हिरासत में लिए गए लोगों में दो प्रमुख श्रमिक यूनियनों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। प्रदर्शनकारी श्रमिक बिना वेतन कटौती के रविवार को साप्ताहिक अवकाश, काम के घंटे आठ घंटे तक सीमित करने, समय पर वेतन भुगतान और वेतन वृद्धि की मांग कर रहे थे।

प्रतीकात्मक तस्वीर;फोटो: पीटीआई
गुजरात के सूरत और आसपास के इलाकों में कपड़ा उद्योग की कढ़ाई सहित अन्य औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले 70 से अधिक श्रमिकों को गुरुवार (15 अक्टूबर) को सत्याग्रह के दौरान हिरासत में ले लिया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में दो प्रमुख श्रमिक यूनियनों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। श्रमिक रविवार को बिना वेतन कटौती के साप्ताहिक अवकाश, काम के घंटे आठ घंटे तक सीमित करने, समय पर वेतन भुगतान और वेतन वृद्धि की मांग कर रहे थे।
खबरों के अनुसार, सूरत की कढ़ाई और अन्य औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले करीब 10,000 श्रमिकों ने गुरुवार को अठवा लाइंस स्थित कलेक्टर कार्यालय पर सामूहिक सत्याग्रह करने का आह्वान किया था।
श्रमिकों और विभिन्न कार्यकर्ता समूहों को एकत्र होने या अठवा लाइंस की ओर जाने से रोकने के लिए शहर के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में पुलिस बसें और वैन तैनात की गई थीं। अपनी मांगों को लेकर जब श्रमिक कलेक्टर कार्यालय के पास जुटे, तो पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी। पुलिस ने आधिकारिक अनुमति नहीं होने का हवाला देते हुए कई श्रमिकों को हिरासत में ले लिया।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार दिलीप क्षत्रिय द्वारा एक्स पर पोस्ट किए गए वीडियो में हिरासत की कार्रवाई के बाद कलेक्टर कार्यालय के बाहर मची अफरा-तफरी दिखाई दे रही है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिरासत में लेने की कार्रवाई सुबह सवेरे शुरू हुई और दोपहर तक जारी रही। श्रमिक नेता सुरेश सोनवणे और मलखान वर्मा भी हिरासत में लिए गए लोगों में शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें पांडेसरा पुलिस थाने ले जाया गया।
प्रमुख मांगें
कारखाना मालिकों की ओर से श्रमिकों की मांगों को बार-बार नजरअंदाज किए जाने के कारण यह विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। श्रमिकों की प्रमुख मांगों में साप्ताहिक अवकाश और कानून के अनुसार हर महीने की पहली से सात तारीख के बीच वेतन का भुगतान शामिल है। श्रमिकों का कहना है कि वे पिछले करीब चार महीनों से इन मुद्दों को उठा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला है।
गौरतलब है कि सूरत देश के प्रमुख कपड़ा और कढ़ाई उद्योग केंद्रों में शामिल है। यहां श्रमिकों का यह आंदोलन अगस्त में शुरू हुआ था। इसकी शुरुआत अमरोली की कढ़ाई इकाइयों में काम करने वाले श्रमिकों ने की थी। धीरे-धीरे यह आंदोलन शहर के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों और फिर जिले के दूसरे हिस्सों तक फैल गया।
द वायर ने लिखा है कि गुजरात प्रदेश आईएनटीयूसी के अध्यक्ष और आंदोलन के नेता नैषध देसाई ने दैनिक भास्कर के मुताबिक कहा कि श्रमिकों ने कलेक्टर कार्यालय में शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने का फैसला लिया था। उन्होंने करीब 10,000 श्रमिकों से इसमें शामिल होने की अपील की थी। देसाई ने कहा कि उनकी कोशिश है कि सूरत की फैक्ट्रियों का कामकाज भी जारी रहे और श्रमिकों का सत्याग्रह भी सफल हो।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नैषध देसाई ने बताया कि श्रमिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने रविवार को एक बैठक की थी। इसमें गुरुवार को जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपने का निर्णय लिया गया था। देसाई के मुताबिक, सुरेश सोनवणे और वर्मा ने ज्ञापन सौंपने के लिए पुलिस से अनुमति मांगी थी, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं मिली। इसके बाद दोनों को अलग-अलग समय पर गिरफ्तार कर लिया गया।
देसाई ने कहा कि श्रमिकों की केवल दो स्पष्ट मांगें हैं। पहली, उन्हें हर सप्ताह एक दिन का अवकाश दिया जाए और दूसरी, कानून के अनुसार हर महीने की पहली से सात तारीख के बीच वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे पहले तीन बार ज्ञापन सौंपने के बावजूद चैंबर, फैक्ट्री इंस्पेक्टर और श्रम आयुक्त ने न तो श्रमिकों के साथ बैठक कर बातचीत की और न ही विवाद सुलझाने की कोई पहल की।
‘रविवार की छुट्टी मांगने पर नौकरी से निकाला’
रविवार को साप्ताहिक अवकाश की मांग करने के बाद नौकरी गंवाने वाले आनंद कुशवाहा ने आरोप लगाया कि कारखाना मालिक श्रमिकों को काम पर रखने से रोकने के लिए अन्य मालिकों के बीच उनके वीडियो साझा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मालिक श्रमिकों पर दूसरे कर्मचारियों को उकसाने का आरोप लगाते हैं और साफ कह देते हैं कि उन्हें साप्ताहिक छुट्टी नहीं दी जाएगी।
कुशवाहा ने अखबार से कहा, “मैं पिछले डेढ़ महीने से बेरोजगार हूं और घर पर बैठा हूं। मेरे जैसे अनगिनत श्रमिकों को इसी तरह गलत तरीके से नौकरी से निकाल दिया गया है।”
उन्होंने बताया कि पिछले डेढ़ महीने से काम नहीं मिलने के कारण वह अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए दोस्तों और रिश्तेदारों से 500 और 1,000 रुपये उधार ले रहे हैं।
श्रमिकों ने कहा कि उनकी लड़ाई किसी एक कारखाना मालिक के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सरकारी तंत्र के खिलाफ है जो कानून लागू करने में नाकाम रहा है।
कुशवाहा ने आगे आरोप लगाया कि कलेक्टर और श्रम विभाग को तीन बार व्यक्तिगत रूप से लिखित ज्ञापन सौंपने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप नहीं करता और साप्ताहिक अवकाश व वेतन से जुड़े नियमों को कानून के अनुसार लागू नहीं कराता, तो सूरत में श्रमिकों का आंदोलन और तेज किया जाएगा।
यह प्रदर्शन केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह के 9 अक्टूबर को हुए सूरत दौरे के कुछ दिनों बाद हुआ। अपने दौरे के दौरान मंत्री ने रोजगार की तलाश में श्रमिकों के अपने पैतृक गांवों की ओर लौटने को लेकर जताई जा रही चिंताओं को कमतर बताया था।
उन्होंने कहा था कि मिल मालिक और श्रमिक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनके मुताबिक, आदर्श संबंध वही है, जिसमें मिल मालिक श्रमिक को अपने परिवार का सदस्य माने और श्रमिक भी मिल मालिक को अपने परिवार का हिस्सा समझे।
गुजरात के कपड़ा उद्योग में यह मुद्दा केवल एक विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। श्रमिकों की मांगों ने श्रम कानूनों के पालन, प्रवासी मजदूरों के साथ होने वाले व्यवहार और औद्योगिक उत्पादन व श्रमिकों के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर;फोटो: पीटीआई
गुजरात के सूरत और आसपास के इलाकों में कपड़ा उद्योग की कढ़ाई सहित अन्य औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले 70 से अधिक श्रमिकों को गुरुवार (15 अक्टूबर) को सत्याग्रह के दौरान हिरासत में ले लिया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में दो प्रमुख श्रमिक यूनियनों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। श्रमिक रविवार को बिना वेतन कटौती के साप्ताहिक अवकाश, काम के घंटे आठ घंटे तक सीमित करने, समय पर वेतन भुगतान और वेतन वृद्धि की मांग कर रहे थे।
खबरों के अनुसार, सूरत की कढ़ाई और अन्य औद्योगिक इकाइयों में काम करने वाले करीब 10,000 श्रमिकों ने गुरुवार को अठवा लाइंस स्थित कलेक्टर कार्यालय पर सामूहिक सत्याग्रह करने का आह्वान किया था।
श्रमिकों और विभिन्न कार्यकर्ता समूहों को एकत्र होने या अठवा लाइंस की ओर जाने से रोकने के लिए शहर के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में पुलिस बसें और वैन तैनात की गई थीं। अपनी मांगों को लेकर जब श्रमिक कलेक्टर कार्यालय के पास जुटे, तो पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी। पुलिस ने आधिकारिक अनुमति नहीं होने का हवाला देते हुए कई श्रमिकों को हिरासत में ले लिया।
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार दिलीप क्षत्रिय द्वारा एक्स पर पोस्ट किए गए वीडियो में हिरासत की कार्रवाई के बाद कलेक्टर कार्यालय के बाहर मची अफरा-तफरी दिखाई दे रही है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिरासत में लेने की कार्रवाई सुबह सवेरे शुरू हुई और दोपहर तक जारी रही। श्रमिक नेता सुरेश सोनवणे और मलखान वर्मा भी हिरासत में लिए गए लोगों में शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें पांडेसरा पुलिस थाने ले जाया गया।
प्रमुख मांगें
कारखाना मालिकों की ओर से श्रमिकों की मांगों को बार-बार नजरअंदाज किए जाने के कारण यह विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। श्रमिकों की प्रमुख मांगों में साप्ताहिक अवकाश और कानून के अनुसार हर महीने की पहली से सात तारीख के बीच वेतन का भुगतान शामिल है। श्रमिकों का कहना है कि वे पिछले करीब चार महीनों से इन मुद्दों को उठा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई समाधान नहीं निकला है।
गौरतलब है कि सूरत देश के प्रमुख कपड़ा और कढ़ाई उद्योग केंद्रों में शामिल है। यहां श्रमिकों का यह आंदोलन अगस्त में शुरू हुआ था। इसकी शुरुआत अमरोली की कढ़ाई इकाइयों में काम करने वाले श्रमिकों ने की थी। धीरे-धीरे यह आंदोलन शहर के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों और फिर जिले के दूसरे हिस्सों तक फैल गया।
द वायर ने लिखा है कि गुजरात प्रदेश आईएनटीयूसी के अध्यक्ष और आंदोलन के नेता नैषध देसाई ने दैनिक भास्कर के मुताबिक कहा कि श्रमिकों ने कलेक्टर कार्यालय में शांतिपूर्ण सत्याग्रह करने का फैसला लिया था। उन्होंने करीब 10,000 श्रमिकों से इसमें शामिल होने की अपील की थी। देसाई ने कहा कि उनकी कोशिश है कि सूरत की फैक्ट्रियों का कामकाज भी जारी रहे और श्रमिकों का सत्याग्रह भी सफल हो।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नैषध देसाई ने बताया कि श्रमिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने रविवार को एक बैठक की थी। इसमें गुरुवार को जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपने का निर्णय लिया गया था। देसाई के मुताबिक, सुरेश सोनवणे और वर्मा ने ज्ञापन सौंपने के लिए पुलिस से अनुमति मांगी थी, लेकिन उन्हें अनुमति नहीं मिली। इसके बाद दोनों को अलग-अलग समय पर गिरफ्तार कर लिया गया।
देसाई ने कहा कि श्रमिकों की केवल दो स्पष्ट मांगें हैं। पहली, उन्हें हर सप्ताह एक दिन का अवकाश दिया जाए और दूसरी, कानून के अनुसार हर महीने की पहली से सात तारीख के बीच वेतन का भुगतान सुनिश्चित किया जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि इससे पहले तीन बार ज्ञापन सौंपने के बावजूद चैंबर, फैक्ट्री इंस्पेक्टर और श्रम आयुक्त ने न तो श्रमिकों के साथ बैठक कर बातचीत की और न ही विवाद सुलझाने की कोई पहल की।
‘रविवार की छुट्टी मांगने पर नौकरी से निकाला’
रविवार को साप्ताहिक अवकाश की मांग करने के बाद नौकरी गंवाने वाले आनंद कुशवाहा ने आरोप लगाया कि कारखाना मालिक श्रमिकों को काम पर रखने से रोकने के लिए अन्य मालिकों के बीच उनके वीडियो साझा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि मालिक श्रमिकों पर दूसरे कर्मचारियों को उकसाने का आरोप लगाते हैं और साफ कह देते हैं कि उन्हें साप्ताहिक छुट्टी नहीं दी जाएगी।
कुशवाहा ने अखबार से कहा, “मैं पिछले डेढ़ महीने से बेरोजगार हूं और घर पर बैठा हूं। मेरे जैसे अनगिनत श्रमिकों को इसी तरह गलत तरीके से नौकरी से निकाल दिया गया है।”
उन्होंने बताया कि पिछले डेढ़ महीने से काम नहीं मिलने के कारण वह अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए दोस्तों और रिश्तेदारों से 500 और 1,000 रुपये उधार ले रहे हैं।
श्रमिकों ने कहा कि उनकी लड़ाई किसी एक कारखाना मालिक के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सरकारी तंत्र के खिलाफ है जो कानून लागू करने में नाकाम रहा है।
कुशवाहा ने आगे आरोप लगाया कि कलेक्टर और श्रम विभाग को तीन बार व्यक्तिगत रूप से लिखित ज्ञापन सौंपने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि प्रशासन समय रहते हस्तक्षेप नहीं करता और साप्ताहिक अवकाश व वेतन से जुड़े नियमों को कानून के अनुसार लागू नहीं कराता, तो सूरत में श्रमिकों का आंदोलन और तेज किया जाएगा।
यह प्रदर्शन केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह के 9 अक्टूबर को हुए सूरत दौरे के कुछ दिनों बाद हुआ। अपने दौरे के दौरान मंत्री ने रोजगार की तलाश में श्रमिकों के अपने पैतृक गांवों की ओर लौटने को लेकर जताई जा रही चिंताओं को कमतर बताया था।
उन्होंने कहा था कि मिल मालिक और श्रमिक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। उनके मुताबिक, आदर्श संबंध वही है, जिसमें मिल मालिक श्रमिक को अपने परिवार का सदस्य माने और श्रमिक भी मिल मालिक को अपने परिवार का हिस्सा समझे।
गुजरात के कपड़ा उद्योग में यह मुद्दा केवल एक विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। श्रमिकों की मांगों ने श्रम कानूनों के पालन, प्रवासी मजदूरों के साथ होने वाले व्यवहार और औद्योगिक उत्पादन व श्रमिकों के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
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