परीक्षा संकट ने छेड़ी जवाबदेही की लड़ाई

Written by sabrang india | Published on: July 22, 2026
छात्रों की शिकायतों से लेकर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल तक, इस आंदोलन ने जवाबदेही, लोकतंत्र और राज्य के दखल की सीमाओं पर सवाल उठाए।


Image: J Allen Egenuse / The Hindu

दिल्ली के जंतर-मंतर के आस-पास की सड़कें 20 जुलाई, 2026 को तेजी से बढ़ते टकराव का केंद्र बन गईं। यह टकराव शिक्षा व्यवस्था में कथित नाकामियों के लिए जवाबदेही की मांग कर रहे छात्रों के नेतृत्व वाले आंदोलन और उस सरकार के बीच था जो विरोध प्रदर्शन को संसद की ओर बढ़ने से रोकने पर अड़ी हुई थी। भारी सुरक्षा तैनाती, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा, मध्य दिल्ली में बैरिकेड्स और संसद के आस-पास पाबंदियों के बावजूद, हजारों प्रदर्शनकारी प्रस्तावित "चलो संसद" मार्च के लिए इकट्ठा हुए।






यह दिन एक तेज होती राजनीतिक और कानूनी लड़ाई के माहौल में गुजरा। आंदोलन का एक प्रमुख चेहरा बन चुके सोनम वांगचुक, 18 जुलाई को जंतर-मंतर से हटाए जाने के बाद सफदरजंग अस्पताल में डॉक्टर की देखरेख में भूख हड़ताल करते रहे। अस्पताल में भर्ती होने के बाद भी, वांगचुक ने कहा कि वे तब तक अपना उपवास जारी रखेंगे जब तक सरकार शिक्षा व्यवस्था में हालिया नाकामियों - खासकर परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और प्रश्न पत्र लीक - के लिए जवाबदेही तय नहीं करती, या जब तक चुने हुए प्रतिनिधि उन्हें यह भरोसा नहीं दिलाते कि इन मुद्दों को संसद में उठाया जाएगा।

सोनम वांगचुक के उपवास के साथ-साथ, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) से जुड़े छात्र कार्यकर्ताओं ने भी लगातार भूख हड़ताल की। तीन छात्रों - नेहा, मनीष और आमीन - ने व्यापक आंदोलन के समर्थन में अपना अनिश्चितकालीन उपवास जारी रखा और इस बात पर जोर दिया कि परीक्षा में नाकामियों का युवा उम्मीदवारों पर सीधा असर पड़ा है। उनका विरोध प्रदर्शन 23 दिनों तक चला। इसके बाद, सांसदों, नागरिक समाज के प्रतिनिधियों और सार्वजनिक हस्तियों के एक प्रतिनिधिमंडल की अपील पर उन्होंने 20 जुलाई को उपवास खत्म करने का फैसला किया। प्रतिनिधिमंडल ने उनसे संसदीय हस्तक्षेप और जन-अभियानों के जरिए संघर्ष जारी रखने का आग्रह किया था।


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इस बीच, जब प्रदर्शनकारियों ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की, तो दिल्ली में सुरक्षा का भारी इंतजाम देखा गया। मध्य दिल्ली के इलाकों में बैरिकेड्स, पुलिस की तैनाती, अर्धसैनिक बल और आवाजाही पर पाबंदियां लगाई गईं। सरकारी हिंसा की खबरें, प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के आरोप और पुलिस द्वारा इन आरोपों से इनकार करने की वजह से शांतिपूर्ण विरोध को संभालने के सरकार के तरीके पर बहस और तेज हो गई। प्रशासन ने सार्वजनिक व्यवस्था और संसद की सुरक्षा का हवाला देते हुए अपनी कार्रवाई को सही ठहराया, जबकि प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि जवाबदेही की मांग करने वाले आंदोलन को दबाने के लिए एहतियाती पाबंदियों का इस्तेमाल किया जा रहा था।









इसलिए, 20 जुलाई की घटनाएं इस आंदोलन में एक निर्णायक मोड़ साबित हुईं। भारत की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर छात्रों की ओर से जवाब मांगने के तौर पर शुरू हुई यह मांग एक बड़े संवैधानिक संघर्ष में बदल गई। इसमें शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार, सार्वजनिक सभाओं को नियंत्रित करने की सरकार की शक्ति, भूख हड़ताल करने वाले व्यक्ति की स्वायत्तता और जनता की शिकायतों पर प्रतिक्रिया देने की लोकतांत्रिक संस्थाओं की जिम्मेदारी जैसे मुद्दे शामिल थे।

शुरुआत: NEET संकट से उपजा एक आंदोलन

इस लामबंदी की तत्काल वजह 3 मई, 2026 को आयोजित NEET-UG 2026 परीक्षा से जुड़ा विवाद था। पेपर लीक और परीक्षा की निष्पक्षता से समझौता होने के आरोपों के कारण नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) को 12 मई, 2026 को परीक्षा रद्द करनी पड़ी और परीक्षा की नई तारीख की घोषणा करनी पड़ी, जो बाद में 21 जून, 2026 को आयोजित की गई।

नेशनल एलिजिबिलिटी-कम-एंट्रेंस टेस्ट (NEET-UG) देश भर के मेडिकल कॉलेजों में दाखिले का आधार तय करता है और लाखों उम्मीदवार इसे अपने शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य की एक निर्णायक परीक्षा मानते हैं। इसलिए, गड़बड़ी और प्रक्रियात्मक खामियों के आरोपों ने छात्रों, अभिभावकों और नागरिक समाज समूहों के बीच व्यापक आक्रोश पैदा किया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या परीक्षा प्रणाली निष्पक्षता और योग्यता की रक्षा करने में विफल रही है।

इस विवाद ने एक गहरा मानवीय पहलू तब अख्तियार किया जब छात्रों में गंभीर मानसिक तनाव की खबरें सामने आईं, जिनमें परीक्षा से जुड़े दबाव और नतीजों को लेकर अनिश्चितता से कथित तौर पर जुड़ी आत्महत्याएं भी शामिल थीं। कई प्रदर्शनकारियों के लिए, यह मुद्दा केवल एक परीक्षा में हुई अनियमितता तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में जवाबदेही के एक बड़े संकट को दर्शाता था।



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इस पृष्ठभूमि में, छात्रों और नागरिक समाज समूहों ने लामबंद होना शुरू किया और पारदर्शिता, कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही और परीक्षा प्रक्रिया में विश्वास बहाल करने के उपायों की मांग की।

इस आंदोलन ने नई दिल्ली में लोकतांत्रिक विरोध के ऐतिहासिक स्थल जंतर-मंतर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। संसद के बेहद करीब स्थित जंतर-मंतर दशकों से एक ऐसी जगह रही है जहां नागरिक, छात्र, श्रमिक और नागरिक समाज संगठन अपनी शिकायतों को सीधे सार्वजनिक मंच पर लाते रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों के लिए, जंतर-मंतर पर इकट्ठा होना सिर्फ विरोध करने का एक तरीका नहीं था। यह सरकार से एक संवैधानिक अपील थी - एक ऐसी मांग कि लाखों युवाओं की जिदगी पर असर डालने वाली परीक्षाएं आयोजित करने वाले संस्थानों को निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़े सवालों का जवाब देना चाहिए।

आंदोलन में सोनम वांगचुक का शामिल होना

सोनम वांगचुक के विरोध में शामिल होने के फैसले ने इस मुहिम को और ज्यादा राष्ट्रीय पहचान दिलाया, जो पहले से ही छात्रों, अभिभावकों, सिविल सोसाइटी समूहों और देश भर के समर्थकों को मिलाकर एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुकी थी। 28 जून, 2026 को जंतर-मंतर पर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू करने का उनका फैसला इस आंदोलन के अहम पलों में से एक पल बन गया। वांगचुक ने कहा कि उनके उपवास का मकसद हाल की उन नाकामियों के लिए जवाबदेही तय करना था जिनसे छात्र प्रभावित हुए हैं, जिनमें परीक्षा में कथित गड़बड़ियां और प्रश्न पत्र लीक होना शामिल है। हालांकि, विरोध के दौरान उनकी मांगों का स्वरूप बदलता गया। जहां CJP के नेतृत्व में चल रहे व्यापक आंदोलन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को प्रमुखता से उठाया था, वहीं वांगचुक की बाद की शर्तें मुख्य रूप से शिक्षा प्रणाली में नाकामियों को सरकार द्वारा स्वीकार करने, शिक्षा में जवाबदेही पर संसदीय चर्चा और चुने हुए प्रतिनिधियों से सुधारों के आश्वासन पर केंद्रित थीं।

आंदोलन में उनका शामिल होना इसलिए अहम था क्योंकि भारत में भूख हड़ताल का एक लंबा राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास रहा है। महात्मा गांधी के सत्याग्रहों से लेकर बाद के जन-आंदोलनों तक, उपवास का इस्तेमाल अक्सर शारीरिक टकराव के बजाय नैतिक रूप से मनाने या समझाने के तरीके के तौर पर किया जाता रहा है।

वांगचुक ने 28 जून, 2026 को जंतर-मंतर पर अपनी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने 21 दिनों से ज्यादा समय तक उपवास जारी रखा और कहा कि उनका मकसद सरकार से टकराव के बजाय राजनीतिक जवाबदेही तय करना था। उनके इस फैसले ने विरोध प्रदर्शन को जल्द चर्चा में ला दिया। समर्थकों ने भूख हड़ताल को गांधीवादी प्रतिरोध के तौर पर देखा यानी एक स्वैच्छिक त्याग जिसका मकसद संस्थागत नाकामियों की ओर ध्यान खींचना था।

हालांकि, सरकार की प्रतिक्रिया एक अलग चिंता पर केंद्रित होती गई यानी वांगचुक की बिगड़ती सेहत और उन्हें गंभीर मेडिकल नुकसान से बचाने की सरकार की जिम्मेदारी। यही टकराव आगे चलकर दिल्ली हाई कोर्ट के सामने मुख्य कानूनी मुद्दा बन गया।


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तीन हफ्ते का बढ़ता आंदोलन: स्थानीय विरोध से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तक

लगभग तीन हफ्तों तक, जंतर-मंतर पर चल रहा विरोध प्रदर्शन धीरे-धीरे लोगों को एकजुट करने का केंद्र बन गया। शुरुआती दौर में रोजाना भीड़ जुटना, छात्रों की भागीदारी, भाषण और समर्थन देने के लिए लोगों का आना-जाना आम बात थी। समय के साथ, वांगचुक की भूख हड़ताल ने सिविल सोसाइटी समूहों, मशहूर हस्तियों और राजनीतिक नेताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा।

आंदोलन का संदेश सिर्फ परीक्षा से जुड़े विवाद तक ही सीमित नहीं रहा। इसने कई अहम मुद्दों पर सवाल उठाए:

● सरकारी संस्थानों की जवाबदेही;
● कामकाज में पारदर्शिता;
● सिस्टम की कमियों से प्रभावित छात्रों के साथ व्यवहार;
● चुने हुए प्रतिनिधियों का रवैया।

संसद के बाहर एक बुजुर्ग एक्टिविस्ट की लंबी भूख हड़ताल ने आंदोलन को और ज्यादा राजनीतिक महत्व दिया। जुलाई के मध्य तक, यह विरोध प्रदर्शन सिर्फ एक अलग-थलग प्रदर्शन न रहकर लोगों का एक बड़ा आंदोलन बन चुका था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, समर्थकों ने मॉनसून सत्र के दौरान संसद तक मार्च करने की योजना बनाई थी, जिससे भीड़ को संभालने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने को लेकर प्रशासन की चिंता बढ़ गई।

सरकार का दखल: चुप्पी से लेकर मेडिकल आधार पर कार्रवाई तक

जब सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का तीसरा हफ्ता शुरू हुआ, तो सरकार की प्रतिक्रिया के तरीके पर सवाल उठने लगे। यह विरोध सिर्फ भूख हड़ताल जारी रखने के बारे में नहीं था बल्कि इसकी जड़ें NEET परीक्षा संकट पर जवाबदेही, परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने में कथित विफलता और उन हजारों छात्रों की परेशानी से जुड़ी थीं जिनका शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हुआ था।

विरोध के शुरुआती दौर में, अधिकारियों ने इन बड़े मुद्दों को हल करने या छात्रों और सिविल सोसाइटी समूहों की मांगों पर सार्थक बातचीत करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। जंतर-मंतर पर वांगचुक की लंबी भूख हड़ताल और लोगों का बढ़ता ध्यान होने के बावजूद, प्रशासन ने उन्हें विरोध स्थल से हटाने या आंदोलन में सीधे दखल देने की तुरंत कोशिश नहीं की।

सरकार का दखल बाद में हुआ और वह भी मुख्य रूप से वांगचुक की सेहत को ध्यान में रखते हुए। यह बदलाव - आंदोलन की मुख्य मांगों पर सीमित बातचीत से हटकर मेडिकल आधार पर सक्रिय दखल तक - दिल्ली हाई कोर्ट में बहस के मुख्य मुद्दों में से एक मुद्दा बन गया।



प्रदर्शनकारी से सीधे बातचीत करने के बजाय, यह मामला वांगचुक की सेहत की मेडिकल निगरानी से जुड़ी कार्यवाही के जरिए दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा। उस समय कोर्ट का दखल सीमित था: कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता था कि उनकी सेहत की नियमित निगरानी हो और जरूरी मेडिकल मदद मिलती रहे। अहम बात यह है कि कोर्ट ने भूख हड़ताल खत्म करने का कोई आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने न तो वांगचुक को जंतर-मंतर से जबरदस्ती हटाने की मंजूरी दी और न ही सरकार को उनके विरोध-प्रदर्शन जारी रखने के फैसले को पलटने की इजाजत दी।

बाद में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रशासन ने मेडिकल निगरानी से जुड़े सीमित न्यायिक निर्देश को एक बहुत ज्यादा दखल देने वाली कार्रवाई का आधार बना लिया - यानी वांगचुक को विरोध-प्रदर्शन वाली जगह से हटाना और प्रदर्शन का समर्थन करने वालों की मर्जी के बिना उन्हें अस्पताल ले जाना। इसलिए, यह विवाद सिर्फ मेडिकल देखभाल के बारे में नहीं था बल्कि यह सरकारी अधिकारियों की शक्ति के दायरे के बारे में था।

18 जुलाई: जंतर-मंतर खाली कराना

18 जुलाई को, जब वांगचुक तीन हफ्ते से ज्यादा समय तक भूख हड़ताल कर चुके थे, तब दिल्ली पुलिस ने उन्हें जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन वाली जगह से हटाकर सफदरजंग अस्पताल पहुंचाया। पुलिस ने मेडिकल आधार पर इस कार्रवाई को सही ठहराया और कहा कि वांगचुक की हालत बिगड़ गई थी और उनकी सेहत की सुरक्षा के लिए यह दखल जरूरी था। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्टों में कहा गया कि पुलिस ने मेडिकल सलाह का सहारा लिया और फैसले को समझाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में हुई पिछली कार्यवाही का जिक्र किया। हालांकि, उन्हें हटाने का तरीका तुरंत विवाद का विषय बन गया।

प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस की कार्रवाई एक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी को जबरदस्ती हटाने जैसा था और तर्क दिया कि सरकार ने विरोध-प्रदर्शन को खत्म करने के लिए सेहत संबंधी चिंताओं का बहाना बनाया। घटनास्थल की तस्वीरों में भारी पुलिस बल और वांगचुक को ले जाते समय उन्हें घेरे हुए अफसर दिखे, जिससे समर्थकों ने बेवजह बल प्रयोग का आरोप लगाया। पुलिस ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि कार्रवाई संयम के साथ की गई थी और प्रदर्शनकारियों के विरोध के बाद दखल देना जरूरी हो गया था।

सरकार ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि वह असहमति को दबाने की कोशिश नहीं कर रही थी, बल्कि जीवन की रक्षा करने के अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा कर रही थी। अधिकारियों के अनुसार, जब मेडिकल चिंताएं गंभीर हो गईं, तो बिना दखल दिए उपवास जारी रखने की इजाजत देना किसी नागरिक की भलाई की अनदेखी करने जैसा होता। हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने इस दखल को अलग नजरिए से देखा। उन्होंने तर्क दिया कि वांगचुक सक्षम नागरिक हैं जो अपनी मर्जी से राजनीतिक विकल्प चुन रहे हैं और सरकार ने स्वास्थ्य संबंधी चिंता को एक कानूनी विरोध-प्रदर्शन को रोकने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया है। उनकी नजर में, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार में विरोध का तरीका और उसकी तीव्रता तय करने की आजादी शामिल है, जिसमें अपनी मर्जी से उपवास करना भी शामिल है।

इसलिए, इस विवाद ने तीन संवैधानिक गारंटियों के बीच सीधा टकराव पैदा कर दिया:

● अनुच्छेद 19(1)(a): बोलने व अभिव्यक्ति की आजादी, जिसमें राजनीतिक बातचीत और असहमति जताना शामिल है;
● अनुच्छेद 19(1)(b): शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने का अधिकार;
● अनुच्छेद 21: जीवन व व्यक्तिगत आजादी का अधिकार, जिसमें शरीर पर अपना अधिकार और फैसले लेने की आजादी शामिल है।

कोर्ट के सामने सवाल यह नहीं था कि क्या सरकार जीवन को महत्व देती है। सवाल यह था कि क्या सरकार उस आजादी को दरकिनार करके जीवन की रक्षा कर सकती है जिसे संवैधानिक आजादी बनाए रखना चाहती है।



19 जुलाई: गीतांजलि अंगमो ने सरकार की मनमानी को चुनौती देने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया

वांगचुक को अस्पताल ले जाए जाने के बाद, डॉ. गीतांजलि अंगमो ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की और जंतर-मंतर से उन्हें हटाए जाने के तरीके को चुनौती दी। 'लाइव लॉ' (LiveLaw) के अनुसार, याचिका में कई चिंताएं उठाई गईं:

● पुलिस द्वारा बल प्रयोग का आरोप;
● परिवार के सदस्यों, वकीलों और अपनी पसंद के डॉक्टरों से मिलने की इजाजत न देना;
● वांगचुक की मर्जी के बिना उन्हें मेडिकल सुविधा में ले जाना;
● उनके इलाज के तरीके चुनने में दखल देना;
● शरीर पर अपने अधिकार का उल्लंघन।

याचिका में यह तर्क नहीं दिया गया कि सरकार को वांगचुक के स्वास्थ्य की कोई परवाह नहीं है।

बल्कि, इसमें यह सवाल उठाया गया कि क्या यह चिंता किसी व्यस्क नागरिक के अपने शरीर के बारे में लिए गए स्वेच्छापूर्ण फैसले से ज्यादा अहम हो सकती है। संवैधानिक तर्क निजता और स्वायत्तता पर सुप्रीम कोर्ट की विकसित होती कानूनी समझ पर आधारित था। जस्टिस के.एस. पुट्टास्वामी (रिटायर्ड) बनाम भारत संघ मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने निजता को अनुच्छेद 21 के तहत आजादी का अहम हिस्सा माना, जिसमें फैसले लेने की स्वायत्तता और लोगों की व्यक्तिगत पसंद चुनने की क्षमता शामिल है।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह सिद्धांत भूख हड़ताल करने के विकल्प पर भी लागू होता है - यह राजनीतिक अभिव्यक्ति का एक ऐसा तरीका है जो ऐतिहासिक रूप से अहिंसक विरोध से जुड़ा रहा है। डॉ. अंग्मो की ओर से पेश होते हुए, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि राज्य स्वास्थ्य संबंधी चिंता को व्यक्तिगत स्वायत्तता (अपनी मर्जी से फैसला लेने की आजादी) को दरकिनार करने का आधार नहीं बना सकता। 'लाइव लॉ' (Livelaw) के अनुसार, उनका कहना था कि वांगचुक एक जागरूक नागरिक हैं जिन्होंने अपनी मर्जी से विरोध का यह तरीका चुना है। उन्होंने तर्क दिया कि मुद्दा यह नहीं था कि उपवास करना चिकित्सकीय रूप से सही है या नहीं। मुद्दा यह था कि क्या राज्य किसी व्यक्ति के कल्याण के बारे में अपनी समझ को उस व्यक्ति के अपने फैसले पर थोप सकता है।

सिब्बल ने जंतर-मंतर से वांगचुक को हटाए जाने के हालात पर सवाल उठाए और तर्क दिया कि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता मानो वह फैसले लेने में अक्षम हो, सिर्फ इसलिए कि राज्य उन फैसलों से सहमत नहीं है।

इस तर्क ने मामले को व्यापक संवैधानिक बहस के दायरे में ला खड़ा किया, जिसमें ये मुद्दे शामिल थे:

● पूरी जानकारी के साथ सहमति;
● चिकित्सा संबंधी स्वायत्तता;
● अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा;
● असहमति का अधिकार।

याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि लोकतांत्रिक अधिकार तभी सार्थक होते हैं जब नागरिकों को विरोध के ऐसे तरीके अपनाने की अनुमति हो जो लोकप्रिय न हों या असुविधाजनक हों।



राज्य का पक्ष: सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ने पुलिस की कार्रवाई का बचाव किया। राज्य का पक्ष यह था कि उन्हें हटाना विरोध को दबाने की कोशिश नहीं थी, बल्कि वांगचुक की जान बचाने के लिए जरूरी कदम था। ASG ने तर्क दिया कि अधिकारी चिकित्सा सलाह पर काम कर रहे थे और जब लंबे समय तक उपवास के बाद किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य बिगड़ रहा हो, तो राज्य चुप नहीं बैठ सकता। सरकार का तर्क अनुच्छेद 21 की एक अलग समझ पर आधारित था।

जहां याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 21 को स्वायत्तता और पसंद की गारंटी के तौर पर देखा, वहीं राज्य ने अनुच्छेद 21 को जीवन की रक्षा करने की सकारात्मक जिम्मेदारी के तौर पर देखा।

सरकार का मुख्य तर्क यह था: नागरिक की स्वायत्तता महत्वपूर्ण है, लेकिन राज्य ऐसी स्थिति को नजरअंदाज नहीं कर सकता जहां जीवन को गंभीर खतरा हो।

अदालत का संतुलन बनाने का प्रयास: जस्टिस मिनी पुष्करणा के समक्ष कार्यवाही ने एक मुश्किल संवैधानिक विरोधाभास को उजागर किया कि जीवन की रक्षा का दावा करने वाला राज्य, ऐसा करते हुए, उस आजादी को ही कमजोर कर सकता है जो लोकतांत्रिक विरोध को उसका अर्थ देती है।

अदालत के सामने मुख्य मुद्दा सिर्फ यह नहीं था कि सोनम वांगचुक को चिकित्सा सहायता की जरूरत है या नहीं। सवाल यह था कि क्या सरकार किसी जागरूक नागरिक की उस पसंद को नजरअंदाज करने के लिए उसकी सेहत की चिंता का हवाला दे सकती है, जिसने अपनी मर्जी से राजनीतिक विरोध के तौर पर भूख हड़ताल का रास्ता चुना हो।

याचिकाकर्ताओं की दलील इस विवाद की जड़ तक जाती थी कि सरकार ने तब उतनी तत्परता नहीं दिखाई थी जब प्रदर्शनकारी NEET परीक्षा संकट को लेकर जवाबदेही की मांग कर रहे थे, लेकिन जब विरोध के तरीके को नियंत्रित करने की बात आई तो वह दखल देने लगी। शिकायत इस बात की नहीं थी कि सरकार को वांगचुक की सेहत की चिंता थी; बल्कि यह थी कि सरकार विरोध के नतीजों से निपटने को तो तैयार दिखी, लेकिन उन संस्थागत नाकामियों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जिनकी वजह से यह विरोध शुरू हुआ था।

इस चुनौती का एक अहम पहलू दिल्ली हाई कोर्ट के पहले के आदेश का कथित विस्तार था। कोर्ट का शुरुआती दखल सिर्फ वांगचुक की हालत की मेडिकल निगरानी सुनिश्चित करने तक सीमित था। उसने न तो भूख हड़ताल खत्म करने का निर्देश दिया और न ही जंतर-मंतर से प्रदर्शनकारी को जबरदस्ती हटाने की इजाजत दी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रशासन ने सुरक्षा के मकसद से दिए गए न्यायिक निर्देश को असल में सरकार की जबरदस्ती वाली कार्रवाई का आधार बना दिया।

हालांकि, कोर्ट ने सरकार की इस दलील को मान लिया कि मौजूदा हालात में वांगचुक को अस्पताल ले जाना मनमाना फैसला नहीं था। उसने माना कि लंबी भूख हड़ताल से गंभीर मेडिकल जोखिम होते हैं और जब किसी व्यक्ति की सेहत को गंभीर खतरा हो, तो सरकार से सिर्फ मूकदर्शक बने रहने की उम्मीद नहीं की जा सकती। फिर भी, यह तर्क एक बड़ी संवैधानिक चिंता पैदा करता है।

अगर सरकार तब भी दखल दे सकती है जब उसे लगे कि कोई व्यक्ति खुद को नुकसान पहुंचाने वाला राजनीतिक फैसला ले रहा है, तो सुरक्षा और 'अभिभावकवादी रवैये' के बीच की सीमा खतरनाक रूप से धुंधली हो जाती है। लोकतांत्रिक असहमति शायद ही कभी सहज होती है। विरोध आंदोलनों में अक्सर असुविधा, त्याग और व्यक्तिगत कठिनाइयां शामिल होती हैं। विरोध के संवैधानिक संरक्षण को इस बात पर निर्भर नहीं किया जा सकता कि सरकार विरोध के तरीके को उचित, सही या मेडिकल नजरिए से सही मानती है या नहीं।

भूख हड़ताल, विरोध के हिंसक या उपद्रवी तरीकों से बिल्कुल अलग होती है। इसकी राजनीतिक ताकत अपनी मर्जी से खुद को किसी चीज से दूर रखने में है। विरोध करने वाला व्यक्ति दूसरों को शारीरिक नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि, वह राजनीतिक बातचीत के केंद्र में अपने ही शरीर को रखता है। इतिहास में, भूख हड़ताल का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि जवाबदेही के पारंपरिक तरीके या तो नाकाम रहे हैं या लोगों को ऐसा लगा है कि वे नाकाम रहे हैं।

इसलिए, संवैधानिक मुश्किल यह नहीं थी कि क्या राज्य को जीवन बचाने में दिलचस्पी है। बेशक, उसे दिलचस्पी है। ज्यादा मुश्किल सवाल यह था कि क्या राज्य किसी जागरूक वयस्क नागरिक के सोच-समझकर लिए गए राजनीतिक फैसले को दरकिनार करके उसका जीवन बचा सकता है। वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के दौरान पोटेशियम देने को लेकर हुए विवाद ने इस तनाव को और उजागर किया। ऐसी स्थितियों में मेडिकल दखल को सिर्फ एक क्लिनिकल मामला नहीं माना जा सकता। जब किसी व्यक्ति की मेडिकल स्थिति सीधे तौर पर राजनीतिक विरोध से जुड़ी हो, तो सहमति, स्वायत्तता और पारदर्शिता के सवाल हेल्थकेयर के सवालों से अलग नहीं रह जाते।



याचिकाकर्ताओं की चिंता सिर्फ इलाज को लेकर नहीं थी। चिंता इस बात को लेकर थी कि राज्य के दखल के बाद वांगचुक के शरीर से जुड़े फैसलों पर किसका नियंत्रण रहेगा। राज्य का कहना था कि मेडिकल फैसले पेशेवर सलाह और उनकी स्थिति को देखते हुए लिए गए थे। हालांकि, इस घटना ने उन संवैधानिक जोखिमों को दिखाया जो तब पैदा होते हैं जब राज्य की शक्ति डॉक्टर-मरीज के रिश्ते में दखल देती है। कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए अपनी शारीरिक स्वायत्तता नहीं छोड़ देता क्योंकि वह मरीज बन गया है।

परिवार के सदस्यों, वकीलों और स्वतंत्र मेडिकल राय तक पहुंच को लेकर जताई गई चिंताओं ने एक और अहम मुद्दा उठाया। वांगचुक आपराधिक कानून के तहत हिरासत में लिया गया व्यक्ति नहीं था। उसे किसी न्यायिक प्रक्रिया के जरिए आजादी से वंचित नहीं किया गया था। वह एक नागरिक था जो सार्वजनिक विरोध में हिस्सा ले रहा था और बाद में राज्य की कार्रवाई के तहत उसे वहां से हटा दिया गया।

ऐसी स्थितियों में, अस्पताल ऐसी जगह नहीं बन सकता जहां संवैधानिक सुरक्षा कमजोर पड़ जाए। मेडिकल केयर ऐसी जगह नहीं बन सकती जहां आजादी कम हो और बातचीत, सलाह-मशविरा और स्वतंत्र निगरानी प्रशासनिक मर्जी पर निर्भर हो जाए।

अदालत का अंतिम नजरिया समझौते की कोशिश जैसा था। उसने राज्य की कार्रवाई को मनमाना मानने से इनकार कर दिया और अस्पताल में भर्ती करने के सरकार के तर्क को स्वीकार कर लिया। साथ ही, उसने विरोध या व्यक्तिगत पसंद में दखल देने की राज्य की असीमित शक्ति को मान्यता नहीं दी। हालांकि, बड़ा संवैधानिक सवाल अभी भी अनसुलझा है।

ऐसे मामलों में खतरा हमेशा असहमति को खुलेआम दबाने का नहीं होता है। यह पाबंदी के एक नरम रूप की संभावना है जहां भलाई, सुरक्षा और बचाव की बातें धीरे-धीरे असुविधाजनक राजनीतिक अभिव्यक्ति को सीमित करने का बहाना बन जाती हैं। अनुच्छेद 19 न केवल लोकप्रिय विचारों को, बल्कि असहज असहमति को भी सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 21 न केवल जीवन की, बल्कि स्वायत्तता, सम्मान और व्यक्तिगत चुनाव करने की आजादी की भी सुरक्षा करता है। इसलिए, एक संवैधानिक लोकतंत्र को सिर्फ यह नहीं पूछना चाहिए कि क्या राज्य का दखल नेक नीयत से है, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि क्या वह उचित और जरूरी है।

वांगचुक मामले से अंततः एक बुनियादी सवाल उठता है: जब कोई नागरिक विरोध के लिए अपने ही शरीर का इस्तेमाल करता है, तो क्या जीवन की रक्षा करने का राज्य का कर्तव्य उसे दखल देने की इजाजत देता है या क्या ऐसे दखल से सुरक्षा के नियंत्रण में बदल जाने का खतरा पैदा हो जाता है?

पूरा आदेश यहां देखा जा सकता है:



20 जुलाई: संसद की ओर बढ़ता विरोध प्रदर्शन

जब दिल्ली हाई कोर्ट में जंतर-मंतर से सोनम वांगचुक को हटाए जाने के कानूनी मामले पर बहस चल रही थी, तब जमीनी स्तर पर यह आंदोलन एक नए चरण में पहुंच गया। NEET परीक्षा संकट को लेकर जवाबदेही की मांग से शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन अब देश भर के छात्रों, नागरिक समाज समूहों और समर्थकों को शामिल करते हुए एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका था। 20 जुलाई, 2026 को प्रस्तावित "चलो संसद" मार्च का मकसद इन मांगों को सीधे संसद तक पहुंचाना था; प्रदर्शनकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं के लिए जवाबदेही और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे।

इस जगह को चुनने के पीछे गहरा प्रतीकात्मक महत्व था। प्रदर्शनकारियों के लिए, संसद नागरिकों के प्रति जवाबदेह संस्था का प्रतीक थी। इस मार्च को विधायी कामकाज में बाधा डालने की कोशिश के तौर पर नहीं, बल्कि चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने अपनी शिकायतें रखने के लोकतांत्रिक अधिकार के इस्तेमाल के तौर पर देखा गया। हालांकि, प्रशासन के लिए मार्च का समय - जो संसद के मॉनसून सत्र के पहले दिन के साथ मेल खाता था - सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और उच्च-सुरक्षा वाले सरकारी प्रतिष्ठानों की सुरक्षा को लेकर चिंता का विषय बन गया।


mage: Anushree Fadnavis/Reuters

19 जुलाई की शाम तक, मार्च से पहले के घंटों में मध्य दिल्ली एक सख्त नियंत्रण वाले इलाके में बदल गई थी। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, जंतर-मंतर पर अभूतपूर्व सुरक्षा इंतजाम किए गए थे, राजधानी के प्रमुख इलाकों में दंगा-रोधी वाहन, बैरिकेड्स और दिल्ली पुलिस के भारी सुरक्षा बल तैनात थे। एक्सप्रेस ने बताया कि VIP इलाकों और दिल्ली की सीमाओं के आसपास 1,200 से ज्यादा दिल्ली पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे, जबकि संसद और वहां जाने वाले रास्तों पर अतिरिक्त बल तैनात किए गए थे।

'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, विरोध स्थल छात्रों और समर्थकों से खचाखच भरा हुआ था, फुटपाथों पर उन लोगों के लिए टेंट लगे थे जो कई दिनों और हफ्ते से भूख हड़ताल पर बैठे थे। प्रदर्शनकारी बैनर और नारों के साथ इकट्ठा हुए, जबकि वॉलंटियर्स अगले दिन के मार्च की तैयारी कर रहे थे। CJP के संस्थापक अभिजीत दिपके ने अनुशासन बनाए रखने की अपील की और बार-बार जोर दिया कि विरोध प्रदर्शन की सफलता शांति बनाए रखने पर निर्भर करती है - यह संदेश सोनम वांगचुक ने भी अस्पताल से दिया था।

हालांकि, प्रशासन ने प्रस्तावित मार्च को सुरक्षा के लिए संभावित चुनौती के तौर पर देखा। दिल्ली पुलिस ने कहा कि संसद की ओर जुलूस निकालने के लिए न तो कोई अनुमति मांगी गई थी और न ही दी गई थी। नई दिल्ली जिले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई, जिससे लोगों के इकट्ठा होने और जुलूस निकालने पर रोक लग गई। पुलिस ने एक सार्वजनिक एडवाइजरी में चेतावनी दी कि बिना मंजूरी के मार्च और सभाओं पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी, जिसमें भारतीय न्याय संहिता के तहत कार्रवाई भी शामिल है।






धारा 163 लागू करना विवाद का एक मुख्य मुद्दा बन गया। जहां अधिकारियों ने संसद की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के आधार पर इन प्रतिबंधों को सही ठहराया, वहीं प्रदर्शनकारियों ने सवाल उठाया कि क्या हिंसा के किसी वास्तविक खतरे से निपटने के बजाय, शांतिपूर्ण राजनीतिक प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए एहतियाती शक्तियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस तरह के प्रतिबंधों के साथ संवैधानिक मुश्किल यह नहीं है कि क्या राज्य सार्वजनिक सभाओं को नियंत्रित कर सकता है। वह निश्चित रूप से ऐसा कर सकता है। अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार उचित प्रतिबंधों के अधीन है। हालांकि, एहतियाती आदेशों का बार-बार इस्तेमाल एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या प्रशासनिक सुविधा और सुरक्षा चिंताओं का दायरा इतना बढ़ा दिया जा रहा है कि यह नागरिकों को अपनी शिकायतें सार्वजनिक जगहों पर ले जाने से रोकने की एक आम शक्ति बन जाए?

20 जुलाई को, जब प्रदर्शनकारी मार्च शुरू करने की तैयारी कर रहे थे, तो जंतर-मंतर के आसपास सुरक्षा और कड़ी कर दी गई। 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, कई परतों वाली बैरिकेडिंग लगाई गई, संसद के आसपास की सड़कें बंद कर दी गईं और पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों की बड़ी टुकड़ियां तैनात की गईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अलग-अलग जिलों से अतिरिक्त अधिकारी बुलाए गए और नई दिल्ली जिले में 2,000 से ज्यादा अर्धसैनिक बल के जवान तैनात किए गए।



'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आयोजकों से कहा कि भगदड़ मचने की आशंका एक चिंता का विषय है और उनसे इतनी बड़ी भीड़ के साथ आगे बढ़ने के फैसले पर फिर से विचार करने का आग्रह किया। प्रदर्शनकारियों ने जवाब दिया कि उन्होंने हमेशा अनुशासन बनाए रखा है और प्रशासन सुरक्षा चिंताओं का इस्तेमाल मार्च को ही रोकने के लिए कर रहा है।

जैसे ही मार्च शुरू हुआ, बारिश और पाबंदियों के बावजूद हजारों प्रदर्शनकारी इकट्ठा होने लगे। डेक्कन हेराल्ड ने PTI का हवाला देते हुए बताया कि मंडी हाउस से जंतर-मंतर जाने की कोशिश कर रहे कुछ प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिसमें लाठीचार्ज का आरोप भी शामिल था। दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए सोशल मीडिया पर कहा कि "ऐसी कोई घटना नहीं हुई है" और प्रदर्शन को पेशेवर तरीके से संभाला जा रहा था। अलग-अलग बयानों से पुलिस की कार्रवाई के उचित होने या न होने पर चल रहे बड़े विवाद का पता चलता है।

अधिकारियों ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए कुछ मेट्रो स्टेशनों - जैसे जनपथ, पटेल चौक, राजीव चौक, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और सेवा तीर्थ - पर लोगों की आवाजाही पर कुछ समय के लिए रोक लगा दी। संसद की ओर जाने वाली सड़कों पर बैरिकेड लगा दिए गए और सेंट्रल दिल्ली में आवाजाही पर कड़ी नजर रखी गई।

प्रदर्शनकारियों के लिए, ये कदम सत्ता में बैठे लोगों से जवाबदेही की मांग करने वाले आंदोलन को दबाने की सरकार की कोशिश थे। उनका तर्क था कि लोकतंत्र में विरोध करने के अधिकार का सैद्धांतिक रूप से जश्न नहीं मनाया जा सकता, जबकि उन संस्थानों तक पहुंचने की कोशिश करने पर नागरिकों पर रोक लगाई जाए जिनसे वे सवाल पूछना चाहते हैं।

प्रशासन के लिए, ये पाबंदियां संसद की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित अव्यवस्था को रोकने की जिम्मेदारी का सही पालन थीं। इसलिए 'चलो संसद' मार्च सिर्फ एक जुलूस के रास्ते को लेकर विवाद से कहीं ज्यादा बन गया। इसने एक बार-बार उठने वाले संवैधानिक तनाव को सामने ला दिया कि क्या व्यवस्था बनाए रखने की सरकार की जिम्मेदारी लोकतंत्र की रक्षा के लिए निभाई जा रही है, या इसका इस्तेमाल उसी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति को सीमित करने के लिए किया जा रहा है जो जवाबदेही तय करती है?



20 जुलाई: बातचीत और सरकार की पहल

जब अफरातफरी की खबरें आ रही थीं, तभी 20 जुलाई को CJP के प्रवक्ता सौरव दास ने X पर घोषणा की कि सरकार से बातचीत का प्रस्ताव मिलने के बाद, वे आशुतोष रंका के साथ बीजेपी अध्यक्ष और वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा से मिलने जा रहे हैं। दास ने लिखा, "अभी सुबह के 11:52 बजे हैं। आशुतोष रंका और मैं, कॉकरोच जनता पार्टी की ओर से, जे.पी. नड्डा से मिलने जा रहे हैं। सरकार ने सुबह बातचीत के लिए संपर्क किया था। हमारी मांगें साफ हैं। युवा बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए हैं।" CJP के प्रतिनिधियों का कहना था कि किसी भी बातचीत में उन मुख्य मुद्दों पर बात होनी चाहिए जिनकी वजह से छात्र सड़कों पर उतरे थे - जैसे परीक्षा में कथित गड़बड़ियों के लिए जवाबदेही, परीक्षा प्रणाली की नाकामियों की जिम्मेदारी, और इस बात का भरोसा कि ऐसे संकट दोबारा नहीं आएंगे।

'द हिंदू' की रिपोर्ट के अनुसार, CJP ने जिला मजिस्ट्रेट, केंद्र सरकार के सचिव और राज्य मंत्री से मिलने के प्रस्तावों को ठुकरा दिया और प्रधानमंत्री या कैबिनेट मंत्री से बातचीत करने पर जोर दिया।

पूरे भारत में एकजुटता

जैसे-जैसे दिल्ली में विरोध प्रदर्शन जारी रहा, देश के कई हिस्सों में एकजुटता दिखाने के लिए प्रदर्शन हुए। FinancialExpress.com की रिपोर्ट के मुताबिक, हैदराबाद, मुंबई, पुणे, नागपुर और अहिल्या नगर जैसे शहरों में कार्यकर्ताओं और छात्रों ने रैलियां आयोजित कीं। इन रैलियों का मकसद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करना और जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जबरदस्ती अस्पताल में भर्ती कराए जाने का विरोध करना था।

मुंबई: मुंबई में सार्वजनिक सभाओं को लेकर राज्य सरकार के सख्त रुख ने शहर को टकराव का अखाड़ा बना दिया है। आजाद मैदान या दक्षिण मुंबई की अन्य जगहों पर प्रदर्शन की अनुमति न मिलने के बाद, 19 जुलाई 2026 को समर्थक शिवाजी पार्क में इकट्ठा हुए। 'द इंडियन एक्सप्रेस' के अनुसार, एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अनुमति न देने के फैसले को सही ठहराते हुए 'सार्वजनिक बैठक, आंदोलन और जुलूस नियम, 2025' का हवाला दिया, जो वीकेंड और सार्वजनिक छुट्टियों पर विरोध प्रदर्शनों पर रोक लगाते हैं।


Image: Sayyed Sameer Abedi / Mid-Day

शिवाजी पार्क का माहौल गरमाया हुआ था और शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया। 'द इंडियन एक्सप्रेस' ने बताया कि ठाकरे ने अपनी बात को और तेज करते हुए कहा कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग एक "छोटी बात" है और असली लड़ाई "सरकार बदलने" की होनी चाहिए। विरोध प्रदर्शन के दौरान, लोगों ने चिंता जताई कि परीक्षा प्रणाली में बुनियादी कमियों की वजह से देश के युवाओं का भविष्य लगातार प्रभावित हो रहा है।

मुंबई पुलिस ने कई कानूनी कार्रवाईयां की हैं। 'द इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के अनुसार, 18 जुलाई को पुलिस ने 'सार्वजनिक बैठक, आंदोलन और जुलूस नियम, 2025' का उल्लंघन करने के आरोप में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दो FIR दर्ज कीं। खास तौर पर:

● राज्य सचिवालय के बाहर विरोध प्रदर्शन करने के लिए NCP (SP) के छात्र नेताओं के खिलाफ मरीन ड्राइव पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया।
● प्रेस क्लब के पास विरोध प्रदर्शन करने के लिए एक्टिविस्ट-लेखक सुधीर धवले और अन्य लोगों के खिलाफ आजाद मैदान पुलिस स्टेशन में दूसरी FIR दर्ज की गई; इन पर गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने और सरकारी अधिकारी के आदेश न मानने जैसे आरोप लगाए गए।

पुणे: पुणे में, वांगचुक के साथ एकजुटता दिखाने और शिक्षा व्यवस्था में बड़े सुधारों की मांग करने के लिए सैकड़ों लोग बालगंधर्व चौक पर इकट्ठा हुए। 'इंडियन एक्सप्रेस' की रिपोर्ट के मुताबिक, जब पुलिस ने भीड़ को हटाने की कोशिश की तो माहौल तनावपूर्ण हो गया और सरकारी निर्देशों को न मानने वाले कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया गया। शिक्षकों और छात्रों समेत प्रदर्शनकारियों ने इस बात पर जोर दिया कि NEET का मुद्दा सरकार में जवाबदेही की कमी का एक लक्षण है और इससे शिक्षा व्यवस्था में युवाओं का भरोसा खतरे में पड़ रहा है।

बेंगलुरु: इस बीच, 'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 जुलाई को बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में 1,000 से ज्यादा लोग NEET पेपर लीक और "बिगड़ती लोकतांत्रिक व्यवस्था" के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए इकट्ठा हुए। यह सभा समाज की व्यापक आलोचना का मंच बन गई; अभिनेता किशोर कुमार ने लोगों से अपील की कि वे यह सुनिश्चित करें कि यह मुहिम सिर्फ NEET तक ही सीमित न रहे, बल्कि किसानों, मजदूरों और अन्य हाशिए पर मौजूद समूहों के समर्थन तक भी फैले। 13 साल के सोहन और छात्रा काव्या जैसे युवा प्रतिभागियों ने निराशा की बढ़ती भावना को उजागर किया और सवाल उठाया कि अगर सरकार अपनी नाकामियों के लिए जवाबदेही से बचती रही तो भविष्य क्या होगा।


बेंगलुरु के लोग एकजुट हुए; प्रदर्शनकारियों के हाथों में विरोध, न्याय और उम्मीद के संदेश वाले पोस्टर थे। यहां कुछ ऐसे ही पोस्टर और शब्द दिए गए हैं जिन्होंने इस विरोध-प्रदर्शन को आकार दिया। तस्वीरें: @deeptensarkar (CJP, बेंगलुरु विरोध-प्रदर्शन)

समर्थन में सभाओं की खबरें इन जगहों से भी आईं:

● हैदराबाद;
● नागपुर;
● इंदौर;
● जम्मू;
● गुवाहाटी;

20 जुलाई: भूख हड़ताल पर अपडेट

जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले जाए जाने के बाद भी सोनम वांगचुक ने अपनी भूख हड़ताल जारी रखी। उन्होंने साफ कर दिया कि उनका उपवास खत्म करने का फैसला सिर्फ उनकी मेडिकल हालत पर ही नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या उन बड़े मुद्दों पर कोई राजनीतिक प्रतिक्रिया मिलती है जिनकी वजह से यह आंदोलन शुरू हुआ था।

20 जुलाई को, प्रस्तावित "चलो संसद" मार्च से पहले, वांगचुक ने हाथ से लिखा एक नोट जारी किया जिसका शीर्षक था "मैं उपवास कब खत्म करूंगा...!"। इसमें उन्होंने उन हालात का जिक्र किया जिनके तहत वे अपना अनिश्चितकालीन उपवास खत्म करेंगे। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' और दूसरे मीडिया आउटलेट्स की रिपोर्ट के अनुसार, इन शर्तों में शिक्षा व्यवस्था की नाकामियों, खासकर परीक्षा में कथित गड़बड़ियों और प्रश्न पत्र लीक होने के मामलों में जवाबदेही तय करने पर जोर दिया गया था।

खास बात यह है कि जहां व्यापक CJP आंदोलन लगातार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा था, वहीं वांगचुक ने अपना अनशन खत्म करने के लिए जो शर्तें रखीं, उनमें शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की बात खास तौर पर शामिल नहीं थी। इसके बजाय, उन्होंने इस मुद्दे को संस्थागत जवाबदेही और सुधारात्मक कार्रवाई के नजरिए से पेश किया।

वांगचुक ने कहा कि अगर सरकार "शिक्षा व्यवस्था में हालिया नाकामियों" (जिसमें कथित पेपर लीक भी शामिल हैं) की जिम्मेदारी स्वीकार कर लेती है, तो वह अपना अनशन खत्म कर देंगे। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि अनशन तब भी खत्म हो सकता है जब वह और CJP के नेता संसद तक पहुंच सकें और उन्हें सांसदों व विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं से यह भरोसा मिल जाए कि प्रदर्शनकारियों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर मॉनसून सत्र के दौरान चर्चा की जाएगी।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनकी सेहत या हालात उन्हें मार्च में शामिल होने से रोकते हैं, तो सांसद और राजनीतिक नेता अस्पताल में उनसे आकर मिलें और वैसा ही भरोसा दिलाएं।

इन शर्तों से पता चलता है कि ध्यान भूख हड़ताल के तात्कालिक प्रतीकात्मक महत्व से हटकर शिक्षा संकट पर संसद का ध्यान खींचने जैसे बड़े राजनीतिक मकसद की ओर केंद्रित हो गया था। वांगचुक के संदेश में इस बात पर जोर दिया गया कि यह विरोध प्रदर्शन किसी एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द नहीं, बल्कि परीक्षा व्यवस्था की कथित नाकामियों से प्रभावित छात्रों की चिंताओं पर केंद्रित था।

अपनी पत्नी डॉ. गीतांजलि आंग्मो के जरिए साझा किए गए संदेश में वांगचुक ने फिर दोहराया कि वह इस आंदोलन की "वजह" नहीं हैं, बल्कि सिर्फ उन युवाओं की आवाज हैं जो जवाबदेही चाहते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट की सुनवाई के बाद सफदरजंग अस्पताल के बाहर बात करते हुए आंग्मो ने कहा कि संसद तक प्रस्तावित मार्च जारी रहेगा और वांगचुक ने हमेशा यही कहा है कि यह आंदोलन युवाओं का है।

इस बीच, वांगचुक की सेहत मेडिकल निगरानी में रही। 20 जुलाई को वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज (VMMC) और सफदरजंग अस्पताल की ओर से जारी हेल्थ बुलेटिन में बताया गया कि उनके जरूरी हेल्थ पैरामीटर स्थिर थे, लेकिन उनके ब्लड पैरामीटर पर बारीकी से नजर रखने की जरूरत थी। अस्पताल ने कहा कि लगातार क्लिनिकल निगरानी और मेडिकल दखल जरूरी था, और एक मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम उनकी हालत पर नजर रख रही थी।

बड़े पैमाने पर चल रहे आंदोलन के साथ-साथ, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) से जुड़े छात्रों ने भी आंदोलन के समर्थन में भूख हड़ताल की। तीन छात्र एक्टिविस्ट - नेहा, मनीष और आमीन - ने 23 दिनों के बाद अपनी भूख हड़ताल खत्म की। उन्होंने यह फैसला सांसदों, सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों और जानी-मानी हस्तियों के एक डेलिगेशन की अपील के बाद लिया, जिन्होंने उनसे लगातार उपवास करने के बजाय संसदीय बातचीत और जन-अभियानों के जरिए संघर्ष जारी रखने का आग्रह किया था।

AISA ने बताया कि उपवास के दौरान छात्रों को काफी शारीरिक तकलीफे झेलनी पड़ीं, जिसमें वजन का काफी कम होना और ब्लड शुगर का खतरनाक स्तर तक गिरना शामिल था। उनके हटने से छात्र-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शन के एक चरण में बदलाव आया, जबकि संसद की ओर मार्च के जरिए व्यापक आंदोलन जारी रहा।



निष्कर्ष: परीक्षा में विफलता से जवाबदेही के संकट तक

20 जुलाई की घटनाओं ने शिक्षा से जुड़े विरोध प्रदर्शन के स्वरूप में एक निर्णायक बदलाव ला दिया। जो आंदोलन परीक्षा में कथित अनियमितताओं से प्रभावित छात्रों की मांग के तौर पर शुरू हुआ था, वह इस बात पर एक व्यापक टकराव में बदल गया कि जब संस्थागत विफलताओं से जनता में गुस्सा पैदा होता है तो सरकार कैसे प्रतिक्रिया देती है।

आंदोलन की मुख्य मांग वही रही: उन विफलताओं के लिए जवाबदेही तय करना जिन्होंने भारत की प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली में भरोसे को कमजोर किया था। विरोध प्रदर्शन सिर्फ परीक्षा रद्द करने या पेपर लीक के नतीजों के बारे में नहीं थे। हजारों छात्रों के लिए, यह मुद्दा एक गहरे डर का प्रतीक था कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार संस्थाओं की विफलताओं के कारण उनकी बरसों की तैयारी, व्यक्तिगत त्याग और उम्मीदें बेकार हो सकती हैं।

हालांकि, आंदोलन के बढ़ने से ध्यान मूल शिकायत से हटकर सरकार द्वारा असहमति से निपटने के तरीके पर चला गया। सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल इस बदलाव का प्रतीक बन गई। 'चलो संसद' मार्च से जुड़ी घटनाओं ने इस तनाव को और उजागर किया। प्रदर्शनकारियों को संसद की ओर बढ़ने से रोकने के सरकार के फैसले का बचाव सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर किया गया। फिर भी, प्रदर्शनकारियों के लिए इन पाबंदियों ने एक बुनियादी चिंता पैदा कर दी कि अगर नागरिक लाखों युवाओं को प्रभावित करने वाली अपनी शिकायतों को लेकर चुने हुए प्रतिनिधियों के पास नहीं जा सकते, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही कहां रह जाती है?

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