जवाबों के बजाय वॉटर कैनन: बिहार का भर्ती संकट और राज्य का प्रदर्शन पर दमन

Written by sabrang india | Published on: August 27, 2026
भर्ती और परीक्षा सुधारों को लेकर हफ्तों से चल रहे आंदोलन ने पटना में हिंसक झड़पों का रूप ले लिया, जिसमें जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग, गैर-कानूनी हिरासत और हिरासत में दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप लगे।


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पटना की सड़कों पर 25 अगस्त को एक बार फिर बिहार के छात्रों और सरकार के बीच टकराव हुआ। यह टकराव तब हुआ जब नौकरी के लिए प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों उम्मीदवार मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के आवास की ओर बढ़े। भर्ती परीक्षाओं को लेकर शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन झड़पों, बैरिकेड तोड़ने, वॉटर-कैनन के इस्तेमाल, लाठीचार्ज और हिरासत में लिए जाने की घटनाओं में बदल गया।

लेकिन इन घटनाओं को सिर्फ़ "छात्र बनाम पुलिस" की कहानी मान लेना बड़े संकट को नजरअंदाज करना होगा। यह विरोध प्रदर्शन भर्ती में देरी, परीक्षा में गड़बड़ी, कथित पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं के बदलते पैटर्न और राज्य की भर्ती प्रक्रिया पर भरोसे की कमी जैसी गहरी और पुरानी शिकायतों का नतीजा है।

इसलिए, 25 अगस्त को हुई हिंसा कानून-व्यवस्था से जुड़ी कोई अलग-थलग घटना नहीं है। यह उस विरोध प्रदर्शन का ताजा घटनाक्रम है जो हफ्तों से चल रहा था और जिसमें सरकारी ताकत के जरूरत से ज्यादा और गलत इस्तेमाल के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं।

नौकरियों, परीक्षाओं और उस सिस्टम के खिलाफ विरोध जिस पर छात्रों को अब भरोसा नहीं रहा

छात्र 18 अगस्त से पटना के गर्दनीबाग में धरना दे रहे हैं। एक दर्जन से ज्यादा छात्र और युवा संगठन इस आंदोलन में शामिल हुए हैं, जिनकी मांगें बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC), बिहार कर्मचारी चयन आयोग (BSSC), शिक्षक भर्ती और अन्य सरकारी परीक्षाओं से जुड़ी हैं।

इस विवाद के केंद्र में चौथी शिक्षक भर्ती परीक्षा, यानी TRE-4 है। छात्र चाहते हैं कि परीक्षा प्रस्तावित प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के पैटर्न के बजाय एक ही चरण में आयोजित की जाए। वे नेगेटिव मार्किंग हटाने, भर्ती परीक्षाओं में ज्यादा पारदर्शिता लाने और सरकारी नौकरियों व शिक्षक नियुक्तियों में 100% डोमिसाइल (मूल निवासी) आधारित भर्ती की भी मांग कर रहे हैं।

भर्ती के मौकों का दायरा काफी बड़ा है। BPSC ने घोषणा की है कि TRE-4 के तहत 32,388 शिक्षण पद भरे जाएंगे। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, प्रस्तावित परीक्षा दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 में होने की उम्मीद है, जिसके लिए आवेदन 1 सितंबर से 30 सितंबर के बीच लिए जाएंगे। छात्रों ने कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के कारण 70वीं BPSC परीक्षा को रद्द करने की भी मांग की है। BPSC ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि ऑनलाइन फैलाया गया मटीरियल नकली था। इसने हिंदी-मीडियम वाले उम्मीदवारों के साथ भेदभाव के आरोपों से भी इनकार किया है।

प्रदर्शनकारी विकास भट्ट ने मीडिया से बात करते हुए लाइब्रेरियन जैसे पदों पर भर्ती में होने वाली लंबी देरी और कई भर्ती संस्थाओं के लिए रेगुलर परीक्षा कैलेंडर न होने की ओर इशारा किया। 'द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' ने उनके इस आरोप की खबर दी कि BSSC के जरिए घोषित कुछ भर्ती प्रक्रियाएं सालों से अटकी हुई हैं। इसलिए, बिहार सरकार के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि क्या छात्र उसके भरोसे को मानने को तैयार हैं। सवाल यह है कि क्या राज्य ने उन्हें उन भरोसे पर यकीन करने की ठोस वजह दी है।

25 अगस्त का टकराव

'द इंडियन एक्सप्रेस' के मुताबिक, 25 अगस्त को 17 छात्र संगठनों के समर्थन से 1,500 से ज्यादा छात्रों ने गांधी मैदान के पास जेपी गोलंबर से मुख्यमंत्री आवास का "घेराव" करने के लिए मार्च निकाला। प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए पुलिस ने डाक बंगला चौक पर बैरिकेड लगाए थे। छात्रों ने बैरिकेड तोड़ दिए, जिससे पुलिस के साथ टकराव हुआ। राज्य ने वॉटर कैनन और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया। कई छात्रों को हिरासत में लिया गया। 'द टेलीग्राफ' के मुताबिक, टकराव में दो पुलिसकर्मी भी घायल हुए; रिपोर्ट में कहा गया है कि करीब 25 छात्रों को हिरासत में लिया गया और बाद में बिना किसी औपचारिक आरोप के छोड़ दिया गया।

दूसरी रिपोर्टों में कहा गया कि छात्रों ने पत्थर फेंके और एक पुलिस अधिकारी व एक महिला कॉन्स्टेबल घायल हो गए। हिंसा को नजरअंदाज या माफ नहीं किया जा सकता: जो प्रदर्शनकारी पुलिसकर्मियों पर हमला करते हैं या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं, उन्हें कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। लेकिन इससे राज्य की प्रतिक्रिया का सवाल हल नहीं होता।

कोई लोकतांत्रिक सरकार सिर्फ इसलिए असीमित अधिकार हासिल नहीं कर लेती कि कोई विरोध प्रदर्शन बेकाबू हो गया है। बल का प्रयोग कानूनी, जरूरी और जरूरत के हिसाब से होना चाहिए। बैरिकेड और प्रतिबंधित इलाके की मौजूदगी से ही हर प्रदर्शनकारी छात्र ऐसा खतरा नहीं बन जाता जिसके लिए जबरदस्ती वाली प्रतिक्रिया की जरूरत हो।

पटना की तस्वीरें- जिसमें छात्र पुलिसकर्मियों और वॉटर कैनन का सामना कर रहे हैं - खास तौर पर चौंकाने वाली हैं क्योंकि प्रदर्शनकारी संवैधानिक व्यवस्था को पलटने की मांग नहीं कर रहे थे। वे नौकरी, भर्ती की तारीखों, परीक्षा में सुधार और जवाबदेही की मांग कर रहे थे।


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जब सरकार की भाषा अपमानजनक हो जाती है

इस टकराव से पहले एक और विवाद हुआ था, जिससे प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच बढ़ती दूरी का पता चला। BPSC परीक्षा नियंत्रक राजेश कुमार सिंह ने आंदोलन के बारे में सवालों का जवाब देते हुए हिंदी कहावत का इस्तेमाल किया: "हाथी चले बाजार, कुत्ता भौंके हजार।" प्रदर्शनकारियों ने इस टिप्पणी का मतलब यह निकाला कि उनकी तुलना भौंकने वाले कुत्तों से की जा रही है।

बाद में सिंह ने खेद व्यक्त किया और कहा कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया था। लेकिन 'द न्यू इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, विवाद के बाद बिहार सरकार ने उन्हें सस्पेंड कर दिया। यह सस्पेंशन महत्वपूर्ण है। कड़ी सार्वजनिक जांच के दायरे में आने वाली परीक्षा प्रणाली के लिए जिम्मेदार अधिकारी प्रदर्शनकारी उम्मीदवारों के बारे में ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं कर सकता जिसे उचित रूप से अपमानजनक या नीचा दिखाने वाला माना जा सके। भले ही कहावत का इस्तेमाल शाब्दिक अर्थ में न किया गया हो, लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए भाषा का चयन बेहद असंवेदनशील था। यहां एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक सिद्धांत है: विरोध को संभालने की कोशिश करने से पहले सरकार को नागरिकों को अमानवीय नहीं समझना चाहिए। छात्र कोई ऐसी परेशानी नहीं हैं जिन्हें तब तक नजरअंदाज किया जाए जब तक कि बैरिकेड्स लगाने की नौबत न आ जाए। वे ऐसे नागरिक हैं जो उन संस्थानों के खिलाफ शिकायतें उठा रहे हैं जिनका उनके भविष्य पर बहुत अधिक नियंत्रण है।

अगस्त के विरोध प्रदर्शनों के पीछे एक बहुत ही गंभीर कहानी है

बिहार में पुलिस के व्यवहार को लेकर लगाए गए आरोप 25 अगस्त को हुई घटनाओं से कहीं आगे तक जाते हैं। 'पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' (PUCL) की बिहार इकाई द्वारा 22 अगस्त को बुलाई गई एक जनसुनवाई में 21 जुलाई से 27 जुलाई के बीच विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई से जुड़े बयान दर्ज किए गए।

'काउंटरव्यू' द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई में 19 प्रत्यक्ष बयान और आरोप दर्ज किए गए, जिनमें शारीरिक हमला, गैर-कानूनी हिरासत, हिरासत में यातना, घरों पर छापेमारी, महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ यौन हिंसा और अन्य प्रकार की डराने-धमकाने की घटनाएं शामिल थीं। ये आरोप प्रदर्शनकारियों और कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए थे और इन्हें स्थापित न्यायिक निष्कर्ष मानने के बजाय स्वतंत्र रूप से जांचा जाना चाहिए। ये आरोप बेहद परेशान करने वाले हैं। खबरों के अनुसार, PUCL की जनसुनवाई में लक्षित लाठीचार्ज, पुलिस फायरिंग, हथियारों के इस्तेमाल, हिरासत में दुर्व्यवहार और गिरफ्तारी व हिरासत के दौरान नियमों के उल्लंघन के दावे दर्ज किए गए। कुछ बयानों में यह भी आरोप लगाया गया कि महिलाओं के साथ महिलाओं के प्रति नफरत भरी अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया और शारीरिक हमला किया गया।

घरों पर छापेमारी को लेकर भी आरोप लगाए गए। सुनवाई की रिपोर्ट के अनुसार, परिवारों ने दावा किया कि पुलिस रात में घरों में घुसी, निवासियों के साथ मारपीट की, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और महिलाओं के साथ अपमानजनक व्यवहार किया। ये ऐसे आरोप नहीं हैं जिन्हें कोई लोकतांत्रिक सरकार बस पुलिस की कार्रवाई में होने वाली आम ज्यादती कहकर खारिज कर दे। अगर इन दावों का एक छोटा सा हिस्सा भी सच है, तो मामला "भीड़ को काबू करने" से कहीं आगे का है। यह पुलिस की ताकत के सिस्टमैटिक गलत इस्तेमाल का सवाल बन जाता है। PUCL की सुनवाई में मुसलमानों, अनुसूचित जाति के लोगों, महिलाओं और CPI(ML) से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार के आरोप भी सामने आए। साथ ही, नाबालिगों को कानूनी तौर पर तय समय के भीतर सही अधिकारियों के सामने पेश किए बिना हिरासत में रखने के आरोप भी लगे। इन दावों की स्वतंत्र जांच की जरूरत है और अगर ये सही साबित होते हैं, तो कानूनी कार्रवाई और संस्थागत जवाबदेही तय होनी चाहिए।

वकील भी कथित तौर पर निशाने पर आए

शायद सबसे चिंताजनक आरोप उन लोगों से जुड़े हैं जो प्रदर्शनकारियों को कानूनी मदद देने की कोशिश कर रहे थे। PUCL की जन-सुनवाई की रिपोर्ट के मुताबिक, PUCL के दो वकील-सदस्य, जो हिरासत में लिए गए प्रदर्शनकारियों को मुफ्त कानूनी मदद दे रहे थे, उन्हें खुद कथित तौर पर हिरासत में ले लिया गया और शराब पीने व पुलिस के काम में बाधा डालने जैसे आरोपों में केस दर्ज किया गया। खबर है कि उन्हें हथकड़ी पहनाई गई और सबके सामने घुमाया गया।

अगर स्वतंत्र जांच में ऐसी बातें सच साबित होती हैं, तो यह कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार और आपराधिक न्याय प्रणाली के कामकाज पर गहरी चोट होगी। गिरफ्तार प्रदर्शनकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों को सिर्फ इसलिए प्रदर्शन आंदोलन का हिस्सा नहीं माना जा सकता क्योंकि वे कानूनी मदद दे रहे हैं। जो राज्य कानूनी मदद देने वालों को डराता-धमकाता है, वह न्याय तक पहुंच को ही प्रदर्शन से जुड़ी पुलिस कार्रवाई का शिकार बना सकता है।

इसलिए, PUCL ने 21 जुलाई से 27 जुलाई के बीच पुलिस की कार्रवाई की स्वतंत्र जांच की मांग की है। इसमें गैर-कानूनी हिरासत, हिरासत में यातना, हथियारों का इस्तेमाल और अपने वकील-सदस्यों को कथित तौर पर निशाना बनाने जैसे आरोप शामिल हैं। इसने प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज 64 FIR वापस लेने और सिवान में फायरिंग में घायल हुए लोगों को मुआवजा देने की भी मांग की है। इन मांगों को महज राजनीतिक बयानबाजी कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इनके लिए निष्पक्ष जांच की जरूरत है जिससे यह पता चल सके कि असल में क्या हुआ था।

विस्तृत रिपोर्ट यहां पढ़ी जा सकती है।

सरकार संस्थागत विफलता का जवाब पुलिस की ताकत से नहीं दे सकती।

बिहार में मुख्य विरोधाभास को नजरअंदाज करना मुश्किल है। छात्र इसलिए विरोध कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि भर्ती प्रक्रियाएं भरोसेमंद नहीं हैं। सरकार का जवाब यह रहा है कि उनकी चिंताओं का समाधान कर दिया गया है, जबकि साथ ही उन्हें मार्च करने से रोकने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

25 अगस्त को सरकार ने 'विद्यार्थी सहयोग शिविर' शुरू करने की घोषणा की - ये शिविर हर महीने के चौथे मंगलवार को आयोजित किए जाएंगे - साथ ही एक ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और हेल्पलाइन नंबर 1100 भी शुरू किया जाएगा। इसका मकसद छात्रों को अपनी शिकायतें सीधे सरकारी अधिकारियों के सामने रखने का मौका देना है। बातचीत का स्वागत है। लेकिन शिकायत निवारण की व्यवस्था ठोस जवाबदेही का विकल्प नहीं बन सकती।

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