इन चार मजदूरों की पहचान सफीकुल इस्लाम, साबिर शेख, नसीरुद्दीन शेख और लल्टू शेख के तौर पर हुई है। वे मुर्शिदाबाद के सुती और शमशेरगंज इलाकों के रहने वाले हैं और उन 23 प्रवासी मजदूरों में शामिल थे जिन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस ने 4 सितंबर को हिरासत में लिया था।

छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी नागरिक होने के शक में हिरासत में लिए गए मुर्शिदाबाद के चार प्रवासी मजदूरों को कलकत्ता हाई कोर्ट के दखल के बाद रिहा कर दिया गया है। इससे उनकी एक महीने से ज्यादा समय से चली आ रही हिरासत खत्म हो गई।
द ऑब्जर्वर पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इन चार मजदूरों की पहचान सफीकुल इस्लाम, साबिर शेख, नसीरुद्दीन शेख और लल्टू शेख के तौर पर हुई है। वे मुर्शिदाबाद के सुती और शमशेरगंज इलाकों के रहने वाले हैं और उन 23 प्रवासी मजदूरों में शामिल थे जिन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस ने 4 सितंबर को हिरासत में लिया था।
इन मजदूरों को बुधवार रात रिहा किया गया। इससे कुछ दिन पहले ही हाई कोर्ट ने उनकी लगातार हिरासत के आधार और अधिकारियों के उस अधिकार पर सवाल उठाए थे जिसके तहत वे उनकी नागरिकता तय कर रहे थे, जबकि पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से उनके नाम हटाने की प्रक्रिया अभी चल रही थी।
सितंबर में 23 मजदूर हिरासत में लिए गए थे
यह मामला 4 सितंबर का है, जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने बिलासपुर इलाके में मुर्शिदाबाद के 23 प्रवासी मजदूरों को हिरासत में लिया था।
ये मजदूर रोजी-रोटी के लिए छत्तीसगढ़ गए थे और घूम-घूमकर सामान बेचने और दूसरे अनौपचारिक कामों में लगे थे। उनके परिवारों के मुताबिक, वे बिलासपुर जिले के सिरगिट्टी पुलिस स्टेशन के तहत आने वाले चुनचियापारा-गणेश नगर इलाके में रह रहे थे।
रिश्तेदारों का आरोप है कि जब उनसे उनकी नागरिकता के बारे में पूछा गया, तो मजदूरों ने वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड और पैन कार्ड जैसे पहचान के दस्तावेज दिखाए। इसके बाद उन्हें रायपुर के एक डिटेंशन या होल्डिंग सेंटर ले जाया गया।
हिरासत में करीब 15 दिन बिताने के बाद 23 में से 19 मजदूरों को 18 सितंबर को रिहा कर दिया गया था। उस समय आई रिपोर्टों में कहा गया था कि अधिकारियों ने रिहा किए गए लोगों के दस्तावेजों और पहचान की पुष्टि कर ली थी।
बाकी चार मजदूर हिरासत में ही रहे, जिसके बाद उनके परिवारों ने कानूनी मदद लेने का फैसला किया।
हाई कोर्ट ने नागरिकता तय करने पर सवाल उठाए
बाद में परिवार कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचे और दलील दी कि ये चारों व्यक्ति लंबे समय से मुर्शिदाबाद के निवासी हैं और वोटर लिस्ट से उनके नाम हटाने की प्रक्रिया पहले से ही चल रही थी।
5 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट ने सवाल किया कि अधिकारी इन चार मजदूरों की नागरिकता तय करने की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ा सकते हैं, जबकि वोटर लिस्ट से नाम हटाने के खिलाफ उनकी अपीलें तय अपीलीय फोरम के पास अभी भी लंबित हैं। जस्टिस कृष्णा राव ने फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर की भूमिका पर सवाल उठाए और पूछा कि क्या अधिकारी नागरिकता तय करने की अलग प्रक्रिया तब भी प्रभावी ढंग से चला रहे थे, जब वोटर लिस्ट से जुड़ी कार्यवाही अभी पूरी नहीं हुई थी।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या अधिकारी “लोगों के साथ खिलवाड़” कर रहे थे, जबकि वोटर लिस्ट से नाम हटाने को चुनौती देने के लिए पहले से ही एक तय तरीका मौजूद था।
कोर्ट की इन टिप्पणियों ने मामले में एक अहम मोड़ ला दिया, जिसके बाद छत्तीसगढ़ प्रशासन ने उन मजदूरों को रिहा कर दिया।
समीरुल इस्लाम का कहना है कि वेरिफिकेशन रिपोर्ट मांगी गई थी
तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद समीरुल इस्लाम ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्रशासन ने मुर्शिदाबाद के जिला मजिस्ट्रेट से यह पता लगाने के लिए रिपोर्ट मांगी थी कि क्या वे चारों मजदूर उसी जिले के रहने वाले हैं।
इस्लाम के मुताबिक, जरूरी रिपोर्ट नहीं दी गई, जिससे परिवारों को कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
इस्लाम ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “मुर्शिदाबाद जिले के तेईस मजदूरों को ‘बांग्लादेशी’ होने के शक में गिरफ्तार किया गया था। उनमें से उन्नीस को पहले ही रिहा कर दिया गया था, लेकिन चार हिरासत में ही थे। कोर्ट के दखल के बाद छत्तीसगढ़ प्रशासन ने उन्हें रिहा कर दिया।”
उन्होंने वेरिफिकेशन रिपोर्ट देने में हुई कथित देरी की आलोचना की और कहा कि सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे निवासियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करें।
इस्लाम ने लिखा, “मैं सभी सरकारी अधिकारियों को याद दिलाना चाहता हूं कि नागरिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना उनके कर्तव्य का हिस्सा है।”
उन्होंने कहा कि जब किसी दूसरे राज्य का प्रशासन किसी निवासी के बारे में जानकारी मांगता है, तो संबंधित जिला अधिकारियों को बिना किसी राजनीतिक सोच के सही और तथ्यों पर आधारित जवाब देना चाहिए।
इस्लाम ने इस मामले में दखल देने के लिए न्यायपालिका का भी शुक्रिया अदा किया और इस घटनाक्रम को प्रभावित परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बताया।
Released
कर्नाटक: SIR की पड़ताल, नाम गलत तरीके से हटाने पर उठे सवाल

छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी नागरिक होने के शक में हिरासत में लिए गए मुर्शिदाबाद के चार प्रवासी मजदूरों को कलकत्ता हाई कोर्ट के दखल के बाद रिहा कर दिया गया है। इससे उनकी एक महीने से ज्यादा समय से चली आ रही हिरासत खत्म हो गई।
द ऑब्जर्वर पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इन चार मजदूरों की पहचान सफीकुल इस्लाम, साबिर शेख, नसीरुद्दीन शेख और लल्टू शेख के तौर पर हुई है। वे मुर्शिदाबाद के सुती और शमशेरगंज इलाकों के रहने वाले हैं और उन 23 प्रवासी मजदूरों में शामिल थे जिन्हें छत्तीसगढ़ पुलिस ने 4 सितंबर को हिरासत में लिया था।
इन मजदूरों को बुधवार रात रिहा किया गया। इससे कुछ दिन पहले ही हाई कोर्ट ने उनकी लगातार हिरासत के आधार और अधिकारियों के उस अधिकार पर सवाल उठाए थे जिसके तहत वे उनकी नागरिकता तय कर रहे थे, जबकि पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट से उनके नाम हटाने की प्रक्रिया अभी चल रही थी।
सितंबर में 23 मजदूर हिरासत में लिए गए थे
यह मामला 4 सितंबर का है, जब छत्तीसगढ़ पुलिस ने बिलासपुर इलाके में मुर्शिदाबाद के 23 प्रवासी मजदूरों को हिरासत में लिया था।
ये मजदूर रोजी-रोटी के लिए छत्तीसगढ़ गए थे और घूम-घूमकर सामान बेचने और दूसरे अनौपचारिक कामों में लगे थे। उनके परिवारों के मुताबिक, वे बिलासपुर जिले के सिरगिट्टी पुलिस स्टेशन के तहत आने वाले चुनचियापारा-गणेश नगर इलाके में रह रहे थे।
रिश्तेदारों का आरोप है कि जब उनसे उनकी नागरिकता के बारे में पूछा गया, तो मजदूरों ने वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड और पैन कार्ड जैसे पहचान के दस्तावेज दिखाए। इसके बाद उन्हें रायपुर के एक डिटेंशन या होल्डिंग सेंटर ले जाया गया।
हिरासत में करीब 15 दिन बिताने के बाद 23 में से 19 मजदूरों को 18 सितंबर को रिहा कर दिया गया था। उस समय आई रिपोर्टों में कहा गया था कि अधिकारियों ने रिहा किए गए लोगों के दस्तावेजों और पहचान की पुष्टि कर ली थी।
बाकी चार मजदूर हिरासत में ही रहे, जिसके बाद उनके परिवारों ने कानूनी मदद लेने का फैसला किया।
हाई कोर्ट ने नागरिकता तय करने पर सवाल उठाए
बाद में परिवार कलकत्ता हाई कोर्ट पहुंचे और दलील दी कि ये चारों व्यक्ति लंबे समय से मुर्शिदाबाद के निवासी हैं और वोटर लिस्ट से उनके नाम हटाने की प्रक्रिया पहले से ही चल रही थी।
5 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान, हाई कोर्ट ने सवाल किया कि अधिकारी इन चार मजदूरों की नागरिकता तय करने की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ा सकते हैं, जबकि वोटर लिस्ट से नाम हटाने के खिलाफ उनकी अपीलें तय अपीलीय फोरम के पास अभी भी लंबित हैं। जस्टिस कृष्णा राव ने फॉरेनर्स रजिस्ट्रेशन ऑफिसर की भूमिका पर सवाल उठाए और पूछा कि क्या अधिकारी नागरिकता तय करने की अलग प्रक्रिया तब भी प्रभावी ढंग से चला रहे थे, जब वोटर लिस्ट से जुड़ी कार्यवाही अभी पूरी नहीं हुई थी।
कोर्ट ने यह भी पूछा कि क्या अधिकारी “लोगों के साथ खिलवाड़” कर रहे थे, जबकि वोटर लिस्ट से नाम हटाने को चुनौती देने के लिए पहले से ही एक तय तरीका मौजूद था।
कोर्ट की इन टिप्पणियों ने मामले में एक अहम मोड़ ला दिया, जिसके बाद छत्तीसगढ़ प्रशासन ने उन मजदूरों को रिहा कर दिया।
समीरुल इस्लाम का कहना है कि वेरिफिकेशन रिपोर्ट मांगी गई थी
तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद समीरुल इस्लाम ने कहा कि छत्तीसगढ़ प्रशासन ने मुर्शिदाबाद के जिला मजिस्ट्रेट से यह पता लगाने के लिए रिपोर्ट मांगी थी कि क्या वे चारों मजदूर उसी जिले के रहने वाले हैं।
इस्लाम के मुताबिक, जरूरी रिपोर्ट नहीं दी गई, जिससे परिवारों को कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
इस्लाम ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, “मुर्शिदाबाद जिले के तेईस मजदूरों को ‘बांग्लादेशी’ होने के शक में गिरफ्तार किया गया था। उनमें से उन्नीस को पहले ही रिहा कर दिया गया था, लेकिन चार हिरासत में ही थे। कोर्ट के दखल के बाद छत्तीसगढ़ प्रशासन ने उन्हें रिहा कर दिया।”
उन्होंने वेरिफिकेशन रिपोर्ट देने में हुई कथित देरी की आलोचना की और कहा कि सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे निवासियों के अधिकारों और हितों की रक्षा करें।
इस्लाम ने लिखा, “मैं सभी सरकारी अधिकारियों को याद दिलाना चाहता हूं कि नागरिकों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना उनके कर्तव्य का हिस्सा है।”
उन्होंने कहा कि जब किसी दूसरे राज्य का प्रशासन किसी निवासी के बारे में जानकारी मांगता है, तो संबंधित जिला अधिकारियों को बिना किसी राजनीतिक सोच के सही और तथ्यों पर आधारित जवाब देना चाहिए।
इस्लाम ने इस मामले में दखल देने के लिए न्यायपालिका का भी शुक्रिया अदा किया और इस घटनाक्रम को प्रभावित परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बताया।
Released
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