संगरूर में 5 दिन से धरने पर बैठे परिजनों को हटाया, पुलिस ने बिना सहमति कराया दलित युवक का अंतिम संस्कार; AAP सरपंच पर उत्पीड़न के आरोप

फोटो साभार : द मूकनायक
संगरूर सिविल अस्पताल में गुरुवार को 23 वर्षीय दलित युवक की आत्महत्या के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे हैं। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें मोर्चरी के बाहर से जबरन हटा दिया और उनकी गैरमौजूदगी में ही शव का पोस्टमार्टम कराकर अंतिम संस्कार भी करवा दिया।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, मृतक की पहचान कनोई गांव निवासी और पेशे से राजमिस्त्री सनमदीप सिंह के रूप में हुई है। सनमदीप ने 25 सितंबर को जहर खा लिया था, जिसके एक दिन बाद 26 सितंबर को उसकी मौत हो गई। न्याय की मांग को लेकर परिवार ने पिछले पांच दिनों से शव को अस्पताल की मोर्चरी में रखा हुआ था। वे अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे और आम आदमी पार्टी (आप) से जुड़े गांव के सरपंच और उसके साथियों की गिरफ्तारी होने तक पोस्टमार्टम या शव लेने से साफ इनकार कर रहे थे।
सनमदीप के चाचा गोरा सिंह ने प्रशासन और गांव के सरपंच पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि सनमदीप की शिकायत के आधार पर वर्ष 2019 में सरपंच के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। गोरा सिंह का आरोप है कि इसी मामले को वापस लेने का दबाव बनाने के लिए करीब पांच महीने पहले उनके परिवार के सात सदस्यों के खिलाफ भी कथित तौर पर झूठी एफआईआर दर्ज करवा दी गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद से सनमदीप को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। गोरा सिंह के मुताबिक, गांव में सीवर लाइन बिछाने के दौरान जानबूझकर उनके परिवार के चार घरों को छोड़ दिया गया। इसके अलावा, सनमदीप को मनरेगा के तहत काम भी नहीं दिया गया।
गुरुवार दोपहर स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई, जब पुलिस और प्रशासन की टीम मोर्चरी के प्रवेश द्वार को खाली कराने पहुंची। परिजनों का आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने उनके साथ कथित तौर पर बर्बरता की। परिवार के मुताबिक, सनमदीप की मां और दादी को घसीटकर पुलिस वैन में बैठाया गया। इसके बाद परिजनों की सहमति के बिना ही शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
गोरा सिंह के मुताबिक, परिवार और ग्रामीण शांतिपूर्ण तरीके से न्याय तथा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग कर रहे थे। उनका आरोप है कि पुलिस ने अपने आश्वासन से पीछे हटते हुए बल प्रयोग किया और महिलाओं के साथ भी हाथापाई की। उन्होंने दावा किया कि पुलिस ने नगर निगम के कर्मचारियों के साथ मिलकर परिजनों की गैरमौजूदगी में गुपचुप तरीके से शव का अंतिम संस्कार कर दिया।
गोरा सिंह का यह भी आरोप है कि पूरे गांव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था और बड़ी संख्या में सुरक्षाबल तैनात किए गए, जिससे ग्रामीणों में भय का माहौल पैदा हो गया।
हंगामे के बीच पुलिस ने सुनाम से कांग्रेस पदाधिकारी राजिंदर सिंह दीपा समेत चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, इन लोगों पर पुलिसकर्मियों के साथ कथित मारपीट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप हैं। सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
इसके अलावा, पुलिस ने सनमदीप के परिवार के आठ सदस्यों समेत चार अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया। हालांकि, पुलिस के अनुसार इन लोगों के खिलाफ अभी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
पुलिस की ओर से संगरूर के डीएसपी दलबीर सिंह सिद्धू ने पूरी कार्रवाई का बचाव किया है। उनका कहना है कि शव की हालत लगातार बिगड़ रही थी और उसमें सड़न शुरू हो गई थी। इसी वजह से प्रशासन को अंतिम संस्कार कराने का निर्णय लेना पड़ा। उनके मुताबिक, सीनियर मेडिकल ऑफिसर की ओर से कई नोटिस जारी कर परिवार को शव की तेजी से बिगड़ती स्थिति के बारे में चेतावनी दी गई थी।
पुलिस का कहना है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 301 के तहत शव का अपमान करना या उसे ऐसी स्थिति में छोड़ना, जिससे उसकी गरिमा प्रभावित हो, अपराध की श्रेणी में आता है। डीएसपी के अनुसार, कार्यकारी मजिस्ट्रेट-सह-तहसीलदार जगदीप सिंह और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने परिवार को कई बार नोटिस दिए, लेकिन परिवार ने कथित तौर पर उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया। पुलिस ने इसके पीछे राजनीतिक उकसावे को कारण बताया है।
रिपोर्ट के अनुसार, डीएसपी सिद्धू ने स्पष्ट किया कि सनमदीप के पिता की शिकायत पर संगरूर सदर पुलिस स्टेशन में 28 सितंबर को ही सरपंच, उसके भाई, एक पूर्व पंचायत सदस्य और एक महिला के खिलाफ बीएनएस की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 3(5) के तहत एफआईआर दर्ज की जा चुकी थी। इसके बावजूद दीपा और अन्य बाहरी तत्वों ने राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए परिवार को मोहरा बनाया और पोस्टमार्टम से पहले मनमानी गिरफ्तारियों की जिद पर अड़े रहे।
पुलिस के अनुसार, जब उन्होंने कानूनी प्रक्रिया शुरू की तो प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए, उन्होंने गालियां दीं, बसों के शीशे तोड़ दिए और अधिकारियों पर हमला किया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा। अंततः तीन चिकित्सा अधिकारियों के एक बोर्ड ने पोस्टमार्टम किया और उभावाल रोड स्थित श्मशान घाट पर नगर निगम अधिकारियों और कुछ पंचायत प्रतिनिधियों की मौजूदगी में युवक का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
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फोटो साभार : द मूकनायक
संगरूर सिविल अस्पताल में गुरुवार को 23 वर्षीय दलित युवक की आत्महत्या के मामले में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे हैं। परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने उन्हें मोर्चरी के बाहर से जबरन हटा दिया और उनकी गैरमौजूदगी में ही शव का पोस्टमार्टम कराकर अंतिम संस्कार भी करवा दिया।
द मूकनायक की रिपोर्ट के अनुसार, मृतक की पहचान कनोई गांव निवासी और पेशे से राजमिस्त्री सनमदीप सिंह के रूप में हुई है। सनमदीप ने 25 सितंबर को जहर खा लिया था, जिसके एक दिन बाद 26 सितंबर को उसकी मौत हो गई। न्याय की मांग को लेकर परिवार ने पिछले पांच दिनों से शव को अस्पताल की मोर्चरी में रखा हुआ था। वे अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे और आम आदमी पार्टी (आप) से जुड़े गांव के सरपंच और उसके साथियों की गिरफ्तारी होने तक पोस्टमार्टम या शव लेने से साफ इनकार कर रहे थे।
सनमदीप के चाचा गोरा सिंह ने प्रशासन और गांव के सरपंच पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि सनमदीप की शिकायत के आधार पर वर्ष 2019 में सरपंच के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। गोरा सिंह का आरोप है कि इसी मामले को वापस लेने का दबाव बनाने के लिए करीब पांच महीने पहले उनके परिवार के सात सदस्यों के खिलाफ भी कथित तौर पर झूठी एफआईआर दर्ज करवा दी गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि इसके बाद से सनमदीप को लगातार मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। गोरा सिंह के मुताबिक, गांव में सीवर लाइन बिछाने के दौरान जानबूझकर उनके परिवार के चार घरों को छोड़ दिया गया। इसके अलावा, सनमदीप को मनरेगा के तहत काम भी नहीं दिया गया।
गुरुवार दोपहर स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई, जब पुलिस और प्रशासन की टीम मोर्चरी के प्रवेश द्वार को खाली कराने पहुंची। परिजनों का आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने उनके साथ कथित तौर पर बर्बरता की। परिवार के मुताबिक, सनमदीप की मां और दादी को घसीटकर पुलिस वैन में बैठाया गया। इसके बाद परिजनों की सहमति के बिना ही शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
गोरा सिंह के मुताबिक, परिवार और ग्रामीण शांतिपूर्ण तरीके से न्याय तथा एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग कर रहे थे। उनका आरोप है कि पुलिस ने अपने आश्वासन से पीछे हटते हुए बल प्रयोग किया और महिलाओं के साथ भी हाथापाई की। उन्होंने दावा किया कि पुलिस ने नगर निगम के कर्मचारियों के साथ मिलकर परिजनों की गैरमौजूदगी में गुपचुप तरीके से शव का अंतिम संस्कार कर दिया।
गोरा सिंह का यह भी आरोप है कि पूरे गांव को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था और बड़ी संख्या में सुरक्षाबल तैनात किए गए, जिससे ग्रामीणों में भय का माहौल पैदा हो गया।
हंगामे के बीच पुलिस ने सुनाम से कांग्रेस पदाधिकारी राजिंदर सिंह दीपा समेत चार लोगों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस के मुताबिक, इन लोगों पर पुलिसकर्मियों के साथ कथित मारपीट, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप हैं। सभी आरोपियों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
इसके अलावा, पुलिस ने सनमदीप के परिवार के आठ सदस्यों समेत चार अन्य लोगों को भी हिरासत में लिया। हालांकि, पुलिस के अनुसार इन लोगों के खिलाफ अभी कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है।
पुलिस की ओर से संगरूर के डीएसपी दलबीर सिंह सिद्धू ने पूरी कार्रवाई का बचाव किया है। उनका कहना है कि शव की हालत लगातार बिगड़ रही थी और उसमें सड़न शुरू हो गई थी। इसी वजह से प्रशासन को अंतिम संस्कार कराने का निर्णय लेना पड़ा। उनके मुताबिक, सीनियर मेडिकल ऑफिसर की ओर से कई नोटिस जारी कर परिवार को शव की तेजी से बिगड़ती स्थिति के बारे में चेतावनी दी गई थी।
पुलिस का कहना है कि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 301 के तहत शव का अपमान करना या उसे ऐसी स्थिति में छोड़ना, जिससे उसकी गरिमा प्रभावित हो, अपराध की श्रेणी में आता है। डीएसपी के अनुसार, कार्यकारी मजिस्ट्रेट-सह-तहसीलदार जगदीप सिंह और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने परिवार को कई बार नोटिस दिए, लेकिन परिवार ने कथित तौर पर उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया। पुलिस ने इसके पीछे राजनीतिक उकसावे को कारण बताया है।
रिपोर्ट के अनुसार, डीएसपी सिद्धू ने स्पष्ट किया कि सनमदीप के पिता की शिकायत पर संगरूर सदर पुलिस स्टेशन में 28 सितंबर को ही सरपंच, उसके भाई, एक पूर्व पंचायत सदस्य और एक महिला के खिलाफ बीएनएस की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) और 3(5) के तहत एफआईआर दर्ज की जा चुकी थी। इसके बावजूद दीपा और अन्य बाहरी तत्वों ने राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए परिवार को मोहरा बनाया और पोस्टमार्टम से पहले मनमानी गिरफ्तारियों की जिद पर अड़े रहे।
पुलिस के अनुसार, जब उन्होंने कानूनी प्रक्रिया शुरू की तो प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए, उन्होंने गालियां दीं, बसों के शीशे तोड़ दिए और अधिकारियों पर हमला किया। भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हल्का बल प्रयोग करना पड़ा। अंततः तीन चिकित्सा अधिकारियों के एक बोर्ड ने पोस्टमार्टम किया और उभावाल रोड स्थित श्मशान घाट पर नगर निगम अधिकारियों और कुछ पंचायत प्रतिनिधियों की मौजूदगी में युवक का अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
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