदुत्व द्वारा गढ़ा गया इतिहास अब तेजी से स्टेट इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से भी सामने आ रहा है। पिछले वर्ष जुलाई में, योगी आदित्यनाथ ने बहराइच में "राजा सुहेलदेव राजभर" की 40 फीट ऊँची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया। द कारवां ने दिखाया है कि किस तरह भाजपा और हिंदू युवा वाहिनी ने सुहेलदेव की विरासत के जरिए राजभर ओबीसी समुदाय को संगठित किया, जिसे अमिश त्रिपाठी के उपन्यास "लीजेंड ऑफ़ सुहेलदेव" (2020) ने और लोकप्रिय बनाया।
हालाँकि, संघ परिवार का सुहेलदेव से जुड़ाव इससे भी पुराना है। 2003 में तुलसी पीठ के महंत रामभद्राचार्य ने तुलसी दोहा शतक नामक एक संदिग्ध ग्रंथ को प्रस्तुत किया जिसमें राममंदिर विध्वंस की कहानी का ज़िक्र था , जिसे बाद में नामवर सिंह ने खारिज किया । गहरवार या कलचुरी वंश—जो उस क्षेत्र में प्रभावी थे—के किसी भी 11वीं सदी के शिलालेख में सुहेलदेव नाम के किसी शासक का उल्लेख नहीं मिलता। सुहेलदेव का पहला जिक्र 17वीं सदी के मीरात-ए-सिकंदरी में मिलता है, जहाँ उन्हें एक दयालु राजा नहीं, बल्कि एक दमनकारी हिंदू शासक के रूप में दिखाया गया है। इस तरह, एक काल्पनिक या संदिग्ध चरित्र को बाद की कथाओं में “ऐतिहासिक” राजभर राजा के रूप में पेश किया गया, ताकि ओबीसी समुदायों को जाटव-नेतृत्व वाली बहुजन राजनीति से दूर किया जा सके।
ऐसी प्रक्रियाएँ अन्य जगहों पर भी दिखाई देती हैं। 2000 में इंडिया पोस्ट ने महाराजा बिजली पासी के नाम पर डाक टिकट जारी किया, जिसमें उन्हें गलत तरीके से पृथ्वीराज चौहान का समकालीन बताया गया। प्रो. बद्री नारायण ने अपनी पुस्तक "इन्वेंटिंग कास्ट हिस्ट्री" में ऐसे निर्माणों का विश्लेषण किया है। हाल ही में, योगी सरकार ने निहालगढ़ रेलवे स्टेशन—जिसका नाम भाले सुल्तान प्रमुख निहाल खान के नाम पर था—का नाम बदलकर महाराजा बिजली पासी स्टेशन कर दिया।
लखनऊ की स्थापना को भी आधिकारिक कथाओं में कभी रामायण के लक्ष्मण, कभी लखन अहीर, तो कभी लखन पासी से जोड़ा जाता है। सुनीता सिन्हा के अनुसार, भाजपा द्वारा “जातीय शाही इतिहासों” का गाढ़ना बसपा के आंबेडकर पार्कों के जवाब में उभरा है, जहाँ सामाजिक मुक्ति की राजनीति की जगह प्रतीकात्मक गौरव को बढ़ावा दिया जाता है। इस तरह के प्रयासों को आरएसएस नेतृत्व का भी समर्थन मिलता रहा है, जिन्होंने विजय सोनकर शास्त्री जैसे लेखकों के कार्यों को खुलकर प्रोत्साहित किया है।
ये कथात्मक हस्तक्षेप केवल वैचारिक नहीं हैं, बल्कि संरक्षकता (patronage) और प्रकाशन के उन नेटवर्क से भी जुड़े हैं, जिन पर ऐतिहासिक रूप से व्यापारी पूंजी का प्रभुत्व रहा है। यही नेटवर्क तय करते हैं कि किन इतिहासों को प्रमुखता मिलेगी और किन पहचानों को महिमामंडित किया जाएगा।
क्षत्रियकरण: आर्य समाज से आरएसएस तक
1907 में ही डेंजिल इबेटसन ने आर्य समाज पर लिखा था कि यह एक ऐसा धार्मिक संगठन है, जिसका मूल उद्द्देश्य धर्म की आड़ में राजनीति करना है । यह मुख्यतः मध्यमवर्गीय ब्राह्मणों और शहरी व्यापारी जातियों के साझा हितों पर आधारित था और इसका उद्देश्य उन ग्रामीण जमींदार समुदायों - जिनके लोग हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में सहयोगात्मक रूप से अस्तित्व रखते थे - को इस ब्राह्मण-बनिया वर्ग के हितों के अनुसार इंजिनियर करना था , । जहाँ एक ओर इन किसान जातियों की स्थापित हिंदू–मुस्लिम एकजुटता कमजोर हुई, वहीं दूसरी ओर हिंदू ग्रामीण जातियों को भी “क्षत्रिय बनाय जाने का लालच दिया जाने लगा ”, जिससे इन जातियों में आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ी — यह एक ऐसा प्रोजेक्ट था जो आर्य समाज को आरएसएस से विरासत में मिली और आरएसएस ने उसे आगे बढ़ाया।
मार्च 1998 में हंस पत्रिका में लिखते हुए सांस्कृतिक आलोचक राजेंद्र यादव ने सामाजिक विश्लेषण किया था कि जमींदार ओबीसी जातियाँ वर्ण व्यवस्था को खत्म करने के बजाय उसमें “क्षत्रिय” दर्जा पाना चाहती हैं और एक क्षत्रिय इतिहास प्राप्त करना चाहती हैं , जो दलित-बहुजन राजनीति से बिलकुल भिन्न है । अतः ब्राह्मण-बनिया बौद्धिक वर्ग के लिए “क्षत्रिय इतिहास” एक ऐसा प्रतीकात्मक संसाधन बन जाता है, जिसे वे जमींदार ओबीसी समूहों को “गिफ्ट” में देकर ब्राह्मणवादी संस्थागत प्रभुत्व और बनिया पूंजीवादी वर्चस्व को बनाय रखने में इन जातियों का सहयोग प्राप्त कर सकते हैं।
क्षत्रियकरण की प्रक्रिया में विभिन्न जातियों को पौराणिक पात्रों से जोड़ना या उन्हें पीछे जाकर राजपूत इतिहास और व्यक्तित्वों से जोड़ देना शामिल रहा है। सदियों तक ब्राह्मण और बनिया समुदाय हिंदू पौराणिक और ऐतिहासिक आख्यानों के प्रमुख संरक्षक रहे—यह भूमिका उन्हें विभिन्न राजसत्ताओं (चाहे वे राजपूत, मुगल, मराठा, अफगान या जाट हों) की दरबारी व्यवस्थाओ में पीढ़ी दर पीढ़ी उच्च-अधिकारी बने रहने से मिली।
रियासतों के विघटन और राजपूत समाज के संस्थागत कमजोर होने के बाद, ब्राह्मण–बनिया बौद्धिक वर्ग निर्णायक रूप से राजपूत इतिहास और पहचान का गेटकीपर अर्थात 'नियंत्रण करने वाले' बन गए । इस ऐतिहासिक नियंत्रण ने उन्हें सार्वजनिक विमर्श में कम-से-कम दो महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक शक्तियाँ प्रदान कीं।
पहला, राजपूत इतिहास की चयनात्मक व्याख्या और मनचाहे उदाहरणों के जरिए वे एक साथ मुसलमानों को बदनाम और राजपूतों को इतिहास में मुस्लिम का साथ देने के लिए शर्मिंदा भी कर सकते थे—जिससे उन पर “धर्म-रक्षक ” का स्थायी दबाव डालकर उन्हें मुस्लिम समुदाय से दूर किया जा सके और आरएसएस का फुटसोल्जर बनाया जा सके।
दूसरा, इसी नियंत्रण के जरिए राजपूतों का सैन्य इतिहास और राजवंशों की पहचान अन्य प्रभावशाली ओबीसी जातियों—जैसे जाट और गुज्जर—को दी जाती है, ताकि मुसलमानों और राजपूतों के खिलाफ ये जातियां माहौल बनाने का कार्य करें , जिससे ब्राह्मण-संस्थागत प्रभुत्व और बनिया-पूंजीवादी प्रभुत्व को लोकविमर्श से गायब रखा जा सके।
उदाहरण के तौर पर, राजस्थान में झुंझार सिंह नेहरा जैसे काल्पनिक पात्र को झुंझुनूं शहर का संस्थापक स्थापित करके भाजपा सरकार ने झुंझुनू के मूल संस्थापक नवाब मोहम्मद खान की ऐतिहासिक भूमिका को मिटाने का कार्य किया । इसी तरह, चूरू की स्थापना को चूहड़ू जाट से जोड़ा गया जिसके भी समकालीन स्त्रोत नहीं मिलते। इस तरह क्षेत्रीय मुस्लिम समुदाय के लोकइतिहास को मिटाकर उन्हें सामाजिक रूप से दरकिनार करने का प्रयास किया जाता आया है । हाल ही में राजस्थान के गोगामेड़ी स्थल पर जो घटनाएँ हुईं, वे इसी प्रवृत्ति का उदाहरण हैं।
इसी तरह, एक संगोष्ठी में दक्षिणपंथी इतिहासकार कपिल कपूर ने सम्राट हर्ष को जाट बताया, और हिंदुत्व से जुड़े लेखक अक्सर सिकंदर के समकालीन हुए राजा पोरस और मध्य भारत के छठी सदी के शासक यशोधर्मन को जाट के रूप में प्रस्तुत करते आय हैं—यह आर्य समाज की वैदिक 'क्षत्रियकरण' रणनीतियों की ही पुनरावृत्ति है।
सबसे विवादास्पद दावे गुज्जरों को लेकर हैं। उन्हें “क्षत्रिय” बनाने के लिया या तो यह प्रचारित किया जाता है कि राजपूतों की उत्पत्ति गुज्जरों से है या यह प्रचारित किया जाता है कि पूर्वमध्यकालीन राजपूत राजवंश गुज्जर जाति से थे । 1997 में एनएच-24 का नाम बदलकर “गुज्जर सम्राट मिहिर भोज मार्ग” रखा गया और 2010 में अक्षरधाम में स्थापित एक प्रतिमा में मिहिर भोज को “गुज्जर सम्राट” बताया गया। दक्षिणपंथी स्कॉलर मीनाक्षी जैन और पुरातत्वविद् के.के. मोहम्मद ने भी ऐसे दावों का समर्थन किया, जबकि प्रो. शांतरानी शर्मा ने Indian Historical Review में तथ्यों के साथ इन्हें खारिज किया था ।
Fractured Forest, Quartzite City में थॉमस क्रॉले लिखते हैं कि हिंदुत्ववादी लेखकों ने गुज्जर इतिहास को “बाद में गढ़कर एक गौरवशाली (भले ही अंततः असफल) संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया है।” वहीं, फ्रैंक चार्ल्स स्पॉल्डिंग ने अपने शोध में यह बताया कि “गुज्जरों के बीच ऐसे किसी मध्यकालीन राज्य या उससे अपने संबंध की कोई लिखित या मौखिक परंपरा नहीं मिलती” (पृष्ठ 74), जो उन्हें इन पूर्वमध्यकालीन राजवंशों से जोड़ता हो । आर्य समाज से शुरू होकर आरएसएस द्वारा आगे बढ़ाए गए जाट और गुज्जर समुदायों के बीच ये प्रतिस्पर्धी दावे, सबाल्टर्न समुदायों को सशक्त करने के बजाय, कृषि समाज की एकता को तोड़ती हैं।
निष्कर्ष
हिंदुत्व का ऐतिहासिक पुनर्लेखन जहाँ एक ओर मुस्लिम-विरोधी ध्रुवीकरण को बढ़ावा देता है, वहीं यह हिंदू समाज को नियंत्रित करने का भी एक साधन बन जाता है—दलित-बहुजन आंदोलनों का कमज़ोर करने, कृषि समाज की एकजुटता को तोड़ने और शासन की जगह प्रतीकात्मक राजनीति को स्थापित करने के लिए।
इतिहास का यह निर्माण अब नीतिगत विफलताओं को छिपाने का एक वैचारिक सहारा बन चुका है, जो जातीय और साम्प्रदायिक विभाजनों को गहरा करता है और ऐतिहासिक समझ को खोखला करता जाता है। इस प्रक्रिया में इतिहास, अतीत को समझने का माध्यम न रहकर, नियंत्रण, प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक भटकाव का एक उपकरण बन जाता है।
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