'सांप्रदायिकता और गौ-वध' के मुद्दे पर जयप्रकाश नारायण RSS के खिलाफ दृढ़ता से खड़े रहे

Written by Sabrangindia Staff | Published on: October 11, 2017
आज 11 अक्टूबर है और आज जयप्रकाश नारायण (जेपी) की 115 वीं जयंती है। जेपी के संपूर्ण क्रांति आंदोलन का उद्देश्य था भारत से अधिनायकवाद को समाप्त करना। आरएसएस के प्रति जेपी के नरम रूख और इस आंदोलन के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है और लिखा भी जा चुका है। जनता पार्टी के अंग के रूप में आरएसएस के कार्यकर्ता को आपातकाल विरोधी गुटबंदी के चलते जेल भेजा गया था। जेपी के लेखन तथा भाषणों के चलते उन्हें याद किया जाता है और बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जाता है। जो स्पष्ट है वो ये कि जब जेपी तथा अन्य लोगों ने आरएसएस को राजनीति की मुख्यधारा में लाने की कोशिश की तो आरएसएस यथावत तथा विभाजनकारी बना रहा।

jay Prakash

यहां जेपी के संभाषणों तथा लेखों को पढ़ें। साथ ही कर्नाटक के एके सुबईया के वक्तव्य को भी जाने जो आरएसएस के कट्टर समर्थक रह चुके हैं। सुबईया ने इसके नष्टकारी राजनीति को करीब से देखा और संगठन छोड़ दिया।

अक्सर ऐसा आरोप लगाया जाता है कि आरएसएस को आपातकालीन विरोधी आंदोलन से वैधता मिली। जब आरएसएस पुरूष कार्यकर्ताओं (और कुछ महिलाओं)को सलाखों के पीछे डाल दिया गया तो वे निश्चित रूप से 'नायक' बन कर उभरे, बहुपक्षीय सांप्रदायिकता पर लोक नायक जय प्रकाश (जेपी) के स्पष्ट विचार थे। वर्ष 1968 में सांप्रदायिकता के विरूद्ध राष्ट्रीय सम्मेलन में संबोधन, और वर्ष 1977 में एक शिविर में आरएसएस कार्यकर्ताओं को किए संबोधन जेपी के बहुपक्षीय सांप्रदायिकता और गाय-वध पर उनकी स्थिति को और ज्यादा स्पष्ट करता है।
 

जयप्रकाश नारायाण के वक्तव्य:

"यद्दपि लगभग हर धार्मिक समुदाय का सांप्रदायिकता का अपना ब्रांड था, लेकिन हिंदू सांप्रदायिकता अन्य की तुलना में अधिक हानिकारक थी क्योंकि हिन्दू सांप्रदायिकता सभी विरोधियों को राष्ट्र विरोधी बता कर आसानी से भारतीय राष्ट्रवाद के रूप में छद्म वेष धारण कर सकती है।"


आरएसएस के संबंध में
उन्होंने कहा कि “आरएसएस की तरह कुछ खुले तौर पर भारतीय राष्ट्र की हिन्दू राष्ट्र से पहचान कर सकते हैं, अन्य इसे अधिक आसानी से कर सकते हैं।” “लेकिन प्रत्येक मामलों में इस तरह की पहचान राष्ट्रीय विघटन के साथ सारगर्भित है क्योंकि दूसरे समुदाय के सदस्य दूसरे दर्जे की नागरिकता कभी नहीं स्वीकार कर सकते हैं। इसलिए इस तरह की स्थिति में लगातार संघर्ष था बुनियादी विघटन के बीज हैं।”




भारत हिंदू नहीं हैः जेपी
“..वे लोग जो भारत को हिंदू से और भारतीय इतिहास को हिंदू इतिहास को समान करने की कोशिश कर रहे हैं वे केवल भारत की महानता और भारतीय इतिहास और सभ्यता की महिमा को कम कर रहे हैं। ऐसे लोग वास्तविकता में ही हिंदू धर्म और हिंदुओं के दुश्मन हैं। न केवल वे इस महान धर्म को नीचा करते हैं और सहिष्णुता तथा सद्भाव की अपनी आध्यात्मिकता एवं भावना को नष्ट करते हैं, बल्कि वे भी राष्ट्र के ताने बाने को कमजोर करते हैं।" (ये संंबोधन पटना में 3 नवंबर 1977 को पटना में आरएसएस के प्रशिक्षण शिविर में दिया गया था। )


जनसंघ के संबंध में जेपी के विचार
“उस वक्त तक जनसंघ के धर्मनिरपेक्ष आंदोलन को गंभीरता से कभी नहीं लिया जाएगा जब तक कि वे दृढ़ता से जुड़े आरएसएस तंत्र से अपने संबंध अलग नहीं कर लेता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उस वक्त तक एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में नहीं माना जा सकता है जब तक कि वह एक राजनीतिक दल का संरक्षक और प्रभावी रक्षक बना रहता है।"


गौ-वध पर विचार
गौ-वध पर पर जेपी के रुख की आज भी अत्यधिक प्रासंगिकता है। सीतामढ़ी में हिंसा के बाद जारी एक बयान में उन्होंने कहा; "मुझे नहीं लगता कि हिंदू धर्म ने कभी सोचा है कि कोई भी जानवर का जीवन चाहे कितना भी पवित्र क्यों न हो मानव जीवन की तुलना में ज्यादा पवित्र है। सभी जीवन पवित्र है, लेकिन मानव जीवन सबसे पवित्र है।" फिर उन्होंने एक पवित्र जानवर के रूप में गाय के उद्भव को संदर्भित किया: “हिन्दू अवधारणा है कि गाय का जीवन अन्नुलंघनीय है, इसका परिणाम किसी भी प्राचीन निषेध का नहीं है क्योंकि एक समय में बीफ हिंदू समाज का एक आम भोजन था, लेकिन जैन तथा बौद्ध धर्म जैसे गैर वैदिक धर्म ने शायद भारतीय लोगों के क्रमिक नैतिक और आध्यात्मिक विकास का नेतृत्व किया। समय के साथ, मानव जीवन के लिए सम्मान बढ़ता गया और मानव संबंधों में अहिंसा को और अधिक बल दिया गया।

जनता पार्टी के 'विनाश' के लिए आरएसएस किस प्रकार जिम्मेदार था: एके सुबईया
"जब केंद्र की सत्ता में जनता पार्टी थी तो आरएसएस पार्टी पर अपना पकड़ बनाने और देश पर अपना विभाजनकारी एजेंडा लागू करने का गुप्त प्रयास कर रही थी। इस दिशा में पुराने जन संघ-बीजेपी का पहला अवतार- ने समानांतर बैठकें और चर्चाएं की। बंगलौर में आरएसएस की ऐसी गुप्त बैठकों को गोपीनाथ नामक व्यक्ति के निवास पर आयोजित किया जा रहा था जो आरएसएस के बेहद करीबी थे।

मुझे इस तरह की दो गुप्त बैठकों के लिए आमंत्रित किया गया था। मैंने एक बैठक में भाग लिया और स्पष्ट तौर सवाल किया कि जनता पार्टी के होते हुए गुप्त बैठक करने का औचित्य क्या है।उस दिन से मुझे ऐसी गुप्त बैठकों के लिए आमंत्रित नहीं किया गया। स्वभाविक रूप से ऐसी गुप्त बैठकों की जानकारी के बाद जनता पार्टी के भीतर आरएसएस विरोधी समूह में हलचल मची और जनता पार्टी को हाशिए पर समेटने की कोशिश की। आरएसएस एक ऐसी संस्था है जो दूसरों के खिलाफ षडयंत्र करने में माहिर है। इसलिए उसे भीतर से सामना करना मुश्किल था। ये कोई आश्चर्य नहीं है कि जनता पार्टी के संस्थापकों ने सोचा कि उनकी पार्टी को आरएसएस को सौंपने के बजाय बेहतर होगा कि इसे विघटित कर दिया जाए।

जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मंधू लिमे ने कहा कि जनता पार्टी को तोड़ना एक ऐतिहासिक आवश्यकता थी। उन्होंने कहा कि क्योंकि उन्हें पता था कि आरएसएस कितना षडयंत्र करने में माहिर था।


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वर्ष 1979 में जनता पार्टी के विभाजन के बाद आरएसएस के बारे में मधू लिमे ने जो कहा उसे नीचे की लिंक पर पढ़ सकते हैं
What Is The RSS:Madhu Limaye on the Age-Old Enemy


बीजेपी के बनने के बाद ये घोषित कर दिया गया था कि 'भारतीय जनता पार्टी' जन संघ जैसा नहीं होगा। इसके बजाय यह घोषित किया गया कि बीजेपी जनता पार्टी द्वारा शुरू किए गए आंदोलन को आगे बढ़ाएगा। वास्तव में भाजपा के आदर्श और विचारधारा जनता पार्टी के समान थीं। यह भी दावा किया गया था कि बीजेपी के लिए अलग नियम और अधिनियम तैयार किए जाएंगे। सबसे अहम बात यह कही गयी थी कि बीजेपी और आरएसएस के बीच कोई संबंध नहीं होगा। प्रारंभिक वर्षों के दौरान आरएसएस का भी ही मानना था। संभवतः आरएसएस ने ऐसा महसूस किया कि इससे बीजेपी का विकास नहीं होगा।

मुंबई में बीजेपी सम्मेलन के बाद लोगों ने यह विश्वास करना शुरू कर दिया कि बीजेपी जनसंघ से अलग था। इसके परिणाम स्वरूप बीजेपी तेजी से विकास किया। अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश किया गया। आरएसएस ने इन घटनाओं को देखा और बीजेपी के मामलों में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। इसने बीजेपी को नियंत्रित करने का फैसला किया। परिणाम स्वरूप जो सुधारों की प्रक्रिया बीजेपी के भीतर शुरू हुई थी वह आरंभ में ही रोक दी गई। सुधार करने वाले जो बीजेपी में बेहद शक्तिशाली थे आरएसएस के निर्देश के अनुसार दबा दिए गए।

इस तरह बीजेपी ने जनसंघ के रूप में अपनी यात्रा शुरू की। अब बीजेपी जनसंघ के 1962 वाली स्थिति में वापस चली गई है। अब कोई भी बीजेपी को जनसंघ के विकल्प के तौर पर नहीं मानता है। यहां तक कि वाजपेयी को भी गंभीरता से नहीं लिया जाता है। इस तरह तेजी से बढ़ रहे बीजेपी को आरएसएस ने अगवा कर लिया था। अगर आरएसएस को बिना किसी बाधा के बढ़ने की इजाजत दी जाती है तो हमारे देश को एक बार फिर विभाजित कर दिया जाएगा। वे लोग जो स्पष्ट रूप से सोंचते हैं उन्हें इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए।

आरएसएस के छिपे चेहरे को एके सुबईया द्वारा सबसे पहले वर्ष 1985 में कन्नड़ में प्रकाशित किया गया था और इसका अनुवाद 2015 में लंकेश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था। ये अनुवाद डॉ.हेवादन मूदुसगरी द्वारा किया गया।

लेखक के बारे में (एके सुबईया): अज्जिकुत्तिरा करीयप्पा सुबईया कर्नाटक के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ हैं। छह दशकों से वह पूरे राज्य में कई जन आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं। अपने राजनैतिक स्तर पर धर्मनिरपेक्षता के कट्टर समर्थक सुबईया आरएसएस के सांप्रदायिक स्वभाव के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। यह पुस्तक उनके द्वारा आरएसएस के बारे में लिखे गए लेखों का संकलन है। मूल रूप से कन्नड़ में लिखी गई ये पुस्तक पहली बार 1985 में प्रकाशित हुई थी।

अनुवादक के बारे में (डॉ. हैवदन मूदुसगरी): इस पुस्तक के अनुवादक डॉ. हैवदन मूदुसगरी व्याख्यता हैं। वह कर्नाटक कम्यूनल हार्मनी फोरम का सक्रिय सदस्य रहे हैं।
 

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