नई दिल्ली। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और मोदी सरकार के बीच पैसे को लेकर चल रही तनातनी के बीच खबर आ रही थी कि आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल के बाद डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उर्जित पटेल ने सोमवार दोपहर निजी कारण बताते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया था। इसके बाद देर शाम डेप्युटी गवर्नर विरल आचार्य ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 20 जनवरी 2017 को आरबीआई के डेप्युटी गवर्नर का पद संभालने वाले विरल आचार्य ने भी अपने इस्तीफे का कारण निजी बताया है। इस तरह की खबरें आने के बाद आरबीआई ने इन्हें बेसलैस बताया है। आरबीआई की तरफ से बयान जारी किया गया है कि विरल आचार्य की खबरें आधारहीन हैं वे अपने पद पर बने हुए हैं।

उर्जित पटेल और विरल आचार्य के तत्काल प्रभाव से दिए गए इस्तीफे का मतलब है कि अब आरबीआई और केन्द्र सरकार के बीच तालमेल पूरी तरह बिखर गया है और पटेल के लिए इस पद पर खुद को जारी रखना नामुमकिन हो गया था।
हाल ही में केन्द्रीय बैंक गवर्नर और केन्द्र सरकार में स्वायत्तता को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। विवाद केन्द्र सरकार द्वारा आरबीआई के खजाने में पड़े सिक्योरिटी डिपॉजिट को लेकर था। रिपोर्ट के मुताबिक केन्द्र सरकार केन्द्रीय रिजर्व से अधिक अंश की मांग कर रहा था। हालांकि इस विवाद के बाद केन्द्र सरकार ने बयान दिया था कि उसके और आरबीआई के बीच स्वायत्तता को लेकर कोई विवाद नहीं है।
केन्द्रीय रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के बीच खींचतान बीते कई महीनों से जारी थी। इन विवादों को सुलझाने के लिए आरबीआई बोर्ड ने 19 नवंबर को मैराथन बैठक करते हुए दोनों केन्द्र सरकार और केन्द्रीय बैंक में नए सिरे से सामंजस्य बैठाने के लिए कई अहम फैसले लिए थे। इसमें आरबीआई और केन्द्र सरकार को मिलकर एक एक्सपर्ट समिति गठित करनी थी। इस समिति को आरबीआई और केन्द्र सरकार के बीच जारी विवादों की समीक्षा करने के साथ उनके हल पर काम करना था। वहीं इस समिति को गठित करने में केन्द्रीय बैंक के साथ-साथ केन्द्र सरकार को भी अहम किरदार दिया गया था। उर्जित पटेल के इस इस्तीफे से जाहिर है कि इस समिति को गठित करने के काम को दोनों आरबीआई और केन्द्र सरकार मिलकर नहीं कर पाई हैं।
RBI और केन्द्र सरकार के बीच कई संवेदनशील मामलों में विवाद की स्थिति का खुलासा अक्टूबर के अंत में तब हुआ जब RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने दावा किया कि RBI के कामकाज में दखल देने से देश के लिए खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। आचार्य के इस बयान के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई पर आरोप लगाया था कि 2008 से 2014 तक केन्द्रीय बैंक ने कर्ज बांटने के काम की अनदेखी की और देश के सामने गंभीर एनपीए की समस्या खड़ी हो गई।

उर्जित पटेल और विरल आचार्य के तत्काल प्रभाव से दिए गए इस्तीफे का मतलब है कि अब आरबीआई और केन्द्र सरकार के बीच तालमेल पूरी तरह बिखर गया है और पटेल के लिए इस पद पर खुद को जारी रखना नामुमकिन हो गया था।
हाल ही में केन्द्रीय बैंक गवर्नर और केन्द्र सरकार में स्वायत्तता को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। विवाद केन्द्र सरकार द्वारा आरबीआई के खजाने में पड़े सिक्योरिटी डिपॉजिट को लेकर था। रिपोर्ट के मुताबिक केन्द्र सरकार केन्द्रीय रिजर्व से अधिक अंश की मांग कर रहा था। हालांकि इस विवाद के बाद केन्द्र सरकार ने बयान दिया था कि उसके और आरबीआई के बीच स्वायत्तता को लेकर कोई विवाद नहीं है।
केन्द्रीय रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार के बीच खींचतान बीते कई महीनों से जारी थी। इन विवादों को सुलझाने के लिए आरबीआई बोर्ड ने 19 नवंबर को मैराथन बैठक करते हुए दोनों केन्द्र सरकार और केन्द्रीय बैंक में नए सिरे से सामंजस्य बैठाने के लिए कई अहम फैसले लिए थे। इसमें आरबीआई और केन्द्र सरकार को मिलकर एक एक्सपर्ट समिति गठित करनी थी। इस समिति को आरबीआई और केन्द्र सरकार के बीच जारी विवादों की समीक्षा करने के साथ उनके हल पर काम करना था। वहीं इस समिति को गठित करने में केन्द्रीय बैंक के साथ-साथ केन्द्र सरकार को भी अहम किरदार दिया गया था। उर्जित पटेल के इस इस्तीफे से जाहिर है कि इस समिति को गठित करने के काम को दोनों आरबीआई और केन्द्र सरकार मिलकर नहीं कर पाई हैं।
RBI और केन्द्र सरकार के बीच कई संवेदनशील मामलों में विवाद की स्थिति का खुलासा अक्टूबर के अंत में तब हुआ जब RBI के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने दावा किया कि RBI के कामकाज में दखल देने से देश के लिए खतरनाक स्थिति पैदा हो सकती है। आचार्य के इस बयान के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई पर आरोप लगाया था कि 2008 से 2014 तक केन्द्रीय बैंक ने कर्ज बांटने के काम की अनदेखी की और देश के सामने गंभीर एनपीए की समस्या खड़ी हो गई।