आसमां जहांगीर: पाकिस्तान की एक ऐसी शख्सियत, जिनका जाना भारतीयों को भी अखर गया...

Written by Sabrangindia Staff | Published on: February 13, 2018
मानवाधिकारों के लिए जीवन भर लड़ाई लड़ने वाली पाकिस्तानी महिला आसमां जहांगीर नहीं रहीं. दिल का दौरा पड़ने की वजह से लाहौर में उनका निधन हो गया. 66 साल की आसमां जहांगीर दक्षिण एशिया की जानी- मानी वकील थीं. 1952 में जन्मीं आसमां जहांगीर पंजाब यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई की थी. 1980 में लाहौर हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट की वकील बनीं. आसमां पाकिस्तान में बार एसोसिएशन की अध्यक्ष बनने वाली पहली महिला थीं. कुलभूषण जाधव को जब पाकिस्तान ने काउंसलर नहीं दिया तो आसमां ने इसे लेकर कड़ा विरोध दर्ज काराया था. आसमां जहांगीर को भारत में भी याद किया गया. जानिए लोगों ने किस तरह आसमां जहांगीर को याद किया....


वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी लिखते हैं...
आस्मा जहांगीर का जाना पाकिस्तान में ही नहीं, भारत में भी बहुत सोगवार गुज़रा है। पाकिस्तान के नाम से इन दिनों छड़क खाने वाले ऑल इंडिया रेडियो तक ने आस्मा के इंतक़ाल की ख़बर विस्तार से प्रसारित की। यक़ीनन आस्मा नागरिक अधिकारों के संघर्ष में अपने जुझारू तेवरों के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में आदर से देखी जाती थीं।

उनसे छोटी-सी मुलाक़ात जयपुर में हुई थी। कोई आठ साल पहले। वे जयपुर साहित्य उत्सव (JLF) में शिरकत करने आई थीं। मेरे मित्र सिद्धार्थ वरदराजन द्वारा संचालित एक सत्र में उन्होंने हिस्सा लिया। पर मेरी भेंट सांगानेर हवाई अड्डे पर हुई। वे भी उसी विमान से दिल्ली आ रही थीं। उनके काम से मैं ख़ूब वाक़िफ़ था, लेकिन उनकी विनयशीलता को संयोगवश हुई इस मुलाक़ात में पहचाना। इधर-उधर की सरसरी बातचीत - कुछ साहित्य कुछ संगीत, भारत-पाक सियासी तेवर - के दौरान घड़ी भर को महसूस नहीं होता था कि वे भारत में पाकिस्तान की आगंतुक हैं।

पाकिस्तान के बहुत-से लेखकों, कलाकारों, नेताओं, पत्रकारों और अन्य नागरिकों से मिला हूँ। ज़्यादातर वक़्त, कहीं न कहीं, अपने वतन की दबी-छुपी गाँठ को आप उनमें और वे शायद हम में भाँप ले सकते हैं। पर कुछेक लोगों से मिलने पर यह बोध दूर तक विगलित रहा है कि सामने की शख़्सियत भारतीय नहीं है। इस हवाले से बेसाख़्ता मेहदी हसन याद आते हैं, दूसरी फ़हमीदा रियाज़ और फिर कल रुख़्सत हो चलीं आस्मा जहांगीर।

आस्मा का जाना भारत-पाक दोनों के नागरिक संघर्ष को आहत कर गया है। उनकी याद हम बनाए रखें, ताकि और आस्माएँ सामने आएँ। यहाँ भी। वहाँ भी।

पुष्प रंजन लिखते हैं...
आसमाँ जहांगीर का ऐसे चले जाना !
मंडी हाउस इलाक़े का सप्रू हाउस और उसके पीछे गोमती गेस्ट हाउस, सिटी की आबोहवा के वास्ते जेएनयू के छात्रों का दूसरा ठिकाना हुआ करता था. 
शायद 1982 या 83 की बात है, गोमती गेस्ट हाउस के कॉरिडोर में बाज़ दफा एक महिला को बेपरवाह होकर सिगरेट फूंकते देखा करता था. थोड़ा कौतुहल हुआ कि मोहतरमा हैं कौन? ये आसमाँ जहांगीर थीं, जिनसे शनासा होने का सौभाग्य छात्र दिनों से हुआ. 80 के दशक में आसमाँ जहांगीर के ठहरने का ठिकाना गोमती गेस्ट हाउस ही हुआ करता था.

संभवतः, जेएनयू की आबोहवा का असर था कि आसमाँ जहांगीर पाकिस्तान में सताए हिन्दुओं, ईसाईयों, और दूसरे अल्पसंख्यकों की आवाज़ बन गयीं. फौजी शासन और कठमुल्लों के ज़ुल्म-बद्ज़ाती के विरुद्ध लड़ने का जिगरा होना चाहिए.

बिना लाग-लपेट के, साफ़-साफ़ कहने की बरहनगोई आसमाँ जहांगीर में थी. जर्मनी से जब भी पाकिस्तान के हालात को जानने के वास्ते फोन करता, आसमाँ जहांगीर खुलकर बात करती थीं. पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के बारे में 2005 में एक फीचर तैयार करने में आसमाँ जहांगीर ने मेरी काफी मदद की थी.
अफ़सोस कि अल्पसंख्यकों की वो आवाज़ अब नहीं रहीं !

कुंवर अतीक अहमद लिखते हैं...
आसमा जहांगीर का हर कदम मानवता की रक्षा के लिए था।
वह पाकिस्तान में ईश निंदा जैसे अमानवीय कानून को वह जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती थी।
ताकि इस बहाने से वहां की निर्दाेष माइनॉरिटीज को तंग न किया जाए।
आपकी कमी खलेगी। 
आपकी स्मृति को नमन।

अब्दुल गफ्फार लिखते हैं...
पाकिस्तान की प्रख्यात मानवाधिकार वकील और सामाजिक कार्यकर्ता तथा देश के सशक्त सैन्य प्रतिष्ठान की मुखर आलोचक आसमां जहांगीर का कल दिल का दौरा पड़ने से इंतक़ाल हो गया। उनकी मौत से पाकिस्तान में लोकतंत्र,मानवाधिकार,धर्मनिरपेक्षता,महिलाओं की आज़ादी और भारत-पाक दोस्ती की एक मज़बूत आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई। उन्हें पाकिस्तानी हिंदुओं की आवाज़ उठाने के लिए भी जाना जाता था। कई बार पाकिस्तानी हिंदुओं के समर्थन में वो सरकार से लड़ भी गईं।

पाकिस्तान में वे एक मशहूर वकील थीं और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की पुर्व अध्यक्ष के साथ सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन की महाशक्ति के रूप में जानीं जाती थीं। उनकी मौत से पाकिस्तान के वकीलों में और बार में एक रिक्त स्थान पैदा हो गया है।

वह राजनीति में सेना की भूमिका के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की सबसे बड़ी आवाज़ थी। मिसाल के तौर पर आसमां का एक वीडियो भारत में वायरल हुआ था। आसमां ने पाकिस्तानी सेना को कब्ज़ा करने वाला ग्रुप बता दिया था।

भारत-पाकिस्तान के बेहतर रिश्तों की आसमां जहांगीर हमेशा वकालत करती थीं और इस रिश्ते की सबसे बड़ी समर्थक थीं। आसमां जहांगीर के रूप में भारत-पाकिस्तान रिश्तों की वकालत करने वाली एक बड़ी आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई। शायद इसीलिए आसमां की मौत के बाद पाकिस्तान से ज़्यादा भारत को नुकसान हुआ है।

1983 में पाकिस्तान में एक 13 साल की अंधी लड़की साफिया का बलात्कार हुआ। ये बलात्कार साफिया को नौकरी पर रखने वालों ने ही किया था। साफिया प्रेगनेंट हो गई। उसे ज़िना (शादी से पहले अवैध संबंध) के जुर्म में जेल में डाल दिया गया। लेकिन आसमां जहांगीर खुलकर साफिया के पक्ष में खड़ी हो गईं।

कुलभूषण जाधव को जब पाकिस्तान में काउंसलर नहीं दिया गया तो आसमां ने इसकी मुखालिफत की। आसमां ने कहा था, 'जाधव को काउंसलर नहीं देना बड़ी गलती है। इससे भारतीय जेलों में बंद कैदियों के अधिकारों पर ख़तरा बढ़ेगा। अंतर्राष्ट्रीय कानून नहीं बदल सकते।'

आसमां के जाने के बाद उनके काम को आगे कौन बढ़ाएगा फ़िलहाल पता नहीं है लेकिन आसमां जो करके गई हैं वो तारीख़ में दर्ज रहेगा।

हरिशंकर शाही लिखते हैं...
आस्मां जहाँगीर के बारे में तब कुछ लिख पाऊँगा जब उनके स्तर के, किसी मानवाधिकार के पैरोकार. का साथ यहाँ भारत में देने योग्य हो जाऊँगा.... बाकी आस्मां को किसी की फिक्र नहीं थी, मेरी संवेदनाएँ और श्रद्धांजलि से कहीं ऊपर थी और हैं वो... एक बार फोन से बात हुई थी... उम्मीद थी कि किसी दिन पाकिस्तान जाऊँगा तो आपसे मिलूँगा... अलविदा.. (सुबह से लिखने से बच रहा था एक परिचित ने कहा क्या नाम लेने से बच रहे हो, तो बस)

आशुतोष आर्यन लिखते हैं...
पाकिस्तान के लाहौर से एक बेहद दुखद खबर है। पाकिस्तान की मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्त्ता आसमां जहांगीर का इंतकाल हो गया. जीवन भर जनता के लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए सतत संघर्ष करने वाली आसमां जहांगीर का दिल का दौरा पड़ने से आज कुछ घंटे पहले मृत्यु हो गई. भारत के हिन्दूओं पर हो रहे निर्मम व्यवहार से लेकर कुलभूषण जादव को काउंसिलर ना मिलने का मुखालफत करती रही. वे अपने अल्पसंख्यक आबादी पर हो रहे जुल्मोसितम के लिए जानी-मानी एक बेखौफ आवाज थीं. पाकिस्तान के तानाशाह व कट्टरपंथी शक्तियों के खिलाफ बहादुरी के साथ उन्होंने आवाज बुलंद किया.उन पर भी कई तरह के फर्जी आरोप लगते रहे.

लेकिन इन बातों का उन्होंने कोई परवाह किए बगैर साहसिक तरीके से आजीवन भर सामना किया. मानवाधिकार लड़ाई की चैंपियन को आज हमने शायद खो दिया. जीवन भर पाकिस्तानी आवाम के पक्ष में न्याय की लड़ाई लड़ती रहीं.जीवन के अंतिम समय तक पाकिस्तानी जनता के लिए प्रखर व बुलंद आवाज बनी रहीं.आस्मां को दुनिया भर के तमाम मंचों पर बोलने के लिए बुलाया जाता था. पाकिस्तान में वो उन गिनी-चुनी आवाजों में से शायद एक थीं जो खुले तौर पर सैन्य शासन और सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर बोला करती थीं. उनका जाना पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए अपूरणीय क्षति है.आप हमारे लिए प्रेरक हैं.आपको हमारी तरफ से आखिर सलाम.

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