कर्नाटक में महामारी और लॉकडाउन के दौरान, 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (2013)' [1] के तहत सरकारी स्कूलों और आंगनवाड़ियों में मिलने वाला मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया गया [2,3]। इसे लेकर चिंताएं बढ़ गईं कि इसका कमजोर समुदायों पर क्या असर पड़ेगा। मांग किए जाने के बावजूद, राज्य सरकार ने अभी तक महामारी और लॉकडाउन के बाद कोई विस्तृत सर्वेक्षण नहीं किया है, जिससे कुपोषण को रोकने और उससे निपटने के लिए जरूरी तत्काल और दीर्घकालिक उपायों की पहचान की जा सके। कोविड-19 महामारी के दौरान और उसके बाद, नागरिक समाज संगठनों, छात्रों, पोषण विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने कर्नाटक के विभिन्न जिलों का दौरा किया; यह टिप्पणी उनके द्वारा किए गए अवलोकनों का एक व्यापक विवरण प्रस्तुत करती है। इस विषय पर एक गहन मात्रात्मक (quantitative) और गुणात्मक (qualitative) अध्ययन की आवश्यकता है।
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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA) सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। कोविड-19 महामारी के दौरान, विशेष रूप से कर्नाटक राज्य में, NFSA के तहत मिलने वाले अधिकारों और उनके क्रियान्वयन में मौजूद कमियां खुलकर सामने आ गईं। यह टिप्पणी जमीनी स्तर के अनुभवों के आधार पर इस कानून की आलोचना करती है, क्योंकि इसका मुख्य ध्यान केवल न्यूनतम अनाज की उपलब्धता पर है, न कि पोषण सुरक्षा पर- जो कि विविध होनी चाहिए और स्थानीय संस्कृतियों के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए।
इसके क्रियान्वयन में पहले से ही कई समस्याएं थीं, जो लॉकडाउन के कारण और भी गंभीर हो गईं। इस लेख का उद्देश्य इस अधिनियम के दायरे और इसके क्रियान्वयन से जुड़े नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करना है, ताकि महत्वपूर्ण पोषण संकेतकों (nutritional indicators) में सुधार लाया जा सके।
संवैधानिक और कानूनी आधार
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA-2013) [4], 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत संघ' [5] और अन्य के ऐतिहासिक मामले का परिणाम था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 'भोजन का अधिकार' कोई दान या खैरात नहीं है, बल्कि यह 'जीवन के अधिकार' से गहराई से जुड़ा हुआ है। 2003 के एक अंतरिम आदेश में, राज्यों को सलाह दी गई थी कि वे पोषण के स्तर को ऊपर उठाने, जीवन स्तर में सुधार करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने को अपना प्राथमिक कर्तव्य मानें। इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मध्याह्न भोजन योजना (MDMS) और एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) [6] जैसी योजनाओं के प्रति प्रतिबद्धता जताने को कहा गया। खाद्य सुरक्षा का मुख्य अर्थ था- केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अनाज, पका हुआ भोजन, या घर ले जाने के लिए राशन (THR) की उपलब्धता।
PUCL से जुड़ा यह कानूनी मामला, सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के क्षेत्र में 'न्यायिक सक्रियता' (judicial activism) के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक है। इस मामले में, कोर्ट ने 'जीवन के अधिकार' की व्याख्या का विस्तार करते हुए इसमें 'मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार' भी शामिल किया, जिससे राज्य के लिए कुछ संवैधानिक दायित्व तय हो गए जिन्हें लागू कराना अनिवार्य था। खाद्य सुरक्षा कानून का उद्देश्य इन न्यायिक निर्देशों को एक कानूनी रूप देना और संवैधानिक मुकदमों के दायरे से बाहर जाकर, कानूनी उपाय (statutory remedies) उपलब्ध कराना था। [7]
पोषण सुरक्षा के लिए खाद्य सुरक्षा एक आवश्यक शर्त तो है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है- खासकर तब, जब हमें हर परिवार की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरी तरह से सुनिश्चित करना हो। इस अंतर को स्पष्ट करते हुए, खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने भारत के अनाज पर केंद्रित दृष्टिकोण का उल्लेख किया है। इसकी तुलना में, उत्तरी लाओस में कुपोषण से निपटने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया जाता है, जिसमें शिक्षा, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, खाद्य असुरक्षा के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के प्रयास, घरों की दूर-दराज की स्थिति, बाजारों/सामाजिक सेवाओं तक पहुंच, तथा पानी और स्वच्छता जैसे कई पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है [8,9]।
लागू करने में कमी (Enforcement Gap): कानून कागजों पर बनाम व्यवहार में
क्षेत्रीय अवलोकनों से एक मुख्य चिंता जो सामने आती है, वह है लगातार बनी रहने वाली "लागू करने में कमी" (enforcement gap)। हालांकि NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) में शिकायतों के निवारण के लिए तंत्र मौजूद हैं- जिनमें जिला शिकायत निवारण अधिकारी और राज्य खाद्य आयोग शामिल हैं- लेकिन ये संस्थाएं काफी हद तक अप्रभावी रही हैं, और महामारी के दौरान तो ये पूरी तरह से बंद ही हो गईं। राज्य खाद्य आयोगों की निष्क्रियता, विशेष रूप से व्यापक स्तर पर नियमों के उल्लंघन के बावजूद अपनी 'स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति' (suo motu powers) का इस्तेमाल न कर पाना, उनकी गहरी संस्थागत कमजोरियों को दर्शाता है। इसका परिणाम एक ऐसा कानूनी ढांचा है जो कागजों पर तो मजबूत दिखता है, लेकिन वास्तव में इसमें जवाबदेही का अभाव है।
लाभार्थी शायद ही कभी औपचारिक शिकायत तंत्र का इस्तेमाल करते हैं, और धारा 8 के तहत मिलने वाला 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' (food security allowance) जैसे मुआवजे के प्रावधान तो व्यवहार में न के बराबर हैं। यह विफलता अधिनियम के तहत मिलने वाले अधिकारों की 'न्याय-प्राप्ति की क्षमता' (justiciability) को कमजोर करती है और कानूनी गारंटियों को केवल एक छलावा बना देती है।
योजना-स्तर पर विफलताएं और कानूनी निहितार्थ
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS)
अधिनियम के अनुसार, PDS की दुकानें सप्ताह के सभी दिनों में खुली रहनी चाहिए, सिवाय एक दिन के- जो उस क्षेत्र या जिले के आधार पर तय किया जाएगा। विजयपुरा में जिन क्षेत्रों का दौरा किया गया, वहां दुकानें महीने में केवल 2-3 दिन ही खुलती थीं, और वह भी कोई निश्चित दिन नहीं होता था। जब राशन की आपूर्ति पहुंचती है, तब PDS दुकानदार दुकान खोलता है और लोग एक-दूसरे को बता देते हैं। एक महिला, जिसे अपने घर में सूखे राशन की कमी का सामना करना पड़ा था, उसने बताया-"जिस दिन हमें राशन नहीं मिल पाता, उस दिन हम बस पानी पीकर और जो थोड़ा-बहुत राशन बचा होता है, उसी से काम चलाते हैं।" विजयपुरा की ही एक अन्य महिला ने कहा- "हम गेहूं लेना पसंद करते हैं क्योंकि चावल की गुणवत्ता बहुत खराब होती है, और हम अपने पारंपरिक खान-पान को भी बदलना नहीं चाहते।"
आम तौर पर लोगों का मानना है कि राशन की दुकानों पर पहले भ्रष्टाचार होता था, लेकिन अब इसमें काफी कमी आई है। रामबापुर गांव में महिलाओं ने शिकायत की कि उन्हें चावल, गेहूं या मक्का के अलावा अन्य राशन और ईंधन खरीदने में अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। उनका कहना है कि PDS के ज़रिए या रियायती दरों पर उन्हें मसाले, तेल, सरसों, घी, दूध, सब्जियां, गुड़, नमक और चीनी जैसी चीज़ें मिलनी चाहिए - "अगर घी, मक्खन, अंडे, दूध या दूध का पाउडर और दही जैसे डेयरी उत्पाद सस्ते मिलें, तो हम जरूर उन्हें खरीदेंगे। इससे हमें अपने खाने की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलेगी।"
PDS केंद्रों का अनियमित रूप से काम करना, अनाज की सीमित उपलब्धता और जरूरी गैर-अनाज वस्तुओं का शामिल न होना, NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) के ढांचे की एक बुनियादी कमी को दर्शाता है। यह कानून मुख्य रूप से अनाज पर केंद्रित है, जिससे खान-पान में विविधता की अनदेखी होती है और पोषण संबंधी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पातीं। कानूनी नजरिए से देखें तो यह सवाल उठता है कि क्या राज्य अपनी उस संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा कर रहा है, जिसके तहत न केवल लोगों का जीवित रहना सुनिश्चित करना है, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन स्तर भी प्रदान करना है?
एकीकृत बाल विकास सेवाएं (ICDS)
इस कानून के अनुसार, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को मुफ्त भोजन पाने का अधिकार है। यह भोजन 'अनुसूची II' (Schedule II) में बताए गए पोषण मानकों के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही, मजदूरी के नुकसान की भरपाई के लिए, केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए तरीके से उन्हें कम से कम 6,000 रुपये का मातृत्व लाभ (maternity benefit) किश्तों में मिलना चाहिए। 6 महीने से 6 साल तक के बच्चों को स्थानीय आंगनवाड़ियों के ज़रिए 'अनुसूची II' के पोषण मानकों के अनुसार मुफ्त और उचित भोजन मिलना चाहिए। कुपोषित बच्चों को अतिरिक्त पूरक आहार (supplement) पाने का अधिकार है; अगर ऐसा संभव न हो, तो उन्हें 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' (food security allowance) दिया जाना चाहिए। आंगनवाड़ियों में पीने का साफ पानी, खाना पकाने की सुविधा और साफ-सफाई का इंतजाम भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
यह देखा गया कि गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को मिलने वाला भोजन न तो पौष्टिक था और न ही पर्याप्त -
बेंगलुरु की एक गर्भवती महिला ने कहा, "डिलीवरी के बाद कम से कम एक साल तक भोजन मिलना चाहिए, न कि सिर्फ छह महीने तक। इससे हमें अपनी ताकत वापस पाने में मदद मिलेगी और हम अपने बच्चों की बेहतर देखभाल कर पाएंगे। अभी जो खाना मिलता है, उससे हमारा पेट नहीं भरता। आंगनवाड़ियों में बच्चों को जितनी मात्रा में खाना दिया जाता है, हमें भी उतनी ही मात्रा दी जाती है।" "खाने में कोई विविधता नहीं है और हर दिन एक जैसा ही खाना दिया जाता है।" एक अन्य गर्भवती महिला ने बताया कि सांभर में कोई सब्जी नहीं डाली जाती और जो खाना दिया जाता है, उसे तो गायें भी न खाएं। लॉकडाउन के दौरान, कई जगहों पर बच्चों और पंजीकृत महिलाओं को पका हुआ खाना देने के बजाय सूखा राशन दिया गया था। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को आंगनवाड़ी से हर दिन अंडे मिलने चाहिए। कुछ महिलाओं ने शिकायत की है कि उन्हें हफ्ते में केवल 2-3 बार ही अंडे मिलते हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने शिकायत की है कि उन्हें न तो समय पर फंड मिलता है और न ही वेतन। इसी वजह से वे खाने में विविधता नहीं ला पातीं - "हम अपनी जेब से पैसे खर्च करते हैं और हमें यह भी नहीं पता कि ये पैसे वापस मिलेंगे या नहीं। आखिर इस काम को ठीक से क्यों नहीं किया जा सकता?"
संजय गांधीनगर गांव की चार आंगनवाड़ियों के बारे में माताओं से बात करने पर मुख्य बात यह सामने आई कि वहां सुविधाओं की भारी कमी है - "हमें सरकार से कोई ज्यादा उम्मीद नहीं है। हम बस इतना चाहते हैं कि जो उन्हें देना चाहिए, वे कम से कम उतना तो दें। अगर उन्हें खाना देना है, तो कम से कम ठीक-ठाक खाना तो दें।"
ICDS योजना यह दिखाती है कि कानूनी नियमों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है। 'अनुसूची II' (Schedule II) के तहत तय किए गए पोषण मानक अक्सर पूरे नहीं किए जाते, और लाभार्थियों- खासकर गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं- को बहुत कम और एक जैसा ही खाना मिलता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय (वेतन) में देरी होने से सेवाएं देने के काम पर और बुरा असर पड़ता है। इससे पता चलता है कि कानूनी रूप से मिलने वाले हक को लागू करने में पूरी व्यवस्था ही विफल रही है। जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था न होने से ये कमियां और भी बढ़ जाती हैं।
मिड-डे मील योजना (MDMS)
कानून के अनुसार, सभी स्कूलों में खाना पकाने की सुविधा होनी चाहिए, हालांकि शहरी स्कूलों के मामले में कुछ छूट दी गई है। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, उनमें से 40% स्कूलों को खाना एक केंद्रीय रसोई (सेंट्रलाइज्ड किचन) से मिलता था, जबकि बाकी स्कूलों में खाना परिसर के अंदर ही पकाया जाता था। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, वहां बच्चों को केवल न्यूनतम जरूरी भोजन ही दिया जा रहा था; बच्चों को अलग-अलग तरह का या पोषक तत्वों से भरपूर खाना देने पर शायद ही कोई ध्यान दिया जा रहा था। हैरानी की बात यह थी कि माता-पिता और बच्चे, दोनों ही न्यूनतम जरूरी भोजन से ज्यादा की कोई उम्मीद नहीं रखते थे। - "मेरे बेटे को रोज चावल और सांभर मिलता है, यह काफी है। उसे जो भी दिया जाएगा, वह उसी में काम चला लेगा। जब तक मेरे बच्चे को खाना मिल रहा है, तब तक मुझे और कुछ नहीं चाहिए।" दौरे के समय, हफ्ते में दो दिन अंडे दिए जाने थे, लेकिन बैंगलोर और अनेकल के उन स्कूलों में ऐसा नहीं हो रहा था, जिन्हें 'अक्षय पात्र फाउंडेशन' से मिड-डे मील मिलता है। यह फाउंडेशन न तो अंडे देता है और न ही अपने खाने में प्याज और लहसुन का इस्तेमाल करता है [11,12,13,14]।
पूछने पर, लोगों ने खाने में कुछ और चीजें जोड़ने का सुझाव दिया - मुख्य रूप से विविधता के लिए, न कि पोषण के लिए - जैसे फल, सब्जियां, इडली, चपाती, डोसा, पूरी, चिकन, रागी मुड्डे, मांस आदि। ज्यादातर लोगों को लगा कि अंडों को शामिल करना एक अच्छा विचार है, लेकिन उनका मानना था कि मांस को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा उन्होंने अपनी पसंद के बजाय शाकाहारी लोगों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए कहा।
छात्रों ने शिकायत की कि खाना साफ-सफाई से नहीं बनाया जाता था। स्कूलों के दौरे के दौरान भी यह बात सामने आई, क्योंकि खाने में पत्थर, बाल, गंदगी आदि दिखाई दिए।
दो स्कूल प्रधानाचार्यों का मानना था कि खाने की गुणवत्ता अच्छी नहीं थी और पोषण को बेहतर बनाने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने चाहिए। वहीं, तीन अन्य प्रधानाचार्यों को लगा कि खाना पौष्टिक था क्योंकि इसमें सब्जियों का इस्तेमाल किया जा रहा था। कुछ लोगों का मानना था कि मिड-डे मील में अंडे शामिल करने से पोषण का स्तर बेहतर होगा।
बैंगलोर में जिन स्कूलों का दौरा किया गया, उनमें से एक उर्दू स्कूल था, जहां ज्यादातर छात्र मुस्लिम समुदाय से थे। मिड-डे मील (MDM) एक सेंट्रलाइज्ड किचन, 'अक्षय पात्र' द्वारा उपलब्ध कराया जाता था। इस व्यवस्था को लेकर एक्टिविस्ट्स, MDMS के जॉइंट डायरेक्टर और स्टेट फूड कमीशन ने पहले ही कई चिंताएं जताई थीं [15]।
बेंगलुरु अर्बन के एक सरकारी उर्दू स्कूल की प्रिंसिपल, अक्षय पात्र द्वारा दिए जाने वाले खाने से खुश नहीं थीं। उनका मानना था कि यह खाना न तो पौष्टिक था और न ही ऐसा था जिसे बच्चे अपने घरों में खाने के आदी हों। इस दौरान एक गैर-मुस्लिम टीचर ने बार-बार उनकी बात काटी और कहा - "खाना अच्छा है। मिड-डे मील में अंडे नहीं दिए जाने चाहिए। बच्चों को जो भी दिया जाए, उन्हें वही खा लेना चाहिए, क्योंकि स्कूलों के लिए खुद खाना बनाना मुश्किल काम है। हम कोई बदलाव नहीं चाहते और अक्षय पात्र जो खाना दे रहा है, हम उससे खुश हैं।"
चूंकि एक 'अच्छे' मिड-डे मील के लिए कोई तय मानक (स्टैंडर्ड) नहीं हैं, इसलिए स्कूल, माता-पिता और बच्चों से यह जानना मुश्किल हो गया कि वे असल में क्या चाहते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि लोगों की उम्मीदें ही बहुत कम हैं। इसके अलावा, टीचर मिड-डे मील को एक अतिरिक्त बोझ मानते हैं - "स्कूल में किचन चलाना मुश्किल है, क्योंकि रसोइया (cook) मिलना कठिन होता है। अगर वे छुट्टी पर चले जाएं, तो उनकी जगह किसी और को ढूंढना मुश्किल हो जाता है। साथ ही, कई बार बजट समय पर नहीं आता, तब हमें अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन कुल मिलाकर, जब खाना सेंट्रलाइज्ड किचन के बजाय स्कूल में ही बनता है, तो बच्चे बेहतर खाना खाते हैं। अगर स्कूल में खाना बने, तो टीचर भी उसे खा लेते हैं।"
राज्य सरकार की 'क्षीर भाग्य' योजना के तहत, सुबह 10 बजे स्कूल में ही पाउडर वाले दूध को पानी में मिलाकर तैयार करना होता है और तुरंत बच्चों को देना होता है। स्कूल के किचन में तो ऐसा किया जा रहा था, लेकिन सेंट्रलाइज्ड किचन को ऐसा करने का निर्देश दिए जाने के बावजूद, वे ऐसा नहीं कर रहे थे [16]। अक्षय पात्र सुबह 7 बजे ही दूध तैयार करके पहुंचा देता था, जिसे बच्चे सुबह 10 बजे पीते थे।
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) में सुरक्षित पीने के पानी और साफ-सफाई की भी व्यवस्था होनी चाहिए। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, वहां ज्यादातर जगहों पर पीने का पानी तय मानकों के अनुरूप नहीं था। ग्रामीण स्कूलों में पानी का मुख्य स्रोत 'मिनी टैंक' थे, जिनका ठीक से रखरखाव नहीं किया जाता था। कुछ मिनी टैंकों में कीड़े, पत्तियां और कीचड़ पाए गए।
एक स्कूल में पानी धुंधला था और उसमें कुछ कण भी थे, फिर भी उसका इस्तेमाल बर्तन धोने और खाना पकाने के लिए किया जा रहा था। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, उनमें से 20% स्कूलों में पीने के पानी की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। कुछ बच्चे पानी पीने के लिए घर चले जाते थे, कुछ अपने साथ पानी लाते थे, और कुछ स्कूल में रहते हुए पानी पीते ही नहीं थे।
ज्यादातर मामलों में, स्कूल प्रबंधन का कहना था कि शौचालयों को लेकर कोई समस्या नहीं है, लेकिन लगभग 30% स्कूलों में शौचालय थे ही नहीं। जिन स्कूलों में शौचालय थे, वहां पानी की कोई सुविधा (रनिंग वॉटर) नहीं थी। कई स्कूलों में शौचालयों की हालत बहुत खराब थी - कक्षा 5 की छात्रा राम्या ने बताया, "जब भी हमें शौचालय जाना होता है, तो हम घर वापस चले जाते हैं।" अक्सर शौचालय पूरी तरह से बंद नहीं होते, जिससे निजता (प्राइवेसी) बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। यह उन छात्राओं के लिए चिंता का विषय है, जिन्हें पीरियड्स के दौरान काफी परेशानी होती है।
कर्नाटक में MDM (मिड-डे मील) की एक अच्छी बात 'क्षीर भाग्य' योजना के तहत दूध उपलब्ध कराना है, जिससे भोजन में विविधता आती है। हालांकि, बच्चों को दूध परोसने से ठीक पहले ही पाउडर को पानी में मिलाकर तैयार किया जाना चाहिए। कर्नाटक ने राज्य बजट के जरिए कक्षा 9 और 10 के बच्चों को भी MDM योजना में शामिल किया है। 2016 से, सूखे की आशंका वाले इलाकों में गर्मियों की छुट्टियों के दौरान भी MDM उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार स्थानीय लोगों की पसंद और स्वाद के हिसाब से, उस क्षेत्र के अनुकूल अनाज भी उपलब्ध करा रही है।
कचेरगनहल्ली में राज्य के भीतर प्रवास करने वाले समुदाय के सामने आने वाली समस्याएं
बेल्लारी से बेंगलुरु शहरी इलाके में आकर बसे लगभग 300 परिवार कचेरगनहल्ली में रहते हैं, जो एक वंचित शहरी क्षेत्र है। यहां छह माताओं और दो गर्भवती महिलाओं का विस्तार से साक्षात्कार लिया गया। इन सभी परिवारों के पास 'गरीबी रेखा से नीचे' (BPL) कार्ड थे, लेकिन वे NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) के तहत मिलने वाले लाभों का फायदा नहीं उठा पा रहे थे, क्योंकि उनके परिवार के बुजुर्ग और बच्चे PDS (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) से मिलने वाले राशन पर निर्भर थे। जब वे अपने गांवों में जाते थे, तो कभी-कभी वहां से राशन वापस ले आते थे। इनमें से ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूर थे, और कोविड महामारी के दौरान उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा।
एक गर्भवती महिला ने बताया कि उसे कोई आर्थिक या स्वास्थ्य संबंधी मदद नहीं मिली है। उसने 'मातृपूर्णा' योजना के बारे में कभी नहीं सुना था, और न ही उसे अपनी गर्भावस्था के दौरान आंगनवाड़ी जाकर भोजन करने के लिए कहा गया था। एक अन्य महिला, जिसने 6 महीने पहले बच्चे को जन्म दिया था, उसने भी यही बात कही। अपनी गर्भावस्था के दौरान, उसे यह नहीं पता था कि उसका रजिस्ट्रेशन कहां हुआ है और वह किन सुविधाओं की हकदार है। उसका एक और तीन साल का बच्चा है, लेकिन दोनों में से किसी भी बच्चे का आंगनवाड़ी में रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ था। उसे कुछ मौकों पर 'टेक होम राशन' (THR) मिला था, जिसमें आमतौर पर चावल और थोड़ी दाल होती थी। उसके बच्चों का वजन नहीं किया गया था, और जो बच्चे अंडे पाने के हकदार थे, उन्हें भी अंडे नहीं दिए गए। उसने बताया, "मुझे नहीं पता कि मेरा नाम कहां दर्ज है। एक महिला आई थी और उसने मेरी जानकारी ली थी, लेकिन जब मैंने अपने हक के पैसों के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि मुझे अपने गांव जाना होगा। जब मैं अपने गांव गई, तो उन्होंने कहा कि मैं शहर में रहती हूं, इसलिए मुझे ये सब चीजें नहीं मिल सकतीं। मैं अपने चेकअप के लिए पास के एक छोटे क्लिनिक में जाती हूं और अपनी दवाओं के पैसे खुद देती हूं। मुझे नहीं पता कि डिलीवरी के लिए कहां जाना चाहिए। हर छोटी-छोटी चीज के लिए हमें इधर-उधर दौड़ाया जाता है, और मुझे कभी सही जानकारी नहीं मिलती कि मुझे कहां जाना चाहिए।"
पोषण सुरक्षा: एक संवैधानिक अनिवार्यता
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) भोजन को एक अधिकार के रूप में मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम है। हालांकि, इसे जिस तरह से लागू किया जा रहा है, वह एक 'अधिकार-आधारित' ढांचे से हटकर, केवल 'जीवित रहने के लिए न्यूनतम जरूरतों' वाले मॉडल की ओर पीछे जाने जैसा है। पोषण के अधिकार को कानूनी रूप से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना न केवल वांछनीय है, बल्कि यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य भी है।
कर्नाटक के आंकड़े- जैसे कि एनीमिया (खून की कमी), बच्चों में कुपोषण और आहार संबंधी कमियों का उच्च स्तर- यह दिखाते हैं कि NFSA अपने तय लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया है। इस विफलता को देखते हुए, कानूनी ढांचे में बदलाव की जरूरत है, ताकि यह केवल 'कैलोरी' पर आधारित न रहकर, पोषण पर केंद्रित हो सके।
अपने संवैधानिक वादे को पूरा करने के लिए, इस कानून को इस तरह विकसित होना चाहिए कि यह पोषण की पर्याप्तता, संस्थागत जवाबदेही और सामाजिक समावेश को सुनिश्चित कर सके। अगर ऐसे सुधार नहीं किए गए, तो 'भोजन का अधिकार' केवल एक खोखला अधिकार बनकर रह जाएगा, जिसका उन लोगों की वास्तविक जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं होगा, जिनकी सुरक्षा के लिए इसे बनाया गया था।
खाद्य सुरक्षा व पोषण सुरक्षा के बीच का अंतर केवल शब्दों का ही नहीं है, बल्कि इसका संवैधानिक महत्व भी है। अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' में स्वास्थ्य और गरिमा का अधिकार शामिल है, जिसके लिए पर्याप्त पोषण तक पहुंच होना अनिवार्य है।
कर्नाटक में आवश्यक कदम
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) बनाने वालों ने जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों वाली शिकायत निवारण प्रणाली रखी थी। इसमें जिला शिकायत निवारण अधिकारी [17], सिविल कोर्ट की शक्तियों वाले राज्य खाद्य आयोग [18], और खाद्य सुरक्षा के लिए मुआवजा भत्ता [19] शामिल थे। हालांकि, औपचारिक शिकायत प्रणालियां अक्सर उपलब्ध ही नहीं होतीं। कानून के लिखित प्रावधानों और ज़मीनी हकीकत के बीच का यह अंतर एक तरह का "लागू करने का अंतराल" (enforcement gap) है। व्यापक अनियमितताओं को दूर करने के लिए राज्य खाद्य आयोग द्वारा अपनी 'स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति' (suo moto jurisdiction) का इस्तेमाल न करना यह दिखाता है कि इस कानून में दिए गए संस्थागत सुरक्षा उपाय न केवल कमजोर हैं, बल्कि अपने मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह से अप्रभावी हैं।
पिछले कई वर्षों से लागू होने के बावजूद, NFSA पोषण संबंधी संकेतकों में पर्याप्त सुधार नहीं ला पाया है। 'राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण' (NFHS-5) [12] और 'व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण' (CNNS 2018-19) [20] के आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में 15 वर्ष से कम उम्र की आबादी 23% है।
कर्नाटक में शिशु मृत्यु दर (IMR) [2] 26% है और 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) [3] 30% है। 2-4 वर्ष की आयु के लड़कों और लड़कियों में से केवल 40-40% ही प्री-स्कूल जाते हैं; और यह आंकड़ा और भी कम हो सकता है, जिसका मतलब है कि ये बच्चे शैक्षिक और पोषण संबंधी सहायता से वंचित रह जाते हैं। [20, 21] कम उपस्थिति के कारणों का पता लगाकर उन्हें दूर करना ज़रूरी है, क्योंकि इन बच्चों की जिंदगी की शुरुआत ही एक नुकसान (disadvantage) के साथ होती है।
कुपोषित माताओं के बच्चों के भी कुपोषित होने की संभावना अधिक होती है। 6 से 59 महीने के बच्चों में एनीमिया (खून की कमी) की दर 66% है, जबकि गर्भवती न होने वाली महिलाओं में यह 48% और गर्भवती महिलाओं में 46% है। ग्रामीण महिलाओं और अनुसूचित जाति की महिलाओं में यह समस्या विशेष रूप से अधिक है। कर्नाटक में 6-23 महीने की उम्र के बच्चों में से केवल 4% को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल पाता है, 18% बच्चों को आहार में न्यूनतम विविधता (अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थ) मिलती है, 32% बच्चों को दिन में कम से कम तय बार भोजन मिलता है, और केवल 9% बच्चे ही आयरन से भरपूर भोजन खाते हैं। कर्नाटक में 2-4 साल के बच्चों में से, पिछले 24 घंटों में केवल 22% बच्चों ने मांसाहारी भोजन (मांस आदि) खाया, जबकि केरल में यह आंकड़ा 69% था। 57% बच्चों ने डेयरी उत्पाद (दूध-दही आदि) और 19% बच्चों ने अंडे खाए। कर्नाटक में 5-9 साल के बच्चों में से 96% ने अनाज और 84% ने दूध या दही का सेवन किया; संभवतः ऐसा 'क्षीर भाग्य' योजना की वजह से है। 10-19 साल के बच्चों में 46% को विटामिन B12 की कमी है और 70% को फोलेट की कमी है; यह समस्या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के बच्चों में ज्यादा देखी गई है। 5 साल से कम उम्र के 35% बच्चे 'स्टंटेड' (उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले) हैं और 33% बच्चे कम वजन (अंडरवेट) के हैं... और यह सब महामारी आने से पहले की स्थिति है!!
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे यह उम्मीद की गई थी कि खाद्य सुरक्षा के प्रति दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव आएगा- यानी इसे केवल एक 'कल्याणकारी' (welfare) कदम के बजाय एक 'अधिकार-आधारित' (rights-based) दृष्टिकोण के रूप में देखा जाएगा। मौजूदा हालात को देखते हुए, इस कानून का दायरा केवल 'जीवित रहने' (पेट भरने) तक सीमित न रहकर, पोषण संबंधी संकेतकों (nutritional indicators) में सुधार करने की ओर बढ़ना चाहिए। दुर्भाग्य से, यह कानून अब केवल 'जीवित रहने के अधिकार' (सबसे सस्ते और न्यूनतम भोजन के साथ) तक सिमट कर रह गया है, जबकि इसका उद्देश्य पोषण की कमी और बीमारियों से मुक्त जीवन सुनिश्चित करना होना चाहिए। नीतिगत फैसलों और सरकारी योजनाओं का आधार केवल 'भोजन का अधिकार' नहीं, बल्कि 'अच्छी गुणवत्ता और पर्याप्त मात्रा में पोषण पाने का अधिकार' होना चाहिए। इस कानून के तहत मुख्य रूप से अनाज और मोटे अनाज (millets) देना ही काफी नहीं है; आहार में विविधता होना बहुत जरूरी है।
सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और सब्सिडी के जरिए, नियमित आहार में पशु-जनित पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों- जैसे डेयरी, मांस, पोल्ट्री और अंडे- को शामिल करने की आवश्यकता है। सरकारी आंगनवाड़ियों और मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) में 'क्षीर भाग्य' योजना को लागू करना, सही दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। कई महिलाओं ने यह भी सुझाव दिया कि सब्सिडी वाले ताज़ा या पाउडर वाले दूध और अंडों को PDS (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उन लाभार्थियों की पहचान करना जरूरी है, जिन्हें इस अधिनियम (Act) के तहत विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत आर्थिक मुआवज़ा नहीं मिला है। प्रसव कराने वाली महिलाओं को आर्थिक, पोषण संबंधी और स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता होती है। दी जाने वाली राशि में संशोधन की जरूरत हो सकती है, और इस व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सभी महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के बाद के समय में ज़रूरी आर्थिक सहायता मिल सके। NFSA का 'लक्ष्य-आधारित' (targeted) दृष्टिकोण, समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर कर सकता है। आधार और बायोमेट्रिक प्रणालियों के लागू होने से भी कमजोर समुदाय इस दायरे से बाहर हो गए हैं। यह अधिनियम किसी खास वर्ग तक सीमित न होकर, सभी के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए।
शहरी क्षेत्रों में 'सेंट्रलाइज्ड किचन' (केंद्रीय रसोई) के लिए रखा गया विशेष प्रावधान अब एक आम चलन बन गया है, और इसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इस कानून को उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए, और ऐसी व्यवस्थाएं बनाई जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कानून का इस्तेमाल कॉर्पोरेट या व्यावसायिक हितों को साधने के लिए न किया जाए। बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों का कहना है कि NFSA (विशेषकर MDM - मिड-डे मील) के तहत NGO द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन में विविधता की कमी होती है, जिससे बच्चे कम खाना खाते हैं। यह ज़रूरी है कि बच्चे अपने भोजन का आनंद लें और उन्हें एक ही तरह के मेन्यू के बजाय अलग-अलग तरह के व्यंजन चखने को मिलें। मेन्यू तैयार करने में अभिभावकों और बड़ी कक्षाओं के छात्रों को सक्रिय रूप से शामिल करने की आवश्यकता है। इसमें सांस्कृतिक संदर्भ का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। भोजन में अलग-अलग खाद्य समूहों से विविधता होनी चाहिए - जैसे दालें/फलियां, अनाज/मोटे अनाज, वसा और तेल, सब्ज़ियाँ, डेयरी और दूध, तथा मांस/मछली/अंडे।
'स्कूल विकास एवं प्रबंधन समिति' (SDMC) को खाद्य आपूर्ति के प्रबंधन, स्वच्छता की निगरानी, सुरक्षित पानी की उपलब्धता, और भोजन के स्वाद व गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए। उन्हें MDM की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बड़ी उम्र के बच्चों को भी इसमें शामिल करना चाहिए। MDM और ICDS के तहत भोजन तैयार करते समय स्वच्छता बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए चावल, दाल और सब्जियों को साफ करने के लिए अलग से संसाधन आवंटित किए जाने चाहिए। भंडारण की सुविधाओं में सुधार किया जाना चाहिए ताकि सामग्री को नमी, चूहों, मक्खियों, कॉकरोच आदि से बचाया जा सके। भोजन तैयार करने और परोसने का काम पूरी तरह से स्वच्छ तरीके से होना चाहिए। कर्मचारियों को इस बात का नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि भोजन को स्वच्छता के साथ कैसे संभाला जाए। इसमें भोजन को छूने या परोसने से पहले, और शौचालय का इस्तेमाल करने के बाद, साबुन और पानी से अच्छी तरह हाथ धोना शामिल है। जैविक और रासायनिक प्रदूषण (contamination) की जांच के लिए खाद्य परीक्षण किया जाना चाहिए; खाद्य पदार्थों के पास जहरीले पदार्थ नहीं रखे जाने चाहिए; MDM (मध्याह्न भोजन) तैयार करते समय स्वच्छता से कोई समझौता न हो, इसके लिए साफ और सुरक्षित पेयजल की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी है।
विविध प्रकार के खाद्य पदार्थों के संबंध में यूनिसेफ (UNICEF) की सिफारिशों को तुरंत लागू किया जाना चाहिए और इन्हें 'पोषण के अधिकार' के हिस्से के रूप में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यह अधिकार संविधान में दिए गए 'जीवन के अधिकार' से गहराई से जुड़ा हुआ है। कर्नाटक में पोषण से जुड़े कई संकेतक चिंताजनक हैं। इनमें से ज्यादातर में सुधार तब किया जा सकता है, जब NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) को मजबूत किया जाए, ताकि इसमें केवल अनाज ही नहीं, बल्कि विभिन्न खाद्य समूहों से जुड़े सब्सिडी वाले खाद्य पदार्थ भी शामिल हो सकें।
कानूनी दृष्टिकोण से, इस अध्ययन में पहचानी गई संरचनात्मक कमियों को दूर करने के लिए 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम' में लक्षित संशोधन करना अनिवार्य है। पहला, अधिनियम की धारा 4(2) में संशोधन किया जाना चाहिए ताकि कानूनी रूप से मिलने वाले लाभों का दायरा अनाज से आगे बढ़कर अन्य खाद्य समूहों तक फैले। इसमें दालें, खाद्य तेल, सब्जियां और अंडे व दूध जैसे प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ स्पष्ट रूप से शामिल होने चाहिए। इस तरह के संशोधन से एक बड़ा बदलाव आएगा- हम एक सीमित 'खाद्य सुरक्षा' मॉडल (जो मुख्य रूप से केवल कैलोरी की पर्याप्तता पर केंद्रित है) से हटकर एक व्यापक 'पोषण सुरक्षा' ढांचे की ओर बढ़ सकेंगे। यह ढांचा आधुनिक पोषण विज्ञान और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार' के अनुरूप होगा। दूसरा, इस अधिनियम को लागू करने वाले ढांचे को काफी मजबूत करने की जरूरत है। धारा 16 को सशक्त बनाया जाना चाहिए ताकि राज्य खाद्य आयोगों को यह स्पष्ट अधिकार मिल सके कि वे नियमों का पालन न होने पर प्रशासनिक दंड लगा सकें। इसके अलावा, शिकायतों के निवारण तंत्र को प्रभावी बनाने के लिए, अधिनियम में यह अनिवार्य होना चाहिए कि शिकायतों का समाधान 30 दिनों की तय समय-सीमा के भीतर हो जाए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो धारा 830 के तहत 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' पाने का अधिकार अपने आप मिल जाना चाहिए। इससे प्रक्रियात्मक देरी खत्म होगी, जो अभी के समय में समाधान को केवल कागजी या बेअसर बना देती है।
आगे के कानूनी सुधारों में सेवा वितरण के बदलते स्वरूप और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। चूंकि वैधानिक कार्यों को निजी संस्थाओं को सौंपने का चलन बढ़ रहा है - विशेष रूप से 'मिड-डे मील योजना' के तहत केंद्रीयकृत रसोई (सेंट्रलाइज्ड किचन) चलाने के मामले में - इसलिए इस कानून में संशोधन करके जवाबदेही के स्पष्ट तंत्र (अकाउंटेबिलिटी मैकेनिज्म) जोड़े जाने चाहिए। इनमें पोषण संबंधी ऑडिट (न्यूट्रिशनल ऑडिट) को सार्वजनिक करना, स्वतंत्र थर्ड-पार्टी मूल्यांकन, और ऐसे मानक तय करना शामिल है जो यह सुनिश्चित करें कि परोसा जाने वाला भोजन संबंधित समुदायों की सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप हो। इसके साथ ही, कानून में संशोधन करके अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिकों के लिए उनके हक (एनटाइटलमेंट्स) की 'कानूनी पोर्टेबिलिटी' की व्यवस्था करना भी बेहद जरूरी है। यह एक ऐसा कमजोर वर्ग है जिसे अक्सर सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा जाता है। 'नेशनल कैंपेन फॉर डिग्निटी एंड राइट्स ऑफ सीवरेज एंड एलाइड वर्कर्स' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों के आधार पर, इस तरह के संशोधन से एक केंद्रीयकृत और इंटरऑपरेबल (आपस में जुड़ा हुआ) सिस्टम अनिवार्य हो जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि प्रवासी परिवार अपने काम की जगह पर भी अपने हिस्से का राशन प्राप्त कर सकें।
(लेखक वकील हैं और बेंगलुरु के सेंट जोसेफ कॉलेज ऑफ लॉ (SJCL) के निदेशक भी हैं; यह लेख सेंट जोसेफ लॉ कॉलेज के छात्रों द्वारा किए गए एक अध्ययन पर आधारित है।)
नोट:
इस अध्ययन की रूपरेखा तैयार करने और विश्लेषण में सहयोग के लिए डॉ. सिल्विआ करपागम; SJCL की प्रिंसिपल पॉलीन प्रिया; लॉ कॉलेज की छात्राएं विमला मैरी, रीथू एंथनी और कृतिका जैन; सेंटर फॉर नॉन-फॉर्मल एजुकेशन (CNFE), विजयपुरा; अनन्या चिल्ड्रन्स ट्रस्ट, लिंगराजपुरम, बेंगलुरु; और सेंटर फॉर इंटीग्रल रूरल वेलफेयर (CIRF), अनेकल के स्टाफ का आभार।
References
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[4] Supra note 1
[4] Food security and nutrition security – what is the problem and what is the difference, Summary of the FSN Forum discussion, No. 34, Food and Agriculture Organisation http://km.fao.org/fileadmin/user_upload/fsn/docs/PROCEEDINGS_FoodSecurit...
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[7] Supra note 5
[8] Food security and nutrition security – what is the problem and what is the difference, Summary of the FSN Forum discussion, No. 34, Food and Agriculture Organisation http://km.fao.org/fileadmin/user_upload/fsn/docs/PROCEEDINGS_FoodSecurit...
[9] The nutrition situation in Northern Laos – determinants of malnutrition and changes after four years of intensive interventions (S. Kaufmann). http://geb.uni-giessen.de/geb/volltexte/2009/6904/pdf/KaufmannSilvia-200...).
[10] Supra note 1
[11] Midday meal: External agencies to supply eggs at schools in Karnataka. The Hindu. 2022 July 20. https://www.thehindu.com/news/cities/bangalore/akshaya-patra-mid-day-mea...
[12] Barman, S.R. (2022) Karnataka study shows eggs in mid-day meals help children’s growth, The Indian Express. Available at: https://indianexpress.com/article/education/karnataka-study-shows-eggs-in- mid-day-meals-help-childrens-growth-8078892/ (Accessed: November 28, 2022).
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[15] Vikhar Ahmed Sayeed. Akshaya Patra Foundation under the scanner. Frontline. 2020 December 11. https://frontline.thehindu.com/the-nation/independent-trustees-of-akshay...
[16] Jayachandran N and Ram T. Akshaya Patra mid-day meal controversy: Will Food Commission meeting iron out issues? The Newsminute. 2019 December 18. https://www.thenewsminute.com/karnataka/akshaya-patra-mid-day-meal-contr...
[17] Section 14, The National Food Security Act, 2013 No. 20 of 2013
[18] Section 16, The National Food Security Act, 2013 No. 20 of 2013
[19] Section 8 , The National Food Security Act, 2013 No. 20 of 2013
[20] Ministry of Health and Family Welfare (MoHFW), Government of India, UNICEF and the Population Council. 2019. Comprehensive National Nutrition Survey (CNNS) Karnataka Report. New Delhi.
[21] Chamois S, Singh A, Anand S, Shivika. Advocacy for Healthy Diets: Nutrition Brief Series Nutrition Brief 5 of 6 – Nutrition Matters: Diet Diversity. UNICEF India. 2025 September. https://www.unicef.org/india/media/17476/file/UNICEF%20(nutrition)-%20reports-2025%2009%20Brief%20Nutrition%20Diversity.pdf.pdf
[1] The mathrupoorna Scheme is a Karnataka government initiative launched on October 2, 2017, to improve the nutritional status of pregnant and lactating mothers by providing one full hot cooked meal daily for 25 days a month at Anganwadi centers
[2] Infant mortality rate (IMR) is the probability of a child born in a specific year dying before reaching the age of one and expressed as a rate per 1000 live births
[3] Under-five mortality rate is the probability of a child dying between birth and five years of age, expressed per 1000 live births.
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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (NFSA) सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा को एक संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। कोविड-19 महामारी के दौरान, विशेष रूप से कर्नाटक राज्य में, NFSA के तहत मिलने वाले अधिकारों और उनके क्रियान्वयन में मौजूद कमियां खुलकर सामने आ गईं। यह टिप्पणी जमीनी स्तर के अनुभवों के आधार पर इस कानून की आलोचना करती है, क्योंकि इसका मुख्य ध्यान केवल न्यूनतम अनाज की उपलब्धता पर है, न कि पोषण सुरक्षा पर- जो कि विविध होनी चाहिए और स्थानीय संस्कृतियों के प्रति संवेदनशील होनी चाहिए।
इसके क्रियान्वयन में पहले से ही कई समस्याएं थीं, जो लॉकडाउन के कारण और भी गंभीर हो गईं। इस लेख का उद्देश्य इस अधिनियम के दायरे और इसके क्रियान्वयन से जुड़े नीतिगत निर्णयों को प्रभावित करना है, ताकि महत्वपूर्ण पोषण संकेतकों (nutritional indicators) में सुधार लाया जा सके।
संवैधानिक और कानूनी आधार
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA-2013) [4], 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत संघ' [5] और अन्य के ऐतिहासिक मामले का परिणाम था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि 'भोजन का अधिकार' कोई दान या खैरात नहीं है, बल्कि यह 'जीवन के अधिकार' से गहराई से जुड़ा हुआ है। 2003 के एक अंतरिम आदेश में, राज्यों को सलाह दी गई थी कि वे पोषण के स्तर को ऊपर उठाने, जीवन स्तर में सुधार करने और सार्वजनिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने को अपना प्राथमिक कर्तव्य मानें। इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), मध्याह्न भोजन योजना (MDMS) और एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) [6] जैसी योजनाओं के प्रति प्रतिबद्धता जताने को कहा गया। खाद्य सुरक्षा का मुख्य अर्थ था- केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित अनाज, पका हुआ भोजन, या घर ले जाने के लिए राशन (THR) की उपलब्धता।
PUCL से जुड़ा यह कानूनी मामला, सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के क्षेत्र में 'न्यायिक सक्रियता' (judicial activism) के सबसे महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक है। इस मामले में, कोर्ट ने 'जीवन के अधिकार' की व्याख्या का विस्तार करते हुए इसमें 'मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार' भी शामिल किया, जिससे राज्य के लिए कुछ संवैधानिक दायित्व तय हो गए जिन्हें लागू कराना अनिवार्य था। खाद्य सुरक्षा कानून का उद्देश्य इन न्यायिक निर्देशों को एक कानूनी रूप देना और संवैधानिक मुकदमों के दायरे से बाहर जाकर, कानूनी उपाय (statutory remedies) उपलब्ध कराना था। [7]
पोषण सुरक्षा के लिए खाद्य सुरक्षा एक आवश्यक शर्त तो है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं है- खासकर तब, जब हमें हर परिवार की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरी तरह से सुनिश्चित करना हो। इस अंतर को स्पष्ट करते हुए, खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने भारत के अनाज पर केंद्रित दृष्टिकोण का उल्लेख किया है। इसकी तुलना में, उत्तरी लाओस में कुपोषण से निपटने के लिए एक बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया जाता है, जिसमें शिक्षा, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, खाद्य असुरक्षा के नकारात्मक प्रभावों को कम करने के प्रयास, घरों की दूर-दराज की स्थिति, बाजारों/सामाजिक सेवाओं तक पहुंच, तथा पानी और स्वच्छता जैसे कई पहलुओं पर ध्यान दिया जाता है [8,9]।
लागू करने में कमी (Enforcement Gap): कानून कागजों पर बनाम व्यवहार में
क्षेत्रीय अवलोकनों से एक मुख्य चिंता जो सामने आती है, वह है लगातार बनी रहने वाली "लागू करने में कमी" (enforcement gap)। हालांकि NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) में शिकायतों के निवारण के लिए तंत्र मौजूद हैं- जिनमें जिला शिकायत निवारण अधिकारी और राज्य खाद्य आयोग शामिल हैं- लेकिन ये संस्थाएं काफी हद तक अप्रभावी रही हैं, और महामारी के दौरान तो ये पूरी तरह से बंद ही हो गईं। राज्य खाद्य आयोगों की निष्क्रियता, विशेष रूप से व्यापक स्तर पर नियमों के उल्लंघन के बावजूद अपनी 'स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति' (suo motu powers) का इस्तेमाल न कर पाना, उनकी गहरी संस्थागत कमजोरियों को दर्शाता है। इसका परिणाम एक ऐसा कानूनी ढांचा है जो कागजों पर तो मजबूत दिखता है, लेकिन वास्तव में इसमें जवाबदेही का अभाव है।
लाभार्थी शायद ही कभी औपचारिक शिकायत तंत्र का इस्तेमाल करते हैं, और धारा 8 के तहत मिलने वाला 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' (food security allowance) जैसे मुआवजे के प्रावधान तो व्यवहार में न के बराबर हैं। यह विफलता अधिनियम के तहत मिलने वाले अधिकारों की 'न्याय-प्राप्ति की क्षमता' (justiciability) को कमजोर करती है और कानूनी गारंटियों को केवल एक छलावा बना देती है।
योजना-स्तर पर विफलताएं और कानूनी निहितार्थ
सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS)
अधिनियम के अनुसार, PDS की दुकानें सप्ताह के सभी दिनों में खुली रहनी चाहिए, सिवाय एक दिन के- जो उस क्षेत्र या जिले के आधार पर तय किया जाएगा। विजयपुरा में जिन क्षेत्रों का दौरा किया गया, वहां दुकानें महीने में केवल 2-3 दिन ही खुलती थीं, और वह भी कोई निश्चित दिन नहीं होता था। जब राशन की आपूर्ति पहुंचती है, तब PDS दुकानदार दुकान खोलता है और लोग एक-दूसरे को बता देते हैं। एक महिला, जिसे अपने घर में सूखे राशन की कमी का सामना करना पड़ा था, उसने बताया-"जिस दिन हमें राशन नहीं मिल पाता, उस दिन हम बस पानी पीकर और जो थोड़ा-बहुत राशन बचा होता है, उसी से काम चलाते हैं।" विजयपुरा की ही एक अन्य महिला ने कहा- "हम गेहूं लेना पसंद करते हैं क्योंकि चावल की गुणवत्ता बहुत खराब होती है, और हम अपने पारंपरिक खान-पान को भी बदलना नहीं चाहते।"
आम तौर पर लोगों का मानना है कि राशन की दुकानों पर पहले भ्रष्टाचार होता था, लेकिन अब इसमें काफी कमी आई है। रामबापुर गांव में महिलाओं ने शिकायत की कि उन्हें चावल, गेहूं या मक्का के अलावा अन्य राशन और ईंधन खरीदने में अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। उनका कहना है कि PDS के ज़रिए या रियायती दरों पर उन्हें मसाले, तेल, सरसों, घी, दूध, सब्जियां, गुड़, नमक और चीनी जैसी चीज़ें मिलनी चाहिए - "अगर घी, मक्खन, अंडे, दूध या दूध का पाउडर और दही जैसे डेयरी उत्पाद सस्ते मिलें, तो हम जरूर उन्हें खरीदेंगे। इससे हमें अपने खाने की गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलेगी।"
PDS केंद्रों का अनियमित रूप से काम करना, अनाज की सीमित उपलब्धता और जरूरी गैर-अनाज वस्तुओं का शामिल न होना, NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) के ढांचे की एक बुनियादी कमी को दर्शाता है। यह कानून मुख्य रूप से अनाज पर केंद्रित है, जिससे खान-पान में विविधता की अनदेखी होती है और पोषण संबंधी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पातीं। कानूनी नजरिए से देखें तो यह सवाल उठता है कि क्या राज्य अपनी उस संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा कर रहा है, जिसके तहत न केवल लोगों का जीवित रहना सुनिश्चित करना है, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन स्तर भी प्रदान करना है?
एकीकृत बाल विकास सेवाएं (ICDS)
इस कानून के अनुसार, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को मुफ्त भोजन पाने का अधिकार है। यह भोजन 'अनुसूची II' (Schedule II) में बताए गए पोषण मानकों के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही, मजदूरी के नुकसान की भरपाई के लिए, केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए तरीके से उन्हें कम से कम 6,000 रुपये का मातृत्व लाभ (maternity benefit) किश्तों में मिलना चाहिए। 6 महीने से 6 साल तक के बच्चों को स्थानीय आंगनवाड़ियों के ज़रिए 'अनुसूची II' के पोषण मानकों के अनुसार मुफ्त और उचित भोजन मिलना चाहिए। कुपोषित बच्चों को अतिरिक्त पूरक आहार (supplement) पाने का अधिकार है; अगर ऐसा संभव न हो, तो उन्हें 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' (food security allowance) दिया जाना चाहिए। आंगनवाड़ियों में पीने का साफ पानी, खाना पकाने की सुविधा और साफ-सफाई का इंतजाम भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
यह देखा गया कि गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को मिलने वाला भोजन न तो पौष्टिक था और न ही पर्याप्त -
बेंगलुरु की एक गर्भवती महिला ने कहा, "डिलीवरी के बाद कम से कम एक साल तक भोजन मिलना चाहिए, न कि सिर्फ छह महीने तक। इससे हमें अपनी ताकत वापस पाने में मदद मिलेगी और हम अपने बच्चों की बेहतर देखभाल कर पाएंगे। अभी जो खाना मिलता है, उससे हमारा पेट नहीं भरता। आंगनवाड़ियों में बच्चों को जितनी मात्रा में खाना दिया जाता है, हमें भी उतनी ही मात्रा दी जाती है।" "खाने में कोई विविधता नहीं है और हर दिन एक जैसा ही खाना दिया जाता है।" एक अन्य गर्भवती महिला ने बताया कि सांभर में कोई सब्जी नहीं डाली जाती और जो खाना दिया जाता है, उसे तो गायें भी न खाएं। लॉकडाउन के दौरान, कई जगहों पर बच्चों और पंजीकृत महिलाओं को पका हुआ खाना देने के बजाय सूखा राशन दिया गया था। गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को आंगनवाड़ी से हर दिन अंडे मिलने चाहिए। कुछ महिलाओं ने शिकायत की है कि उन्हें हफ्ते में केवल 2-3 बार ही अंडे मिलते हैं।
आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने शिकायत की है कि उन्हें न तो समय पर फंड मिलता है और न ही वेतन। इसी वजह से वे खाने में विविधता नहीं ला पातीं - "हम अपनी जेब से पैसे खर्च करते हैं और हमें यह भी नहीं पता कि ये पैसे वापस मिलेंगे या नहीं। आखिर इस काम को ठीक से क्यों नहीं किया जा सकता?"
संजय गांधीनगर गांव की चार आंगनवाड़ियों के बारे में माताओं से बात करने पर मुख्य बात यह सामने आई कि वहां सुविधाओं की भारी कमी है - "हमें सरकार से कोई ज्यादा उम्मीद नहीं है। हम बस इतना चाहते हैं कि जो उन्हें देना चाहिए, वे कम से कम उतना तो दें। अगर उन्हें खाना देना है, तो कम से कम ठीक-ठाक खाना तो दें।"
ICDS योजना यह दिखाती है कि कानूनी नियमों का पालन ठीक से नहीं हो रहा है। 'अनुसूची II' (Schedule II) के तहत तय किए गए पोषण मानक अक्सर पूरे नहीं किए जाते, और लाभार्थियों- खासकर गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं- को बहुत कम और एक जैसा ही खाना मिलता है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के मानदेय (वेतन) में देरी होने से सेवाएं देने के काम पर और बुरा असर पड़ता है। इससे पता चलता है कि कानूनी रूप से मिलने वाले हक को लागू करने में पूरी व्यवस्था ही विफल रही है। जवाबदेही तय करने वाली व्यवस्था न होने से ये कमियां और भी बढ़ जाती हैं।
मिड-डे मील योजना (MDMS)
कानून के अनुसार, सभी स्कूलों में खाना पकाने की सुविधा होनी चाहिए, हालांकि शहरी स्कूलों के मामले में कुछ छूट दी गई है। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, उनमें से 40% स्कूलों को खाना एक केंद्रीय रसोई (सेंट्रलाइज्ड किचन) से मिलता था, जबकि बाकी स्कूलों में खाना परिसर के अंदर ही पकाया जाता था। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, वहां बच्चों को केवल न्यूनतम जरूरी भोजन ही दिया जा रहा था; बच्चों को अलग-अलग तरह का या पोषक तत्वों से भरपूर खाना देने पर शायद ही कोई ध्यान दिया जा रहा था। हैरानी की बात यह थी कि माता-पिता और बच्चे, दोनों ही न्यूनतम जरूरी भोजन से ज्यादा की कोई उम्मीद नहीं रखते थे। - "मेरे बेटे को रोज चावल और सांभर मिलता है, यह काफी है। उसे जो भी दिया जाएगा, वह उसी में काम चला लेगा। जब तक मेरे बच्चे को खाना मिल रहा है, तब तक मुझे और कुछ नहीं चाहिए।" दौरे के समय, हफ्ते में दो दिन अंडे दिए जाने थे, लेकिन बैंगलोर और अनेकल के उन स्कूलों में ऐसा नहीं हो रहा था, जिन्हें 'अक्षय पात्र फाउंडेशन' से मिड-डे मील मिलता है। यह फाउंडेशन न तो अंडे देता है और न ही अपने खाने में प्याज और लहसुन का इस्तेमाल करता है [11,12,13,14]।
पूछने पर, लोगों ने खाने में कुछ और चीजें जोड़ने का सुझाव दिया - मुख्य रूप से विविधता के लिए, न कि पोषण के लिए - जैसे फल, सब्जियां, इडली, चपाती, डोसा, पूरी, चिकन, रागी मुड्डे, मांस आदि। ज्यादातर लोगों को लगा कि अंडों को शामिल करना एक अच्छा विचार है, लेकिन उनका मानना था कि मांस को शामिल नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा उन्होंने अपनी पसंद के बजाय शाकाहारी लोगों की भावनाओं का ध्यान रखते हुए कहा।
छात्रों ने शिकायत की कि खाना साफ-सफाई से नहीं बनाया जाता था। स्कूलों के दौरे के दौरान भी यह बात सामने आई, क्योंकि खाने में पत्थर, बाल, गंदगी आदि दिखाई दिए।
दो स्कूल प्रधानाचार्यों का मानना था कि खाने की गुणवत्ता अच्छी नहीं थी और पोषण को बेहतर बनाने के लिए और अधिक प्रयास किए जाने चाहिए। वहीं, तीन अन्य प्रधानाचार्यों को लगा कि खाना पौष्टिक था क्योंकि इसमें सब्जियों का इस्तेमाल किया जा रहा था। कुछ लोगों का मानना था कि मिड-डे मील में अंडे शामिल करने से पोषण का स्तर बेहतर होगा।
बैंगलोर में जिन स्कूलों का दौरा किया गया, उनमें से एक उर्दू स्कूल था, जहां ज्यादातर छात्र मुस्लिम समुदाय से थे। मिड-डे मील (MDM) एक सेंट्रलाइज्ड किचन, 'अक्षय पात्र' द्वारा उपलब्ध कराया जाता था। इस व्यवस्था को लेकर एक्टिविस्ट्स, MDMS के जॉइंट डायरेक्टर और स्टेट फूड कमीशन ने पहले ही कई चिंताएं जताई थीं [15]।
बेंगलुरु अर्बन के एक सरकारी उर्दू स्कूल की प्रिंसिपल, अक्षय पात्र द्वारा दिए जाने वाले खाने से खुश नहीं थीं। उनका मानना था कि यह खाना न तो पौष्टिक था और न ही ऐसा था जिसे बच्चे अपने घरों में खाने के आदी हों। इस दौरान एक गैर-मुस्लिम टीचर ने बार-बार उनकी बात काटी और कहा - "खाना अच्छा है। मिड-डे मील में अंडे नहीं दिए जाने चाहिए। बच्चों को जो भी दिया जाए, उन्हें वही खा लेना चाहिए, क्योंकि स्कूलों के लिए खुद खाना बनाना मुश्किल काम है। हम कोई बदलाव नहीं चाहते और अक्षय पात्र जो खाना दे रहा है, हम उससे खुश हैं।"
चूंकि एक 'अच्छे' मिड-डे मील के लिए कोई तय मानक (स्टैंडर्ड) नहीं हैं, इसलिए स्कूल, माता-पिता और बच्चों से यह जानना मुश्किल हो गया कि वे असल में क्या चाहते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि लोगों की उम्मीदें ही बहुत कम हैं। इसके अलावा, टीचर मिड-डे मील को एक अतिरिक्त बोझ मानते हैं - "स्कूल में किचन चलाना मुश्किल है, क्योंकि रसोइया (cook) मिलना कठिन होता है। अगर वे छुट्टी पर चले जाएं, तो उनकी जगह किसी और को ढूंढना मुश्किल हो जाता है। साथ ही, कई बार बजट समय पर नहीं आता, तब हमें अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। लेकिन कुल मिलाकर, जब खाना सेंट्रलाइज्ड किचन के बजाय स्कूल में ही बनता है, तो बच्चे बेहतर खाना खाते हैं। अगर स्कूल में खाना बने, तो टीचर भी उसे खा लेते हैं।"
राज्य सरकार की 'क्षीर भाग्य' योजना के तहत, सुबह 10 बजे स्कूल में ही पाउडर वाले दूध को पानी में मिलाकर तैयार करना होता है और तुरंत बच्चों को देना होता है। स्कूल के किचन में तो ऐसा किया जा रहा था, लेकिन सेंट्रलाइज्ड किचन को ऐसा करने का निर्देश दिए जाने के बावजूद, वे ऐसा नहीं कर रहे थे [16]। अक्षय पात्र सुबह 7 बजे ही दूध तैयार करके पहुंचा देता था, जिसे बच्चे सुबह 10 बजे पीते थे।
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) में सुरक्षित पीने के पानी और साफ-सफाई की भी व्यवस्था होनी चाहिए। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, वहां ज्यादातर जगहों पर पीने का पानी तय मानकों के अनुरूप नहीं था। ग्रामीण स्कूलों में पानी का मुख्य स्रोत 'मिनी टैंक' थे, जिनका ठीक से रखरखाव नहीं किया जाता था। कुछ मिनी टैंकों में कीड़े, पत्तियां और कीचड़ पाए गए।
एक स्कूल में पानी धुंधला था और उसमें कुछ कण भी थे, फिर भी उसका इस्तेमाल बर्तन धोने और खाना पकाने के लिए किया जा रहा था। जिन स्कूलों का दौरा किया गया, उनमें से 20% स्कूलों में पीने के पानी की कोई व्यवस्था ही नहीं थी। कुछ बच्चे पानी पीने के लिए घर चले जाते थे, कुछ अपने साथ पानी लाते थे, और कुछ स्कूल में रहते हुए पानी पीते ही नहीं थे।
ज्यादातर मामलों में, स्कूल प्रबंधन का कहना था कि शौचालयों को लेकर कोई समस्या नहीं है, लेकिन लगभग 30% स्कूलों में शौचालय थे ही नहीं। जिन स्कूलों में शौचालय थे, वहां पानी की कोई सुविधा (रनिंग वॉटर) नहीं थी। कई स्कूलों में शौचालयों की हालत बहुत खराब थी - कक्षा 5 की छात्रा राम्या ने बताया, "जब भी हमें शौचालय जाना होता है, तो हम घर वापस चले जाते हैं।" अक्सर शौचालय पूरी तरह से बंद नहीं होते, जिससे निजता (प्राइवेसी) बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। यह उन छात्राओं के लिए चिंता का विषय है, जिन्हें पीरियड्स के दौरान काफी परेशानी होती है।
कर्नाटक में MDM (मिड-डे मील) की एक अच्छी बात 'क्षीर भाग्य' योजना के तहत दूध उपलब्ध कराना है, जिससे भोजन में विविधता आती है। हालांकि, बच्चों को दूध परोसने से ठीक पहले ही पाउडर को पानी में मिलाकर तैयार किया जाना चाहिए। कर्नाटक ने राज्य बजट के जरिए कक्षा 9 और 10 के बच्चों को भी MDM योजना में शामिल किया है। 2016 से, सूखे की आशंका वाले इलाकों में गर्मियों की छुट्टियों के दौरान भी MDM उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार स्थानीय लोगों की पसंद और स्वाद के हिसाब से, उस क्षेत्र के अनुकूल अनाज भी उपलब्ध करा रही है।
कचेरगनहल्ली में राज्य के भीतर प्रवास करने वाले समुदाय के सामने आने वाली समस्याएं
बेल्लारी से बेंगलुरु शहरी इलाके में आकर बसे लगभग 300 परिवार कचेरगनहल्ली में रहते हैं, जो एक वंचित शहरी क्षेत्र है। यहां छह माताओं और दो गर्भवती महिलाओं का विस्तार से साक्षात्कार लिया गया। इन सभी परिवारों के पास 'गरीबी रेखा से नीचे' (BPL) कार्ड थे, लेकिन वे NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) के तहत मिलने वाले लाभों का फायदा नहीं उठा पा रहे थे, क्योंकि उनके परिवार के बुजुर्ग और बच्चे PDS (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) से मिलने वाले राशन पर निर्भर थे। जब वे अपने गांवों में जाते थे, तो कभी-कभी वहां से राशन वापस ले आते थे। इनमें से ज्यादातर लोग दिहाड़ी मजदूर थे, और कोविड महामारी के दौरान उन्हें बहुत ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा।
एक गर्भवती महिला ने बताया कि उसे कोई आर्थिक या स्वास्थ्य संबंधी मदद नहीं मिली है। उसने 'मातृपूर्णा' योजना के बारे में कभी नहीं सुना था, और न ही उसे अपनी गर्भावस्था के दौरान आंगनवाड़ी जाकर भोजन करने के लिए कहा गया था। एक अन्य महिला, जिसने 6 महीने पहले बच्चे को जन्म दिया था, उसने भी यही बात कही। अपनी गर्भावस्था के दौरान, उसे यह नहीं पता था कि उसका रजिस्ट्रेशन कहां हुआ है और वह किन सुविधाओं की हकदार है। उसका एक और तीन साल का बच्चा है, लेकिन दोनों में से किसी भी बच्चे का आंगनवाड़ी में रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ था। उसे कुछ मौकों पर 'टेक होम राशन' (THR) मिला था, जिसमें आमतौर पर चावल और थोड़ी दाल होती थी। उसके बच्चों का वजन नहीं किया गया था, और जो बच्चे अंडे पाने के हकदार थे, उन्हें भी अंडे नहीं दिए गए। उसने बताया, "मुझे नहीं पता कि मेरा नाम कहां दर्ज है। एक महिला आई थी और उसने मेरी जानकारी ली थी, लेकिन जब मैंने अपने हक के पैसों के बारे में पूछा, तो उसने कहा कि मुझे अपने गांव जाना होगा। जब मैं अपने गांव गई, तो उन्होंने कहा कि मैं शहर में रहती हूं, इसलिए मुझे ये सब चीजें नहीं मिल सकतीं। मैं अपने चेकअप के लिए पास के एक छोटे क्लिनिक में जाती हूं और अपनी दवाओं के पैसे खुद देती हूं। मुझे नहीं पता कि डिलीवरी के लिए कहां जाना चाहिए। हर छोटी-छोटी चीज के लिए हमें इधर-उधर दौड़ाया जाता है, और मुझे कभी सही जानकारी नहीं मिलती कि मुझे कहां जाना चाहिए।"
पोषण सुरक्षा: एक संवैधानिक अनिवार्यता
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) भोजन को एक अधिकार के रूप में मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम है। हालांकि, इसे जिस तरह से लागू किया जा रहा है, वह एक 'अधिकार-आधारित' ढांचे से हटकर, केवल 'जीवित रहने के लिए न्यूनतम जरूरतों' वाले मॉडल की ओर पीछे जाने जैसा है। पोषण के अधिकार को कानूनी रूप से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ना न केवल वांछनीय है, बल्कि यह संवैधानिक रूप से अनिवार्य भी है।
कर्नाटक के आंकड़े- जैसे कि एनीमिया (खून की कमी), बच्चों में कुपोषण और आहार संबंधी कमियों का उच्च स्तर- यह दिखाते हैं कि NFSA अपने तय लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाया है। इस विफलता को देखते हुए, कानूनी ढांचे में बदलाव की जरूरत है, ताकि यह केवल 'कैलोरी' पर आधारित न रहकर, पोषण पर केंद्रित हो सके।
अपने संवैधानिक वादे को पूरा करने के लिए, इस कानून को इस तरह विकसित होना चाहिए कि यह पोषण की पर्याप्तता, संस्थागत जवाबदेही और सामाजिक समावेश को सुनिश्चित कर सके। अगर ऐसे सुधार नहीं किए गए, तो 'भोजन का अधिकार' केवल एक खोखला अधिकार बनकर रह जाएगा, जिसका उन लोगों की वास्तविक जिंदगी से कोई लेना-देना नहीं होगा, जिनकी सुरक्षा के लिए इसे बनाया गया था।
खाद्य सुरक्षा व पोषण सुरक्षा के बीच का अंतर केवल शब्दों का ही नहीं है, बल्कि इसका संवैधानिक महत्व भी है। अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' में स्वास्थ्य और गरिमा का अधिकार शामिल है, जिसके लिए पर्याप्त पोषण तक पहुंच होना अनिवार्य है।
कर्नाटक में आवश्यक कदम
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) बनाने वालों ने जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए कई स्तरों वाली शिकायत निवारण प्रणाली रखी थी। इसमें जिला शिकायत निवारण अधिकारी [17], सिविल कोर्ट की शक्तियों वाले राज्य खाद्य आयोग [18], और खाद्य सुरक्षा के लिए मुआवजा भत्ता [19] शामिल थे। हालांकि, औपचारिक शिकायत प्रणालियां अक्सर उपलब्ध ही नहीं होतीं। कानून के लिखित प्रावधानों और ज़मीनी हकीकत के बीच का यह अंतर एक तरह का "लागू करने का अंतराल" (enforcement gap) है। व्यापक अनियमितताओं को दूर करने के लिए राज्य खाद्य आयोग द्वारा अपनी 'स्वतः संज्ञान लेने की शक्ति' (suo moto jurisdiction) का इस्तेमाल न करना यह दिखाता है कि इस कानून में दिए गए संस्थागत सुरक्षा उपाय न केवल कमजोर हैं, बल्कि अपने मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह से अप्रभावी हैं।
पिछले कई वर्षों से लागू होने के बावजूद, NFSA पोषण संबंधी संकेतकों में पर्याप्त सुधार नहीं ला पाया है। 'राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण' (NFHS-5) [12] और 'व्यापक राष्ट्रीय पोषण सर्वेक्षण' (CNNS 2018-19) [20] के आंकड़ों के अनुसार, कर्नाटक में 15 वर्ष से कम उम्र की आबादी 23% है।
कर्नाटक में शिशु मृत्यु दर (IMR) [2] 26% है और 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर (U5MR) [3] 30% है। 2-4 वर्ष की आयु के लड़कों और लड़कियों में से केवल 40-40% ही प्री-स्कूल जाते हैं; और यह आंकड़ा और भी कम हो सकता है, जिसका मतलब है कि ये बच्चे शैक्षिक और पोषण संबंधी सहायता से वंचित रह जाते हैं। [20, 21] कम उपस्थिति के कारणों का पता लगाकर उन्हें दूर करना ज़रूरी है, क्योंकि इन बच्चों की जिंदगी की शुरुआत ही एक नुकसान (disadvantage) के साथ होती है।
कुपोषित माताओं के बच्चों के भी कुपोषित होने की संभावना अधिक होती है। 6 से 59 महीने के बच्चों में एनीमिया (खून की कमी) की दर 66% है, जबकि गर्भवती न होने वाली महिलाओं में यह 48% और गर्भवती महिलाओं में 46% है। ग्रामीण महिलाओं और अनुसूचित जाति की महिलाओं में यह समस्या विशेष रूप से अधिक है। कर्नाटक में 6-23 महीने की उम्र के बच्चों में से केवल 4% को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल पाता है, 18% बच्चों को आहार में न्यूनतम विविधता (अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थ) मिलती है, 32% बच्चों को दिन में कम से कम तय बार भोजन मिलता है, और केवल 9% बच्चे ही आयरन से भरपूर भोजन खाते हैं। कर्नाटक में 2-4 साल के बच्चों में से, पिछले 24 घंटों में केवल 22% बच्चों ने मांसाहारी भोजन (मांस आदि) खाया, जबकि केरल में यह आंकड़ा 69% था। 57% बच्चों ने डेयरी उत्पाद (दूध-दही आदि) और 19% बच्चों ने अंडे खाए। कर्नाटक में 5-9 साल के बच्चों में से 96% ने अनाज और 84% ने दूध या दही का सेवन किया; संभवतः ऐसा 'क्षीर भाग्य' योजना की वजह से है। 10-19 साल के बच्चों में 46% को विटामिन B12 की कमी है और 70% को फोलेट की कमी है; यह समस्या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के बच्चों में ज्यादा देखी गई है। 5 साल से कम उम्र के 35% बच्चे 'स्टंटेड' (उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले) हैं और 33% बच्चे कम वजन (अंडरवेट) के हैं... और यह सब महामारी आने से पहले की स्थिति है!!
NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे यह उम्मीद की गई थी कि खाद्य सुरक्षा के प्रति दृष्टिकोण में एक बड़ा बदलाव आएगा- यानी इसे केवल एक 'कल्याणकारी' (welfare) कदम के बजाय एक 'अधिकार-आधारित' (rights-based) दृष्टिकोण के रूप में देखा जाएगा। मौजूदा हालात को देखते हुए, इस कानून का दायरा केवल 'जीवित रहने' (पेट भरने) तक सीमित न रहकर, पोषण संबंधी संकेतकों (nutritional indicators) में सुधार करने की ओर बढ़ना चाहिए। दुर्भाग्य से, यह कानून अब केवल 'जीवित रहने के अधिकार' (सबसे सस्ते और न्यूनतम भोजन के साथ) तक सिमट कर रह गया है, जबकि इसका उद्देश्य पोषण की कमी और बीमारियों से मुक्त जीवन सुनिश्चित करना होना चाहिए। नीतिगत फैसलों और सरकारी योजनाओं का आधार केवल 'भोजन का अधिकार' नहीं, बल्कि 'अच्छी गुणवत्ता और पर्याप्त मात्रा में पोषण पाने का अधिकार' होना चाहिए। इस कानून के तहत मुख्य रूप से अनाज और मोटे अनाज (millets) देना ही काफी नहीं है; आहार में विविधता होना बहुत जरूरी है।
सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और सब्सिडी के जरिए, नियमित आहार में पशु-जनित पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों- जैसे डेयरी, मांस, पोल्ट्री और अंडे- को शामिल करने की आवश्यकता है। सरकारी आंगनवाड़ियों और मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) में 'क्षीर भाग्य' योजना को लागू करना, सही दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। कई महिलाओं ने यह भी सुझाव दिया कि सब्सिडी वाले ताज़ा या पाउडर वाले दूध और अंडों को PDS (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उन लाभार्थियों की पहचान करना जरूरी है, जिन्हें इस अधिनियम (Act) के तहत विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत आर्थिक मुआवज़ा नहीं मिला है। प्रसव कराने वाली महिलाओं को आर्थिक, पोषण संबंधी और स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता होती है। दी जाने वाली राशि में संशोधन की जरूरत हो सकती है, और इस व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सभी महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के बाद के समय में ज़रूरी आर्थिक सहायता मिल सके। NFSA का 'लक्ष्य-आधारित' (targeted) दृष्टिकोण, समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर कर सकता है। आधार और बायोमेट्रिक प्रणालियों के लागू होने से भी कमजोर समुदाय इस दायरे से बाहर हो गए हैं। यह अधिनियम किसी खास वर्ग तक सीमित न होकर, सभी के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए।
शहरी क्षेत्रों में 'सेंट्रलाइज्ड किचन' (केंद्रीय रसोई) के लिए रखा गया विशेष प्रावधान अब एक आम चलन बन गया है, और इसे ग्रामीण क्षेत्रों में भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इस कानून को उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू किया जाना चाहिए, और ऐसी व्यवस्थाएं बनाई जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कानून का इस्तेमाल कॉर्पोरेट या व्यावसायिक हितों को साधने के लिए न किया जाए। बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों का कहना है कि NFSA (विशेषकर MDM - मिड-डे मील) के तहत NGO द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन में विविधता की कमी होती है, जिससे बच्चे कम खाना खाते हैं। यह ज़रूरी है कि बच्चे अपने भोजन का आनंद लें और उन्हें एक ही तरह के मेन्यू के बजाय अलग-अलग तरह के व्यंजन चखने को मिलें। मेन्यू तैयार करने में अभिभावकों और बड़ी कक्षाओं के छात्रों को सक्रिय रूप से शामिल करने की आवश्यकता है। इसमें सांस्कृतिक संदर्भ का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। भोजन में अलग-अलग खाद्य समूहों से विविधता होनी चाहिए - जैसे दालें/फलियां, अनाज/मोटे अनाज, वसा और तेल, सब्ज़ियाँ, डेयरी और दूध, तथा मांस/मछली/अंडे।
'स्कूल विकास एवं प्रबंधन समिति' (SDMC) को खाद्य आपूर्ति के प्रबंधन, स्वच्छता की निगरानी, सुरक्षित पानी की उपलब्धता, और भोजन के स्वाद व गुणवत्ता को सुनिश्चित करने में सक्रिय रूप से शामिल होना चाहिए। उन्हें MDM की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बड़ी उम्र के बच्चों को भी इसमें शामिल करना चाहिए। MDM और ICDS के तहत भोजन तैयार करते समय स्वच्छता बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए चावल, दाल और सब्जियों को साफ करने के लिए अलग से संसाधन आवंटित किए जाने चाहिए। भंडारण की सुविधाओं में सुधार किया जाना चाहिए ताकि सामग्री को नमी, चूहों, मक्खियों, कॉकरोच आदि से बचाया जा सके। भोजन तैयार करने और परोसने का काम पूरी तरह से स्वच्छ तरीके से होना चाहिए। कर्मचारियों को इस बात का नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए कि भोजन को स्वच्छता के साथ कैसे संभाला जाए। इसमें भोजन को छूने या परोसने से पहले, और शौचालय का इस्तेमाल करने के बाद, साबुन और पानी से अच्छी तरह हाथ धोना शामिल है। जैविक और रासायनिक प्रदूषण (contamination) की जांच के लिए खाद्य परीक्षण किया जाना चाहिए; खाद्य पदार्थों के पास जहरीले पदार्थ नहीं रखे जाने चाहिए; MDM (मध्याह्न भोजन) तैयार करते समय स्वच्छता से कोई समझौता न हो, इसके लिए साफ और सुरक्षित पेयजल की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी है।
विविध प्रकार के खाद्य पदार्थों के संबंध में यूनिसेफ (UNICEF) की सिफारिशों को तुरंत लागू किया जाना चाहिए और इन्हें 'पोषण के अधिकार' के हिस्से के रूप में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। यह अधिकार संविधान में दिए गए 'जीवन के अधिकार' से गहराई से जुड़ा हुआ है। कर्नाटक में पोषण से जुड़े कई संकेतक चिंताजनक हैं। इनमें से ज्यादातर में सुधार तब किया जा सकता है, जब NFSA (राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम) को मजबूत किया जाए, ताकि इसमें केवल अनाज ही नहीं, बल्कि विभिन्न खाद्य समूहों से जुड़े सब्सिडी वाले खाद्य पदार्थ भी शामिल हो सकें।
कानूनी दृष्टिकोण से, इस अध्ययन में पहचानी गई संरचनात्मक कमियों को दूर करने के लिए 'राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम' में लक्षित संशोधन करना अनिवार्य है। पहला, अधिनियम की धारा 4(2) में संशोधन किया जाना चाहिए ताकि कानूनी रूप से मिलने वाले लाभों का दायरा अनाज से आगे बढ़कर अन्य खाद्य समूहों तक फैले। इसमें दालें, खाद्य तेल, सब्जियां और अंडे व दूध जैसे प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थ स्पष्ट रूप से शामिल होने चाहिए। इस तरह के संशोधन से एक बड़ा बदलाव आएगा- हम एक सीमित 'खाद्य सुरक्षा' मॉडल (जो मुख्य रूप से केवल कैलोरी की पर्याप्तता पर केंद्रित है) से हटकर एक व्यापक 'पोषण सुरक्षा' ढांचे की ओर बढ़ सकेंगे। यह ढांचा आधुनिक पोषण विज्ञान और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार' के अनुरूप होगा। दूसरा, इस अधिनियम को लागू करने वाले ढांचे को काफी मजबूत करने की जरूरत है। धारा 16 को सशक्त बनाया जाना चाहिए ताकि राज्य खाद्य आयोगों को यह स्पष्ट अधिकार मिल सके कि वे नियमों का पालन न होने पर प्रशासनिक दंड लगा सकें। इसके अलावा, शिकायतों के निवारण तंत्र को प्रभावी बनाने के लिए, अधिनियम में यह अनिवार्य होना चाहिए कि शिकायतों का समाधान 30 दिनों की तय समय-सीमा के भीतर हो जाए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो धारा 830 के तहत 'खाद्य सुरक्षा भत्ता' पाने का अधिकार अपने आप मिल जाना चाहिए। इससे प्रक्रियात्मक देरी खत्म होगी, जो अभी के समय में समाधान को केवल कागजी या बेअसर बना देती है।
आगे के कानूनी सुधारों में सेवा वितरण के बदलते स्वरूप और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के अधिकारों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। चूंकि वैधानिक कार्यों को निजी संस्थाओं को सौंपने का चलन बढ़ रहा है - विशेष रूप से 'मिड-डे मील योजना' के तहत केंद्रीयकृत रसोई (सेंट्रलाइज्ड किचन) चलाने के मामले में - इसलिए इस कानून में संशोधन करके जवाबदेही के स्पष्ट तंत्र (अकाउंटेबिलिटी मैकेनिज्म) जोड़े जाने चाहिए। इनमें पोषण संबंधी ऑडिट (न्यूट्रिशनल ऑडिट) को सार्वजनिक करना, स्वतंत्र थर्ड-पार्टी मूल्यांकन, और ऐसे मानक तय करना शामिल है जो यह सुनिश्चित करें कि परोसा जाने वाला भोजन संबंधित समुदायों की सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप हो। इसके साथ ही, कानून में संशोधन करके अंतर-राज्यीय प्रवासी श्रमिकों के लिए उनके हक (एनटाइटलमेंट्स) की 'कानूनी पोर्टेबिलिटी' की व्यवस्था करना भी बेहद जरूरी है। यह एक ऐसा कमजोर वर्ग है जिसे अक्सर सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा जाता है। 'नेशनल कैंपेन फॉर डिग्निटी एंड राइट्स ऑफ सीवरेज एंड एलाइड वर्कर्स' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों के आधार पर, इस तरह के संशोधन से एक केंद्रीयकृत और इंटरऑपरेबल (आपस में जुड़ा हुआ) सिस्टम अनिवार्य हो जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि प्रवासी परिवार अपने काम की जगह पर भी अपने हिस्से का राशन प्राप्त कर सकें।
(लेखक वकील हैं और बेंगलुरु के सेंट जोसेफ कॉलेज ऑफ लॉ (SJCL) के निदेशक भी हैं; यह लेख सेंट जोसेफ लॉ कॉलेज के छात्रों द्वारा किए गए एक अध्ययन पर आधारित है।)
नोट:
इस अध्ययन की रूपरेखा तैयार करने और विश्लेषण में सहयोग के लिए डॉ. सिल्विआ करपागम; SJCL की प्रिंसिपल पॉलीन प्रिया; लॉ कॉलेज की छात्राएं विमला मैरी, रीथू एंथनी और कृतिका जैन; सेंटर फॉर नॉन-फॉर्मल एजुकेशन (CNFE), विजयपुरा; अनन्या चिल्ड्रन्स ट्रस्ट, लिंगराजपुरम, बेंगलुरु; और सेंटर फॉर इंटीग्रल रूरल वेलफेयर (CIRF), अनेकल के स्टाफ का आभार।
References
[1] The National Food Security Act, 2013 No. 20 of 2013
[2] Thankachan P, Selvam S, Narendra AR, Mishra HN, Sachdev HS, Thomas T, et al. There should always be a free lunch: the impact of COVID-19 lockdown suspension of the mid-day meal on nutriture of primary school children in Karnataka, India. BMJ Nutrition, Prevention & Health. 2022;:e000358. https://doi.org/10.1136/bmjnph-2021-000358
[3] Pinglay-Plumber P. Preschools, daycares disappear into COVID gap; Govt indifferent. Citizen matters. 2021 September 31. https://citizenmatters.in/bengalurus-preschools-daycares-disappear-covid...
[3] People’s Union for Civil Liberties v. Union of India & Ors, In the Supreme Court of India, Civil Original Jurisdiction, Writ Petition (Civil) No.196 of 2001 https://www.escr-net.org/caselaw/2006/peoples-union-civil-liberties-v-un...
[4] Supra note 1
[4] Food security and nutrition security – what is the problem and what is the difference, Summary of the FSN Forum discussion, No. 34, Food and Agriculture Organisation http://km.fao.org/fileadmin/user_upload/fsn/docs/PROCEEDINGS_FoodSecurit...
[5] The nutrition situation in Northern Laos – determinants of malnutrition and changes after four years of intensive interventions (S. Kaufmann). http://geb.uni-giessen.de/geb/volltexte/2009/6904/pdf/KaufmannSilvia-200...).
[6] Midday meal: External agencies to supply eggs at schools in Karnataka. The Hindu. 2022 July 20. https://www.thehindu.com/news/cities/bangalore/akshaya-patra-mid-day-mea...
[7] Supra note 5
[8] Food security and nutrition security – what is the problem and what is the difference, Summary of the FSN Forum discussion, No. 34, Food and Agriculture Organisation http://km.fao.org/fileadmin/user_upload/fsn/docs/PROCEEDINGS_FoodSecurit...
[9] The nutrition situation in Northern Laos – determinants of malnutrition and changes after four years of intensive interventions (S. Kaufmann). http://geb.uni-giessen.de/geb/volltexte/2009/6904/pdf/KaufmannSilvia-200...).
[10] Supra note 1
[11] Midday meal: External agencies to supply eggs at schools in Karnataka. The Hindu. 2022 July 20. https://www.thehindu.com/news/cities/bangalore/akshaya-patra-mid-day-mea...
[12] Barman, S.R. (2022) Karnataka study shows eggs in mid-day meals help children’s growth, The Indian Express. Available at: https://indianexpress.com/article/education/karnataka-study-shows-eggs-in- mid-day-meals-help-childrens-growth-8078892/ (Accessed: November 28, 2022).
[13] Impact Assessment study on providing supplementary nutrition under mid-day meal scheme in Yadgir (Intervention) and Gadag (Control) district. Department of Public Instruction, Government of Karnataka, 2021-22, Karnataka State Rural development and Panchayat Raj University, Gadag.
[14] Azim Premji Foundation signs MoU with Karnataka government to provide eggs to students on all days of the week in mid-day meal. The Hindu. 2024 July 20. https://www.thehindu.com/news/national/karnataka/azim-premji-foundation-...
[15] Vikhar Ahmed Sayeed. Akshaya Patra Foundation under the scanner. Frontline. 2020 December 11. https://frontline.thehindu.com/the-nation/independent-trustees-of-akshay...
[16] Jayachandran N and Ram T. Akshaya Patra mid-day meal controversy: Will Food Commission meeting iron out issues? The Newsminute. 2019 December 18. https://www.thenewsminute.com/karnataka/akshaya-patra-mid-day-meal-contr...
[17] Section 14, The National Food Security Act, 2013 No. 20 of 2013
[18] Section 16, The National Food Security Act, 2013 No. 20 of 2013
[19] Section 8 , The National Food Security Act, 2013 No. 20 of 2013
[20] Ministry of Health and Family Welfare (MoHFW), Government of India, UNICEF and the Population Council. 2019. Comprehensive National Nutrition Survey (CNNS) Karnataka Report. New Delhi.
[21] Chamois S, Singh A, Anand S, Shivika. Advocacy for Healthy Diets: Nutrition Brief Series Nutrition Brief 5 of 6 – Nutrition Matters: Diet Diversity. UNICEF India. 2025 September. https://www.unicef.org/india/media/17476/file/UNICEF%20(nutrition)-%20reports-2025%2009%20Brief%20Nutrition%20Diversity.pdf.pdf
[1] The mathrupoorna Scheme is a Karnataka government initiative launched on October 2, 2017, to improve the nutritional status of pregnant and lactating mothers by providing one full hot cooked meal daily for 25 days a month at Anganwadi centers
[2] Infant mortality rate (IMR) is the probability of a child born in a specific year dying before reaching the age of one and expressed as a rate per 1000 live births
[3] Under-five mortality rate is the probability of a child dying between birth and five years of age, expressed per 1000 live births.